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Thursday, 30 October 2025

680. अनिल सलूजा

 अनिल सलूजा का एक जबरदस्त उपन्यास

बलराज गोगिया सीरीज

Tuesday, 28 October 2025

679. धर्मराज- अनिल सलूजा

यहां इंसाफ होता है। 
धर्मराज - अनिल सलूजा
#बलराज गोगिया- राघव सीरीज

मरने के बाद इंसान धर्मराज के दरबार में पहुंचता है, जहां उसके कर्मों के अनुसार उसे दण्डित किया जाता है । मगर क्या धरती पर भी कोई धर्मराज है जो पापी को उसके पापों का फल यहीं दे सके ।

धर्मराज - अनिल सलूजा

   अनिल सलूजा जी की इन दिनों पढी जा रही उपन्यासों की समीक्षा में 'धर्मराज' एक रोचक उपन्यास है। यह पात्र बलराज गोगिया की शांतिपूर्ण जिंदगी में उठे तूफान का वर्णन है।

उपन्यास समीक्षा से पूर्व हम पढते हैं 'धर्मराज' उपन्यास का प्रथम पृष्ठ ।

"बचाओ...बचा...ओ... हैल्प...।"
"अबे मुंह बन्द कर इसका। साली की चीखें छह मील दूर तक जा रही हैं। बन्द कर इसका मुंह।"
तुरंत एक हाथ जमीन पर पड़ी लड़की के मुंह पर कुकर के ढक्कन की तरह फिट हो गया।

Monday, 27 October 2025

678. मास्टर माइण्ड- अनिल सलूजा

बलराज गोगिया के शांतिमय जीवन में तूफान
मास्टर माइण्ड- अनिल सलूजा

करते है बात आज अनिल सलूजा जी के उपन्यास 'मास्टर माइण्ड' की ।‌ वह मास्टर माइण्ड था और यही गुण उसके जीवन के लिए अब संकट बन चुका था ।
अच्छा भला दुकान चला रहा था बलराज गोगिया । लेकिन वहां के थानेदार की नजर उस पर पड़ गई। थानेदार मजबूर था। उसने उससे मदद मांगी और जब बलराज गोगिया ने हां की तो ऐसा तूफान उठा कि....

सर्वप्रथम हम मास्टर माइण्ड उपन्यास के प्रथम पृष्ठ/ दृश्य को देखते हैं। बाकी चर्चा बाद में...

वह एक साधारण सा पुलिस थाने का ऑफिस था। जिसमें पड़ी साधारण सी टेबल पर रखी फाईलों के करीब रखा लाल रंग का फोन घनघनाया।

Sunday, 26 October 2025

677. नृशंसक - अनिल सलूजा

मुम्बई की किन्नर से बलराज गोगिया की टक्कर
 नृशंसक - अनिल सलूजा
बलराज गोगिया सीरीज

अपने यार की टांग लगवाने के लिए बलराज गोगिया साठ लाख रुपये और सुनीता- राघव के साथ जा पहुंचा मुम्बई । मगर यहाँ हंगामा पहले से ही उसका इंतजार कर रहा था ।

"डिंग...यं...ग.....।" कालबैल बजी।
एक ईजी चेयर पर बैठे हुकूमत शाह ने किचन की तरफ देखते हुए आवाज लगाई-
"ओ वेखीं ओये (ओ देखना ओये) गुड्डू-कौन आया वे।"
कहते हुए उसने अपने बगल में रखी बैसाखी उठाकर अपनी कटी हुई और साबुत टांग के मध्य रख ली।
तभी किचन में से गुड्डू निकला।

Friday, 24 October 2025

676. राघव की वापसी - अनिल सलूजा

जम्मू के डाॅन से बलराज गोगिया की टक्कर
राघव की वापसी - अनिल सलूजा
बलराज गोगिया सीरीज-
#साठ लाख सीरीज + 

