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Sunday, 2 June 2019

198. रात गवाह है- किश्वर देसाई

तेरह लोगों के सामूहिक हत्याकाण्ड की कहानी।
रात गवाह है- किश्वर देसाई, उपन्यास

         इस अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त रचना के शीर्षक ने ही मुझे आकृष्ट कर लिया था। और वहीं पढने की इच्छा ने उपन्यास को मेरे पुस्तकालय में वृद्धि कर दी‌। समयाभाव के चलते उपन्यास पठन में देरी हो गयी।
यह उपन्यास भारतीय समाज में पुत्र मोह और पुत्री को बोझ समझने जैसी विचारधारा को एक नाबालिग के दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है।
उपन्यास के आवरण पृष्ठ पर लिखित कुछ अंश पढें।
       यह उपन्यास एक चौदह साल की लड़की दुर्गा के जीवन का सजीव चित्रण है। दुर्गा पंजाब के एक बड़े- से घर में अकेली पाई गयी। खामोश, डरी हुई और परिवार के तेरह सदस्यों के सामूहिक हत्याकांड की एकमात्र संदिग्ध आरोपी। हर कोई मानता है कि सामूहिक हत्याकाण्ड जो अंजाम तक दुर्गा ने ही पहुंचाया, लेकिन सिमरन को इस पर विश्वास नहीं। सिमरन जो शराब की लत में डूबी और लगातार सिगरेट फूंकने वाली दिल्ली की समाजसेविका है, जिसका मानना है कि दुर्गा संदिग्ध से ज्यादा पीड़ित है।

सिमरन रहस्य से पर्दा उठाने की कोशिश करती है कि सामूहिक हत्याकाण्ड की उस रात को वाक ई क्या हुआ था? वह दुर्गा के पास जाती है तथा जालंधर और यहाँ के लोगों के बीच वह बेचैन महसूस करती है। उनमें दुर्गा के रहस्यमय टयूटर हरप्रीत सर, उसकी कुरूप पत्नी, उच्चवर्गीय अमरिंदर कौर, तथा उसका पति रामनाथ शामिल हैं।
जिस अन्याय और विभिन्न रहस्यों से उसका वास्ता पड़ता है, वह उसे भीतर तक झकझोर कर रख देता है और सिमरन ठान लेती है कि जब तक पूरा सच नहीं जान लेगी, चैन से नहीं बैठेगी।
डर से कंपा देने वाला यह पहला उपन्यास है जो परम्पराओं में बंधे भारत की विसंगत और दारूण परिस्थितियों को उद्घाटित करता है।


- क्या एक चौदह साल की लड़की एक कुकृत्य कर सकती है?
- क्या वजह रही होगी इस काण्ड के पीछे?
- दुर्गा क्यों खामोश थी?
- कौन थे असली हत्यारे?