एक प्रतिशोध कथा
रुद्रगाथा- साहित्य सागर पाण्डेय, उपन्यास
हिन्दी साहित्य का आदिकाल अपनी वीरगाथाओं के लिए जाना जाता है, इसलिए तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी ने आदिकाल का नामकरण 'वीरगाथा काल' किया था।
इंटरनेट पर मुझे एक किताब नजर आयी 'रुद्रगाथा'। गाथा शब्द ने मुझे आकृष्ट किया, मेरे दिमाग में तुरंत आदिकाल की वीरगाथाएं चकराने लगी। इसी चक्कर में 'रुद्रगाथा' नामक उपन्यास पढा गया।
रुद्रगाथा शीर्षक उपन्यास के लेखक है 'साहित्य सागर पाण्डेय', लेखक का नाम भी स्वयं में आकर्षण का केन्द्र है। साहित्य का सागर जब रुद्र गाथा जैसी रचना रचेगा तो यकीनन पाठक शीर्षक से प्रभावित होगा, जैसा की मैं हुआ।
अब बात करते हैं उपन्यास कथा की। - बात तब की है, जब भारतवर्ष कई छोटे-छोटे राज्यों में बँटा था। पूरब- पश्चिम, उत्तर- दक्षिण, चारों दिशाओं में कई छोटे-छोटे राज्य बँटे हुए थे। उनमें से कई राज्यों में क्षत्रिय राजा ही शासन करते थे; केवल दक्षिण के कुछ राज्य अपवाद थे। भारत के सभी राज्यों में सबसे विशाल राज्य था वीरभूमि; और वीरभूमि में ही रहते थे एक ब्राह्मण, जिनका नाम था भद्र। अन्य ब्राह्मणों की तरह भद्र भी पूजा-पाठ करके अपना जीवन यापन करते थे। शास्त्रों के प्रकांड ज्ञाता थे भद्र। भद्र के परिवार में उनके अतिरिक्त केवल उनकी पत्नी रुक्मिणी ही थी। भद्र के लिये उनका कर्म ही उनकी पूजा थी। माँगलिक उत्सवों में पूजा-पाठ करके भद्र अपनी जीविका चला रहे थे।
