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Saturday, 12 January 2019

165. रावायण- सिद्धार्थ अरोड़ा, मनीष खण्डेलवाल

अब हर घर में रावण है।

रावायण- लीला आॅफ रावण, सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर', मनीष खण्डेलवाल

                दिल्ली पुस्तक मेला-2019 के दौरान हमें भी अवसर मिला इस मेले में भ्रमण का। दिनांक 06.01.2019 को वेदप्रकाश कंबोज जी और राम पुजारी जी के उपन्यासों का 'गुल्लीबाबा पब्लिकेशन' से विमोचन था। इस कार्यक्रम में हम भी शामिल थे।
   ‌            सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर' और मनीष खण्डेलवाल कृत 'रावायण- लीला आॅफ रावण' की चर्चा फेसबुक पर काफी दिनों से चल रही थी। इस अवसर पर 'राॅक पिजन' की स्टाॅल पर 'सहर जी' भी मिलना भी हो गया और उपन्यास भी खरीद लिया।

     
       'कलयुग बैठा मार कुण्डली जाऊं तो मैं कहां जाऊं,
       अब हर घर में रावण बैठा, इतने राम कहां से लाऊं'

               यह एक प्रसिद्ध भक्ति गीत की पंक्तियाँ हैं। जो हमारे समाज की वास्तविकता का चित्रण करती नजर आती हैं। आज हमारे मन में, घर में, समाज में अनेक रावण पैदा हो गये हैं। हमें वास्तविकता का पता है लेकिन हम उस वास्तविकता से मुँह चुराते नजर आते हैं। प्रस्तुत उपन्यास उसी वास्तविकता का चित्रण करता नजर आता है। हमारे दोहरे व्यक्तित्व का पर्दाफाश करता है।
                     अगर आपने हिन्दी के प्रसिद्ध रचनाकार मोहन राकेश का नाटक 'आधे-अधूरे' नाटक पढा है तो आपको याद होगा उसमें एक परिवार का बिखराव दिखाया गया है। उस परिवार के पीछे आर्थिक कारण हैं। वहीं 'रावायण' उपन्यास का परिवार एक बिजनेस मैन का परिवार है।

कहानी चाहे एक परिवार की नजर आती है लेकिन यह सत्य पूरे समाज का है।
                     हम आर्थिक दृष्टि से इतने समृद्ध होते जा रहे हैं नैतिक दृष्टि से हमारा उतना ही पतन हो रहा है।
                     यह उपन्यास आरम्भ होता है कथानायक से। "मेरा घर कुछ मामलों में बहुत रोचक था। कब, कौन किस दिन आ धमके कुछ पता नहीं चलता था.....मैं बचपन से ही सोचता आ रहा हूँ की हमारे घर को धर्मशाला क्यों नहीं कहते थे।" (पृष्ठ-08)
                     खैर इस धर्मशाला में मेरे सिवा मेरे पापा, मेरी छोटी बहन और मेरे तीन और भाई भी रहते थे....इसके बाद घर की डाॅन मेरी माँ। (पृष्ठ-08)
                     कहानी का नायक है जीतू। जिसे उसके बदतमीज व्यवहार के कारण घर से निष्कासित किया जाता है। वह कहता है-  "मैं बदतमीज हूँ इसलिए बाहर हूँ। बदचलन होता तो घर के अंदर होता।" (पृष्ठ-72)      
                     लेकिन जीतू स्वयं को पहचाना भी है। वह स्वीकार करता है अपनी कमियों, जिसे हमें छुपाना चाहते हैं।
"है मुझमें भी....इसलिए सबको बोला, पर मुझे पता है कि मेरी कमी क्या है, बाकी इसी मुगालते में जी रहें हैं कि उनमें कोई कमी ही नहीं।" (पृष्ठ-30)
                    
                     उर्मी की परिस्थितियाँ भी कुछ ऐसी होती हैं की वह घर से बाहर जाने को मजबूर हो जाती है। यहीं से दोनों शमशेर उर्फ रावण के संपर्क में आते हैं। रावण के बारे में लोगों की एक ही राय है।
"अरे वो कमीना जिसको उसकी बीवी छोड़कर चली गई थी।" (पृष्ठ-31)
                     लोगों की उसके प्रति धारणा भी यही होती है की इसका व्यक्तित्व रावण की तरह नाकारात्मक है।
                     मूलतः यह कथा हमारे आंतरिक और बाहरी व्यवहार को रेखांकित करती है। उपन्यास अंतिम चरण में इस तथ्य को बखूबी परिभाषित कर देती है की जो बाहर से अच्छा दिखता है वह जरूरी नहीं की अंदर से अच्छा हो। कुछ लोगों का बाहरी व्यक्तित्व अच्छा नहीं होता लेकिन अंदर से बहुत अच्छे होते हैं।
                     उपन्यास में उन लोगों को बेनकाब किया है जिबके हृदय में रावण रूपी विकृतियाँ विकसित हैं
                    
