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Saturday, 8 October 2022

536. पल पल दिल के पास- अतुल प्रभा

काश! यह कहानी काल्पनिक होती
पल पल दिल के पास- अतुल प्रभा
प्यार कोई बोल नहीं प्यार आवाज़ नहीं
एक खामोशी है, सुनती है, कहा करती है 
ना ये रुकती है, ना झुकती है, ना ठहरी है कहीं 
नूर की बूँद है, सदियों से बहा करती है। - गुलजार
 कुछ कहानियाँ, कुछ किताबें ऐसी होती हैं जो मन को छू जाती हैं। मन‌ पर एक अमिट छाप छोड़ जाती हैं।  और कहानी अगर सत्य हो और व्यथा से परिपूर्ण हो तो मन‌ में एक कसक सी भी उठती है काश! यह कहानी काल्पनिक होती।
   कल्पना सत्य से बहुत आगे की चीज है, पर कभी-कभी सत्य भी इतना कठोर होता है की वहाँ कल्पना भी ठहर गयी सी प्रतीत होती है।
ऐसी ही एक सत्य कथा है -पल पल दिल के पास।
लेखक अतुल प्रभा जी के साथ 18.09.2022
   सितम्बर 2022 में दिल्ली- मेरठ जाना हुआ था। दिल्ली में 'नीलम जासूस कार्यालय' प्रकाशन जाना हुआ। वहीं अतुल प्रभा जी से मुलाकात हुयी।‌ स्निग्ध मुस्कान चेहरे पर बिखेरते हुये मिले अतुल जी। वहीं उनकी यह किताब मिली जो अपने अंदर लेखक महोदय के अथाह दर्द को समेटे हुये है।

Sunday, 4 April 2021

430. अभिज्ञान- नरेन्द्र कोहली

सुदामा और श्री कृष्ण मिलन कथा
अभिज्ञान- नरेन्द्र कोहली

भारतीय समाज में श्री सुदामा और श्री कृष्ण की मित्रता का उदाहरण खूब दिया जाता है। दोनों के मिलन को लेकर कुछ कहानियाँ भी प्रचलित हैं। और इन कहानियों में चमत्कार ज्यादा है। 
       नरेन्द्र कोहली द्वारा लिखित उपन्यास 'अभिज्ञान' पढा जो की सुदामा और श्री कृष्ण की मित्रता पर आधारित है, लेकिन इस में  चमत्कारिक घटनाएं नहीं है बल्कि समाज में व्याप्त उन घटनाओं को नया रूप देकर, सत्य के निकल दर्शाया गया है।
  ‌नरेन्द्र कोहली जी की यही विशेषता है कि उनकी रचनाओं में पौराणिक कहानियों को वैज्ञानिक रूप से प्रस्तुत किया है और यह सत्य के निकट प्रतीत भी होता है। 
- श्री कृष्ण के सोलह हजार रानियाँ की कहानी?
- सुदामा को श्री कृष्ण से मिलने पर  क्या मिला?
- युधिष्ठिर द्यूत (जुआ) में क्यों शामिल हुये?
- कृष्ण का गोपियों की मटकी फोड़ना?
- गोपियों और राधा का प्रसंग।

  आदि बहुत सी घटनाओं को नया रूप दिया गया है।
इसके अतिरिक्त कर्म, परिश्रम, फल आदि सिद्धांतों पर गहन चिंतन भी है। 

Tuesday, 23 March 2021

426. उपसंहार - काशीनाथ सिंह

उत्तर महाभारत की कृष्णकथा
उपसंहार - काशीनाथ सिंह

कुरुक्षेत्र के मैदान में 'सत्य की असत्य पर विजय' के उदघोष के साथ महाभारत का युद्ध खत्म हो गया। और खत्म हो गये असख्य लोग। उस युद्ध के पश्चात क्या हुआ? यही उपसंहार है।
      हिंदी साहित्य में काशीनाथ सिंह का नाम एक सशक्त साहित्यकार के रूप में उपस्थित है। 'काशी का अस्सी' जैसी चर्चित रचना उनके नाम दर्ज है। लेकिन प्रस्तुत रचना एक अलग ही विषय पर आधारित है। 

      हालांकि मेरे द्वारा काशीनाथ सिंह जी को पढने का यह प्रथम अवसर है, और वह भी एक उत्कृष्ट रचना के साथ‌। मैं इस रचना को पढने के पश्चात स्तब्ध सा रह गया था, मन शून्य सा हो गया था।
  प्रस्तुत रचना 'उपसंहार' महाभारत के छत्तीस वर्ष बीत जाने के पश्चात की कथा है। जहां पाण्डवों की अपनी समस्याएं हैं, यादवों- द्वारका की अपनी समस्याएं हैं और श्री कृष्ण एक सामान्य मनुष्य की तरह पूर्णतः विवश नजर आते हैं। 

Sunday, 31 January 2021

416. पवित्र पापी- नानक सिंह

पवित्र पापी- नानक सिंह, उपन्यास
मनुष्य से जाने और अनजाने में गलतियाँ हो जाती हैं। कभी मनुष्य उन गलतियों को स्वीकार कर लेता हैऔर कभी नहीं। 
   सच्चा मनुष्य वही है जो अपनी गलती को स्वीकार कर ले। लेकिन कभी-कभी परिस्थितियाँ कुछ और ही कहानी व्यक्त कर देती हैं। मनुष्य को स्वयं तो लगता है उस से गलती हुयी लेकिन अन्य लोग मानते हैं कि वह गलत नहीं, ऐसी स्थिति को आप क्या कहेंगे। 

