मौत का चक्कर
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Saturday, 28 December 2024
611. नौकरी डाॅट काॅम - वेदप्रकाश शर्मा
एक लड़की रहस्यमयी
नौकरी डाॅट काॅम- वेदप्रकाश शर्मा
केवल दस हजार रुपए महीना की पगार पाने के लिए वह
नौकरी डॉट कॉम में काम करती थी मगर उसका महीने का खर्च लाखों रुपए था।
मुंबई अंडरवर्ल्ड का सबसे बड़ा डॉन भी उससे डरता था। क्या था इस रहस्यमय लड़की का राज ?
इस उपन्यास में बताने जा रहे हैं- वेद प्रकाश शर्मा ।
उपन्यास आरम्भ करने से पहले हम एक नजर उपन्यास के प्रथम पृष्ठ की कुछ पंक्तियों पर डाल लेते हैं।
कॉलबेल बजी ।
इंस्पेक्टर अबोध ने दरवाजा खोला।
वह अड़तालीस-पचास साल के लपेटे का शख्स था।
जब वह सामने वाले से बातें करता था तो आदतन उसका हाथ अपने सिर पर पहुंच जाता था और वेख्याली में अधगंजी चांद को सहलाने लगता था, मगर जैसे ही ख्याल आता था, फौरन सिर से हाथ झटक लेता था और अपनी आंखों पर लगे नजर के चश्मे को उतारकर बेवजह रूमाल से साफ करने लगता था।
सामने उमेश हांडा खड़ा था।
इंस्पेक्टर उछल पड़ा।
पलभर के लिए तो उसे यकीन ही न आया कि वह जो देख रहा है, वह सच हो सकता है। सामने खड़े इंसान को पहचानने में उससे कोई गलती नहीं हुई थी।
बेध्यानी में तत्काल हाथ अधगंजी चांद की शोभा बढ़ाने लगा ।
उमेश हांडा उसे देखकर बेहद चित्ताकर्षक अंदाज में
और अब बात करते हैं उपन्यास के कथानक की।
यह कहानी है नीलिमा/ नीलम नामक एक युवती की, जो पन्द्रह हजार की नौकरी करती है, पर उसका रहन सहन उच्च श्रेणी का है। करोड़ों का बंगला, लाखों की कार और लंदन से शिक्षा प्राप्त खूबसूरत युवती है।
नीलिमा का तीन बार कार एक्सीडेंट हो चुका है और संयोग से वह तीनों बार बच गयी। और स्वयं नीलिमा का मानना है उसकी मौत जब भी होगी गोली से होगी ।
“मैं सच कह रही हूं हसबैंड जॉनी । मेरी मौत रोड एक्सीडेंट में नहीं लिखी।"
"तो फिर कैसे लिखी है?"
"गोली से ।"(पृष्ठ-22)
Monday, 15 July 2024
Sunday, 14 July 2024
603. विनाशदूत विकास- वेदप्रकाश शर्मा
विश्व के लिए खतरा बना विकास
विनाशदूत विकास- वेदप्रकाश शर्मा , तृतीय भाग
अमेरिका के जलील हुक्मरानो, कान खोलकर सुनो, मुझे मंगल-सम्राट कहो या विनाशदूत, मैं तुमसे मुखातिब हूं और कहना ये चाहता हूं कि तुम लोगों ने अपने देश के शहरों में होता हुआ विनाश तो देख ही लिया होगा। मेरे पास इतनी शक्ति है कि दस मिनट के अंदर पूरे अमेरिका को तबाह कर सकता हूं, लेकिन मेरा सिद्धांत तुम्हारे सिद्धांत की तरह नीच नहीं है। विश्व के पर्दे से किसी भी देश का नामो-निशान मिटाना मैं उचित नहीं समझता। विकास अब भी तुम्हें मौका देता है कुत्तों, मेरे देश से यह भयानक जाल हटा लो। मेरी तरफ से इसके लिए पैंतालीस दिन निश्चित हैं। याद रखना, अगर पैंतालीस दिन के अंदर मेरे देश से सी.आई.ए. का जाल नहीं हटवाया तो अमेरिका का एक भी बच्चा छियालिसवें दिन का सूरज नहीं देख सकेगा।वेदप्रकाश शर्मा 'विजय-विकास' सीरीज के अंतर्गत महत्वपूर्ण खण्ड में से हमारे पास है चार उपन्यासों में फैली एक विस्तृत कहानी । जिसके दो भाग 'अपराधी विकास' और 'मंगल सम्राट विकास' पर हम चर्चा कर चुके हैं। अब बात करते हैं इस कहानी के तृतीय भाग 'विनाशदूत विकास' की।
रियाब्लो यान के एक भाग को अलग कर विकास अपने साथी टुम्बकटू और धनुषटंकार के साथ जा पहुंचता है मंगल ग्रह पर और वह सिंगही की जगह स्वयं को सम्राट स्थापित कर लेता है।
विकास मंगल-सम्राट के रूप में हीरे जड़ित सिंहासन पर विराजमान था। धनुषटंकार उसकी गोद में बैठा दनादन शराब पी रहा था और टुम्बकटू सिंहासन के दाईं ओर लहरा रहा था। वह अपनी विचित्र सिगरेट का आनंद ले रहा था। विकास के सुंदर जिस्म पर हीरे-जवाहरातों से जड़ा हुआ चमचमाता लिबास था। गोरे मस्तक पर एक मुकुट था ।
यहाँ विकास की मुलाकात मंगलग्रह के वास्तविक लोगों से होती है। इन लोगों से ही सिंगही से मंगल की सत्ता छीनी थी। मंगलग्रह के पूर्व सम्राट के भाई जाम्बू की मदद से विकास अपना कार्य आगे बढाता है।
वहीं सिंगही के हैडक्वार्टर पर उसकी मुलाकात तुंगलामा से होती है। (विजय-विकास और अंतरराष्ट्रीय जासूस 'मैकाबर सीरीज' में तुंगलामा को पराजित कर चुके हैं।)
तुंगलामा एक महानी वैज्ञानिक है और उसके सहयोग से विकास अमेरिका पर आतंक फैलाना आरम्भ करता है।
संपूर्ण अमेरिका चौंक पड़ा।
न केवल चौंक पड़ा बल्कि कांप उठा। घटना ही ऐसी थी। न्यूयार्क! अमेरिका की भूतपूर्व राजधानी। घटना वहां की है। अमेरिका की सर्वोत्तम जासूसी संस्था सी.आई.ए.। इसी संस्था के चीफ का नाम था-फ्रिदतोफ नार्वे । सर्वविदित, सर्वविख्यात । सभी जानते थे कि फ्रिदतोफ नार्वे सी.आई.ए. का चीफ था, लेकिन इस व्यक्ति के साथ बड़ी अजीब-सी घटना पेश आई। ऐसी अजीब कि सरकारी मशीनरी हिलकर रह गई। फ्रिदतोफ नार्वे को देखते ही प्रत्येक व्यक्ति पहले कहकहा लगाता, फिर भयभीत होता और फिर आतंकित हो उठाता।
सी.आई.ए. के चीफ के साथ यह घटना हुई और सी.आई. ए. कुछ कर भी न सकी।
दर असल तुंगलामा के विशेष प्रयोग कीमदद से एक ऐसा इंजेक्शन तैयार करता है, जिसकेलगाने से व्यक्ति स्वयं को बिल्ली महसूस करता है और बिल्ली जैसी ही हरकते करता है।
अमेरिका में हर रोज बिल्ली बनने वालों की संख्या बढती जाती है।
दूसरी तरफ यान का द्वितीय भाग भी मंगलग्रह की ओर बढ रहा था, जिसमें विजय, अलफांसे, प्रिंसेज जैक्शन, पूजा,वैज्ञानिक सुभ्रांत और उसने सहयोगी थे। इनका एक जी मकसद था किसी भी तरह विकास को अपराधी बनने से रोका जाये। पर विकास कहां रुकने वाला था। वह तो विनाशदूत बनकर अमेरिका को तबाह करने पर तुला था।
बादल पुनः गरजे, बिजली फिर चमकी ! इस बार ज्यूरेज के निवासियों के इंसानी जिस्म वृक्ष के सूखे पत्ते की भांति कांप उठे। उठे। रीढ़ की हड्डियों में एक ठंडी लहर दौड़ गई। जिसने आकाश पर गरजती हुई बिजली देखी, उसके मुंह से कांपती हुई आवाज निकली।
-“वि...ना...श...दू...त...वि...का...स!"
तुंगलामा के एक महत्वपूर्ण प्रयोग के द्वारा विकास अमेरिका के शहरों पर काला धुंआ और बिजली की चमक पैदा करता और फिर उस शहर को तबाह।
विकास ने अमेरिका को पैंतालीस दिन दिये थे कि वह पैंतालीस दिनों में भारत से सी. आई. ए. का जाल हटा ले या फिर स्वयं को बर्बाद होने के लिये तैयार कर लें।
लेकिन यह भी अमेरिका था इतनी आसान से हार नहीं मानने वाला था।
तुरंत सारे विश्व के प्रमुख देशों की सीक्रेट सर्विस से संबंध स्थापित किए गए।
परिणामातुर न्यूयार्क। एक गुप्त स्थान पर अंतर्राष्ट्रीय जासूसों की एक मीटिंग हो रही थी। मीटिंग में प्रमुख जासूस थे।
अमेरिका से माइक, इंग्लैंड से ग्रीफित, रूस से बागारोफ, पाकिस्तान से चंगेज खां, काहिरा से अख्तर, जर्मन से हैम्बलर, चीन से फांगसान, बांग्लादेश से रहमान, फ्रांस से निवजलिंग, आस्ट्रेलिया से क्लार्क रॉबर्ट और भारत से पहुंचा था सीक्रेट सर्विस का चीफ पवन यानी ब्लैक ब्वॉय। यूं कोई जानता नहीं था कि ब्लैक ब्वॉय भारतीय सीक्रेट सर्विस का चीफ है। वह सीक्रेट सर्विस के एक एजेंट के रूप में ही गृह मंत्रालय से विशेष परमिशन के बाद आया था।
और फिर सभी जासूस एकमत होकर चल पड़े मंगलग्रह पर विनाशदूत विकास को रोकने।
यानी जैकी आर्मस्ट्रांग। विकास का चौथा गुरु। विजय का भी गुरु। उसे जासूसों का देवता कहा जाता था। जैकी एक अखबार का क्राइम रिपोर्टर था। वह भी बुरी तरह बौखलाया हुआ था। वह क्या जानता था कि जिस लड़के को उसने स्वयं जासूसी के अनेक पैतरे सिखाए हैं, वही एक दिन अमेरिका के लिए काल बन जाएगा। वह जानता था कि विकास अपरिमित शक्ति और विलक्षण बुद्धि का मालिक है। उसे आज भी वे दिन याद हैं जब विकास उसके पास ट्रेनिंग ले रहा था और अचानक वह माफिया के विरुद्ध भड़क गया था। तब उसके मना करने पर भी यह लड़का माफिया से टकरा गया था। (पृष्ठ62)
जैकी और मारिया का पुत्र हैरी, जो की विकास का अच्छा दोस्त है और दोनों 'प्रलयंकारी विकास' केस में अमेरिकन माफिया को पराजित कर चुके हैं।
और एक दिन हैरी अपने घर, अपने कमरे में बिल्ली बना पाया गया।
दोस्तो, यह था 'विनाशदूत विकास' उपन्यास का संक्षिप्त सार। हालांकि उपन्यास की कहानी इसके चतुर्थ भाग 'विकास की वापसी' में खत्म होगी।
जहाँ एक तरफ विकास अपराधी बन चुका है। वह अमेरिका के शहरों को तबाह कर रहा है। विजय-अलफांसे के अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय जासूस भी विकास को रोकने हेतु मंगलग्रह की ओर रवाना हो चुके हैं।
अब सफलता किसे मिलेगी और क्या विकास की वापसी इतनी आसानी से हो जायेगी।
वैसे वेदप्रकाश शर्मा जी के उपन्यासों में विजय-विकास नारी से दूर ही रहते हैं लेकिन यहाँ तो विकास पूजा को मंगलग्रह तक साथ ले आया और पूजा विकास से अथाह प्रेम करती है।
क्या परिणाम निकला इस प्रेम कहानी का?