नमस्ते पाठक मित्रो,
   आज प्रस्तुत है एक्शन लेखक अनिल सलूजा जी के पात्र 'बलराज गोगिया' शृंखला के उपन्यास 'राघव की वापसी' की समीक्षा । यह एक एक्शन प्रधान और 'लंगड़ा यार / साठ लाख' शृंखला का उपन्यास है। जिसमें बलराज गोगिया, राघव और सुनीता जम्मू के एक गैंगस्टर से टकराते नजर आये हैं।
सर्वप्रथम हम  राघव की वापसी उपन्यास का प्रथम पृष्ठ पढते हैं।
                     खुली अलमारी के सामने खड़ी सुनीता ने बांये हाथ मे पकड़ी पांच-पांच सौ के नोटों की गड्डी में से बारह नोट गिन कर बाकी नोट अलमारी के लॉकर में रखे और अलमारी बन्द कर वापिस मुड़ी तो नजर सामने कुर्सी पर बैठे राघव पर पड़ी जो हाथ में पकड़े रिमोट के सामने टी.वी. का चैनल बदल रहा था।
उसकी इकलौती लटक रही टांग आगे-पीछे झूल रही थी और घुटने के पास कटी हुई दूसरी टांग कुर्सी से थोड़ी आगे निकली हुई थी।
कमरे में जहां राघव बैठा था-वहां तीन कुर्सियां और पड़ी थीं और दो कुर्सियां सामने थीं और एक उसके बाईं तरफ थी।
बीच में साधारण-सी सेंटर टेबल रखी थी।
कोने में रखा टी.वी. भी साधारण था और वो एक ऊंची टेबल पर रखा हुआ था।

Tuesday, 21 October 2025

675. मुझे मौत चाहिए - अनिल सलूजा

दिल्ली के डाॅन से बलराज गोगिया की टक्कर
मुझे मौत चाहिए - अनिल सलूजा
# साठ लाख शृंखला +
- बलराज गोगिया सीरीज- 14

  एक कातिल को ढूंढकर उस मौत के घाट उतारने का काम मिला था बलराज गोगिया को। तफ्तीश करते हुये वह आगे बढा तो उल्टा अपनी ही जान के लाले पड़ गये उसे और....
और किसने कहा था- मुझे मौत चाहिए

"नहीं... नहीं... भगवान के लिये मेरे बेटे को कुछ मत कहना... मुझ गरीब का बस एक ही बेटा है...। अगर उसे कुछ हो गया तो मेरी पत्नी रो-रो कर अपनी जान दे देगी...। त... तुम मेरी पत्नी की हालत जा कर देखो... बेटे की जुदाई में वह मरने को हो रही है।" अपने कमरे की तरफ बढ़ते बलराज गोगिया के कदम वहीं ठिठक गये।
मोहन गेस्ट हाउस के बारह नम्बर कमरे में ठहरा हुआ था वह... ।

Friday, 10 October 2025

674. शूटर- अनिल सलूजा

एक मंत्री की हत्या का मामला
शूटर- अनिल सलूजा
- बलराज गोगिया- राघव सीरीज - 05

   आज हम चर्चा कर रहे हैं अनिल सलूजा जी और बलराज गोगिया सीरीज के पांचवें उपन्यास शूटर की। यह एक एक्शन-थ्रिलर उपन्यास है। बलराज गोगिया एक महिला की सहायता के लिए मंत्री की हत्या करने मैदान में उतरता है और एक गहरी साजिश में फंस जाता है।
     आपने पिछले दो भागों में विभक्त उपन्यास 'बारूद की आंधी' और 'खूंखार' में पढा होगा की बलराज गोगिया और राघव का पासपोर्ट और वीजा तैयार है और दोनों शांति का जीवन जीने के लिए देश छोड़ने के लिए एयरपोर्ट पहुंचते हैं लेकिन वहां की विक्टर बनर्जी के धोखे के चलते पुलिस पहुँच जाती है और दोनों जान बचाकर दिल्ली छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।
एक लम्बे समय पश्चात दोनों आगरा से दिल्ली पहुंचते हैं और वह भी सीधे विक्टर बनर्जी के दरवाजे पर दस्तक देते हैं।

"खट... खट... खट।"
दरवाजे पर दस्तक पड़ी।
विक्टर बनर्जी फोल्डिंग पलंग से नीचे उतरा... चप्पल पहनी और चश्मा उतारकर उसे अपनी मैली शर्ट के पल्लू से साफ करते हुए दरवाजे की तरफ बढ़ा।
"कौन...?"