पवित्र पापी- नानक सिंह
पवित्र पापी- नानक सिंह
       पंजाबी के चर्चित कथाकार हैं नानक सिंह। पंजाबी साहित्य को समृद्ध करने में उनका अतुलनीय योगदान है। उनका रचित साहित्य पंजाबी कथासाहित्य में श्री वृद्धि करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  मैं स्वयं पंजाबी हूँ, लेकिन पंजाबी में मैंने कभी विस्तृत साहित्य नहीं पढा। कहानियाँ और कविताओं के अतिरिक्त कभी नहीं। पंजाबी उपन्यास पढने का यह पहला अवसर है। पंजाबी उपन्यास और गुरुमुखी लिपि में।
  पंजाब के खन्ना शहर के मित्र नवनीश भट्टी जी ने मुझे दो पंजाबी उपन्यास भेजे थे। नानक सिंह द्वारा रचित 'पवित्र पापी' और कृशनचंदर का 'एक औरत हजार अफसाने'(पंजाबी में‌ अनूदित) मैं‌ नवनीश का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ ।
    अब चर्चा करते हैं प्रस्तुत उपन्यास की।

Sunday, 25 October 2020

394. वापसी- यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र'

एक औरत की व्यथा
वापसी/ हूं गोरी किण पीव री- यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र'

 राजस्थानी साहित्य में यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' जी का अपना एक विशिष्ट स्थान है। उनकी रचनाओं में राजस्थानी भाषा की मिठास, लोक संस्कृति का चित्रण और सामाजिक समस्याओं का अनूठा चित्रण चित्रण मिलता है। 
     इन दिनों मैंने यादवेन्द्र शर्मा जी की तीन अनुवादित रचनाएं पढी हैं। 'मिनखखोरी'(राजस्थानी- जमारो) कहानी संग्रह और दो उपन्यास 'शतरूपा' और प्रस्तुत उपन्यास 'वापसी'(राजस्थानी- हूं गौरी किण पीव री)।
    यह तीनों रचनाएँ समाज में स्त्री की भूमिका और पुरूष के वर्चस्व को रेखांकित करती हैं।
    अब बात करते हैं 'वापसी' उपन्यास की, यह राजस्थानी भाषा के चर्चित उपन्यास 'हूं गौरी किण पीव री' का अनुवाद है। वैसे राजस्थानी और हिन्दी में विशेष अंतर नहीं है। इसलिए अनुवाद पढते समय वहीं आनंद आता है जो मूल कृति को पढते वक्त महसूस होता है। वैसे भी अनुवाद में हल्की सी आंचलिक शब्दावली प्रयुक्त है। 

Tuesday, 28 July 2020

358. वरुणपुत्री- नरेन्द्र कोहली

पौराणिक, इतिहास, कल्पना और फैटेंसी का रोचक संसार
वरुणपुत्री- नरेन्द्र कोहली, उपन्यास

भारत कभी विश्व गुरु कहलाता था, लेकिन अब वह अपनी सभ्यता और संस्कृति से इतना विमुख हो गया है की उसे अपनी सभ्यता और संस्कृति की पहचान तक नहीं रही।
दूसरी तरफ मनुष्य विज्ञान के इतना समीप हो गया है की उसे विज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी सत्ता पर विश्वास नहीं रहा। इस ब्रह्माण्ड में बहुत कुछ ऐसा है जो मनुष्य और विज्ञान से परे है। हमारे लिए हमारा संसार बस इतना ही है जितना हमने पढा और विज्ञान ने हमें बताया है।
        यह कहानी है विक्रम नामक एक युवक की। जो वरुणपुत्री के साथ समुद्र और द्वारका (श्री कृष्ण जी की जलमग्न नगरी) का भ्रमण करता है।  वहाँ वरुणपुत्री उसे इतिहास और पौराणिक तथ्यों से अवगत करवाती है।    कहानी का द्वितीय भाग विक्रम के परिवार से संबंधित है। उनके आचरण और परिणाम को चित्रित किया गया है।
इस उपन्यास ने मुझे विशेष कर प्रभावित किया है। इसका कारण है एक तो जलमग्न द्वारका का इतिहास, चित्रण और सरकारीवर्ग की उपेक्षा का विश्लेषण करना। एक मिट्टी का विस्तार होना- क्योंकि मैं जानती हूँ कि यह रेत कहाँ की है और यह भी जानती हूँ। कि यह स्थानीय रेत से युद्ध कर रही है। यदि यह क्रम चलता रहा तो स्थानीय रेत समाप्त हो जायेगी और यह रेत सारे सागर-तट पर फैल जायेगी।...”
“अपने आप रेत कैसे फैल जायेगी?" विक्रम चकित था।

      यह विस्तार मात्र मिट्टी का ही नहीं सभ्यता, संस्कृति, भाषा- बोली, देश आदि किसी भी रूप में हो सकता है।

        समय के अनुसार बहुत से शब्दों के और घटनाओं के अर्थ बदल जाते हैं। नरेन्द्र कोहली जी की यह विशेषता है की वे तथ्यों को कसौटी पर परख कर प्रस्तुत करते हैं। महाभारत और रामायण के संबंधित बहुत सी भ्रांतिया समाज में प्रचलित हैं। 'वरुणपुत्री' में महाभारत कालिन कुछ भ्रांतियों का निवारण किया गया है। जैसे‌ एक भ्रांति है की अर्जुन ने एक नाग कन्या से शादी की थी। क्या यह संभव है कोई मनुष्य नागिन से शादी कर ले।
     "आप कौरव्य के विषय में कुछ कह रही थीं।”
     "वह नागों की एक जाति का राजा था। उसकी एक पुत्री थी उलूपी, जिसने अर्जुन से विवाह किया था।
    “तो वह सर्प रूपी नागिन तो नहीं रही होगी, नहीं तो अर्जुन उससे विवाह कैसे कर लेता ? कोई मनुष्य किसी नागिन के साथ अपनी गृहस्थी कैसे बसा सकता है।”
     “इतना ही नहीं। उनका एक पुत्र भी था।”
      “तो वह नाग कहलाने वाली किसी जाति की स्त्री रही होगी; किन्तु होगी वह स्त्री ही।”
      “सम्भव है।” वरुणपुत्री बोलीं,

