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Thursday, 23 March 2017

23. खम्मा- अशोक जमनानी

खम्मा- मरुस्थल में बिखरी एक स्वाभिमानी गायक की जिंदगी की कथा।
अशोक जमनानी का प्रस्तुत उपन्यास 'खम्मा' एक लोकगायक की कथा है। वर्तमान लोक कलाकारों की स्थिति का चित्रण करता यह उपन्यास एक साथ कई कहानियाँ कह जाता है। प्रेम, धोखा, वासना, दलाली, लोक कलाकारों का जीवन, लोक कलाकारों की वर्तमान स्थिति, स्त्रीवर्ग की स्थिति,  उनका स्वाभिमान इत्यादि रंग इस उपन्यास में शामिल है।
      उपन्यास का नायक बींझा एक लोक गायक है। वह अपनी कला का मूल्य तो चाहता है लेकिन किसी की दया नहीं। इसी कसमकस से गुरजते और सफलता- असफलता के बीच झूलते बींझा को प्रस्तुत किया है लेखक अशोक जमनानी ने।
    कहानी- कहानी का मुख्य नायक बीझा है। वह मांगणियार  जाति से संबंधित है, जो की धनिकवर्ग के उत्सवों में गायन कर अपना जीवन यापन करती है। बींझा का बाप एक बार बींझा को एक धनिक परिवार के कार्यक्रम में गायन हेतु ले जाता है, पर वहाँ इस बाप-बेटे के गायन की कोई महता नहीं। वहाँ पर बींझा व उसके बाप का अपमान तक कर दिया जाता है। यही बात बींझा के मन मस्तिष्क में बैठ जाती है और वह प्रण ले लेता है की वह कभी धनिकवर्ग के यहाँ कभी नहीं जायेगा।
  दूसरी तरफ राज परिवार का पुत्र सूरज, बींझा का घनिष्ठ मित्र है। वह बींझा के गायन से प्रभावित होकर उसको आर्थिक मदद देता है। लेकिन एक बार जब सूरज बिना गीत सुने बींझा को रुपये देता है तो बींझा इसे अपना अपमान मानता है और उसकी धनिकवर्ग के प्रति पूर्वधारणा और मजबूत हो जाती है।
यहीं से बींझा एक अनजान सफर पर निकल जाता है। उस सफर पर जहां उसकी कला का मूल्य तो हो पर दया नहीं ।  इसी सफर में में उसे कई अन्य महत्वपूर्ण पात्र मिलते हैं, जो अपनी जिंदगी में कई रंग देख चुके हैं।  प्यार और नफरत के इन रंगों से गुजरता हुआ बींझा उन लोगों से भी मिलता है जो कला और शारीरिक वासना को एक खेल समझते हैं। दिल से टूटा बींझा एक बार फिर खण्डित हो जाता है, लेकिन उपन्यास के अंत में अपने मित्र सूरज के सहयोग से वह एक नयी कहानी लिखने में सफल हो जाता है‌।
  आदमी अगर सही रस्ते पर चलता है तो अनंतः उसे सफलता मिलती है।
पात्र- कहानी का मुख्य पात्र बींझा है और अन्य पात्र उपन्यास में आते-जाते रहते हैं, पर प्रत्येक पात्र अपनी जगह सशक्त रूप से उभर कर सामने आया है।
सूरज- बींझा का मित्र। राजघराने का पुत्र और उपन्यास का एक विशेष पात्र।
सोरठ- बींझा की पत्नी।
सुरंगी- वक्त की मार खायी यह पात्र, अपना सब कुछ त्यागकर एक नृत्यक का जीवन जीती है।
झांझर- सुरंगी व झांझर एक जैसी कथा है। दोनों के दिल में दर्द है।
क्रिस्टीन- कला की दलाल।
ब्रजेन- कला का पारखी। पर वक्त ने कला छीन कर दलाल बना दिया। अंत में यही ब्रजेन बींझा को रास्ता दिखाता है।
इनके अलावा भी उपन्यास में कई महत्वपूर्ण पात्र हैं, जो उपन्यास के कथानक को आगे बढाने में सहायक व आवश्यक हैं।
संवाद और भाषा शैली - उपन्यास की संवाद शैली जीवंत है। संवाद सरल व कथानक को आगे बढाने के साथ-साथ पात्र के चरित्र को अच्छी तरह से प्रस्तुत करता है।
  कहीं- कहीं तो संवाद विशेष सुक्तियां बन गये जो लेखक की संवाद शैली की विशेषता है। अगर बात करें भाषा की तो यह उपन्यास राजस्थान की पृष्ठभूमि पर रचा गया है, इसलिए यह तो यह है की इसमें राजस्थानी भाषा के शब्द तो अवश्य होंगे।
उपन्यास की भाषा सरल व कोमलकांत है, कहीं पर भी क्लिष्ट शब्द नहीं हैं। प्रत्येक पात्र के संवाद भी पात्रानुकूल हैं।
जब बींझा गलत रास्ते से वापस आकर सोरठ से माफी मांगता है, तब सोरठ उसे जो उत्तर देती है वह स्त्रीवर्ग की पीङा को व्यक्त करने वाले शब्द हैं।
" आपने इन दिनों मुझे मारा नहीं पर घाव देते रहे…अब मेरी रूह सूख गयीहै…आप कुछ भी कहो लेकिन मैं आपको माफ़ नहीं कर पा रही हूँ…क्यों माफ़ करूँ आपको?'
       बीझा के स्वाभिमान को प्रकट करने वाले संवाद देखिएगा। बींझा हक तो चाहता है पर किसी की दया नहीं ।
      “ तू शायद यह बात समझेगी नहीं, लेकिन मैं जानता हूँ कि बिना मेहनत के उनसे उनकी दया दिखाने वाले रूपये अगर मैंने अपने पास रख लिए तोवे मेरे दोस्त नहीं रहेंगे, वो हुकुम हो जाएंगे...... सुना सोरठ, वो हुकुम हो जाएंगे ।” (पृ.39)
सुरंगी का नाम ही सुरंगी है, बाकी तो उसके जीवन में मरुस्थल बिखरा पङा है। वही मरुस्थल जहर के समान है, पर वह दूसरों के लिए नहीं, स्वयं सुरंगी को ही लील रहा है।
“... बस मैंने सोच लिया जैसे उस तमाशे ने मेरीसाँस-साँस में जहर भर दिया वैसे ही जैसे पीवणा भरता है ।” (पृ.61)
"ऐसा कहीं हो सकता है। औरत जिंदगी में आगे तो बढती है लेकिन पीछे छूटे का मोह नहीं छोङ पाती।" (66)
कुछ लेखक की पंक्तियाँ भी देखिए-
"बङे लोगों का क्या है, घोङे से आप गिरे साईस की नौकरी गयी" (09)
लोकगीत- उपन्यास में राजस्थानी लोकगीतों का रंग भी खूब बिखरा है। जब उपन्यास लोक गायक को प्रस्तुत करती है तो लोक गीत तो अवश्य आयेंगे।
गांधी जी ने भी कहा है,-"लोकगीत संस्कृति के पहरेदार हैं।"
लोकरंग देखिए-
"सोना री धरती जथे
चांदी रो असमान
रंग-रंगीलो रस भरो
म्हारो प्यारो राजस्थान जी"
" काली रे काली काजलिये रे रेख जी
कोई भूरोङा  बुरजाँ में चमके बीजली"
कथाक्षेत्र- उपन्यास का कथाक्षेत्र राजस्थान का जैसलमेर है।
लेकिन इसके साथ-साथ जोधपुर व रामदेवरा के पर्यटन स्थलों का वर्णन भी है।
कहानी का अंतिम भाग मुंबई का है।
   प्रस्तुत उपन्यास की कहानी बहुत ही मार्मिक है। वर्तमान लोक कलाकारों के जीवन की वास्तविकता का चित्रण करती यह कहानी पाठक को अंदर तक छू जाती है। पृष्ठ दर पृष्ठ पाठक की आँखों से आँसू बहते हैं।
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उपन्यास- खम्मा
लेखक- अशोक जमनानी
प्रकाशक- श्री रंग प्रकाशन, होशंगाबाद, म.प्र.
पृष्ठ-157
मूल्य-₹250.
लेखक की अन्य रचनाएँ
1. को अहम
2. बूढी डायरी
3. व्यास गादी
4. छपाक-छपाक
5. स्वेटर