यह सब बाते तो उपन्यास को पढकर जाने तो ज्यादा सही रहेगा।
उपन्यास रोचक है और जासूस वर्ग के कारनामे पसंद करने वाले पाठकों के लिए अच्छा मनोरंजन भी, क्योंकि यहाँ रूस का प्रसिद्ध जासूस बागारोफ भी है।
वेदप्रकाश शर्मा जी द्वारा रचित 'विनाशदूत विकास' इस शृंखला का तृतीय उपन्यास है। जो मंगलग्रह की धरा से संबंधित है।
एक्शन और रोमांच से भरपूर कथानक है।
उपन्यास- विनाशदूत विकास
लेखक- वेदप्रकाश शर्मा
इस शृंखला के अन्य उपन्यास - लिंक
अपराधी विकास- प्रथम भाग
मंगल सम्राट विकास- द्वितीय भाग
विनाशदूत विकास- तृतीय भाग
विकास की वापसी - चतुर्थ भाग
602. मंगल सम्राट विकास - वेदप्रकाश शर्मा
क्या बन सका विकास मंगल सम्राट?
मंगल सम्राट विकास- वेदप्रकाश शर्मा (द्वितीय भाग)
नमस्ते पाठक मित्रो,
हमने वेदप्रकाश शर्मा जी द्वारा लिखित 'अपराधी विकास' में पढा की अमेरिका से बदला लेने के लिए विकास अपराधी बन जाता है और विश्व के अपराधियों से मदद की गुहार लगाता है।
विकास की मदद के लिए मर्डरलैण्ड से प्रिंसेज जैक्सन, अंतरराष्ट्रीय अपराधी अलफांसे और चन्द्रमा का भगोड़ा अपराधी टुम्बकटू पहुंचते हैं।
यहां विकास, पूजा और धनुषटंकार से मिलकर चर्चा करते हैं।
यहां एक विषय यह भी उठता है कि ब्रह्माण्ड का अपराधी सिंहंगी क्यों नहीं पहुंचा।
यहाँ सभी विकास को समझाते हैं पर जिद्दी विकास किसी की भी बात नहीं सुनता। उसका एक ही उद्देश्य था अपराधी बनकर अमेरिका को खत्म करना।
एक तो अमेरिका को खत्म करना आसान काम नहीं था, दूसरा स्वयं प्रिंसेज जैक्शन भी अमेरिकन थी। वह भी अमेरिका की तबाही नहीं देखना चाहती थी।
इसलिए प्रिसेंज जैक्सन ने बात को घूमाकर सिंगही की तरफ कर दिया ।
प्रिसेंज का कहना था अगर सिंगही हमारी मदद करे तो हमें सफलता अवश्य मिलेगी। पर सिंगही है कहां?
वहीं जब विजय को यह खबर मिलती है तो वह भी चन्द्रमा पर जाने की तैयाई करता है।
भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक सुभ्रांत ने एक विशेष यान बनाया था जो चन्द्रमा तक जा सकता है। इस यान में विजय, सहयोगी अशरफ, वैज्ञानिक सुभ्रांत और उसके तीन सहयोगी चन्द्रमा की तरफ रवाना होते हैं।
लेकिन चन्द्रमा तक पहुंचना इतना आसान नहीं था। दोनों टीमें ही रास्ते से वापस पलट जाती हैं और अपने यान का एक हिस्से भी उन्हें खत्म करना पड़ता है।
चलते -चलते यह भी बता दें भारतीय वैज्ञानिक सुभ्रांत (पूर्ण उपन्यास नाम) द्वारा निर्मित यान की ही नकल प्रिंसेज जैक्सन ने की थी पर बस फर्क इतना था कि प्रिंसजे मैक्स के यान की रफ्तार सुभ्रांत के यान से दोगुनी थी। जहाँ विजय -सुभ्रांत आदि को चन्द्रमा पर पहुंचने में दो महिने लगने थे वहीं विकास - प्रिंसेज जैक्शन आदि को मात्र एक महिना।
जब दोनों यान रास्ते से वापसी पलट आते हैं तो दोनों की आपस में मुलाकात होती है और दोनों यान मिलकर एक बन जाते हैं।
लेकिन यहाँ विकास चालाकी खेल जाता है वह टुम्बकटू और धनुषटंकार के साथ यान के एक हिस्से को अलग कर चन्द्रमा की यात्रा आरम्भ कर देता है।
चन्द्रमा की दुनिया में बनी अजीब है। यहाँ के मूल निवासी ऊपर पैर और नीचे सिर कर के चलते हैं। (लेखक ने कल्पना ही अजीब की है।) उनके सिर पर बाल नहीं होते और मात्र एक आंख होती है।
मित्रों यह आलेख पढकर आपको उपन्यास की कहानी का अंदाज हो गया होगा और आप सोच रहे होंगे की सारी कहानी तो यह लिख दी, अब उपन्यास में क्या रह गया।
सोचो जरा, उपन्यास का नाम है 'मंगल सम्राट विकास' और वर्तमान में मंगल के वास्तविक राजा को खत्म कर वहां का क्रू्र शासक है बना है 'सम्राट सिंगही'।
- क्या सिंगही आसानी से विकास को सम्राट बनने दे देगा?
- क्या वह विकास का अमेरिका अभियान में सहायक बनेगा?
आदि महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर उपन्यास पढने पर ही मिलेंगे। इसलिए आप निश्चिंत होकर इस आलेख का आनंद लीजिये।
यहां विकास , टुम्बकटू और धनुषटंकार तीनों ही मंगल ग्रह पर अज्ञात और उल्टे लोगों की कैद में फंस जाते हैं।
अब मंगलग्रह की कुछ और बातें कर लेते हैं।
सिंगही स्वयं एक खतरनाक अपराधी है जो मूलतः चीन का है। लेकिन सिंगही का एक ही उद्देश्य है विश्व सम्राट बनना और इसके लिए वह निरंतर प्रयासरत रहता है। यहाँ भी एक खतरनाक वैज्ञानिक तुंगलामा (मैकाबर सीरीज का मुख्य अपराधी) की सहायता से नये प्रयोग करता है।
मंगलग्रह पर एक और विशेष पात्र है जाम्बू।
जाम्बू मंगलग्रह के सम्राट का भाई है, जो सिंगही को सम्राट पद से हटाकर पुनः स्थानीय जनता का शासन चाहता है। इसका दल क्रांतिकारी कहलाता है। हालांकि बहुत से मंगलवासी सिंगही के अधीन कार्य करते हैं।
देखा जाये तो उपन्यास के अंत में कई तरह की परिस्थितियाँ बनती हैं।
- सिंगही का विकास को सम्राट बनाना या न बनाना।
- विकास -जैक्शन समूह का संघर्ष ।
- जाम्बू और साथियों का सिंगही से संघर्ष ।
वेदप्रकाश शर्मा जी की एक विशेषता रही है वह अपने उपन्यासों में पौराणिक पात्रों के उदहारण विशेष रूप अए देते हैं।
जैसे की प्रस्तुत उपन्यास में 'हेम्बारा' को हनुमान जी के प्रसंग से स्पष्टता किया है।
बहुत से उपन्यासों में जानवरों का रोचक वर्णन पढने को मिलता है। प्रस्तुत उपन्यास में भी 'हेम्बारा' नामक एक मंगलग्रह के जानवर का वर्णन है, जो काफी रोचक है।
"जी हां। यहां उस जानवर को 'हेम्बोरा' कहते हैं। उसका शरीर तो आपने देखा ही है कि कितना बड़ा है। यहां का वह जानवर बेहद खतरनाक है। वह अपने मुंह से आग उगलता है। वह चार-चार, पांच-पांच वर्ष तक एक ही स्थान पर पड़ा रहता है। किंतु जब खड़ा होता है तो समझ लो कयामत आती है। अपने आसपास के इलाके में वह प्रलय मचा देता है। इतना शक्तिशाली है कि तुम्हारा यान उसके जिस्म पर उतर गया और वह हिला तक नहीं। इसके विषय में जब यहां के लोगों से पहली बार सुना तो अपने प्राचीन ग्रंथ महाभारत की वह घटना याद आई थी जिसमें भीम एक पुष्प लेने आता है और बीच में हनुमानजी इस प्रकार की एक चट्टान के रूप में मिलते हैं। वास्तव में हेम्बोरा भी हनुमानजी की ही भांति शक्तिशाली
है। तुमने देखा होगा कि उन चट्टानों में से पानी रिस रहा था।
दरअसल वह पानी नहीं बल्कि हेम्बोरा का पसीना था। उसके जिस्म में क्योंकि बहुत गर्मी है इसलिए बेहद पसीना निकलता है। तुम्हारी जानकारी हेतु बता दूं कि वह पसीना जहरीला है। उसे पीते ही आदमी का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। चट्टानों के रूप में उसकी हड्डियां थीं। जहां तुम उतरे थे, वह हेम्बोरा के पेट वाला स्थान था, जिधर तुम जा रहे थे, उधर हेम्बोरा का मुख था। अगर तुम बीच में ही हीरे पर न उतर जाते और मुंह की तरफ जाते तो वह भंयकर
आग से तुम्हें भस्म कर देता। खैर, छोड़ो, उसके विषय में तुम्हें बाद में विस्तृत जानकारी दूंगा - इस समय हमारे लिए सबसे बड़ा मसला है सिंगही।"
वेदप्रकाश शर्मा जी की भाषा की बात करें तो उनके लेखन में अक्सर ग्रामीण शब्द झलकते हैं। कुछ बातें हम खड़ी बोली हिंदी में स्पष्ट नहीं कर पाते, वहाँ हमें स्पष्टीकरण हेतु आंचलिक/ ग्रामीण शब्दावली का प्रयोग करना पड़ता है।
जैसे वेदप्रकाश जी के उपन्यास में दरवाजे हुते शब्द प्रयुक्त होता है- दरवाजा उढका हुआ था।
यहां भी 'चिंगल', काबले आदि शब्द हमें पढने को मिलते हैं।
उदाहरण- "आप लोग नाइंटी डिग्री के कोण पर घूमिए, उसके बाद एक सौ अस्सी डिग्री का कोण बनाते हुए सर्जिबेण्टा के सुराखों में अपने काबले डालिए।"
अगर आप विजय-विकास के एक्शन -रोमांच उपन्यास पसंद करते हैं तो यह आपको अवश्य पसंद आयेगा।
उपन्यास चार भागों में विभक्त है।
उपन्यास- मंगल सम्राट विकास (द्वितीय भाग)
लेखक- वेदप्रकाश शर्मा
प्रथम भाग- अपराधी विकास
तृतीय भाग- विनाशदूत विकास
मंगल सम्राट विकास- वेदप्रकाश शर्मा (द्वितीय भाग)
नमस्ते पाठक मित्रो,
हमने वेदप्रकाश शर्मा जी द्वारा लिखित 'अपराधी विकास' में पढा की अमेरिका से बदला लेने के लिए विकास अपराधी बन जाता है और विश्व के अपराधियों से मदद की गुहार लगाता है।
विकास की मदद के लिए मर्डरलैण्ड से प्रिंसेज जैक्सन, अंतरराष्ट्रीय अपराधी अलफांसे और चन्द्रमा का भगोड़ा अपराधी टुम्बकटू पहुंचते हैं।
यहां विकास, पूजा और धनुषटंकार से मिलकर चर्चा करते हैं।
यहां एक विषय यह भी उठता है कि ब्रह्माण्ड का अपराधी सिंहंगी क्यों नहीं पहुंचा।
यहाँ सभी विकास को समझाते हैं पर जिद्दी विकास किसी की भी बात नहीं सुनता। उसका एक ही उद्देश्य था अपराधी बनकर अमेरिका को खत्म करना।
एक तो अमेरिका को खत्म करना आसान काम नहीं था, दूसरा स्वयं प्रिंसेज जैक्शन भी अमेरिकन थी। वह भी अमेरिका की तबाही नहीं देखना चाहती थी।
इसलिए प्रिसेंज जैक्सन ने बात को घूमाकर सिंगही की तरफ कर दिया ।
प्रिसेंज का कहना था अगर सिंगही हमारी मदद करे तो हमें सफलता अवश्य मिलेगी। पर सिंगही है कहां?