वरुणपुत्री एक काल्पनिक उपन्यास है पर वह हमें बहुत कुछ सोचने के लिए विवश करती है, एक नया दृष्टिकोण प्रदान करती है, हमारी समझ को विकसित करती है, अपनी सभ्यता और संस्कृति पर गर्व करने के बहुत से तथ्य हमें प्रदान करती है।
       नरेन्द्र कोहली जी की मुझे विशेषकर इसीलिए पसंद है की वे हमारी सभ्यता और संस्कृति को परिष्कृत कर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। वर्तमान में बहुत से लेखक रामायण और महाभारत समय के पात्रों को इनता विकृत रूप दे रहे हैं जैसे उन्होंने कभी इन महाकाव्यों को पढा ही नहीं, वहीं नरेन्द्र कोहली जी इनके विपरीत महाकाव्यों को और भी परिष्कृत करते नजर आते हैं।
       अगर इन महाकाव्यों के समय को समझना है आगामी पीढी को कुछ सार्थक प्रदान करना है तो नरेन्द्र कोहली जी को अवश्य पढें।
       मुझे कुछ विशेष लगा वह यहाँ प्रस्तुत है-द्वारका के ही समान संसार के और भी अनेक ऐतिहासिक नगर सागर में डूबे हुए हैं। दक्षिणी यूनान में सागर-तट पर एक ग्राम है पावलोपेत्री। उसके निकट ही समुद्र में पाँच मीटर नीचे पांच सहस्र वर्ष पुराना नगर पावलोपेत्री दिखाई पड़ता है। वह आज के नगरों के समान सुनियोजित ढंग से बना हुआ है। कई भवन दोमंज़िले भी हैं और उनमें बारह कमरों तक का निर्माण हुआ है।...जमाइका का पोर्ट रॉयल,...जापान के दि पिरामिड ऑफ़ युनागुनी।...चीन की लॉयन सिटी...पीरु में दि टेंपल अंडर लेक टिटिकाका...अर्जनटाइना का विला एपिक्यूटइन...मिश्र में क्लियोपैट्रा का महल।”
“नहीं। मैं नहीं जानता। हमें भूगोल में यह सब नहीं पढ़ाया जाता।”
“स्कूल में सब कुछ नहीं पढ़ाया जाता। वह तो पहली सीढ़ी है। उसके पश्चात् तो अपनी रुचि से अध्ययन किया जाता है। उसे ही स्वाध्याय कहते हैं। तुम्हारी रुचि हो तो तुम अब स्मरण कर लो।" वरुणपुत्री ने कहा, “जिन जलमग्न नगरों का अब तक पता लगा है, संसार में द्वारका समेत ऐसे नौ नगर हैं।...”

        भारतीय सभ्यता और संस्कृति का रोचक और तथ्यात्मक ढंग से प्रस्तुत करती यह पुस्तक महत्वपूर्ण और पठनीय रचना है। इतिहास, पौराणिक, कल्पन और फैटेंसी का अद्भुत संगम इस रचना में प्रशंसनीय है।
       इसमें जितना रोचक और सरल तरीके से हमारे गौरवशाली अतीत का वर्णन किया गया है ऐसा अन्यत्र दुर्लभ है।
उपन्यास- वरुणपुत्री
लेखक- नरेन्द्र कोहली
प्रकाशक-
फॉर्मेट- ebook
पृष्ठ- 100

एमेजन   लिंक-  
वरुणपुत्री- नरेन्द्र कोहली

Saturday, 4 July 2020

Friday, 3 July 2020

343. काली - नरेन्द्र नागपाल

जब विक्षिप्त खून बदला लेने निकला
काली- अर्जुन नागपाल
अर्जुन नागपाल सीरीज


- क्या कोई खून (रक्त, Blood) भी कोई दहशत मचा सकता है?
- क्या कोई खून भी बदला ले सकता है ?
- क्या कोई खून भी कातिल हो सकता है?
- मनुष्य के शरीर में दौड़ते रक्त की रक्तरंजित कहानी है -काली
लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में बहुत कम उपन्यास हैं जो कुछ अलग हटकर लिखे गये हैं। अधिकांश उपन्यास एक निश्चित पैटर्न पर ही आधारित होते हैं, बस प्रस्तुतीकरण अलग हो जाता है। हालांकि ऐसी बात नहीं की कुछ नया और अलग हटकर लिखा नहीं गया, लिखा गया है लेकिन बस मेरी दृष्टि से चूक गया। (हां, अगर आपको कुछ अलग हटकर उपन्यास मिले तो कमेंट कर जरूर बतायें)
     नरेन्द्र नागपाल जी ने अपने उपन्यास 'काली' में कुछ अलग लिखने का प्रयास किया है और यह प्रयास सराहनीय है। यह कितना सफल रहा है यह पाठक के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है, मुझे उपन्यास बहुत पसंद आया।  क्या आपने टाइगर का उपन्यास 'लाश की जिंदा आंखें' और 'करिश्मा आँखों का' का उपन्यास पढे हैं ?  इन दोनों उपन्यासों की थीम अलग थी ठीक उसी तरह 'काली' उपन्यास की थीम अलग है, अलग हटकर है।

'काली' उपन्यास की कहानी एक विक्षिप्त हत्यारे की है जो चुनौती देकर, तय समय देकर कत्ल करता है लेकिन मजे की बात यह है यह सब 'खून' करवाता है। जी हां, खून, वह खून जो किसी के अंदर है। यह मृत आदमी के जिंदा खून की कहानी है।
पर खून अभी भी जिंदा था और किसी के दिमाग में अभी भी गोलियों की आवाज बन कर दौड़ रहा था।
पर किसके दिमाग में? 