Sunday, 5 October 2025

672. बारूद की आंधी- अनिल सलूजा

बलराज गोगिया का तीसरा कारनामा
बारूद की आंधी- अनिल सलूजा

बलराज गोगिया सीरीज- 03

"अब क्या ख्याल है ?*
"कैसा ख्याल?"
"भई विदेश जाने का।
"वो तो जाना ही है, यहां रहा तो कभी न कभी पुलिस के हत्थे चढ़ जाऊंगा और अगर में एक बार पकड़ा गया तो इस बार कोई अवतार सिंह या इकबाल बचाने के लिए नहीं आने वाला और अदालत भी जल्द से जल्द फांसी पर चढ़ाने का हुक्मनामा जारी कर देगी।"
"एक जरिया था। एक वही दोस्त था लेकिन यह भी हरामजदगी दिखा गया।" एक लंबी सांस छोड़ते हुए राघव बोला।
"इसमें तेरा क्या कसूर था और फिर तूने उसे उसकी गद्दारी की सजा खुद अपने हाथों से दे दी थी।" बलराज गोगिया रुमाल निकालकर मुंह पौंछते हुए बोला।
     गंगानगर पुलिस के हाथों आते-आते बचे थे बलराज गोगिया और राघव अगर ऐन वक्त पर वे इन्दिरा गांधी नहर में छलांग न मार गए होते तो दोनों की लाशें, वहीं पुल पर हो बिछी नजर आती।

Friday, 3 October 2025

Thursday, 1 December 2022

546. फंदा- अनिल सलूजा

बलराज गोगिया शृंखला का प्रथम उपन्यास
फंदा- अनिल सलूजा

"अभी नहीं बल्लू.... कुछ देर और, तब जाओ।”
मुस्करा पड़ा बलराज गोगिया- “लगता है अभी दिल नहीं भरा तेरा।"
“इतने अर्से बाद मिले हो, एक....एक दिन का हिसाब लूंगी।" बड़ी शोख अदा से बोली रजनी।
उसकी शोख अदा ने ही बलराज गोगिया के दिल में खलबली मचा दी, खुद उसका दिल एक बार फिर वही खेल खेलने को मचलने लगा ।
“ठीक है....।” -मुस्कराया बलराज गोगिया और रजनी के उभारों पर अपने हाथ फेरने लगा-“हम यह खेल दोबारा खेलेंगे, मगर, तुझे मेरे यहां आने का पता कैसे चला....?” और फिर
“रूक जा रजनी.... ।”-  दहाड़ उठा बलराज गोगिया ! लेकिन, रजनी ने रूकने का कोई उपक्रम नहीं किया-पूरी रफ्तार से वह गन्ने के खेत की तरफ भाग रही थी, जिसमें से कि पुलिस वाले बाहर निकल रहे थे-पहले तो बलराज का दिल किमा, शूट कर दे उस नागिन को, लेकिन फिर कुछ सोच कर उसने जीप के एक्सीलेटर पर पैर का दबाव बढ़ा दिया।
तोप से निकले गोले की तरह छूटी जीप । पीछे से पुलिस ने फायरिंग कर दी !
                      फन्दा - अनिल सलूजा
खून के सैलाब में लिपटी बलराज गोगिया की ऐसी गाथा जिसमें प्रतिशोध में डूबा गोगिया एक बार फांसी के फंदे से भी नीचे उतर आया। ग्रिल, एक्शन, सस्पेंस और एडवेंचर युक्त यह कहानी एक जलजला है, तूफान है।

Wednesday, 5 June 2019

202. आदमखोर- अनिल सलूजा

अंडरवर्ल्ड गैंगवार की कहानी
आदमखोर- अनिल सलूजा, उपन्यास
भेड़िया सीरिज

अनिल सलूजा जी का एक खतरनाक पात्र है 'भेड़िया'। धर्मराज से शाप प्राप्त, हवस का भूखा, दौलत का दीवाना और खून का प्यासा।
आदमखोर उपन्यास इसी भेड़िया सीरिज की है। उस उपन्यास को पढने का कारण यही था की 'भेड़िया सीरिज' का कोई उपन्यास पढना था।

      यह उपन्यास अंडरवर्ल्ड की गैंगवार पर आधारित है। कालिया पठान अंडरवर्ल्ड का बादशाह है। काली दुनियां पर उसका राज है। पिछले बीस वर्ष से वह दिल्ली अंडरवर्ल्ड
का बेताज बादशाह बना हुआ था। (पृष्ठ -17)
        मकबूल हुसैन और काली सिंह भी अंडरवर्ल्ड के उभरते हुए बदमाश हैं। अब एक शहर में तीन बदमाश तो रह नहीं सकते। काली सिंह और मकबूल हुसैन दोनों एक समझौते के तहत एक साथ हो जाते हैं और कालिया पठान के काले सम्राज्य पर कब्जा करना चाहते हैं। दोनों में गैंगवार चालू है।

Sunday, 21 April 2019

185. हारा हुआ जुआरी- अनिल सलूजा

यार राघव को बचाने निकला बलराज गोगिया...