"क्योंकि आदरणीय सिंगही धरती पर नहीं हैं।"तो यह काफिला भारत से जा पहुंचता है मर्डरलैण्ड और वहां से एक विशेष यान द्वारा चन्द्रमा की तरफ रवाने होते हैं।
"इसका मतलब उसकी छुट्टी हो गई ?" -
"नहीं...।" प्रिंसेज जैक्सन ने जवाब दिया - "बल्कि
असलियत यह है कि आजकल सिंगही महोदय मंगल ग्रह पर हैं, मंगल ग्रह पर उन्हें एक ऐसा स्थान मिल गया है जहां आबादी है और मंगल ग्रह के विषय में यहां अधिक कहना व्यर्थ होगा, लेकिन मैं सिर्फ इतना कह रही हूं कि आजकल आदरणीय सिंगही मंगलग्रह के सम्राट हैं।...।"
वहीं जब विजय को यह खबर मिलती है तो वह भी चन्द्रमा पर जाने की तैयाई करता है।
भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक सुभ्रांत ने एक विशेष यान बनाया था जो चन्द्रमा तक जा सकता है। इस यान में विजय, सहयोगी अशरफ, वैज्ञानिक सुभ्रांत और उसके तीन सहयोगी चन्द्रमा की तरफ रवाना होते हैं।
लेकिन चन्द्रमा तक पहुंचना इतना आसान नहीं था। दोनों टीमें ही रास्ते से वापस पलट जाती हैं और अपने यान का एक हिस्से भी उन्हें खत्म करना पड़ता है।
चलते -चलते यह भी बता दें भारतीय वैज्ञानिक सुभ्रांत (पूर्ण उपन्यास नाम) द्वारा निर्मित यान की ही नकल प्रिंसेज जैक्सन ने की थी पर बस फर्क इतना था कि प्रिंसजे मैक्स के यान की रफ्तार सुभ्रांत के यान से दोगुनी थी। जहाँ विजय -सुभ्रांत आदि को चन्द्रमा पर पहुंचने में दो महिने लगने थे वहीं विकास - प्रिंसेज जैक्शन आदि को मात्र एक महिना।
जब दोनों यान रास्ते से वापसी पलट आते हैं तो दोनों की आपस में मुलाकात होती है और दोनों यान मिलकर एक बन जाते हैं।
लेकिन यहाँ विकास चालाकी खेल जाता है वह टुम्बकटू और धनुषटंकार के साथ यान के एक हिस्से को अलग कर चन्द्रमा की यात्रा आरम्भ कर देता है।
चन्द्रमा की दुनिया में बनी अजीब है। यहाँ के मूल निवासी ऊपर पैर और नीचे सिर कर के चलते हैं। (लेखक ने कल्पना ही अजीब की है।) उनके सिर पर बाल नहीं होते और मात्र एक आंख होती है।
मित्रों यह आलेख पढकर आपको उपन्यास की कहानी का अंदाज हो गया होगा और आप सोच रहे होंगे की सारी कहानी तो यह लिख दी, अब उपन्यास में क्या रह गया।
सोचो जरा, उपन्यास का नाम है 'मंगल सम्राट विकास' और वर्तमान में मंगल के वास्तविक राजा को खत्म कर वहां का क्रू्र शासक है बना है 'सम्राट सिंगही'।
- क्या सिंगही आसानी से विकास को सम्राट बनने दे देगा?
- क्या वह विकास का अमेरिका अभियान में सहायक बनेगा?
आदि महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर उपन्यास पढने पर ही मिलेंगे। इसलिए आप निश्चिंत होकर इस आलेख का आनंद लीजिये।
यहां विकास , टुम्बकटू और धनुषटंकार तीनों ही मंगल ग्रह पर अज्ञात और उल्टे लोगों की कैद में फंस जाते हैं।
अब मंगलग्रह की कुछ और बातें कर लेते हैं।
सिंगही स्वयं एक खतरनाक अपराधी है जो मूलतः चीन का है। लेकिन सिंगही का एक ही उद्देश्य है विश्व सम्राट बनना और इसके लिए वह निरंतर प्रयासरत रहता है। यहाँ भी एक खतरनाक वैज्ञानिक तुंगलामा (मैकाबर सीरीज का मुख्य अपराधी) की सहायता से नये प्रयोग करता है।
मंगलग्रह पर एक और विशेष पात्र है जाम्बू।
जाम्बू मंगलग्रह के सम्राट का भाई है, जो सिंगही को सम्राट पद से हटाकर पुनः स्थानीय जनता का शासन चाहता है। इसका दल क्रांतिकारी कहलाता है। हालांकि बहुत से मंगलवासी सिंगही के अधीन कार्य करते हैं।
देखा जाये तो उपन्यास के अंत में कई तरह की परिस्थितियाँ बनती हैं।
- सिंगही का विकास को सम्राट बनाना या न बनाना।
- विकास -जैक्शन समूह का संघर्ष ।
- जाम्बू और साथियों का सिंगही से संघर्ष ।
वेदप्रकाश शर्मा जी की एक विशेषता रही है वह अपने उपन्यासों में पौराणिक पात्रों के उदहारण विशेष रूप अए देते हैं।
जैसे की प्रस्तुत उपन्यास में 'हेम्बारा' को हनुमान जी के प्रसंग से स्पष्टता किया है।
बहुत से उपन्यासों में जानवरों का रोचक वर्णन पढने को मिलता है। प्रस्तुत उपन्यास में भी 'हेम्बारा' नामक एक मंगलग्रह के जानवर का वर्णन है, जो काफी रोचक है।
"जी हां। यहां उस जानवर को 'हेम्बोरा' कहते हैं। उसका शरीर तो आपने देखा ही है कि कितना बड़ा है। यहां का वह जानवर बेहद खतरनाक है। वह अपने मुंह से आग उगलता है। वह चार-चार, पांच-पांच वर्ष तक एक ही स्थान पर पड़ा रहता है। किंतु जब खड़ा होता है तो समझ लो कयामत आती है। अपने आसपास के इलाके में वह प्रलय मचा देता है। इतना शक्तिशाली है कि तुम्हारा यान उसके जिस्म पर उतर गया और वह हिला तक नहीं। इसके विषय में जब यहां के लोगों से पहली बार सुना तो अपने प्राचीन ग्रंथ महाभारत की वह घटना याद आई थी जिसमें भीम एक पुष्प लेने आता है और बीच में हनुमानजी इस प्रकार की एक चट्टान के रूप में मिलते हैं। वास्तव में हेम्बोरा भी हनुमानजी की ही भांति शक्तिशाली
है। तुमने देखा होगा कि उन चट्टानों में से पानी रिस रहा था।
दरअसल वह पानी नहीं बल्कि हेम्बोरा का पसीना था। उसके जिस्म में क्योंकि बहुत गर्मी है इसलिए बेहद पसीना निकलता है। तुम्हारी जानकारी हेतु बता दूं कि वह पसीना जहरीला है। उसे पीते ही आदमी का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। चट्टानों के रूप में उसकी हड्डियां थीं। जहां तुम उतरे थे, वह हेम्बोरा के पेट वाला स्थान था, जिधर तुम जा रहे थे, उधर हेम्बोरा का मुख था। अगर तुम बीच में ही हीरे पर न उतर जाते और मुंह की तरफ जाते तो वह भंयकर
आग से तुम्हें भस्म कर देता। खैर, छोड़ो, उसके विषय में तुम्हें बाद में विस्तृत जानकारी दूंगा - इस समय हमारे लिए सबसे बड़ा मसला है सिंगही।"
वेदप्रकाश शर्मा जी की भाषा की बात करें तो उनके लेखन में अक्सर ग्रामीण शब्द झलकते हैं। कुछ बातें हम खड़ी बोली हिंदी में स्पष्ट नहीं कर पाते, वहाँ हमें स्पष्टीकरण हेतु आंचलिक/ ग्रामीण शब्दावली का प्रयोग करना पड़ता है।
जैसे वेदप्रकाश जी के उपन्यास में दरवाजे हुते शब्द प्रयुक्त होता है- दरवाजा उढका हुआ था।
यहां भी 'चिंगल', काबले आदि शब्द हमें पढने को मिलते हैं।
उदाहरण- "आप लोग नाइंटी डिग्री के कोण पर घूमिए, उसके बाद एक सौ अस्सी डिग्री का कोण बनाते हुए सर्जिबेण्टा के सुराखों में अपने काबले डालिए।"
अगर आप विजय-विकास के एक्शन -रोमांच उपन्यास पसंद करते हैं तो यह आपको अवश्य पसंद आयेगा।
उपन्यास चार भागों में विभक्त है।
उपन्यास- मंगल सम्राट विकास (द्वितीय भाग)
लेखक- वेदप्रकाश शर्मा
प्रथम भाग- अपराधी विकास
तृतीय भाग- विनाशदूत विकास
601. अपराधी विकास- वेदप्रकाश शर्मा
किस राह चला विकास...
अपराधी विकास- वेदप्रकाश शर्मा, प्रथम भाग
"आप ये भी जानते हैं, वो भी जानते हैं! क्या है जो आप नहीं जानते? अगर यह सच है गुरु, तो धिक्कार है तुम पर ! तुम्हारा खून सफेद हो गया है अंकल, तुम्हें गुरु कहते हुए मुझे शर्म आती है। तुम मेरे गुरु नहीं हो सकते। सुना था अंकल, तुम भारत के लिए एक हीरो हो, लेकिन आज पता लगा कि तुम तो कायर हो, बुजदिल हो। जिसका दिल मेरे देश को इतने भयानक जाल में देखते हुए भी क्रांति न कर दे, वह मेरा गुरु नहीं हो सकता अंकल ! आप खुदगर्ज, कायर और बुजदिल हैं..." विकास ने चीखते हुए कहा, "और कान खोलकर सुन लो, अपने देश को बचाने के लिए मैं अपराधी भी बन सकता हूं। सिर्फ अपराधी बनकर ही अमेरिका से मैं बदला ले सकता हूं। मैं अब अपराधी बनूंगा, गुरु, सिंगही दादा से भी खतरनाक अपराधी..."