Saturday, 27 June 2020

338. लाल रेखा- कुशवाहा कांत

प्रेम, कर्तव्य और स्वतंत्रता संग्राम की कहानी
लाल रेखा- कुशवाहा कांत

     लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में कुशवाहा कांत को रोमांस, जासूसी और क्रांतिकारी लेखक के रूप में जाना जाता है। इनके प्रेमपूरक उपन्यासों में भी क्रांति की ध्वनि गूंजती है और क्रांति पर लिखे गये उपन्यासों में भी प्रेम की महक आती है।
लाल रेखा तो क्रांति और प्रेम दोनों पर आधारित एक अविस्मरणीय रचना है। इस उपन्यास ने कुशवाहा कांत को अमर लेखकों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया।  

     वह हृदय से प्रेम कर सकता है और शरीर से कर्त्तव्य का पालन। कर्त्तव्य का पालन उसे पहले करना है और हृदय की पीड़ा बाद में देखनी है। (पृष्ठ-119)
        मनुष्य कर्तव्य और प्रेम दोनों रास्ते एक साथ तय करता है। लेकिन कभी-कभी परिस्थितियाँ इतनी विकट हो जाती हैं कि उसे प्रेम और कर्तव्य दोनों में से एक का चयन करना है। तब मनुष्य असमंजस की स्थिति में आजा है, वह किंकर्तव्यविमूढ हो जाता है। इसी स्थिति को परिभाषित करती है -लाल रेखा। 

Monday, 22 June 2020

337. कुमकुम- कुशवाहा कांत

द्रविड़ और आर्य राजाओं की संघर्ष गाथा
कुमकुम- कुशवाहा कांत

लेखक अपने जीवन काल में कुछ ऐसी अविस्मरणीय, अमिट रचनाएँ लिख जाता है कि वह उसके सम्पूर्ण साहित्य का प्रतिनिधित्व करती प्रतीत होती हैं। कुछ रचनाएँ सूर्य की भांति होती है जिसके आलोक में अन्य सितारे(रचनाएं) दृष्टिगत नहीं होते।
        कुशवाहा कांत मेरे प्रिय लेखक रहे हैं। इनके द्वारा लिखी गयी 35 रचनाओं में से तकरीबन बीस रचनाएँ मैंने पढ ली हैं। इनके कुछ उपन्यास अविस्मरणीय है तो कुछ विस्मरणीय भी हैं। किसी भी लेखक सभी रचनाएँ श्रेष्ठ नहीं होती लेकिन कुछ रचनाएँ श्रेष्ठतम भी होती हैं।
       कुशवाहा कांत जी के 'लाल रेखा', 'विद्रोही सुभाष', 'आहुति' आदि वह रचनाएँ हैं जो इनके लेखन का प्रतिनिधित्व करती नजर आती हैं। इसी क्रम में एक और उपन्यास शामिल होता है वह है 'कुमकुम'।

आर्य और द्रविड़ राजाओं के युद्ध को आधार बना कर, इतिहास पर कल्पना का आवरण चढा कर रचा गया यह उपन्यास चाहे ऐतिहासिक नहीं है पर इतिहास के एक अध्याय का इतना रोमांचक वर्णन करता है कि सब जीवंत सा प्रतीत होता हैै। 

Saturday, 20 June 2020

336. विद्रोही सुभाष- कुशवाहा कांत

नेताजी सुभाषचंद्र बोस के जीवन पर आधारित एक रोचक उपन्यास ।
लोकप्रिय साहित्य में अद्वितीय कृति
  पठनीय रचना

Monday, 27 April 2020

303. काला साया- अजिंक्य शर्मा

एक रहस्यमयी मर्डर मिस्ट्री
काला साया- अजिंक्य शर्मा

गिरिराज वर्मा शहर के नामी वकील थे। वकील होने के साथ ही वे बेहद संपन्न भी थे क्योंकि उनके पास पुरखों की छोड़ी गई अच्छी-खासी जायदाद भी थी और कुछ कम्पनियों के शेयर भी थे, जिनसे वे खूब मुनाफा कूटते थे। यानि पैसों की उनके पास कोई कमी नहीं थी। हिल रोड पर उनका एक घर था.......और इसी बीच गिरिराज वर्मा के हिल रोड स्थित घर में उनका कत्ल हो गया। गिरिराज वर्मा की लाश उनके घर के स्टडी रूम में उस रिवॉल्विंग चेयर पर पाई गई, जिस पर वो बैठा करते थे। रिवॉल्वर की गोली ने उनकी कनपटी में सुराख कर दिया था और रिवॉल्वर लाश के पास ही फर्श पर पड़ी मिली थी, जैसे हाथ से फिसल कर गिर पड़ी हो।
     जैसे जैसे इस कत्ल की खोजबीन‌ आगे बढी तो नये-नये तथ्य शामिल होते गये। कुछ लोगों के दावे बहुत ही अजीब थे तो कुछ लोग गिरीराज वर्मा के चरित्र पर संदेह करते थे। 


- एडवोकेट गिरिराज वर्मा समाज में बेहद प्रतिष्ठित, सम्मानित व्यक्ति के रूप में जाना जाता था। लोग उसके आदर्श चरित्र की मिसालें देते नहीं थकते थे।
- लेकिन जब एक रात उसी के घर में, बेहद रहस्यमयी ढंग से उसकी हत्या हो गई तो ऐसे-ऐसे चौंकाने वाले राज सामने आए कि लोग हैरान रह गए।
- कौन थी सनाया गौतम, गिरिराज वर्मा ने मरने से पहले-या यूं कहें कि मारे जाने से पहले-अपनी पूरी जायदाद जिसके नाम कर दी थी।
- क्या अधेड़ावस्था में एकाकी जीवन बिता रहे गिरिराज वर्मा को अपने जीवन में ‘चीनी कम’ लगने लगी थी, जिसके चलते उसने अपने सिद्धांतों से समझौता कर लिया था?
या वो ऐसी जहरीली नागिन के जाल में फंस गया था, जिसके जहर का कोई तोड़ नहीं था।
- या फिर गिरिराज वर्मा पर सचमुच किसी चुडै़ल का काला साया था?
जानने के लिए पढ़ें एक तेजरफ्तार मर्डर मिस्ट्री
'काला साया'