- कौन रावण है और कौन नहीं ?
- जीतू और उर्मी को घर से क्यों निकाला  ?
- रावण उर्फ शमशेर को लोग गलत क्यों कहते थे ?
- उर्मी और जीतू का भविष्य क्या रहा ?

इन प्रश्नों के उत्तर तो 'रावायण' उपन्यास पढने पर ही मिलेंगे।

                   इन दिनों 'नई वाली हिन्दी' नामक फण्डा खूब चल रहा है। कुछ लेखक हो रोमन को ही हिन्दी समझने लगे हैं। अगर आप 'रावायण' उपन्यास पढते हैं तो आपको इसमें नयी वाली हिन्दी का फण्डा नहीं मिलेगा। उपन्यास हिन्दी में होकर नयी वाली हिन्दी फण्डे का नकारती है। दम कहानी में होना चाहिए 'किसी फण्डे' में नहीं।
      भाषा शैली के स्तर पर उपन्यास अच्छी है। भाषा शैली सहज, सरल और प्रवाहमयी है। कहीं कोई क्लिष्ट शब्दावली नहीं है।
    रोचकता का एक उदाहरण देखिएगा  
कपि छ: फिट से निकलते कद का हाथी-ब्राण्ड बालक था। (पृष्ठ-94)

     उपन्यास के कुछ संवाद प्रभावशाली हैं।
'मैं बदतमीज हूँ इसलिए बाहर हूँ। बदचलन होता तो घर के अंदर होता।" (पृष्ठ-72)
"अपने घर की छत कभी टपकती नहीं जीतू, और टपके भी तो सुकून होता है...।" (पृष्ठ-85)
"तजुर्बा महंगी शै होता है, क ई कीमती घड़ियाँ चुकाने पर ही मिलता है।" (पृष्ठ-88)
"बात खत्म करने और बात टालने में फर्क होता है।" (पृष्ठ-89)

              उपन्यास में कहीं-कहीं हल्की सी कमियां दृष्टिगत होती हैं। एक अभाव सा महसूस होता है। कुछ एक शाब्दिक गलतियाँ भी है। लेकिन ऐसी कोई कमी नहीं है जो कथा के महत्व को प्रभावित करती हो।
          संपादन की दृष्टि से उपन्यास का प्रत्येक परिच्छेद थोड़ा नीरस सा लगता है। अगर परिच्छेद थोड़ा आगे पीछे होता तो ज्यादा अच्छा लगता।
          कुछ शाब्दिक गलतियाँ हैं, जैसे 'सब्जी' को 'सवजी' (पृष्ठ-22), 'शरारत' को 'सरारत'(पृष्ठ-22) 'अनेक' शब्द को 'अनेकों' लिखा है(पृष्ठ-77), 'ढीठ' को जगह-जगह 'ढीट' (पृष्ठ-111, )लिखा है, 'समृद्धि' को 'सम्रद्धि' (पृष्ठ-78), 'नुकसान' को 'नुक्सान'(पृष्ठ-83) लिखा है।
          ये सब सामान्य टंकण गलतियाँ है इससे कथा पर कहीं कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

   
निष्कर्ष-
            लघु कलेवर का यह उपन्यास हमारे समाज में व्याप्त दोहरे आचरण की भूमिका पर गहरा कटाक्ष करता है। हमारे अंदर के रावण का अच्छा चित्रण करता है। यह भ्रांति भी दूर करता है की हमें किसी के बाहरी व्यक्तित्व को उसकी वास्तविकता न समझें।
            उपन्यास रोचक और पठनीय है। मनोरंजन की दृष्टि से पाठक को कहीं कोई निराशा नहीं होगी।

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उपन्यास- रावायण- लीला आॅफ रावण
लेखक द्वय- सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर', मनीष खण्डेलवाल
ISBN- 978-93-87507-05-0
प्रकाशक- राॅक पिजन
पृष्ठ-142
मूल्य- 135₹
                
संपर्क-
www.rockpigeonpublication.com