वेदप्रकाश शर्मा जी ने अपने लेखन के आरम्भिक काल में 'विजय-विकास' शृंखला के एक्शन-जासूसी उपन्यास लिखे थे, जो पाठकों को अत्यंत पसंद भी थे। इनमें से ज्यादातर उपन्यास अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर आधारित होते थे और उनमें जासूस वर्ग के एक्शन कारनामों को दिखाया जाता था। हालांकि तार्किक स्तर पर पाठकों को उपन्यास का कथानक कमजोर प्रतीत हो सकता है लेकिन रोमांच के मामले में नहीं ।प्रस्तुत उपन्यास चार भागों में विभाजित है। प्रथम भाग 'अपराधी विकास', द्वितीय भाग 'मंगल सम्राट विकास', तृतीय भाग 'विनासदूत विकास', चतुर्थ और अंतिम भाग है 'विकास की वापसी'। इन चार उपन्यासों की इस रोचक शृंखला में हम बात करते हैं प्रथम उपन्यास 'अपराधी विकास' की।
जैसा की ऊपर आपने पढा, विकास कह रहा है-"..मैं अब अपराधी बनूंगा, गुरु, सिंगही दादा से भी खतरनाक अपराधी..."
आखिर क्या कारण था, विकास जैसा देशभक्त युवा अपराधी बनना चाहता है और वह भी अंतरराष्ट्रीय और ब्रह्माण्ड के अपराधियों जैसा।
वेदप्रकाश शर्मा जी द्वारा लिखित उपन्यास 'अपराधी विकास' इसी घटनाक्रम पर आधारित है।
अब बात करते हैं 'अपराधी विकास' उपन्यास के कथानक की। इस उपन्यास का आरम्भ B.I.D. College की एक पिकनिक पार्टी से होता है। पार्टी में अधिकांश विद्यार्थी नशे का सेवन करते हैं।
चरस, गांजे, अफीम, हशीश, भंग, शराब इत्यादि मादक पदार्थों की गंध ने वहां के वातावरण को रंगीन बना दिया था। हिप्पी बनने का भयानक रोग उन्हें लग चुका था। एल.एस.डी. पर तो ऐसे झपटते, जैसे चूहे पर बिल्ली। इन्हीं मादक पदार्थों में वे दिल की शांति खोज रहे थे। इन्हीं खोजों में जैसे राम और कृष्ण घुसकर बैठ गए थे। सब कुछ इन्हीं में था।
वाह री भारतीय सभ्यता और संस्कृति ! (पृष्ठ-06)
इसी पार्टी के नशे से दो ही व्यक्ति बचे रहते हैं। एक काॅलेज छात्रसंघ का अध्यक्ष बिशन मल्होत्रा और दूसरा विकास।
लंबा-तगड़ा, गोरा-चिट्टा अठारह वर्षीय विकास अपनी पर्सनैलिटी के कारण बाईस-तेईस की आयु से किसी भी प्रकार कम नहीं लगता था। अब किसी का भी दिल उसे किशोर कहने के लिए नहीं ठुकता था। वह युवक हो चुका था लेकिन उसके गोरे-चिट्टे, गोल और लाल मुखड़े पर अब भी किशोरों जैसी मासूमियत थी। भोला-सा विकास बड़ा प्यारा लगता। अर्द्ध-घुंघराले बाल उसके चेहरे पर खूब फबते थे।
रघुनाथ और रैना का वह लड़का भारत के लिए एक हीरा था।
विकास भी काॅलेज की तरफ से पार्टी में अवश्य था पर वह नशे से दूर था।
यहाँ विकास को यह पता चलता है की विद्यार्थी वर्ग को नशे में झोंकने वाला छात्रसंघ अध्यक्ष बिशन मल्होत्रा है। यही नहीं उसे यह भी पता चलता है इस सब के पीछे अमेरिका का हाथ है और अमेरिका की खूफिया सीक्रेट सर्विस के सदस्य भारत के हर डिपार्टमेंट में घुस चुके हैं और वह भारत को हर संभव क्षति पहुंचाना चाहते हैं।
विकास शीघ्र ही इस विषय पर विजय से मिलता है। भारतीय सीक्रेट सर्विस के वीर एजेंट विजय।
विजय विकास को समझता है की यह सब उसे पता है और इस से निपटना इतना आसान नहीं है। लेकिन विकास तो ठहरा जिद्दी लड़का। और वह विजय को कहता है वह अमरीका का बर्बाद कर देगा। विजय के बहुत समझाने पर भी विकास अपनी जिद्द से नहीं टलता।
विकास विजय को स्पष्ट कहता है-
"...और कान खोलकर सुन लो, अपने देश को बचाने के लिए मैं अपराधी भी बन सकता हूं। सिर्फ अपराधी बनकर ही अमेरिका से मैं बदला ले सकता हूं। मैं अब अपराधी बनूंगा, गुरु, सिंगही दादा से भी खतरनाक अपराधी..."अपने उद्देश्य को सफल बनाने के लिए विकास घर से निकल पड़ता है और भारत में मौजूद दुश्मनों को मारना आरम्भ कर देता है। विकास जनता के सामने अब एक अपराधी बन चुका था और जनता नहीं चाहती थी कि ऐसा अपराधी खुला घूमे...
-"भाइयो, क्या ये सरासर गुंडागर्दी नहीं है? वो कुत्ता विकास सुपर रघुनाथ का लड़का है तो क्या हमारी मां-बहनों पर हाथ डालेगा? क्या हमारी मां-बहनें इस गुंडागर्दी के शासन में सुरक्षित रह सकती है? अगर यही बदमाशी चलती रही तो कभी नहीं रख सकतीं! पूजा हमारे एक साथी की बहन थी। हमारे साथी की बहन हमारी बहन होती है। पूजा मेरी बहन थी। पूजा हम सबकी बहन थी। हम सब इस अपमान का बदला लेकर ही रहेंगे। हमारी सबसे पहली मांग यही है कि पुलिस जल्द-से-जल्द उस कुत्ते विकास को पकड़कर हमारे हवाले कर दे। दूसरी मांग यह है कि हमारी पूजा को उसी तरह पवित्र हमारे सामने लाया जाए जैसी कि वो है। जब तक उस कुत्ते विकास को हमारे हवाले नहीं किया जाएगा और पुलिस हमारी बहन पूजा को न खोज निकालेगी तो हम इस सरकार की ईंट से ईंट बजा देंगे। दोस्तो! वह सुपर रघुनाथ का लड़का है। अगर वो सुपर है तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसका लड़का हमारी मां-बहन की अस्मत पर हाथ डालेगा या हमारे साथियों की हत्या करेगा। हमारी तीसरी मांग यह है कि सुपर रघुनाथ को उनके पद से वंचित कर दिया जाए।"
इधर यह सब चलता रहता और उधर विकास धनुष्टकार और पूजा को साथ लेकर अंतरराष्ट्रीय अपराधियों से जा मिलता है। जिसमें अलफांसे, प्रिंसेज जैक्शन और टुम्बकटू शामिल थे।
विकास उनके सामने भी अमेरिका से बदला लेने और स्वयं के अपराधी बनने की बात रखता है। विकास के इस निर्णय से सब चकित रह जाते हैं।
दूसरी तरफ अमेरिका भी खामोश रहने वाला नहीं था। वह भी विकास की हत्या के लिए अपने श्रेष्ठ जासूस माइक स्पेलन को भारत भेजता है। हालांकि पूर्व में 'प्रयंकारी विकास' और 'मैकाबर सीरीज' में साथ-साथ काम करने के कारण विकास और माइक दोस्त बन चुके थे। पर यहाँ परिस्थिति एक दूसरे के विरुद्ध थी। दोनों के किए अपना देश प्रिय था, अपना कर्तव्य प्रथम था।
अब एक तरफ विकास निकला है अमेरिका को तबाह करने और दूसरी तरफ है माइक, जो विकास की हत्या करना चाहता है।
एक तरफ है विकास जो अपराधी बनना चाहता है और दूसरी तरफ है विजय, जो उसे रोकना चाहता है।
इस संघर्ष में कौन सफल होगा, यह उपन्यास पढने पर ही पता चलेगा।
विकास का जो चरित्र है उसमें लड़कियों की भूमिका नगण्य है। यहाँ एक पात्र है पूजा, जिसे विकास अपने साथ रखता है।
पृष्ठों के हिसाब से उपन्यास लगभग 122 पृष्ठ का है। यह वेदप्रकाश शर्मा का आरम्भिक दौर का उपन्यास है, तब उपन्यास पृष्ठ इतने ही होते थे। इसलिए प्रस्तुत उपन्यास को चार भागों में विभाजित करना पड़ा।
कथा की दृष्टि से अभी तक उपन्यास सामान्य ही है। हालांकि अभी इसके तीन भाग पढने बाकी हैं।
इस उपन्यास के आरम्भ में बी.आई.डी. काॅलेज का जिक्र है। वहाँ से एक अनुमान लगता है कि विकास इसी काॅलेज का विद्यार्थी है, हालांकि पूर्णतः स्पष्ट कहीं नहीं है।
वेदप्रकाश शर्मा जी के कुछ और उपन्यास भी हैं जिसमें उन्होंने अमेरिकी संस्था CIA का वर्णन किया है। जैसे सी.आई.ए. का आतंक।
वेदप्रकाश शर्मा द्वारा लिखित 'अपराधी विकास' एक एक्शन प्रधान उपन्यास है। जिसमें विकास अमेरिका को तबाह करने के लिए अपराधी बनना चाहता है।
उपन्यास- अपराधी विकास
लेखक- वेदप्रकाश शर्मा
प्रकाशक- राजा पॉकेट बुक्स, दिल्ली
पृष्ठ- 122
द्वितीय भाग- मंगल सम्राट विकास
वेदप्रकाश शर्मा जी के अन्य उपन्यासों की समीक्षा
दहकते शहर ।। आग के बेटे ।। केशव पण्डित ।। नसीब मेरा दुश्मन ।। मैकाबर सीरीज ।। खूनी छलावा
Monday, 4 December 2023
Saturday, 24 September 2022
534. दरिंदा- वेदप्रकाश शर्मा
आखिर क्यों बना विकास दरिंदा
दरिंदा- वेदप्रकाश शर्मा
एक तरफ सिंगही का शिष्य वतन था, दूसरी तरफ विजय और अलफांसे का शिष्य विकास। दोनों के टकराव की महागाथा है यह उपन्यास और यह उपन्यास भी यही है जिसमें बताया गया है कि विकास को दरिंदा क्यों जाने लगा। वेदप्रकाश शर्मा जी द्वारा रचित उपन्यास 'हिंसक' का द्वितीय भाग है 'दरिंदा। दोनों उपन्यासों की संयुक्त कथा ब्रह्माण्ड के अपराधी सिंगही से संबंधित है। सिंगही विश्व विजेता बनने के लिए एक वैज्ञानिक एडिसन के साथ मिलकर एक घातक योजना के साथ अपनी चाल चलता है और बना देता है एक हिंसक और एक दरिंदा।
नमस्कार पाठक मित्रो,
आज 'स्वामी विवेकानंद पुस्तकालय' ब्लाग में प्रस्तुत है उपन्यास साहित्य के सितारे वेदप्रकाश शर्मा जी के एक्शन उपन्यास 'दरिंदा' की समीक्षा।
दरिंदा- वेदप्रकाश शर्मा
एक तरफ सिंगही का शिष्य वतन था, दूसरी तरफ विजय और अलफांसे का शिष्य विकास। दोनों के टकराव की महागाथा है यह उपन्यास और यह उपन्यास भी यही है जिसमें बताया गया है कि विकास को दरिंदा क्यों जाने लगा। वेदप्रकाश शर्मा जी द्वारा रचित उपन्यास 'हिंसक' का द्वितीय भाग है 'दरिंदा। दोनों उपन्यासों की संयुक्त कथा ब्रह्माण्ड के अपराधी सिंगही से संबंधित है। सिंगही विश्व विजेता बनने के लिए एक वैज्ञानिक एडिसन के साथ मिलकर एक घातक योजना के साथ अपनी चाल चलता है और बना देता है एक हिंसक और एक दरिंदा।
नमस्कार पाठक मित्रो,
आज 'स्वामी विवेकानंद पुस्तकालय' ब्लाग में प्रस्तुत है उपन्यास साहित्य के सितारे वेदप्रकाश शर्मा जी के एक्शन उपन्यास 'दरिंदा' की समीक्षा।
Wednesday, 14 September 2022
533. हिंसक - वेदप्रकाश शर्मा