Tuesday, 24 March 2020

281. चित्रलेखा- भगवतीचरण वर्मा

समीक्षा पाप और पुण्य की
चित्रलेखा- भगवतीचरण वर्मा, उपन्यास
 


श्वेतांक ने पूछा—“और पाप !”
महाप्रभु रत्नाम्बर मानो एक गहरी निद्रा से चौंक उठे। उन्होंने श्वेतांक की ओर एक बार बड़े ध्यान से देखा—“पाप ? बड़ा कठिन प्रश्न है वत्स ! पर साथ ही बड़ा स्वाभाविक ! तुम पूछते हो पाप क्या है !" इसके बाद रत्नाम्बर ने कुछ देर तक कोलाहल से भरे पाटलिपुत्र की ओर, जिसके गगनचुम्बन करने का दम भरनेवाले ऊँचे-ऊँचे प्रासाद अरुणिमा के धुँधले प्रकाश में अब भी दिखलाई दे रहे थे, देखा—“हाँ, पाप की परिभाषा करने की मैंने भी कई बार चेष्टा की है, पर सदा असफल रहा हूँ। पाप क्या है, और उसका निवास कहाँ है; यह एक बड़ी कठिन समस्या है, जिसको आज तक नहीं सुलझा सका हूँ। अविकल परिश्रम करने के बाद, अनुभव के सागर सें उतराने के बाद भी जिस समस्या को नहीं हल कर सका हँ, उसे किस प्रकार तुमको समझा दूँ ?”

भगवतीचरण वर्मा द्वारा लिखा गया उपन्यास 'चित्रलेखा' मुख्यतः पाप-पुण्य को रेखांकित है। आखिर पाप क्या है और पुण्य क्या ह? यह स्वाभाविक सा प्रश्न है और इसे आधार लिखा गया यह उपन्यास पठनीय और विचारणीय भी है।
महाप्रभु रत्नाकर के दो शिष्य शिक्षा पूर्ण करने पर अपने गुरु से प्रश्न पूछते है कि पाप और पुण्य क्या है?
     श्वेतांक और विशाल को इसी बात को पता लगाने के लिए महाप्रभु दोनों को दो अलग-अलग प्रवृति के दो लोगों के पास भेजते हैं।
एक योगी है और दूसरा भोगी। योगी का नाम है कुमारगिरि और भोगी का नाम है बीजगुप्त।


Wednesday, 11 March 2020

275. जय सोमनाथ- कन्हैयालाल माणिक्यलाल मुंशी

सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के आक्रमण की कथा।
जय सोमनाथ- कन्हैयालाल माणिक्यलाल मुंशी, उपन्यास

'जय सोमनाथ' साहित्य जगत की एक चर्चित रचना है। इसका जिक्र अक्सर पाठकवर्ग में होता रहता है। जब विद्यालय के पुस्तकालय में यह उपन्यास दृष्टि में आया तो सहज ही उठा लिया और जब पढने बैठा तो इस उपन्यास की कहानी में डूबता चला गया। उपन्यास का कथानक इतना सुसंगठित है की मैं एक बहाव की तरह बहता चला गया।
         उपन्यास की कहानी महमूद गजनवी के सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण को आधार बना कर लिखी गयी है। लेखक महोदय लिखते हैं- लेकिन इस कथा में मेरा उद्देश्य सुल्तान महमूद के आक्रमण का चित्रण करना नहीं है, वरण गुजरात द्वारा किये गये प्रतिरोध का वर्णन करना है।
        हां वास्तव में यह उपन्यास तात्कालिक राजाओं के युद्ध कौशल, वीरता, संगठन और भीषण परिस्थितियों से जूझते हुए वीरों की शौर्यगाथा है। एक ऐसी गाथा जो कहीं मन को द्रवित करती है तो कहीं हृदय में जोश पैदा करती है। कहीं तात्कालिक समाज की परिस्थितियाँ सोचने को विवश करती है तो कहीं धर्म -अधर्म पर विचारने का अवसर प्रदान करती है।

उपन्यास का आरम्भ सोमनाथ मंदिर से होता है। जहां पाटण के राजा भीमदेव अपनें मत्री विमल के साथ उपस्थित हैं।
संवत् 1082 की कार्तिक सुदी एकादशी थी। जैसे लोहा चुम्बक से खिंचता चला आता है वैसे ही यात्री सोमनाथ के परम पूज्य शिवालय की ओर आकर्षित होकर खिंचे चले आ रहे थे। (पृष्ठ-प्रथम)
- वे चले आ रहे थे, हजारों की संख्या में। वे एक ही परम कर्तव्य को सामने रखकर आ रहे थे- देव का दर्शन। और उनके कानों में एक ही पूण्यनाद गूँज रहा था- 'जय सोमनाथ'
गंग सर्वज्ञ, भीमदेव और विमल को सूचना मिलती है की महमदू गजनवी सोमनाथ के लिंग को ध्वस्त करने आ रहा हैैै।

"गजनी का अमीर चढा चला आ रहा है।"
"क्या कहा?"- सर्वज्ञ और भीमदेव दोनों बोल उठे।
" हां, उसने थानेश्वर को लूट लिया है और कन्नौज को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। क्या आपको पता है कि वह अब भगवान सोमनाथ के थाम को नष्ट करने के लिए आ रहा है? एक क्षण भी खोने का समय नहीं है। जाओ, मेरे बापू और गूर्जर भूमि को संभालो।"(
पृष्ठ-41)


Sunday, 1 March 2020

273. नसीब मेरा दुश्मन- वेदप्रकाश शर्मा

नसीब और कर्म की टक्कर
नसीब मेरा दुश्मन- वेदप्रकाश शर्मा, उपन्यास

वह  A की हत्या के जुर्म में पकड़ा गया था।
और B के मर्डर की सफाई देने जा रहा था
और उसे C का कातिल साबित कर दिया।

क्या यह संभव है?


