मेरा नाम ही मेजर नहीं, मैं काम में भी मेजर हूँ।
रहस्यमय लड़कियां- सुरेन्द्र इलाहाबादी
एक समय था जब उपन्यास साहित्य का केन्द्र इलाहाबाद था। इलाहाबाद का 'पुष्पी कार्यालय' उपन्यास प्रकाशन में अग्रणी था। जहाँ से बहुत अच्छे जासूसी उपन्यास प्रकाशित होते रहे हैं।सुरेन्द्र इलाहाबादी के उपन्यास भी यहीं से प्रकाशित होते थे। यह नाम वास्तविक है या छद्म यह तो कहना संभव नहीं है। इनका एक उपन्यास 'रहस्यमयी लड़कियां' पढने को मिला, जो एक रोचक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है।
मेजर का नया अदभुत कारनामा
रहस्यमय लड़कियां
जो भी लड़की मरी हुई मिलती उसके गले में नायलोन का मोजा होता आँखें बाहर को उछली हुई होतीं मुँह से जिह्वा की नोक दिखाई देती !
चारों लड़कियाँ एक-से-एक सुन्दर थीं चारों सुशिक्षिता थीं; आधुनिक थीं उन पर कोई भी प्यार करने को अकुला जाता मगर न जाने हत्यारे को उन पर क्यों तरस नहीं आया ।
हत्याओं की यह अनोखी कहानी है। इसे पढ़ कर रोंगटे खड़े हो जाएँगे यह निराला ही कारनामा है । मेजर का अनोखा कारनामा।
- सुरेन्द्र इलाहाबादी
अब बात करते हैं उपन्यास कथानक की।
जासूस मेजर लखनऊ के अपने ऑफिस में बैठा शीरी ओर विजय के साथ मेरठ के हत्याकांड पर विचार विनिमय कर रहा था । तभी मेजर के पास वंदना का फोन आया। मिसेज वन्दना त्रिपाठी को मेजर 'भाभी' कहा करता था । वह उसके अभिन्न मित्र और देश के यशस्वी सर्जन ओमप्रकाश त्रिपाठी की पत्नी थी।
वन्दना बोली - "आप इसी क्षण शिवाजी मार्ग २६ की ऊपरी मंजिल के फ्लैट में चले जाइये । इस इमारत के नीचे 'बंसल एण्ड कम्पनी' का आफिस है। आज इतवार है इसलिए दुकाने बन्द हैं। ऊपरी मंजिल के फ्लैट के बाहर ताला लगा हुआ है। और मैं अन्दर कैद हूँ ।"
जासूस मेजर लखनऊ के अपने ऑफिस में बैठा शीरी ओर विजय के साथ मेरठ के हत्याकांड पर विचार विनिमय कर रहा था । तभी मेजर के पास वंदना का फोन आया। मिसेज वन्दना त्रिपाठी को मेजर 'भाभी' कहा करता था । वह उसके अभिन्न मित्र और देश के यशस्वी सर्जन ओमप्रकाश त्रिपाठी की पत्नी थी।
वन्दना बोली - "आप इसी क्षण शिवाजी मार्ग २६ की ऊपरी मंजिल के फ्लैट में चले जाइये । इस इमारत के नीचे 'बंसल एण्ड कम्पनी' का आफिस है। आज इतवार है इसलिए दुकाने बन्द हैं। ऊपरी मंजिल के फ्लैट के बाहर ताला लगा हुआ है। और मैं अन्दर कैद हूँ ।"