जब टकराये विकास और वतन
हिंसक - वेदप्रकाश शर्मा
हिंदी लोकप्रिय जासूसी कथा साहित्य में वेदप्रकाश शर्मा अपनी सशक्त लेखनी के दम पर पाठकों के सर्वप्रिय कथाकार रहे हैं। वेदप्रकाश शर्मा अपने पात्रों के द्वारा एक अलग काल्पनिक संसार की रचना करते हैं और पाठक उसी अद्भुत काल्पनिक संसार को उपन्यास के माध्यम से पढकर आनंदित होता है। कुछ पाठकों को चाहे इनके उपन्यास वास्तविकता के नजदीक नजर नहीं आते, यह सत्य भी है, पर यह भी सत्य है की वेदप्रकाश शर्मा जीके उपन्यास कल्पना की एक नयी उड़ान होते हैं। जो इस संसार में वर्तमान में संभव नहीं उसी असंभव को अपने उपन्यासों में संभव कर के दिखाते हैं। प्रस्तुत उपन्यास 'हिंसक' जिसका द्वितीय भाग 'दरिंदा' है की यहाँ संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत है।
'हिंसक' उपन्यास की कथावस्तु का आरम्भ एक भारतीय वैज्ञानिक से होता है जो अमेरिका से भारत लौटता है लेकिन भ्रष्ट मानसिकता के सहयोगियों के चलते हुये वह गहरी मुसीबतों में फंस जाता है।
हिंदी लोकप्रिय जासूसी कथा साहित्य में वेदप्रकाश शर्मा अपनी सशक्त लेखनी के दम पर पाठकों के सर्वप्रिय कथाकार रहे हैं। वेदप्रकाश शर्मा अपने पात्रों के द्वारा एक अलग काल्पनिक संसार की रचना करते हैं और पाठक उसी अद्भुत काल्पनिक संसार को उपन्यास के माध्यम से पढकर आनंदित होता है। कुछ पाठकों को चाहे इनके उपन्यास वास्तविकता के नजदीक नजर नहीं आते, यह सत्य भी है, पर यह भी सत्य है की वेदप्रकाश शर्मा जीके उपन्यास कल्पना की एक नयी उड़ान होते हैं। जो इस संसार में वर्तमान में संभव नहीं उसी असंभव को अपने उपन्यासों में संभव कर के दिखाते हैं। प्रस्तुत उपन्यास 'हिंसक' जिसका द्वितीय भाग 'दरिंदा' है की यहाँ संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत है।
'हिंसक' उपन्यास की कथावस्तु का आरम्भ एक भारतीय वैज्ञानिक से होता है जो अमेरिका से भारत लौटता है लेकिन भ्रष्ट मानसिकता के सहयोगियों के चलते हुये वह गहरी मुसीबतों में फंस जाता है।
Friday, 5 August 2022
528. C.I.A. का आतंक - वेदप्रकाश शर्मा
विजय का अमेरिकी अभियान
C.I.A. का आतंक - वेदप्रकाश शर्मा
C.I.A. का आतंक - वेदप्रकाश शर्मा
"एक तरफ छात्रों को भड़काना, कुछ नेताओं को विभिन्न प्रकार के लाभ देकर जनता में वर्तमान सरकार के प्रति गलत विचारों का प्रचार करना, पत्रकारों तक को खरीदकर पत्रों द्वारा जनता में गलत भावनाएं भरना, युवा पीढ़ी को मादक वस्तुओं तथा यौवन के सेवन का चस्का डालकर उन्हें पथभ्रष्ट करना, यहां तक कि धर्म में आस्था रखने वाले वर्ग में किसी महापुरुष की हैसियत से अपने किसी सदस्य को उनके बीच पहुंचाना आदि अनेक तरीकों से भारत को अंदर ही अंदर खोखला कर रहे है और दूसरी तरफ भारतीय सुरक्षा सीमाओं पर तैनात फौजों की युद्ध सामग्री को रास्ते में ही नष्ट करना और तीसरी तरफ पाकिस्तान की आधुनिक युद्ध सामग्री देकर उसे पुनः युद्ध के लिए प्रेरित व तैयार करना उनके मुख्य काम हैं।"
C.I.A. अमेरिका की गुप्तचर संस्था है। अमेरिका की यह संस्था भारत में सक्रिय थी और उसका कार्य था भारतीय शासन व्यवस्था को अस्त-व्यस्त करना। इसके लिए वह हिप्पियों के वेश में कुछ असामाजिक तत्वों को भारत में भेजती रही है।
एक दौर था जब हिप्पी लोग भारत में कथित शांति की खोज में आते थे और उस समय अमरीका पाकिस्तान के ज्यादा नजदीक था, वह भारत में आतंकी तत्वों को सक्रिय कर रहा था। उस समय को आधार बना कर वेदप्रकाश शर्मा जी ने 'सी.आई.ए. का आतंक' उपन्यास लिखा है।
Wednesday, 3 August 2022
527. चीते का दुश्मन- वेदप्रकाश शर्मा
कौन बनेगा खजाने का मालिक
चीते का दुश्मन- वेदप्रकाश शर्मा
'बससे बड़ा जासूस' का द्वितीय भाग
लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में दैदीप्यमान सितारे वेदप्रकाश शर्मा जी के आरम्भिक उपन्यास लगभग पार्ट में ही होते थे। वेद जी द्वारा लिखित 'सबसे बड़ा जासूस' उपन्यास का द्वितीय भाग है 'चीते का दुश्मन' अगर आपने प्रथम भाग 'सबसे बड़ा जासूस' उपन्यास/समीक्षा पढी है तो आपको याद होगा पूर्व में अंतरराष्ट्रीय सीक्रेट सर्विस गठन के लिए विश्व के जासूस रूस में एकत्र हुये। वहाँ सीक्रेट सर्विस के गठन के दौरान यह प्रश्न उठा की इस संस्था का प्रमुख कौन होगा? उत्तर आया जो 'सबसे बडा जासूस' होगा वही सीक्रेट सर्विस का प्रमुख बनेगा।
अब सबसे बड़ा जासूस कौन?
इस के लिए अभी चर्चा चल ही रही थी की चन्द्रमा का अपराधी टुम्बकटू वहाँ पहुंच कर समस्त जासूस वर्ग को चैलेंज करता है की जो उसे पकड़ लेगा वह सबसे बड़ा जासूस होगा।
तो सभी जासूस टुम्बकटू के पीछे लग जाते हैं और टुम्बकटू सबको चकमा देता रहता है, आखिर कब तक?
टुम्बकटू का एक और दावा था, वह था उसके पास अथाह खजाना है। जो व्यक्ति उसे पकड़ लेगा वह उस खजाने का मालिक होगा लेकिन उस खजाने को प्राप्त करने के लिए उसे 'चीते का दुश्मन' बनना ही होगा, क्योंकि उस खजाने का रक्षक एक अद्भुत चीता है जो कि चन्द्रमा का निवासी है।
चीते का दुश्मन- वेदप्रकाश शर्मा
'बससे बड़ा जासूस' का द्वितीय भाग
लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में दैदीप्यमान सितारे वेदप्रकाश शर्मा जी के आरम्भिक उपन्यास लगभग पार्ट में ही होते थे। वेद जी द्वारा लिखित 'सबसे बड़ा जासूस' उपन्यास का द्वितीय भाग है 'चीते का दुश्मन' अगर आपने प्रथम भाग 'सबसे बड़ा जासूस' उपन्यास/समीक्षा पढी है तो आपको याद होगा पूर्व में अंतरराष्ट्रीय सीक्रेट सर्विस गठन के लिए विश्व के जासूस रूस में एकत्र हुये। वहाँ सीक्रेट सर्विस के गठन के दौरान यह प्रश्न उठा की इस संस्था का प्रमुख कौन होगा? उत्तर आया जो 'सबसे बडा जासूस' होगा वही सीक्रेट सर्विस का प्रमुख बनेगा।
अब सबसे बड़ा जासूस कौन?
इस के लिए अभी चर्चा चल ही रही थी की चन्द्रमा का अपराधी टुम्बकटू वहाँ पहुंच कर समस्त जासूस वर्ग को चैलेंज करता है की जो उसे पकड़ लेगा वह सबसे बड़ा जासूस होगा।
तो सभी जासूस टुम्बकटू के पीछे लग जाते हैं और टुम्बकटू सबको चकमा देता रहता है, आखिर कब तक?
टुम्बकटू का एक और दावा था, वह था उसके पास अथाह खजाना है। जो व्यक्ति उसे पकड़ लेगा वह उस खजाने का मालिक होगा लेकिन उस खजाने को प्राप्त करने के लिए उसे 'चीते का दुश्मन' बनना ही होगा, क्योंकि उस खजाने का रक्षक एक अद्भुत चीता है जो कि चन्द्रमा का निवासी है।
Monday, 1 August 2022
526. सबसे बडा़ जासूस - वेदप्रकाश शर्मा, भाग-01
आखिर कौन बनेगा - सबसे बड़ा जासूस?
सबसे बड़ा जासूस - वेदप्रकाश शर्मा
अंतरराष्ट्रीय समस्याओं से निपटने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय सीक्रेट सर्विस बनाने का विचार विश्वमंच पर आया, इसके लिए विश्व के श्रेष्ठ जासूस एकत्र हुये और फिर यह मंच स्वयं में एक समस्या बन गया। क्योंकि वहाँ उपस्थित जासूस वर्ग में सभी स्वयं को मानते थे 'सबसे बड़ा जासूस'।
जासूसी साहित्य में वेदप्रकाश शर्मा का नाम अद्वितीय है। उन जैसा लेखन अन्यत्र दुर्लभ है। उन्होंने विजय के साथ स्वयं का मौलिक पात्र 'विकास' सर्जित कर उपन्यास साहित्य में जो 'एंग्रीयंग मैन' वाले उपन्यास रचे हैं वह पाठकवर्ग में एक समय विशेष में अति चर्चित रहे हैं।
विकास एक युवा जासूस है, जो अधिकाश मसले ताकत से सुलझाने में विश्वास रखता है लेकिन वहीं विजय दिमाग का ज्यादा इस्तेमाल करता है। विजय-विकास के अनोखे कारनामे पाठकों बहुत रोचक लगते हैं। एक समय था जब उपन्यास साहित्य में अंतरराष्ट्रीय जासूस वर्ग के एक्शन युक्त कारनामें दिखाये जाते थे।
सबसे बड़ा जासूस - वेदप्रकाश शर्मा
अंतरराष्ट्रीय समस्याओं से निपटने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय सीक्रेट सर्विस बनाने का विचार विश्वमंच पर आया, इसके लिए विश्व के श्रेष्ठ जासूस एकत्र हुये और फिर यह मंच स्वयं में एक समस्या बन गया। क्योंकि वहाँ उपस्थित जासूस वर्ग में सभी स्वयं को मानते थे 'सबसे बड़ा जासूस'।
जासूसी साहित्य में वेदप्रकाश शर्मा का नाम अद्वितीय है। उन जैसा लेखन अन्यत्र दुर्लभ है। उन्होंने विजय के साथ स्वयं का मौलिक पात्र 'विकास' सर्जित कर उपन्यास साहित्य में जो 'एंग्रीयंग मैन' वाले उपन्यास रचे हैं वह पाठकवर्ग में एक समय विशेष में अति चर्चित रहे हैं।
विकास एक युवा जासूस है, जो अधिकाश मसले ताकत से सुलझाने में विश्वास रखता है लेकिन वहीं विजय दिमाग का ज्यादा इस्तेमाल करता है। विजय-विकास के अनोखे कारनामे पाठकों बहुत रोचक लगते हैं। एक समय था जब उपन्यास साहित्य में अंतरराष्ट्रीय जासूस वर्ग के एक्शन युक्त कारनामें दिखाये जाते थे।
Tuesday, 1 June 2021
436. सिंगही और मर्डरलैण्ड- वेदप्रकाश शर्मा
जब टकराई विश्व की दो महाशक्तियां
सिंगही और मर्डरलैण्ड- वेदप्रकाश शर्मा
मनुष्य की लालसा कभी शांत होने का नाम नहीं लेती। वह एक सफलता के पश्चात दूसरी सफलता की तलाश में निकल लेती है। लेकिन जब यह लालसा हवश में बदल जाये और हवश भी विश्व पर आधिपत्य की तो...?
