सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के आक्रमण की कथा।
जय सोमनाथ- कन्हैयालाल माणिक्यलाल मुंशी, उपन्यास
'जय सोमनाथ' साहित्य जगत की एक चर्चित रचना है। इसका जिक्र अक्सर पाठकवर्ग में होता रहता है। जब विद्यालय के पुस्तकालय में यह उपन्यास दृष्टि में आया तो सहज ही उठा लिया और जब पढने बैठा तो इस उपन्यास की कहानी में डूबता चला गया। उपन्यास का कथानक इतना सुसंगठित है की मैं एक बहाव की तरह बहता चला गया।
उपन्यास की कहानी महमूद गजनवी के सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण को आधार बना कर लिखी गयी है। लेखक महोदय लिखते हैं- लेकिन इस कथा में मेरा उद्देश्य सुल्तान महमूद के आक्रमण का चित्रण करना नहीं है, वरण गुजरात द्वारा किये गये प्रतिरोध का वर्णन करना है।
हां वास्तव में यह उपन्यास तात्कालिक राजाओं के युद्ध कौशल, वीरता, संगठन और भीषण परिस्थितियों से जूझते हुए वीरों की शौर्यगाथा है। एक ऐसी गाथा जो कहीं मन को द्रवित करती है तो कहीं हृदय में जोश पैदा करती है। कहीं तात्कालिक समाज की परिस्थितियाँ सोचने को विवश करती है तो कहीं धर्म -अधर्म पर विचारने का अवसर प्रदान करती है।
उपन्यास का आरम्भ सोमनाथ मंदिर से होता है। जहां पाटण के राजा भीमदेव अपनें मत्री विमल के साथ उपस्थित हैं।
संवत् 1082 की कार्तिक सुदी एकादशी थी। जैसे लोहा चुम्बक से खिंचता चला आता है वैसे ही यात्री सोमनाथ के परम पूज्य शिवालय की ओर आकर्षित होकर खिंचे चले आ रहे थे। (पृष्ठ-प्रथम)
- वे चले आ रहे थे, हजारों की संख्या में। वे एक ही परम कर्तव्य को सामने रखकर आ रहे थे- देव का दर्शन। और उनके कानों में एक ही पूण्यनाद गूँज रहा था- 'जय सोमनाथ'
गंग सर्वज्ञ, भीमदेव और विमल को सूचना मिलती है की महमदू गजनवी सोमनाथ के लिंग को ध्वस्त करने आ रहा हैैै।
"गजनी का अमीर चढा चला आ रहा है।"
"क्या कहा?"- सर्वज्ञ और भीमदेव दोनों बोल उठे।
" हां, उसने थानेश्वर को लूट लिया है और कन्नौज को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। क्या आपको पता है कि वह अब भगवान सोमनाथ के थाम को नष्ट करने के लिए आ रहा है? एक क्षण भी खोने का समय नहीं है। जाओ, मेरे बापू और गूर्जर भूमि को संभालो।"(पृष्ठ-41)
जय सोमनाथ- कन्हैयालाल माणिक्यलाल मुंशी, उपन्यास
'जय सोमनाथ' साहित्य जगत की एक चर्चित रचना है। इसका जिक्र अक्सर पाठकवर्ग में होता रहता है। जब विद्यालय के पुस्तकालय में यह उपन्यास दृष्टि में आया तो सहज ही उठा लिया और जब पढने बैठा तो इस उपन्यास की कहानी में डूबता चला गया। उपन्यास का कथानक इतना सुसंगठित है की मैं एक बहाव की तरह बहता चला गया।
उपन्यास की कहानी महमूद गजनवी के सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण को आधार बना कर लिखी गयी है। लेखक महोदय लिखते हैं- लेकिन इस कथा में मेरा उद्देश्य सुल्तान महमूद के आक्रमण का चित्रण करना नहीं है, वरण गुजरात द्वारा किये गये प्रतिरोध का वर्णन करना है।
हां वास्तव में यह उपन्यास तात्कालिक राजाओं के युद्ध कौशल, वीरता, संगठन और भीषण परिस्थितियों से जूझते हुए वीरों की शौर्यगाथा है। एक ऐसी गाथा जो कहीं मन को द्रवित करती है तो कहीं हृदय में जोश पैदा करती है। कहीं तात्कालिक समाज की परिस्थितियाँ सोचने को विवश करती है तो कहीं धर्म -अधर्म पर विचारने का अवसर प्रदान करती है।
उपन्यास का आरम्भ सोमनाथ मंदिर से होता है। जहां पाटण के राजा भीमदेव अपनें मत्री विमल के साथ उपस्थित हैं।
संवत् 1082 की कार्तिक सुदी एकादशी थी। जैसे लोहा चुम्बक से खिंचता चला आता है वैसे ही यात्री सोमनाथ के परम पूज्य शिवालय की ओर आकर्षित होकर खिंचे चले आ रहे थे। (पृष्ठ-प्रथम)
- वे चले आ रहे थे, हजारों की संख्या में। वे एक ही परम कर्तव्य को सामने रखकर आ रहे थे- देव का दर्शन। और उनके कानों में एक ही पूण्यनाद गूँज रहा था- 'जय सोमनाथ'
गंग सर्वज्ञ, भीमदेव और विमल को सूचना मिलती है की महमदू गजनवी सोमनाथ के लिंग को ध्वस्त करने आ रहा हैैै।
"गजनी का अमीर चढा चला आ रहा है।"
"क्या कहा?"- सर्वज्ञ और भीमदेव दोनों बोल उठे।
" हां, उसने थानेश्वर को लूट लिया है और कन्नौज को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। क्या आपको पता है कि वह अब भगवान सोमनाथ के थाम को नष्ट करने के लिए आ रहा है? एक क्षण भी खोने का समय नहीं है। जाओ, मेरे बापू और गूर्जर भूमि को संभालो।"(पृष्ठ-41)