एक अविस्मरणीय कथानक।
क्या किसी शख्स नसीब इतना बुरा हो सकता है की वह हर जगह मात खा जाये, हर जगह उसे हार मिले, हर काम‌ में उसे असफलता मिले।
क्या वास्तव में किसी आदमी का नसीब बुरा हो सकता है। लेकिन वेदप्रकाश शर्मा जी का उपन्यास 'नसीब मेरा दुश्मन' पढा तो पता चला की ऐसा भी कुछ हो सकता है।
     'नसीब मेरा दुश्मन' कहानी है एक चोर-उच्चके मुकेश उर्फ मिक्की की। मिक्की का मानना है की उसका नसीब उसे हर बार धोखा देता है।- "यह साला बचपन से मुझे धोखा देता चला आ रहा है—सोने की खान में हाथ डालता हूं तो राख के ढेर में तब्दील हो जाती है, हाथ पर हीरा रखकर मुट्ठी बंद करूं तो खोलने तक कोयले में बदल चुका होता है।"

Tuesday, 25 February 2020

270. शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द

स्वामी विवेकानन्द जी के शिक्षा के प्रति विचार

    विद्यालय के पुस्तकालय में एक छोटी सी किताब मिली। जिसका शीर्षक था 'शिक्षा'। यह स्वामी विवेकानन्द जी के शिक्षा के प्रति विचारों का एक छोटा सा संग्रह है। इससे पूर्व (एक दिन पहले) राम पुजारी जी द्वारा लिखित एक बाल साहित्य की किताब 'अन्नु और स्वामी विवेकानन्द' पढी थी जो विवेकानन्द जी की जीवनी थी और यह पुस्तक (शिक्षा) उनके विचारों का संग्रह है।
मैंने विवेकानन्द जी से संबंधित अब तक जो साहित्य पढा है उनमें से यह लघु रचना मुझे श्रेष्ठ लगी।

       शिक्षा कैसी होनी चाहिए इस विषय पर विभिन्न संदर्भों के माध्यम से विचार किया गया है। शिक्षा की मनुष्य  को क्या आवश्यकता है, शिक्षा के तत्व, धार्मिक शिक्षा या स्त्री-शिक्षा सभी पर विवेकानन्द जी ने बहुत सारगर्भित बाते कही हैं।
स्वामी जी कहते हैं की वर्तमान हमारी शिक्षा हमें बौद्धिक दृष्टि से सक्षम बना रही है लेकिन हृदय के स्तर पर हम शून्य होते जा रहे हैं। 
हमें तो ऐसी शिक्षा चाहिये कि जिससे चरित्रगठन हो, मानसिक वीर्य बढे, बुद्धि का विकास हो और उससे मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके। (पृष्ठ-04)

         धर्म के विषय पर स्वामी जी के विचार मुझे बहुत प्रभावित करते हैं। आज हम धर्म को किस दृष्टि से देखते हैं और स्वामी जी किस दृष्टि से देखते हैं यह इस किताब से पता चलता है।
- हमें मनुष्य का निर्माण करने वाला धर्म चाहिए। हमें आवश्यकता है 'मनुष्य बनाने वाले सिद्धांतों की। हमें चाहिए ऐसी शिक्षा, जो हर तरह से हमें मनुष्य बना सके। (पृष्ठ-05)
धार्मिक शिक्षा अध्याय में लिखते है की 'नये धर्म का कहना है कि जो अपने में विश्वास नहीं रखता वह नास्तिक है।'(पृष्ठ-35)

स्री शिक्षा अध्याय में औरतों की दशा पर विचार करते हुए कहते हैं की "यह समझना बहुत कठिन है कि इस देश में पुरुषों और स्त्रियों के बीच इतना भेद क्यों रखा गया है जब कि वेदांत की यह घोषणा है कि सभी प्राणियों में वही एक आत्मा विराजमान है।" (पृष्ठ-43)

कुछ और विशेष विचार जो मुझे अच्छे लगे।
-ज्ञान प्राप्ति के लिए केवल एक ही मार्ग है और वह है एकाग्रता। (पृष्ठ-13)
- जिस अभ्यास के द्वारा मनुष्य की इच्छाशक्ति का प्रवाह और आविष्कार संयमित होकर फलदायी बन सके, उसी का नाम है शिक्षा। (पृष्ठ-05)
- मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है।


प्रस्तुत किताब 'शिक्षा' एक पठनीय और विचारणीय रचना है। अगर स्वामी विवेकानन्द जी को समझना है तो यह किताब अवश्य पढें और पढायें। यह किताब हमारे विचारों को परिपक्व करती है और एक नयी दृष्टि देती है। 
किताब-   शिक्षा     
विचारक- स्वामी विवेकानन्द
पृष्ठ-      50
प्रकाशन- 