ऐसा ही कुछ उपन्यास 'सिंगही और मर्डरलैण्ड' में है। जहां विश्व की दो महाशक्तियां आप में टकराती हैं और उनके मध्य होता है महा संग्राम। अब कुछ चर्चा उपन्यास कथानक पर-
- मोन्टोफो- रूस का योग्य वैज्ञानिक ।(पृष्ठ-60)
- मिस्टर एबनर भारत के प्रमुख वैज्ञानिक हैं। उन्होंने हाल ही मैं एक आश्चर्य में डाल देने वाला आविष्कार किया है। आविष्कार भी इतना महत्वपूर्ण है कि वह जिसके हाथ लग जाएगा वह देश संसार का सर्वशक्तिशाली देश बन जायेगा। (पृष्ठ-11)
- न्यूयॉर्क ही नहीं बल्कि अमेरिका के प्रसिद्ध व होनहार वैज्ञानिक का नाम था- जान माल्टेन।(पृष्ठ-29)
- बांग्लादेश का वैज्ञानिक सरजात।
लेकिन फिर एक एक के विश्व के वैज्ञानिक गायब होते चले गये। लेकिन गायब होने के साथ ही उनके साथ एक अजीब घटना घटित होती और वह समस्त विश्व के लिए आश्चर्यजनक घटना बनती।
जैसे अमेरिका के प्रसिद्ध वैज्ञानिक के साथ हुआ-
वह किसी बिल्ली की भांति घुटनों के बल फर्श पर बैठा था और ठीक बिल्ली की भांति ही बार-बार जीभ निकालकर फर्श पर पड़ी उस चाय को चाट रहा था....।
जान माल्टेन पूरी तरह बिल्ली तो बन ही चुका था। (पृष्ठ-33)
यह कैसे संभव था की कोई वैज्ञानिक बिल्ली बन जाये और यह एक नहीं विश्व के लगभग देशों में यही घटित हो रहा था।
सिंगही और मर्डरलैण्ड- वेदप्रकाश शर्मा
मनुष्य की लालसा कभी शांत होने का नाम नहीं लेती। वह एक सफलता के पश्चात दूसरी सफलता की तलाश में निकल लेती है। लेकिन जब यह लालसा हवश में बदल जाये और हवश भी विश्व पर आधिपत्य की तो...?
ऐसा ही कुछ उपन्यास 'सिंगही और मर्डरलैण्ड' में है। जहां विश्व की दो महाशक्तियां आप में टकराती हैं और उनके मध्य होता है महा संग्राम। अब कुछ चर्चा उपन्यास कथानक पर-
- मोन्टोफो- रूस का योग्य वैज्ञानिक ।(पृष्ठ-60)
- मिस्टर एबनर भारत के प्रमुख वैज्ञानिक हैं। उन्होंने हाल ही मैं एक आश्चर्य में डाल देने वाला आविष्कार किया है। आविष्कार भी इतना महत्वपूर्ण है कि वह जिसके हाथ लग जाएगा वह देश संसार का सर्वशक्तिशाली देश बन जायेगा। (पृष्ठ-11)
- न्यूयॉर्क ही नहीं बल्कि अमेरिका के प्रसिद्ध व होनहार वैज्ञानिक का नाम था- जान माल्टेन।(पृष्ठ-29)
- बांग्लादेश का वैज्ञानिक सरजात।
लेकिन फिर एक एक के विश्व के वैज्ञानिक गायब होते चले गये। लेकिन गायब होने के साथ ही उनके साथ एक अजीब घटना घटित होती और वह समस्त विश्व के लिए आश्चर्यजनक घटना बनती।
जैसे अमेरिका के प्रसिद्ध वैज्ञानिक के साथ हुआ-
वह किसी बिल्ली की भांति घुटनों के बल फर्श पर बैठा था और ठीक बिल्ली की भांति ही बार-बार जीभ निकालकर फर्श पर पड़ी उस चाय को चाट रहा था....।
जान माल्टेन पूरी तरह बिल्ली तो बन ही चुका था। (पृष्ठ-33)
यह कैसे संभव था की कोई वैज्ञानिक बिल्ली बन जाये और यह एक नहीं विश्व के लगभग देशों में यही घटित हो रहा था।
Tuesday, 8 December 2020
403. मैकाबर का अंत- वेदप्रकाश शर्मा
आखिर कौन है मैकाबर और कजारिया?
मैकाबर का अंत - वेदप्रकाश शर्मा
मैकाबर सीरीज का तृतीय/अंतिम भाग
मैकाबर का अंत - वेदप्रकाश शर्मा
मैकाबर सीरीज का तृतीय/अंतिम भाग
कजारिया नामक देश की एक खतरनाक संस्था है मैकाबर, जो विश्व के विभिन्न देशों से महत्वपूर्ण सूचनाएं चोरी करती हैं। विश्व पर अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए विभिन्न वैज्ञानिक शक्तियों का प्रयोग करती है।
इसी खतरनाक संस्था को खत्म करके के लिए विश्व के जासूस जा पहुंचते हैं कजारिया नामक देश।
मैकाबर सीरीज के तीन भाग है। प्रथम 'विकास और मैकाबर', द्वितीय 'विकास मैकाबर के देश में', और तृतीय/अंतिम भाग है 'मैकाबर का अंत।'
Monday, 7 December 2020
402. विकास मैकाबर के देश में- वेदप्रकाश शर्मा
एक खतरनाक यात्रा
विकास मैकाबर के देश में
मैकाबर सीरीज का द्वितीय भाग
वेदप्रकाश शर्मा जी की 'मैकाबर' एक एक्शन सीरीज है, जिसके तीन भाग हैं। यहाँ इस सीरीज के द्वितीय भाग 'विकास मैकाबर के देश में' की चर्चा करते हैं।
यह कहानी 'विकास और मैकाबर' उपन्यास का द्वितीय भाग है। प्रथम भाग में मैकाबर की दहशत संपूर्ण विश्व पर छा जाती है और मैकाबर कुछ जासूसों को गायब कर देता है।
शेष बचे जासूस मित्र मैकाबर नामक खतरनाक संस्था को खत्म करने की यात्रा पर निकलते हैं। प्रस्तुत उपन्यास उसी यात्रा पर आधारित है। इस उपन्यास को मुख्यतः चार भागों में बांट सकते हैं।
प्रथम - वायुमार्ग से यात्रा करने वाले जासूस
द्वितीय- जलमार्ग से यात्रा करने वाले जासूस
तृतीय- विकास और चीनी जासूस फुचिंग की लडा़ई
चतुर्थ- कजारिया देश का वर्णन जिसमें मैकाबर संस्था का वर्णन, लार्बिटा, अलफांसे आदि।
विकास मैकाबर के देश में
मैकाबर सीरीज का द्वितीय भाग
वेदप्रकाश शर्मा जी की 'मैकाबर' एक एक्शन सीरीज है, जिसके तीन भाग हैं। यहाँ इस सीरीज के द्वितीय भाग 'विकास मैकाबर के देश में' की चर्चा करते हैं।
यह कहानी 'विकास और मैकाबर' उपन्यास का द्वितीय भाग है। प्रथम भाग में मैकाबर की दहशत संपूर्ण विश्व पर छा जाती है और मैकाबर कुछ जासूसों को गायब कर देता है।
शेष बचे जासूस मित्र मैकाबर नामक खतरनाक संस्था को खत्म करने की यात्रा पर निकलते हैं। प्रस्तुत उपन्यास उसी यात्रा पर आधारित है। इस उपन्यास को मुख्यतः चार भागों में बांट सकते हैं।
प्रथम - वायुमार्ग से यात्रा करने वाले जासूस
द्वितीय- जलमार्ग से यात्रा करने वाले जासूस
तृतीय- विकास और चीनी जासूस फुचिंग की लडा़ई
चतुर्थ- कजारिया देश का वर्णन जिसमें मैकाबर संस्था का वर्णन, लार्बिटा, अलफांसे आदि।
Sunday, 6 December 2020
401. विकास और मैकाबर- वेदप्रकाश शर्मा
एक खतरनाक संस्था से टकराव
विकास और मैकाबर- वेदप्रकाश शर्मा
मैकाबर सीरीज का प्रथम भाग
वेदप्रकाश शर्मा जी की 'विजय- विकास' सीरीज में मैकाबर शृंखला के तीन उपन्यास हैं। 'विकास और मैकाबर', 'विकास मैकाबर के देश में', और 'मैकाबर का अंत'।
इस शृंखला के प्रथम उपन्यास 'विकास और मैकाबर' पर चर्चा करते हैं। मैकाबर अपराधियों की एक खतरनाक संस्था है और जिनका आतंक विश्व में फैल रहा है। कजारिया नामक देश से संचालित यह संस्था भारत में भी अपनी दहशत फैलाती है।
भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर अरोड़ा के मूत्र को मैकाबर चुराना चाहता है और इस के लिए वह अंतरराष्ट्रीय अपराधी अलफांसे को हायर करते हैं।
विजय-विकास और भारतीय सिक्रेट सर्विस इस मूत्र चोरी को रोकना चाहती है।
- मैकाबर संस्था की वास्तिकता क्या है?
- वह भारतीय वैज्ञानिक का मूत्र क्यों चुराना चाहती है?
- क्या इस चोरी में अलफांसे सफल हो पाया?
- क्या विकास और उसके साथी इस चोरी को रोक पाये?
यह सब जान ने के लिए आपको 'वेदप्रकाश शर्मा जी' का उपन्यास 'विकास और मैकाबर' पढना होगा।
मैकाबर सीरीज का प्रथम भाग
वेदप्रकाश शर्मा जी की 'विजय- विकास' सीरीज में मैकाबर शृंखला के तीन उपन्यास हैं। 'विकास और मैकाबर', 'विकास मैकाबर के देश में', और 'मैकाबर का अंत'।
इस शृंखला के प्रथम उपन्यास 'विकास और मैकाबर' पर चर्चा करते हैं। मैकाबर अपराधियों की एक खतरनाक संस्था है और जिनका आतंक विश्व में फैल रहा है। कजारिया नामक देश से संचालित यह संस्था भारत में भी अपनी दहशत फैलाती है।
भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर अरोड़ा के मूत्र को मैकाबर चुराना चाहता है और इस के लिए वह अंतरराष्ट्रीय अपराधी अलफांसे को हायर करते हैं।
विजय-विकास और भारतीय सिक्रेट सर्विस इस मूत्र चोरी को रोकना चाहती है।
- मैकाबर संस्था की वास्तिकता क्या है?