          अपने साठ लाख लेकर वह जम्मू जा रहा था। जहां उसका यार राघव था। उसकी प्रेमिका सुनीता थी। (पृष्ठ-08)
         जम्मू तवी एक्सप्रेस ट्रेन में सफर करते वक्त बलराज गोगिया के सामने कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनी की उसे साठ लाख रूपये किसी को देने पड़ गये लेकिन साथ ही उसे दस करोड़ रूपये लूट का आॅफर भी मिल गया।

          अनिल सलूजा जी का एक पात्र है बलराज गोगिया। बलराज गोगिया एक डकैत है,‌ लेकिन ईमानदार भी। बस कुछ परिस्थितियाँ उसे गलत राह पर ले गयी। इस बार भी उसके साथ कुछ ऐसे हालात बने की उसे एक डकैती में शामिल होना पड़ा।

               बलराज गोगिया का मित्र है राघव। राघव की टांग में जहर फैल जाने से डाॅक्टरों ने राघव की टांग काट दी। उस टांग को पुन: जुड़वाने के लिए बलराज गोगिया को रुपयों की आवश्यकता थी।
जैसा की उपन्यास के उपर लिखा है यार की जिंदगी बचाने के अभियान पर निकले बलराज गोगिया का एक और कारनामा.... इससे यह तो स्पष्ट होता है की अपने मित्र राघव के लिए बलराज ने कुछ डकैतियां अवश्य की है। 'हारा हुआ जुआरी' के बाद जो अनिल सलूजा का उपन्यास है उसका शीर्षक है 'राघव की वापसी' अर्थात राघव का इलाज सफल रहा।
             अपने बात कर रहे थे प्रस्तुत उपन्यास 'हारा हुआ जुआरी' की। साठ लाख रुपयों के साथ जम्मूतवी ट्रेन में सफर करते हुए कुछ परिस्थितियों के चलते बलराज गोगिया को वह रुपये करनाल (हरियाणा) में किसी को देने पड़ गये।
                  मनोज, रहीम, संजय और राकेश साहू चार ऐसे पात्र हैं जो एक बैंक की वैन को लूटना चाहते हैं लेकिन यह लूट उनके लिए संभव नहीं। एक योजना के तहत वे चारों बलराज गोगिया को इस लूट में शामिल करते हैं। बलराज गोगिया भी स्वयं के बारे में यही कहता है- मैं‌ तो जमाने का का ठुकराया हुआ एक ऐसा इंसान हूँ- जिसकी जिंदगी उस कुत्ते की तरह है- जिसका कोई वली वारिस नहीं। सुकून की तलाश में भटकता हुआ मैं जब भी किसी जगह आराम करता हूँ तो कोई न कोई मेरी पीठ पर लात मारकर मेरे को किसी न किसी के पीछे लगने को मजबूर कर देता है।(पृष्ठ-264)

- बलराज गोगिया ने साठ लाख रुपये किसे व क्यों दे दिये?
- ट्रेन दुर्घटना क्या थी?
- चारों मित्रों ने बलराज गोगिया को लूट में कैसे शामिल किया?
- क्या बलराज गोगिया बैं‌क की वैन लूट पाया?
-आखिर लूट में कौन सफल रहा?
- क्या हुआ राघव का?


यह उपन्यास पूर्णतः डकैती पर आधारित है। आखिर कैसे एक सुरक्षाबद्ध वैन को बिना किसी हंगामें के लूट लिया जाता है।

उपन्यास के जैसे जैसे आगे बढती है तो कुछ नये किरदार जुड़ते चले जाये हैं। और हर किसी की नजर होती है दस करोड़ की दौलत पर। यह वह दौलत ही क्या जो इतनी आसानी से मिल जाये। 
यही से आरम्भ होता है घात और विश्वासघात का सिलसिला। दस करोड़ जैसी बड़ी रकम पर बहुत से लूटेरे नजर टिकाये बैठ हैं।
अब देखना यह है की इस करोड़ों के खेल में किसे रुपये मिले और किसे मौत।