Wednesday, 14 December 2016

06. एक कहानी जो मन को छू गयी

   मानवीय संवेदना की कहानी 'चिङिया'
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कुछ कहानियां होती हि ऐसी हैं जो अापके ह्रदय में उतर जाती है, जो भुलाये नहीं भूलती॥
ऐसी हि एक कहानी है "चिङिया" जो अाधुनिक महानगर के संवेदनाहीन संबंधों पर तीव्र प्रहार करती है।
कहानी का मुख्य पात्र स्वयं लेखक है जो एक गाँव के जीवंत परिवेश और संबंधों से जुङा हुआ है।
एक बार लेखक को एक महानगर में नौकरी मिल जाती है, और वह उस संवेदना हीन शहर का तीसरी मंजिल का सदस्य बन जाता है।
यहां लेखक ने बहुत हि खूबसूरती के साथ के शहर के लोगों कि तथाकथित सभ्यता का वर्णन किया है।
बीच वाली मंजिल के शर्मा जी के घर समारोह है और लेखक इंतजार करता है उसे कि भी पङोसी होने के नाते बुलाया जायेगा, पर इंतजार हि रह जाता है।
वहीं एक बार सताईस नंबर के फ्लैट वाले बुजुर्ग दिवाकर जी 'अंकल' शब्द पर नाराज हो जाते हैं।
हद तो तब हो नाती है जब यहाँ के लोग 'राम-राम' शब्द को पुराना बता कर नकार देते हैं।
तब लेखक लिखता है जब सङक पर खङा कुत्ता मुझे देखकर पूंछ हिला देता है तो मुझे आत्मीयता का अहसास होता है।
ऐसे शहर में रहना लेखक के लिए मुश्किल हो जाता है॥
लेखक के इस एकान्त को दूर करती है लेखक के कमरे में आने वाली चिङिया, जिससे लेखक भावनात्मक रिश्ता कायम हो जाता है और चिङिया कमरे में हि घोंसला बना लेती है।
लेकिन एक दिन लेखक का स्थानान्तरण अन्यत्र हो जाता है।
लेखक जब अपना सामान बांध रहा होता है, तब चिङिया उदास निगाहों से लेखक को देखती रहती है। चाहे चिङिया नासमझ है पर वो महसूस करती है कि लेखक शायद मुझसे दूर जा रहा है। स्वयं लेखक भी इस भावना को महसूस करता है, पर मजबूर है।
लेखक अपना सामान बांध कर नीचे रिक्शे में रख अाता है, और बाकी सामान लेने  के लिए पुनः कमरे अाता है तो स्तब्ध रह जाता है।
कमरे में चिङिया का घोंसला बिखरा पङा है और चिङिया उड गयी॥
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अाधुनिक समय के संवेदनहीन होगे संबंधों पर लिखी गयी एक मार्मिक कहानी है।
यह लेखक कि प्रथम कहानी है।
लेखन-ज्ञानप्रकाश विवेक
प्रथम प्रकाशन- दैनिक ट्रिब्यून, चंडीगढ।