- वह भारतीय वैज्ञानिक का मूत्र क्यों चुराना चाहती है?
- क्या इस चोरी में अलफांसे सफल हो पाया?
- क्या विकास और उसके साथी इस चोरी को रोक पाये?
यह सब जान ने के लिए आपको 'वेदप्रकाश शर्मा जी' का उपन्यास 'विकास और मैकाबर' पढना होगा।
Tuesday, 17 November 2020
398. सफेद चूहा- वेदप्रकाश शर्मा
कहानी चमगादड़ की
सफेद चूहा- वेदप्रकाश शर्मा
किस्सा अफ्रीका के जंगलों में मौजूद जाकिर नामक एक कबीले से शुरू हुआ गुरु। इस कबीले के लोग चमगादड़ के पुजारी हैं। जो चमगादड़ उनके पास था वह पुरातत्व दुनिया के लिए एक भेद है । अफ्रीकी सरकार ने संग्राम को उस चमगादड़ की खोज में लगाया था। जैकसन आदि पहले ही उस चमगादड़ के चक्कर में थी। वह एक चमगादड़ था जिसे हर कोई प्राप्त करना चाहता था। अफ्रीका से अमेरिका और भारत तक के लोग इस चमगादड़ के लिए संघर्ष कर रहे थे।
लोकप्रिय साहित्य में वेदप्रकाश शर्मा सस्पेंश के बादशाह माने जाते हैं। उनका एक विशाल पाठकवर्ग है। वेद जी का नाम लोकप्रिय साहित्य में सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक के रूप में जाना जाता है।
सफेद चूहा- वेदप्रकाश शर्मा
किस्सा अफ्रीका के जंगलों में मौजूद जाकिर नामक एक कबीले से शुरू हुआ गुरु। इस कबीले के लोग चमगादड़ के पुजारी हैं। जो चमगादड़ उनके पास था वह पुरातत्व दुनिया के लिए एक भेद है । अफ्रीकी सरकार ने संग्राम को उस चमगादड़ की खोज में लगाया था। जैकसन आदि पहले ही उस चमगादड़ के चक्कर में थी। वह एक चमगादड़ था जिसे हर कोई प्राप्त करना चाहता था। अफ्रीका से अमेरिका और भारत तक के लोग इस चमगादड़ के लिए संघर्ष कर रहे थे।
लोकप्रिय साहित्य में वेदप्रकाश शर्मा सस्पेंश के बादशाह माने जाते हैं। उनका एक विशाल पाठकवर्ग है। वेद जी का नाम लोकप्रिय साहित्य में सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक के रूप में जाना जाता है।
Monday, 6 April 2020
288. आलपिन का खिलाड़ी- वेदप्रकाश शर्मा
जब विकास अपराधी बन गया....
आलपिन का खिलाड़ी- वेदप्रकाश शर्मा
लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के प्रसिद्ध लेखक वेदप्रकाश शर्मा जी का आरम्भिक दौर का एक उपन्यास है 'आलपिन का खिलाड़ी'।
"अशरफ मैं आशा बोल रही हूँ।"
"अरे जल्दी बोलो,आदेश क्या है। मैं बहुत दिन से बोर हो रहा हूँ।"
"इस बार सारी बोरियत दूर हो जायेगी अशरफ, मुकाबला ऐसे व्यक्ति से है जिसे समाप्त करने में सिक्रेट सर्विस का प्रत्येक सदस्य ही नहीं बल्कि चीफ भी हिचकिचायेगा।"
"कौन है वो महाशय?"
"हमार ही एक साथी।"
"कौन?"
"विकास"
"क्या"
"सच"
ऐसी कौनसी परिस्थितियाँ पैदा हुयी जो स्वयं सीक्रेट सर्विस के सदस्य ही अपने साथी विकास की जान लेने पर आ गये।
बस यही से कहानी एक्शन आरोप हो जाता है और पाठक भी सोचता रह जाता है की आखिर यह कैसे हो गया।
दूसरी तरफ विकास भी अजीब सी परिस्थितियों में फंसा होता है। जहाँ उसके चारों तरफ मौत है। एक ऐसे जाल में ऒंसा है जहाँ से निकलना मुश्किल है। - इस बार बहुत मजा आयेगा विकास, तुम मेरे जाल से निकल नहीं सकते इस बार खुद तुम अपराधी हो। तुम्हारे नाना ठाकुर साहब ने स्वयं आदेश दिया है कि तुम्हें देखते ही गोली मार दी जाये।
तो क्या विकास मुजरिम बन गया? आखिर वह कौनसी सी परिस्थितियाँ रही होंगी जब विकास जैसा देशभक्त अपराधी बन गया। अब विकास क्या कहता है यह भी देख लीजिएगा- अब पूरी दुनिया मेरा मुजरिम वाला रूप देखेगी। अब दुनिया यह देखेगी कल तक का जासूस विकास मुजरिम बन कर क्या कर सकता है।
तो 'आलपिन का खिलाड़ी' उपन्यास की कहानी विकास के मुजरिम बन जाने की है। जहाँ सीक्रेट सर्विस, पुलिस और दुश्मन सब विकास की जान लेना चाहते हैं।-आजकल यहाँ विकास की कोई खास अच्छी नहीं है सर, सारे देश की पुलिस उसकी तलाश में है।
आखिर यह कैसे हो गया?
एक देशभक्त कैसे मुजरिम बन गया?
इसी रहस्य को समझने के लिए यह उपन्यास पढना होगा।
उपन्यास का आरम्भ बंदर धनुषटंकार से होता है। विजय-विकास का प्रिय धनुषटंकार। जो शरीर से चाहे बंदर है लेकिन उसके अंदर मस्तिष्क एक मनुष्य का है। ( इसकी भी एक कहानी है)
धनुष्टंकार न सिर्फ साधारण बंदर बल्कि विकास जैसे खतरनाक लड़के का चेला था। लड़ने के हर पैंतरे में पूरी तरह माहिर।
उपन्यास में धनुषटंकार का किरदार उन फिल्मी बंदरों जैसा है जो मोटरसाइकिल और कार चलाते हैं, खैर....यहां भी धनुषंटकार यही कारनामें करता है।
आलपिन का खिलाड़ी-
उपन्यास का शीर्षक वास्तव में रोचक हथ पर उपन्यास में शीर्षक कोई विशेष महत्व नहीं रखता। अगर अतिरिक्त मेहनत की जाती तो आलपिन के और भी कारनामे दिखाये जा सकते थे।
'आपका बच्चा आलपिन का खिलाड़ी है गुरु।'
उपन्यास का कथानक सामान्य स्तर का है। एक छोटा सा रहस्य है वह है विकास का। इसके अतिरिक्त उपन्यास में एक्शन दृश्य (लडा़ई) बहुत ज्यादा हैं।
उपन्यास में एक सदस्य दो-दो फेसमास्क लगा कर घूमता है और किसी को पता तक नहीं चलता। ऐसा वेद जी के अन्य उपन्यासों में भी मिलता है।
हां, उपन्यास एक्शन के स्तर पर तो खैर निराश नहीं करेगा। बस एक बार बार इसलिए पढा जा सकता है की उपन्यास वेदप्रकाश शर्मा जी का लिखा हुआ है।
उपन्यास- आलपिन का खिलाड़ी
लेखक- वेदप्रकाश शर्मा
आलपिन का खिलाड़ी- वेदप्रकाश शर्मा
लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के प्रसिद्ध लेखक वेदप्रकाश शर्मा जी का आरम्भिक दौर का एक उपन्यास है 'आलपिन का खिलाड़ी'।
"अशरफ मैं आशा बोल रही हूँ।"
"अरे जल्दी बोलो,आदेश क्या है। मैं बहुत दिन से बोर हो रहा हूँ।"
"इस बार सारी बोरियत दूर हो जायेगी अशरफ, मुकाबला ऐसे व्यक्ति से है जिसे समाप्त करने में सिक्रेट सर्विस का प्रत्येक सदस्य ही नहीं बल्कि चीफ भी हिचकिचायेगा।"
"कौन है वो महाशय?"
"हमार ही एक साथी।"
"कौन?"
"विकास"
"क्या"
"सच"
ऐसी कौनसी परिस्थितियाँ पैदा हुयी जो स्वयं सीक्रेट सर्विस के सदस्य ही अपने साथी विकास की जान लेने पर आ गये।
बस यही से कहानी एक्शन आरोप हो जाता है और पाठक भी सोचता रह जाता है की आखिर यह कैसे हो गया।
दूसरी तरफ विकास भी अजीब सी परिस्थितियों में फंसा होता है। जहाँ उसके चारों तरफ मौत है। एक ऐसे जाल में ऒंसा है जहाँ से निकलना मुश्किल है। - इस बार बहुत मजा आयेगा विकास, तुम मेरे जाल से निकल नहीं सकते इस बार खुद तुम अपराधी हो। तुम्हारे नाना ठाकुर साहब ने स्वयं आदेश दिया है कि तुम्हें देखते ही गोली मार दी जाये।
तो क्या विकास मुजरिम बन गया? आखिर वह कौनसी सी परिस्थितियाँ रही होंगी जब विकास जैसा देशभक्त अपराधी बन गया। अब विकास क्या कहता है यह भी देख लीजिएगा- अब पूरी दुनिया मेरा मुजरिम वाला रूप देखेगी। अब दुनिया यह देखेगी कल तक का जासूस विकास मुजरिम बन कर क्या कर सकता है।
तो 'आलपिन का खिलाड़ी' उपन्यास की कहानी विकास के मुजरिम बन जाने की है। जहाँ सीक्रेट सर्विस, पुलिस और दुश्मन सब विकास की जान लेना चाहते हैं।-आजकल यहाँ विकास की कोई खास अच्छी नहीं है सर, सारे देश की पुलिस उसकी तलाश में है।
आखिर यह कैसे हो गया?
एक देशभक्त कैसे मुजरिम बन गया?
इसी रहस्य को समझने के लिए यह उपन्यास पढना होगा।
उपन्यास का आरम्भ बंदर धनुषटंकार से होता है। विजय-विकास का प्रिय धनुषटंकार। जो शरीर से चाहे बंदर है लेकिन उसके अंदर मस्तिष्क एक मनुष्य का है। ( इसकी भी एक कहानी है)
धनुष्टंकार न सिर्फ साधारण बंदर बल्कि विकास जैसे खतरनाक लड़के का चेला था। लड़ने के हर पैंतरे में पूरी तरह माहिर।
उपन्यास में धनुषटंकार का किरदार उन फिल्मी बंदरों जैसा है जो मोटरसाइकिल और कार चलाते हैं, खैर....यहां भी धनुषंटकार यही कारनामें करता है।
आलपिन का खिलाड़ी-
उपन्यास का शीर्षक वास्तव में रोचक हथ पर उपन्यास में शीर्षक कोई विशेष महत्व नहीं रखता। अगर अतिरिक्त मेहनत की जाती तो आलपिन के और भी कारनामे दिखाये जा सकते थे।
'आपका बच्चा आलपिन का खिलाड़ी है गुरु।'
उपन्यास का कथानक सामान्य स्तर का है। एक छोटा सा रहस्य है वह है विकास का। इसके अतिरिक्त उपन्यास में एक्शन दृश्य (लडा़ई) बहुत ज्यादा हैं।
उपन्यास में एक सदस्य दो-दो फेसमास्क लगा कर घूमता है और किसी को पता तक नहीं चलता। ऐसा वेद जी के अन्य उपन्यासों में भी मिलता है।
हां, उपन्यास एक्शन के स्तर पर तो खैर निराश नहीं करेगा। बस एक बार बार इसलिए पढा जा सकता है की उपन्यास वेदप्रकाश शर्मा जी का लिखा हुआ है।
उपन्यास- आलपिन का खिलाड़ी
लेखक- वेदप्रकाश शर्मा
Sunday, 1 March 2020
273. नसीब मेरा दुश्मन- वेदप्रकाश शर्मा
नसीब और कर्म की टक्कर
नसीब मेरा दुश्मन- वेदप्रकाश शर्मा, उपन्यास
वह A की हत्या के जुर्म में पकड़ा गया था।
और B के मर्डर की सफाई देने जा रहा था
और उसे C का कातिल साबित कर दिया।
क्या यह संभव है?