          बलराज गोगिया चाहे एक डकैत हो लेकिन वह साफ हृदय का इंसान है।‌ उसके विचार ही उसके व्यक्तित्व को परिभाषित करते हैं। राखी को भी वह कहता है- औरत के लिए मेरे दिल में उतनी ही इज्जत है जितनी एक इज्जतदार आदमी के दिल में होनी चाहिए। (पृष्ठ-81)

वहीं माला भी बलराज गोगिया के चरित्र की प्रशंसा करती हुयी कहती है।- जिसने मेरे से कोई रिश्ता न होने के बावजूद साठ लाख सिर्फ इसलिए मुझे दे दिये कि मेरी गोद सूनी न हो....जबकि वो साठ लाख वो अपने भाई के इलाज के लिए ले जा रहा था। (पृष्ठ-252)

पूरे हिन्दुस्तान के अंडरवर्ल्ड का सबसे बड़ा ऐसा डाॅन....जो सबसे शरीफ डाॅन माना जाता है और सबसे खतरनाक भी माना जाता है।

                      उपन्यास के आरम्भ में यह दिखाया गया है की जम्मूतवी एक्सप्रेस ट्रेन की पटरियों को कुछ बदमाश खोल देते हैं। वहीं बाद में यह पता चलता है की आतंकवादी ट्रेन में विस्फोट कर देते हैं।
उपन्यास में यह कहीं क्लियर ही नहीं होता की ट्रेन की पटरियों को खोलने वाले कौन थे। हालांकि उक्त दोनों दृश्यों का उपन्यास के बाकी अंश से कोई संबंध नहीं है।

- ट्रेन के बाहर से, खिड़की से कोई बलराज गोगिया का साठ लाख रुपयों से भरा बैग उठाने की कोशिश करता है।
- बलराज गोगिया भी ट्रेन की खिड़की से बाहर सिर निकाल कर उसे देखता है।
यह ट्रेन में संभव नहीं है, जब तक की आप आपातकालीन खिड़की के पास नहीं बैठ हों और खिड़की खुली न हो।
बलराज गोगिया जैसा शातिर खिड़की खुली छोड़ दे ये संभव नहीं।

निष्कर्ष-
‌         अनिल सलूजा द्वारा रचित 'हारा हुआ जुआरी' बलराज गोगिया सीरिज का एक डकैती पर आधारित उपन्यास है। यह एक सामान्य कहानी है कहीं कोई विशेष प्रभाव नहीं छोड़ती। हां, यह भी है की कहानी कहीं से आपको निराश नहीं होने देगी।
उपन्यास एक बार पढा जा सकता है।


उपन्यास- हारा हुआ जुआरी
लेखक-   अनिल सलूजा
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- ‌‌‌‌‌        317



#बलराज गोगिया सीरिज
अनिल सलूजा के अन्य उपन्यास
कृष्ण बना कंस- अनिल सलूजा

Thursday, 19 October 2017

71.कृष्ण बना कंस- अनिल सलूजा

एक बहन के हत्यारे की कथा, जिस पर बहन से बलात्कार करने का आरोप था।
कृष्ण बना कंस, थ्रिलर उपन्यास, एक्शन,  पठनीय।

    "औरत के आंसू किस कदर पत्थर को भी मोम में बदल देते हैं- चाहे वे आंसू मगरमच्छी ही क्यों हों। आंसूओं के रूप में औरत के पास एक ऐसा खतरनाक हथियार है, जो किसकी जिंदगी को तबाह कर दे, कहा नहीं जा सकता।
          ऐसे ही मगरमच्छी आंसूओं का सहारा लेकर, एक औरत ने रीमा राठौर को इस कदर फंसाया कि वह बेगुनाह इंसान राक्षस बनने को मजबूर हो गया।" (लेखक की कलम से)
          

रीमा राठौर से हुयी एक छोटी सी गलती ने, उसकी जिंदगी को उस मोङ पर ला खङा किया, जहाँ उसे हर तरफ खून ही खून नजर आने लगा।

