Showing posts with label रवीन्द्रनाथ टैगोर. Show all posts
Showing posts with label रवीन्द्रनाथ टैगोर. Show all posts

Saturday, 5 May 2018

109. बाल एकांकी- रवीन्द्रनाथ टैगोर

चार रोचक बाल एकांकी


नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने बाल साहित्य भी खूब लिखा है। इन्होंने जो भी लिखा है वास्तव में मन को छू लेने वाला साहित्य है।

मेरा शीश नवा दो अपनी, चरण धूल के तल में।

देव! डूबो दो अहंकार सब, मेरे आँसू जल में। - गीतांजलि

           टैगोर जी द्वारा लिखित बाल एंकाकी संग्रह विद्यालय के पुस्तकालय से पढने को मिला। इस संग्रह में कुल चार बाल एकांकी है। चारों एंकाकी दिलचस्प और रोचक है।

1. परीक्षा

              यह एकांकी हमारी वर्तमान शिक्षा में व्याप्त कमियों को हास्य रूप में उजागर करती है। प्रस्तुत एकांकी में शिक्षक प्रेम की बजाय छात्र को दण्ड के द्वारा सुधारना चाहता है, छात्र भी कम नहीं है वह भी एक अनोखे तरीके से शिक्षक को सबक सीखा देता है।

                यह एकांकी हमारी शिक्षा व्यवस्था पर गहरी चोट करती है।

2. ख्याति का नाटक

                         यह एकांकी बहुत ही रोचक है।  इस एकांकी में एक संस्था 'गानोन्नति विधायिनि'  के लिए सेठ कंगालीचरण एक वकील दुकौड़ी दत्त के पास चंदा लेने आता है। वकील चंदे के लिए मना कर देता है। तब कंगालीचरण प्रण लेता है। आया चंदा मांगने और मिला गरदन पर प्रहार। महाशय तुम्हें भी सबक सीखा कर रहूंगा। (पृष्ठ-14)

        और कंगालीचरण एक बहुत ही अलग तरीके से वकील को चंदा न देने पर सबक सीखाता है।

        यह एकांकी पूर्णतः हास्य रस से सरोबर है।

3. बिरछा बाबा

                         यह एकांकी एक ऐसे वृक्ष देवता की कथा है जो मनोकामना पूर्ण करता है। एक दिन पांचू और ऊधो नामक दो व्यक्ति उसी वृक्ष देवता की खोज में निकलते हैं। 

                         "चलो भाई, चलो।  बिरछा बाबा की तलाश की जाये। लेकिन उन्हें खोजेगे कहां?"

                        - तो क्या पांचू और माधो को वृक्ष देवता मिले?

                        - क्या उनकी मनोकामना पूर्ण हुयी?

                        - क्या था रहस्य वृक्ष बाबा का?

    इन प्रश्नों का उत्तर तो यह बाल एकांकी ही दे सकती है। इस एकांकी में कुछ रोचक प्रसंग भी हैं।

     

4. मुकुट

              इस संग्रह की अंतिम और सबसे लंबी एकांकी है मुकुट। यह अन्य एकांकियों से कुछ अलग है।‌ बाकी एकांकी जहाँ हास्य रस से परिपूर्ण है वहीं मुकुट एकांकी वीर रस की रचना है।

              युद्ध में विजय के पश्चात विजय मुकुट कौन धारण करे इस विषय पर तीनों राजकुमार एकमत नहीं हैं। सभी एक दूसरे को विजय का कारण मानते हैं।