लिंक- शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द

Thursday, 31 October 2019

239. तूफान फिर आया-भाग-02 ओमप्रकाश शर्मा

महमूद ग़ज़नवी का सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण
तूफान फिर आया-  ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय लेखक
जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी द्वारा लिखा गया एक बहुत ही अच्छा उपन्यास पढने को मिला। उपन्यास का की कथा ऐतिहासिक है, जिसे शर्मा जी ने अपनी कल्पना के रंग भर के उसे जीवंत रूप दे दिया है। लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में यह उपन्यास मील का पत्थर है। महमूद गजनवी का भारत पर आक्रमण और फिर सोमनाथ मंदिर की लूट यह इतिहास लिखित है।
      महमूद ग़ज़नवी अफ़ग़ानिस्तान के गज़नी राज्य का राजा था जिसने धन की चाह में भारत पर 17 बार हमले किए, सन 1024 ईसवी में उसने लगभग 5 हज़ार साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया, उस समय लगभग 25 हजा़र (यह संख्या कम ज्यादा हो सकती है) लोग मंदिर में पूजा करने आए हुए थे।
तूफान फिर आया- ओमप्रकाश शर्मा
जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश जी द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास 'तूफान फिर आया' गजनवी के सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण से संबंधित है। यह उपन्यास 'गजनी का सुल्तान' का द्वितीय भाग है।
      सौराष्ट्र में राजाओं को पता चला की इस बार म्लेच्छ गजनवी पवित्र सोमनाथ की अपार सम्पदा लूटने आ रहा है। - अबकी बार तूफान आया है सौराष्ट्र में। म्लेच्छ ने लक्ष्य बनाया है देवाधिदेव सोमनाथ को।"(पृष्ठ-145) तो उन्होंने गजनवी के विरुद्ध मोर्चा तैयार किया।
        यह एक सत्य है की राजपूत मरने से नहीं डरता। उनके लिए युद्ध एक खेल की तरह है। लेकिन गजनवी जैसे लुटेरे के लिए युद्ध कूटनीति का काम है, बहादुरी का नहीं। भारतीय राजाओं के लिए यह युद्ध धर्मयुद्ध था, सोमनाथ को बचाना उनका कर्तव्य था। लेकिन महामंत्री जानते थे की युद्ध केवल युद्ध होता है और यही बात उन्होंने राजा और रानी को समझायी।
"महामंत्री, महाराज यहाँ धर्मयुद्ध करने आए हैं।"
"मैं आपकी भावनाओं का आदर करता हूँ महारानी....परंतु युद्ध केवल युद्ध होता है धर्मयुद्ध नहीं।"
(पृष्ठ-191)
       क्योंकि गजनवी एक लूटेरा है। वह एक हिंसक पशु है और पशु धर्मयुद्ध नहीं जानते। मंत्री मेहता ने कहा - "हम भारतीयों को इतना सभ्य नहीं बनना चाहिए था। जितना कि हम सब बन गए हैं। राजाओं की यही भूल रही कि उन्होंने प्रजा को यह नहीं बताया कि पशु से निपटने के लिए पशु बन जाना चाहिए....।" (पृष्ठ-146,47)
       उपन्यास में एक पात्र है अनहिलवाड़ का दुर्गपाल नामदेव। एक युद्धा है जो सुलतान को टक्कर देता है। नामदेव के कथन राजपूतों का प्रतिनिधित्व करते नजर आते हैं। "भूलते हो सुलतान! पत्थर मोम नहीं हुआ करते। पत्थर झुकते भी नहीं हैं। पत्थर सिर्फ टूटते हैं। पत्थर सिर्फ टूटना जानते हैं।" (पृष्ठ-180))
         उपन्यास का प्रमुख पात्र है गुप्तचर कमल। यह एक काल्पनिक पात्र है लेकिन यह यथार्थ के बहुत नजदीक है। जहां राजा युद्ध को धर्मयुद्ध कह कर लड़ते वहीं कमल का मानना है की युद्ध में कूटनीति आवश्यक है। वह युद्ध अंत नहीं चाहता वह तो गजनवी का अंत चाहता है ताकी भविष्य में गजनवी का तूफान फिर न आये।
"कौन अंत कर सकता है?"
"जब तक जियूंगा मैं यह प्रयत्न जारी रखूँगा।"
(पृष्ठ-186)
यही कमल अंत तक गजनवी को जिस तरह से मात देता नजर आता है वह उसकी बहादरी और बुद्धि का कमाल है। कमल का चातुर्य प्रशंसा के योग्य है। वह चाहे साधू कमलानंद के रूप, किले के पहरेदार के रूप में या छद्म युद्ध में। कमल एक गुप्तचर है और उसका व्यवहार उसी के अनुरूप है, वही उसकी ताकत है।
         सत्य घटना पर वह भी ऐतिहासिक घटना पर उपन्यास लिखना बहुत मुश्किल कार्य है। क्योंकि उपन्यास का समापन किस तरीके से किया जाये की घटना सत्य भी रहे और पाठक भी संतुष्ट हो। क्लाइमैक्स किसी भी उपन्यास का महत्वपूर्ण होता है। प्रस्तुत उपन्यास का समापन इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है की पाठक को एक आत्मसंतुष्टि प्राप्त होती है वह भी सत्य के साथ कोई खिलवाड़ न करके।
       उपन्यास काल्पनिक है, ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है, पर तथ्यों को कहीं गलत नहीं दिखाया गया। ऐतिहासिक  विषयों पर लिखा गया इतना रोचक उपन्यास मैंने इस सेे पहले नहीं पढा।  शर्मा जी को इस कार्य के लिए धन्यवाद।

       लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में ऐतिहासिक विषयों पर लिखित उपन्यास नाममात्र के ही हैं। शर्मा जी इस विषय पर लिख कर लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में ऐतिहासिक अध्याय पृष्ठों में जो श्रीवृद्धि की है वह अविस्मरणीय है।
        जहाँ इतिहास मात्र तथ्यों का संग्रह होता है वही उपन्यास इतिहास और कल्पना का वह मिश्रित होता है नीरस कथा में भी सरसता पैदा कर देता है। इस दृष्टि से प्रस्तुत उपन्यास खरा उतरता है। ऐतिहासिक और युद्धों का विवरण होते हुए भी उपन्यास में जो मानवीय दृष्टि दिखाई गयी है वह लेखक की प्रतिमा का परिणाम है।
‌ ‌उपन्यास मात्र पठनीय ही नहीं संग्रहणीय भी है।