एक अविस्मरणीय कथानक।
क्या किसी शख्स नसीब इतना बुरा हो सकता है की वह हर जगह मात खा जाये, हर जगह उसे हार मिले, हर काम में उसे असफलता मिले।
क्या वास्तव में किसी आदमी का नसीब बुरा हो सकता है। लेकिन वेदप्रकाश शर्मा जी का उपन्यास 'नसीब मेरा दुश्मन' पढा तो पता चला की ऐसा भी कुछ हो सकता है।
'नसीब मेरा दुश्मन' कहानी है एक चोर-उच्चके मुकेश उर्फ मिक्की की। मिक्की का मानना है की उसका नसीब उसे हर बार धोखा देता है।- "यह साला बचपन से मुझे धोखा देता चला आ रहा है—सोने की खान में हाथ डालता हूं तो राख के ढेर में तब्दील हो जाती है, हाथ पर हीरा रखकर मुट्ठी बंद करूं तो खोलने तक कोयले में बदल चुका होता है।"
नसीब मेरा दुश्मन- वेदप्रकाश शर्मा, उपन्यास
वह A की हत्या के जुर्म में पकड़ा गया था।
और B के मर्डर की सफाई देने जा रहा था
और उसे C का कातिल साबित कर दिया।
क्या यह संभव है?
एक अविस्मरणीय कथानक।
क्या किसी शख्स नसीब इतना बुरा हो सकता है की वह हर जगह मात खा जाये, हर जगह उसे हार मिले, हर काम में उसे असफलता मिले।
क्या वास्तव में किसी आदमी का नसीब बुरा हो सकता है। लेकिन वेदप्रकाश शर्मा जी का उपन्यास 'नसीब मेरा दुश्मन' पढा तो पता चला की ऐसा भी कुछ हो सकता है।
'नसीब मेरा दुश्मन' कहानी है एक चोर-उच्चके मुकेश उर्फ मिक्की की। मिक्की का मानना है की उसका नसीब उसे हर बार धोखा देता है।- "यह साला बचपन से मुझे धोखा देता चला आ रहा है—सोने की खान में हाथ डालता हूं तो राख के ढेर में तब्दील हो जाती है, हाथ पर हीरा रखकर मुट्ठी बंद करूं तो खोलने तक कोयले में बदल चुका होता है।"
Thursday, 27 February 2020
272. हीरों का बादशाह- वेदप्रकाश शर्मा
भारत- पाक के मध्य युद्ध की कहानी।
हीरों का बादशाह- वेदप्रकाश शर्मा,
वेद जी का 21वांं उपन्यास
विजय- अलफांसे का कारनामा
इस माह वेदप्रकाश शर्मा जी का यह तीसरा उपन्यास पढ रहा हूँ। इससे पूर्व टुम्बकटू सीरीज के दो उपन्यास 'खूनी छलावा' और 'छलावा और शैतान' पढे थे। दोनों उपन्यास आकार में छोटे थे और प्रस्तुत उपन्यास भी कहानी और कलेवर में उसी प्रकार का है।
वेद जी के आरम्भिक उपन्यास एक्शन प्रधान होते थे जिनमें कहानी गौण और पात्रों के करतब मुख्यतः दिखाये जाते थे। इस उपन्यास में भी विजय और अलफांसे के करतब देखने को मिलते हैं।
कहानी कोई बड़ी नहीं है। कुछ परिस्थितियों के चलते भारतीय सेना का मेजर बलवंत और कुछ सैन्य दस्तावेज और एक विशेष हीरा पाकिस्तान को प्राप्त हो जाते हैं इन महत्वपूर्ण सूचनाओं के दम पर पाकिस्तान भारत पर आक्रमण करना चाहता है।
भारतीय सीक्रेट सर्विस उन सैन्य दस्तावेजों को और मेजर बलवंत को वापस लाने की जिम्मेदारी जासूस विजय को सौंपती है।
पूर्वी पाकिस्तान के एक छोटे से गांव में अंतरराष्ट्रीय अपराधी अलफांसे भी उपस्थित है।
- सैन्य दस्तावेज़ और मेजर बलवंत पाकिस्तान सेना के कब्जे में कैसे आये?
- हीरे का क्या रहस्य था?
- विजय और उसकी टीम ने क्या कारनामे दिखाये?
- अलफांसे पाकिस्तान में क्यों उपस्थित था?
आखिर क्या परिणाम निकला इस कथानक का?
इन प्रश्नों के उत्तर तो उपन्यास पढने पर ही मिलेंगे।
अब उपन्यास के अन्य बिंदुओं पर चर्चा।
उपन्यास में विजय के अतिरिक्त अशरफ और आशा का किरदार भी रखा है और दोनों ही भारतीय सीक्रेट सर्विस के जासूस हैं। उपन्यास में दोनों का एक-एक घटनाक्रम में ही नजर आते हैं इसके अलावा कहीं उनका कोई काम नहीं है।
उपन्यास में कोई विशेष स्मरणीय संवाद नहीं है, अगर है तो सिर्फ एक्शन है।
उपन्यास का शीर्षक चाहे 'हीरों का बादशाह' है लेकिन उपन्यास में मात्र एक ही हीरा है और उसका बादशाह किसे कहें? यह सोच से परे है। क्योंकि बादशाह वाली कोई स्थिति नहीं है।
मेजर बलवंत का फेसमास्क लगा कर हर कोई कहीं भी घूम रहा है और किसी को पता भी नहीं चलता की ये मेजर बलवंत है या कोई और। यह असंभव सा प्रतीत होता है।
उपन्यास में तार्किक स्तर पर बहुत सी गलतियाँ है। कहीं-कहीं तो अचानक से आये घटनाक्रम अनावश्यक से प्रतीत होते हैं। कहीं-कही तो घटनाएं इतनी जल्दी में आरम्भ और खत्म होती ह कुछ समझ में ही नहीं आता और जब कुछ समझमें आने लगता है तो उपन्यास खत्म हो जाता है।
अगर आप कहानी के स्तर य उपन्यास पढना चाहते हैं तो आपको निराशा हाथ लगेगी। अगर वेदप्रकाश शर्मा जी के नाम से और एक्शन के कारण पढना चाहते हैं तो यह लघु उपन्यास आपका ज्यादा समय नहीं लेगा आप पढ सकते हैं। क्योंकि उपन्यास में एक्शन है लेकिन कहीं बोर करने वाले दृश्य नहीं है।
उपन्यास- हीरों का बादशाह.
लेखक- वेदप्रकाश शर्मा
हीरों का बादशाह- वेदप्रकाश शर्मा,
वेद जी का 21वांं उपन्यास
विजय- अलफांसे का कारनामा
इस माह वेदप्रकाश शर्मा जी का यह तीसरा उपन्यास पढ रहा हूँ। इससे पूर्व टुम्बकटू सीरीज के दो उपन्यास 'खूनी छलावा' और 'छलावा और शैतान' पढे थे। दोनों उपन्यास आकार में छोटे थे और प्रस्तुत उपन्यास भी कहानी और कलेवर में उसी प्रकार का है।
वेद जी के आरम्भिक उपन्यास एक्शन प्रधान होते थे जिनमें कहानी गौण और पात्रों के करतब मुख्यतः दिखाये जाते थे। इस उपन्यास में भी विजय और अलफांसे के करतब देखने को मिलते हैं।
कहानी कोई बड़ी नहीं है। कुछ परिस्थितियों के चलते भारतीय सेना का मेजर बलवंत और कुछ सैन्य दस्तावेज और एक विशेष हीरा पाकिस्तान को प्राप्त हो जाते हैं इन महत्वपूर्ण सूचनाओं के दम पर पाकिस्तान भारत पर आक्रमण करना चाहता है।
भारतीय सीक्रेट सर्विस उन सैन्य दस्तावेजों को और मेजर बलवंत को वापस लाने की जिम्मेदारी जासूस विजय को सौंपती है।
पूर्वी पाकिस्तान के एक छोटे से गांव में अंतरराष्ट्रीय अपराधी अलफांसे भी उपस्थित है।
- सैन्य दस्तावेज़ और मेजर बलवंत पाकिस्तान सेना के कब्जे में कैसे आये?
- हीरे का क्या रहस्य था?
- विजय और उसकी टीम ने क्या कारनामे दिखाये?
- अलफांसे पाकिस्तान में क्यों उपस्थित था?
आखिर क्या परिणाम निकला इस कथानक का?
इन प्रश्नों के उत्तर तो उपन्यास पढने पर ही मिलेंगे।
अब उपन्यास के अन्य बिंदुओं पर चर्चा।
उपन्यास में विजय के अतिरिक्त अशरफ और आशा का किरदार भी रखा है और दोनों ही भारतीय सीक्रेट सर्विस के जासूस हैं। उपन्यास में दोनों का एक-एक घटनाक्रम में ही नजर आते हैं इसके अलावा कहीं उनका कोई काम नहीं है।
उपन्यास में कोई विशेष स्मरणीय संवाद नहीं है, अगर है तो सिर्फ एक्शन है।
उपन्यास का शीर्षक चाहे 'हीरों का बादशाह' है लेकिन उपन्यास में मात्र एक ही हीरा है और उसका बादशाह किसे कहें? यह सोच से परे है। क्योंकि बादशाह वाली कोई स्थिति नहीं है।
मेजर बलवंत का फेसमास्क लगा कर हर कोई कहीं भी घूम रहा है और किसी को पता भी नहीं चलता की ये मेजर बलवंत है या कोई और। यह असंभव सा प्रतीत होता है।
उपन्यास में तार्किक स्तर पर बहुत सी गलतियाँ है। कहीं-कहीं तो अचानक से आये घटनाक्रम अनावश्यक से प्रतीत होते हैं। कहीं-कही तो घटनाएं इतनी जल्दी में आरम्भ और खत्म होती ह कुछ समझ में ही नहीं आता और जब कुछ समझमें आने लगता है तो उपन्यास खत्म हो जाता है।
अगर आप कहानी के स्तर य उपन्यास पढना चाहते हैं तो आपको निराशा हाथ लगेगी। अगर वेदप्रकाश शर्मा जी के नाम से और एक्शन के कारण पढना चाहते हैं तो यह लघु उपन्यास आपका ज्यादा समय नहीं लेगा आप पढ सकते हैं। क्योंकि उपन्यास में एक्शन है लेकिन कहीं बोर करने वाले दृश्य नहीं है।
उपन्यास- हीरों का बादशाह.
लेखक- वेदप्रकाश शर्मा
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