एक शेर की साहसिक यात्रा।
जेल डायरी- शेरसिंह राणा
शेर सिंह राणा का नाम सुनते ही दो तस्वीरें सामने आती हैं। क्या आपने शेर सिंह राणा का नाम सुना है, अगर सुना है तो आपके दिमाग में एक सकारात्मक तस्वीर उभरी होगी और साथ ही एक नकारात्मक तस्वीर भी। एक सिक्के के दो पक्ष की तरह शेर सिंह राणा का जीवन। जहां एक पक्ष पर सारे देश को गर्व है तो द्वितीय पक्ष पर रोष भी।
लेकिन शेर सिंह राणा के बारे में एक बात तय है वह है आदमी बहादुर है। ऐसा बहादुर जो शेर की गुफा में जाकर शेर के दाँत तोड़ने की क्षमता रखता है।
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| विश्व पुस्तक मेला- नई दिल्ली, 2018 |
पहली बार जब यह पता लगा की शेर सिंह राणा ने अपनी आत्मकथा लिखी है तब से मेरे मन में इस किताब को पढने की अदम्य इच्छा बलवती हो उठी। आत्मकथा का शीर्षक और शेर सिंह राणा को कारनामा ही इस किताब को पढने के लिए प्रेरित करता है।
भारत के महान राजा पृथ्वी राज चौहान और मोहम्मद शहाबुद्दीन गौरी के मध्य हुये तराईन के युद्ध (सन् 1191 और 1192 ई.) को सभी ने पढा ही होगा। प्रथम युद्ध में हारने के बाद गौरी ने द्वितीय युद्ध में कुटिल नीति से युद्ध जीता और पृथ्वी राज चौहान को बंदी बना कर अपने देश गजनी ले गया। पृथ्वी राज चौहान के एक परममित्र और कवि चंदबरदाई थे। चंदबरदाई ने 'पृथ्वी राज रासो' नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की है। यह वीर रस का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है।
गौरी ने गजनी ले जाकर पृथ्वी राज चौहान को बंदी बना लिया और चौहान की आँखे खत्म कर दी। पृथ्वी राज चौहान की एक विशेषता थी 'शब्दभेदी' बाण चलाने की। इसी विशेषता के चलते एक 'पद्य' के माध्यम से चंदबराई ने पृथ्वी राज चौहान को गजनी की स्थिति बता दी।
चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण
ता उपर सुल्तान है,मत चूको चौहान।।
चंदबराई के इस संकेत से पृथ्वी राज चौहान ने शब्द भेदी बाण से गौरी को खत्म कर दिया। दोनों मित्रों ने वहीं पर अपनी जीवन लीला भी समाप्त कर ली।
गजनी में इन तीनों की समाधी है। गजनी में पृथ्वी राज चौहान की समाधी को अपमानित किया जाता है। बस यही बात शेर सिंह राणा के मन में थी की इस समाधी को भारत लाना है और इस बहादुर व्यक्तित्व ने इस महान कार्य के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी।
एक केस के सिलसिले में शेर सिंह राणा को तिहाड़ जेल जाना पड़ा। लेकिन दिल में एक आग सुलग रही थी। वह आग थी पृथ्वी राज चौहान की अस्थियों को भारत लाने की।
यह आत्मकथा तिहाड़ से ही आरम्भ होती है। तिहाड़ से होते हुए बांग्लादेश और वहाँ से काबुल, कांधार तक घूमती है।