उस पर बहन से बलात्कार का आरोप था, और उसने बहन की हत्या कर दी। अपने जीजा को भी मार दिया और अब उसे तलाश थी उस वकील रीमा राठौर की जिसके कारण उसे सजा हुयी।
       रीमा राठौर की तलाश में निकले किशन ने अपनी बेगुनाही साबित करने की जगह लाशों के ढेर लगा दिये और वह भी बेवजह।
   अनिल सलूजा द्वारा लिखा गया रीमा राठौर सीरिज एक ऐसे युवक की कहानी है जिस पर अपनी बहन से बलात्कार का आरोप था, उसे सजा हुयी। वह जेल से भाग निकला और अपनी बहन व जीजा की हत्या कर दी।
      उपन्यास में  प्रतिशोध की कहानी है। उपन्यास का प्रमुख पात्र किशन उपन्यास के आरम्भ में ही जेल से फरार होकर अपना बदला ले लेता है। तब पाठक सोचता है की आगे क्या होगा अब आगे होने को कुछ भी नहीं है। जो होना था उपन्यास के आरम्भिक बीस पृष्ठ में हो जाता है बाकी दो सौ पृष्ठ लेखक ने अनावश्यक रूप से ही बढा दिये।
      अब किशन उन लोगों से बदला लेने लग जाता है जो उसके जीजा के बुरे कामों के साथी थे। हालांकि किशन को जेल करवाने में उनका किसी प्रकार का कोई योगदान नहीं है, पर लेखक महोदय ने बेतुकी कहानी पाठक के आगे परोस दी।
        
  पूरे उपन्यास में मात्र एक दो संवाद हैं जो पठनीय है बाकी तो सामान्य कथन मात्र हैं। हालांकि थ्रिलर उपन्यासों में अच्छे संवादों का इतना महत्व नहीं होता लेकिन फिर भी अच्छे संवाद पाठक को सदा याद रहते हैं।
" यह रिश्ते नाते शरीफों के तबके में पहचाने जाते हैं। हमारे तबके में ऐसे किसी भी रिश्ते की अहमियत नहीं होती।"-(पृष्ठ 50)

- " इस दुनिया का सबसे खतरनाक गुस्सा, शरीफ आदमी का ही गिना जाता है। जब वह जुनून में आता है तो पूरी दुनिया को खत्म करने से भी पीछे नहीं हटता।"-(पृष्ठ 103)

उपन्यास में गलतियां:-
उपन्यास में कुछ गलतियां तो ऐसी हैं जिन्हें मेरे विचार से लेखक उपन्यास को दोबारा पढता तो दूर कर सकता था।

" कानून में पहले प्रावधान था कि अगर किसी औरत की इज्जत लुटती थी, तो उसे साबित करना पङता था कि उसकी वाकई में इज्जत लुटी...मगर अब कानून का यह प्रावधान बदल दिया गया है ....उस आदमी को साबित करना पङता है कि वह बेगुनाह है।"-(पृष्ठ 74)
       मुझे नहीं लगता की कानून में ऐसा कोई प्रावधान है। ऐसे तो कोई भी महिला किसी भी पुरुष पर इल्जाम लगा देगी और पुरुष कैसे साबित करेगा।
- उपन्यास में किशन का कोई मेडिकल टेस्ट नहीं होता जबकि बलात्कार में सबसे पहले मेडिकल टेस्ट ही होता है।
- रमेश सहगल के घर से कुछ गुण्डे शादी की एलबम से फोटो चुरा कर ले जाते हैं, भले आदमी एक-एक फोटो निकालने में कितना समय लगता है, पूरी एलबम ही उठाकर ले जाता। (पृष्ठ 91-92)
- पृष्ठ संख्या 118,
पुलिस की गाङी ऐन रीमा राठौर के करीब आकर रुकी।
......
"लेकिन कार में किसी की लाश नहीं ....." (पृष्ठ 118)
जब इंस्पेक्टर कार के पास ही नहीं गया तो उसे दूर से कैसे पता चल गया की कार में कोई नहीं।

       अनिल मोहन का एक उपन्यास ' दहशत का दौर' पढा था। जिसका नायक लगातार हत्या पर हत्या करता चला जाता है और कहीं पर उसका बाल भी बांका नहीं होता उसी प्रकार इस उपन्यास का मुख्य पात्र किशन भी हर जगह पहुंच कर हत्या दर हत्या करता रहता है।
    उपन्यास खाली समय में एक बार पढा जा सकता है।
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उपन्यास- कृष्ण बना कंस
लेखक- अनिल सलूजा
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- 222
मूल्य- 20₹
श्रृंखला- रीमा राठौर सीरिज

लेखक संपर्क-
अनिल सलूजा
मकान नंबर- 494
वार्ड नंबर- 12
पानीपत , हरियाणा