              यह एकांकी एक शिक्षाप्रद रचना है।

निष्कर्ष-   इस संग्रह में शामिल चारों रचनाएँ बहुत ही रोचक और पठनीय है।

----

  पुस्तक- बाल एकांकी

  लेखक- रवीन्द्रनाथ टैगोर

  प्रकाशक- यूनिक ट्रेडर्स, जयपुर

  संस्करण-1994

  पृष्ठ- 72             

Monday, 23 April 2018

108. डाकघर- रवीन्द्रनाथ टैगोर

एक बच्चे की करणामयी कथा।
डाकघर- रवीन्द्रनाथ टैगोर, लघु नटक, संवेदनशील रचना, पठनीय।
रवीन्द्रनाथ टैगोर को पढने का अर्थ है भावना के समुद्र में बह जाना, मानवीय संवेदना को छू जाना।  
प्रकाशक लिखता है- रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानियाँ एवं नाटक विशेष रूप से कला, शिल्प, शब्द- सौन्दर्य, सभी दृष्टियों से अनुपम एवं महत्वपूर्ण हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानियाँ एवं‌ नाटक वास्तव में जिसने नहीं पढे उसने कुछ नहीं पढा। 
            रवीन्द्रनाथ टैगौर द्वारा रचित 'डाकघर' एक लघु नाटक है। डाकघर एक नन्हें बच्चे की कहानी है। एक‌ नन्हा बच्चा 'अमल' जो किसी रोग से ग्रस्त है। वैद्य जी ने उसे कमरे से भी बाहर निकले को मना किया है। उसकी रक्षा का एकमात्र उपाय है उसे किसी तरह शरत्ऋतु की धूप और हवा से बचाकर घर में बंद रखना। (पृष्ठ-10)
          अमल घर में, कमरे में कैद है। खिड़की से वह आते-जाते लोगों को देखता है, उनसे बातें करता है।‌ कितनी विवशता है। बच्चा सबको देखता है, उसका मन भी खेलने को होता है, घूमने को होता है लेकिन वह मजबूर है। बस अपना दर्द समेटे बैठा है। कमरा ही उसकी दुनियां है। लेकिन कमरे से बाहर एक और दुनियां है अमल उसी दुनियां को जीना चाहता है।    
           बच्चों का मन बहुत कल्पनाशील होता है। अमल भी बाहर की दुनियां की बाते सुन- सुन कर अपनी एक काल्पनिक दुनियां बना लेता है।
          एक ऐसे दुनियां जिसमें शास्त्र पढे पण्डित नहीं होंगे, उसमें तो दही बेचने वाला होगा, घूमने वाले होंगे, डाकिया होगा, भिखारी होगा, पहाड़ पर जाने वाले होंगे। अमल कभी डाकिया बनना चाहता है, कभी दहीवाला, कभी भिखारी तो कभी कुछ-कभी कुछ।
            नाटक में रोचक प्रसंग और मोड़ तब आता है जब अमल के घर के सामने  राजा का डाकघर खुलता है। अमल स्वयं को उसी डाकघर से जोड़ लेता है। उसकी काल्पनिक दुनियां में डाकघर एक नया पात्र है। अमल को लगता है एक दिन उसको राजा का पत्र आयेगा और डाकिया उसे देकर जायेगा। मेरे नाम‌ की चिट्ठी आयेगी तो वे मुझे पहचान कर दे जायेँगे।(पृष्ठ-29)
            गांव में एक तथाकथित चौधरी है जो एक बीमार बच्चे के दर्द को न महसूस कर राजा को बच्चे की शिकायत कर देता है।
- क्या अमल का रोग सही हुआ?
-  क्या अमल को राजा की चिट्ठी आयी?
-  गाँव के चौधरी ने क्या किया?
नाटक का आरम्भ बहुत रोचक ढंग से होता है। माधवदत्त जी अमल के अभिभावक हैं और एक है वैद्य जी। दोनों के संवाद बहुत रोचक हैं।
माधवदत्त- बड़ी मुसीबत में पड़ गया। जब वह नहीं था, तब नहीं ही था, किसी बात की चिंता ही न थी। अब न जाने कहाँ से आकर उसने मेरा घर घेर लिया है; उसके चले जाने से मेरा घर फिर घर ही नहीं रह जाएगा। वैद्यजी, आप क्या समझते हैं उसे? (पृष्ठ-07)
      वैद्य जी प्रत्येक बात पर शास्त्रों की चर्चा करते हैं जो माधव की समझ से बाहर है।
शास्त्रों में लिखा है, 
- 'पैत्तिकान् सन्निपातजान कफवातसमुद्भवात'। (पृष्ठ-07)
- 'अपस्मारे ज्वरे काशे कामलाया हलीमके'(पृष्ठ-08)
- 'पवने तपने चैव'(पृष्ठ-08)
एक और मार्मिक संवाद देखें।
तुम्हें क्या हुआ है बाबू?
मुझे नहीं मालूम। मैं पढा लिखा नहीं हूँ न।(पृष्ठ-15)
         नाटक के सभी पात्र, चाहे उनका किरदार कम ही क्यों न हो, पर सभी प्रभावी हैं। 
         नाटक शुरू से अंत तक बहुत ही रोचक है और इसका समापन सहृदय की आँखों में आँसू ले आयेगा।
निष्कर्ष:-
          सहृदय पाठक के लिए यह लघु नाटक मन के अंदर तक उतरने की क्षमता रखता है।‌ नाटक का कलेरव चाहे छोटा हो लेकिन उसकी संवेदना बहुत गहरी है। 
               यह लघु नाटक कम पृष्ठों में बहुत कुछ कह जाता है। पठनीय रचना है, अवश्य पढें।
-----
किताब- डाकघर (लघु नाटक)
लेखक- रवीन्द्रनाथ टैगोर
प्रकाशक- रमन बुक सेंटर, मथुरा(UP)
पृष्ठ- 50
मूल्य- 75₹