उपन्यास- तूफान फिर आया
लेखक-   ओमप्रकाश शर्मा
प्रकाशक- पुष्पी पॉकेट इलाहाबाद


गजनी का सुलतान- ओमप्रकाश शर्मा  प्रथम भाग समीक्षा

238. गजनी का सुल्तान भाग-01- ओमप्रकाश शर्मा

गुप्तचर कमल का कारनामा
गजनी का सुल्तान- ओमप्रकाश शर्मा

भारत भूमि हमेशा ऐश्वर्यशाली रही है, वह चाहे धन-धान्य के रूप में हो या वीरों के रूप में। इस पावन धरा पर धन भी है तो वीर भी जन्म लेते हैं।
      जहां अच्छाई होती है वहां बुराई भी आ जाती है।‌भारतभूमि की अपार सम्पदा पर विदेश शासकों की हमेशा से कुदृष्टि रही है। भारत पर सर्वाधिक आक्रमण पश्चिम से होते। जिनमें गजनी के शासकों द्वारा भारत पर किये गये क्रुर आक्रमण भी हैं।
      ओमप्रकाश शर्मा जी द्वारा लिखित उपन्यास 'गजनी का सुलतान' और इसका द्वितीय भाग 'तूफान फिर आया' भारतीय वीरों की वीरता और महमूद गजनी की क्रूरता का चित्रण करते हैं।
      महमूद गजनवी की क्रूरता का चित्रण करते हुए लेखक ने लिखा है।  यह प्रलयवान आँधी जिस दिशा की ओर रुख करती गांव राख हो जाते, नगरों के वैभव नष्ट हो जाते। जो मनुष्य उस आँधी की भेंट चढ़ते उनकी लाशें गिद्धों का भोजन बनती, जो इस आंधी की लपेट में आ जाते वे दूर काकेशश तक जाकर गुलामों ले बाजार में बिकते, और जो दुर्भाग्यशाली यह दोनों गति न पाकर किसी प्रकार भाग निकलते वो निराश्रित होकर चाकरी करते, भीख माँगते और युवा स्त्रियाँ भूख न सह पाने के कारण वेश्याएं बन जाती। (पृष्ठ-03)

महमूद गजनवी ने भारत पर लगभग 17 बार आक्रमण किया था। वह भारत की अपार संपदा लूट कर ले गया। यह कहानी गजनवी के सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण से कुछ पूर्व की है।
जब महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण और सोमनाथ मंदिर की लूट का विचार बनाया तो कुछ भारतीय राजा उसका साथ देने को तैयार हो गये। ऐसे ही एक राजा का राजदूत गजनी में जाकर महमूद गजनवी से मिला।
     अब लगभग तय हो गया की गजनवी का भारत पर और वह भी सौराष्ट्र पर आक्रमण होगा तो राजपुताना, सिन्ध यहाँ तक की सौराष्ट्र तक के राजा इस विशाल आँधी से चिंतित रहते थे।(पृष्ठ-03)

     वहीं दूसरी तरफ सुरक्षा का भार भीमदेव के जिम्मे था। इस प्रलयकारी आँधी के झोंके राजपूताने और उसके विशाल रेगिस्तान को स्पर्श करके सौराष्ट्र की और न बढें संयोग से इसका दायित्व सौंपा था पाटणपति भीमदेव को। अनहिलवाड़ पाटण की गद्दी पर अब भीमदेव विराजते थे। (पृष्ठ...)
अनहिलवाड का श्रेष्ठ गुप्तचर कमल गजनी सत्य का पता लगाने जाता है। उपन्यास का अधिकांश भाग कमल के गजनी प्रवास पर ही आधारित है।
       लेखक महोदय ने कमल के गजनी आवागमन और प्रवास का जो चित्र उकेरा है वह जीवंत लगता है।
         इस कथा के साथ -साथ गजनी में साहित्यकार फिरदौसी का भी अच्छा वर्णन मिलता है। उपन्यास में फिरदौस और महमूद का जो वर्णन है वह एक सत्य घटना है।
        उपन्यास मुख्यतः कमल पर आधारित है जो अपने बुद्धिबल पर क्रूर सुल्तान के राज्य गजनी में रहकर किस तरह अपने गुप्तचर दायित्व का निर्वाह करता है। एक-एक शब्द और घटना का जिस तरह से उपन्यास में वर्णन किया गया है वह एक काल्पनिक कथा न होकर एक ऐतिहासिक रचना नजर आती है।
       मेरी दृष्टि में जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी की यह एक अनमोल रचना है। जो कल्पना और सत्य के मिश्रित एक यादगार रचना है।

        प्रस्तुत उपन्यास ओमप्रकाश शर्मा जी द्वारा लिखा गया एक अदभुत उपन्यास है। लोकप्रिय साहित्य के पाठक के लिए एक दुर्लभ मोती की तरह है।
गजनी का सुल्तान- ओमप्रकाश शर्मा
www.svnlibrary.blogspot.in
उपन्यास- गजनी का सुल्तान
लेखक-   ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय लेखक
प्रकाशक- पुष्पी पॉकेट बुक्स, इलाहाबाद



Wednesday, 21 August 2019

218. पृथ्वी के छोर पर- शरदिंदु मुकर्जी

एक वैज्ञानिक की अंटार्कटिका यात्रा
पृथ्वी के छोर पर- डाॅ. शरदिन्दु मुकर्जी

कभी-कभी अलग प्रकार ही नहीं बहुत अलग प्रकार की किताबें पढने को मिल जाती हैं। ऐसी किताबें जो स्मृति पर अमिट छाप छोड़ जाती हैं। जब कुछ ऐसा पढने को मिल जाये जो अपनी उम्मीदों से परे हो, अपनी कल्पना शक्ति से आगे हो और रुचिकर हो तो उसकी चर्चा आवश्यक हो जाती है। ऐसी ही एक रचना 'पृथ्वी के छोर पर' पढने को मिली।
पृथ्वी के छोर पर' भूवैज्ञानिक शरदिंदु मुकर्जी जी के अंटार्कटिका यात्रा का रोमांचक वर्णन है। भारत का वैज्ञानिक दल अंटार्कटिका में शोध हेतु जाता रहता है। वहाँ पर भारत के दो शोध केन्द्र भी हैं दक्षिण गंगोत्री और मैत्री।
अंटार्कटिका के अपने तीन दशकों से भी अधिक समय के सम्पर्क से और वहाँ के विभिन्न अभियानों में भाग लेने के कारण उनके पास इस अद्भुत हिमप्रदेश के अनेक रहस्यमय संस्मरणों का एक विशाल भण्डार मौजूद है. एक सशक्त लेखक, प्रकृति प्रेमी कवि तथा कुशल वैज्ञानिक होने के कारण जिस सहजता से बखूबी उन्होंने अपनी आँखों देखी बातों का विवरण ‘पृथ्वी के छोर पर' में लिखा है, उसने इस पुस्तक को रोमांचकारी रूप प्रदान कर दिया है.