नारी के शोषण की करुणगाथा
ढोलण कुंजकली- यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र'
ढोलण कुंजकली- यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र'
रजवाड़ों के समय में तो हाल बद से बदतर थे। एक तो गरीब दूसरा दूसरा शोषण और फिर जातिवाद का जहर। और इस कुचक्रें अगर किसी गरीब दलित की औरत फंस गयी तो उसका बाहर निकला मुश्किल था और अगर वह सौन्दर्य से परिपूर्ण हुयी तो उसका आंतरिक जीवन दलदल सा हो जाता था।
यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' ने राजस्थान के परिवेश और भारतीय नारी की स्थिति पर बहुत प्रासंगिक रचनाएं लिखी हैं। जथसे हजार घोडो़ का सवार, हूं गोरी किण पीव री, जमारो, ढोलण कुंजकली आदि।
इनकी रचनाओं में नारी की विपन्न स्थिति, शोषित वर्ग का चित्रण, ब्रिटिश काल का अत्याचार आदि का बखूबी चित्रण मिलता है। इनकी रचनाएं काल्पनिक होते हुये भी यथार्थ के समीप होती हैं। प्रस्तुत रचना 'ढोलण कुंजकली' एक ऐसी ही रचना है जो दलितवर्ग की स्त्री की मार्मिक गाथा को प्रस्तुत करती है। "कुंज की कली को कोई भी तोड़ मरोड़ सकता है। वही दसा मेरी है।" (पृष्ठ-105)

