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Thursday, 20 October 2022

538. काम्बोजनामा- राम पुजारी

लोकप्रिय जासूसी साहित्य के वटवृक्ष- वेदप्रकाश काम्बोज
काम्बोजनामा- राम पुजारी

लोकप्रिय जासूसी उपन्यास साहित्य में वेदप्रकाश काम्बोज जी उस वटवृक्ष की तरह हैं जिसके नीचे असंख्य जीव- पौधे पनपते हैं और उस से वटवृक्ष अनजान होता है। जासूसी लेखन से साहित्यिक गलियारों तक में कलम चलाने वाले, मंजिल को भुला अपने इस सफर के आनंद में डूबे, लेखन पथ पर आवारगी करने वाले वेदप्रकाश काम्बोज एक ऐसे ही व्यक्तित्व हैं, जिनके पात्रों पर बहुसंख्यक लेखकों ने लिखा पर वेदप्रकाश काम्बोज उस से अलग ही रहे। ऐसे सरल स्वभाव के काम्बोज जी को समर्पित, उन्हीं के जीवन‌ पर आधारित रचना है - काम्बोजनामा ।
' काम्बोजनामा' के लेखक राम पुजारी जी के साथ 17.09.2022, मेरठ

 उसी वटवृक्ष के जीवन और लेखन को युवा लेखक राम पुजारी जी ने 'काम्बोजनामा' में समेटने का जो प्रयास किया है वह उपन्यास साहित्य में एक मील पत्थर है। हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के शिष्य ने 'व्योमकेश दरवेश लिखा, कुशवाहा कांत जी के शिष्य ने 'कुशवाहा कांत...' लिखा। ऐसा ही एक प्रयास रामपुजारी जी ने 'काम्बोजनामा' में किया है।

Saturday, 2 January 2021

411. अनोखा सफर- राधानाथ स्वामी

एक अमरिकी युवक आध्यात्मिक भारत यात्रा
अनोखा सफर- राधानाथ स्वामी, आध्यात्मिक यात्रा वृतांत


भारत भूमि अध्यात्म की भूमि है। ऋषि-मुनियों की भूमि है। यहाँ की भूमि में कुछ तो विशेष आकर्षक है जो अभारतीय भी यहाँ खींचे चले आते हैं। और उनके आने का उद्देश्य कोई सामान्य यात्रा नहीं है, वे तो आध्यात्मिक शांति के लिए यहाँ आते हैं। इस पवित्र धरा को समझने आते हैं।
ऐसा ही अमेरिकी युवक भारत आता है और फिर यहाँ का होकर रह जाता है। 
    राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में हमारे आदरणी मैम रेखा चौधरी जी को आध्यात्मिक पुस्तकों में विशेष रूचि है। उनके सानिध्य में कुछ आध्यात्मिक किताबें मैंने भी पढी हैं। इस पुस्तक से पूर्व मैंने श्री एम की आध्यात्मिक रचना 'हिमालयवासी गुरु के साये में' पढी थी और संभव यह अध्ययन आगे भी यथावत जारी रहेगा।
   
अनोखा सफर- राधानाथ स्वामी
अनोखा सफर- राधानाथ स्वामी
यह यात्रा है एक बीस वर्षीय अमेरिकी युवक रिचर्ड की। उसे यात्रा का शौक था। एक बार किसी यात्रा में,नदी के किनारे उसे एक आवाज सुनाई देती है-भारत जाओ-भारत जाओ
  इस पुकार पर वह युवक अपना घर-ऐशोआराम त्याग कर 'हिचहाइक'(रास्ते में जो भी साधन मिला उसी से लिफ्ट लेकर यात्रा करना) द्वारा तुर्की, अफगानिस्तान जैसे खतरनाक और आतंकवाद क्षेत्र से पैदल भारत की ओर गमन करता है। खैबर दर्रे से होता हुआ जब वह भारत में प्रवेश चाहता है तो उसे प्रवेश नहीं मिलता। 

Sunday, 23 February 2020

269. अन्नु और स्वामी विवेकानन्द- राम पुजारी

अन्नु और स्वामी विवेकानन्द- राम पुजारी

भौतिक युग में हम सात्विकता से दूर होते जा रहे हैं। हम उस वृक्ष की तरह होते जा रहे हैं जिसकी धीरे-धीरे मूल काट दी जाये। इंटरनेट युग के बच्चे अपनी संस्कृति और सभ्यता से विलग होते जा रहे हैं, उन्हें फिल्मों, डिजिटल दुनिया की जानकारी तो है लेकिन अपने देश के युग नायकों को भुल रही है।
     स्वामी विवेकानन्द जिन्हेें युवाओं का प्रेरणा पुरूष कहा जाता है। यह छोटी सी किताब विवेकानन्द जी को बहुत ही सहज और सरल तरीके से प्रस्तुत करती है ताकी किशोरावस्था के बच्चे युग नायक स्वामी विवेकानन्द जी को समझ सके। सिर्फ समझ ही नहीं बल्कि उनकी प्रेरणा से आगे भी बढ सके।
इस लघु जीवनी में हालांकि विवेकानन्द जी के संपूर्ण जीवन को समेटना संभव नहीं है लेकिन लेखक महोदय ने जो आवश्यक और उपयोगी प्रसंग इस किताब में प्रस्तुत किये हैं वे सब बच्चों के संस्कार और विवेकानन्द जी को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
     अन्नु एक छोटी सी बच्ची है जो अन्तरिक्ष जगत की जानकारी तो रखती है लेकिन वह विवेकानन्द जी को नहीं जानती, तब उसके चाचा उसे बहुत ही सरल तरीके से उसे विवेकानन्द जी का परिचय देते हैं।
     विवेकानन्द साहित्य मुझे बहुत प्रभावित करता है इसलिए मैं समयानुसार विवेकानन्द जी के साहित्य को पढता रहता हूँ और मेरी इच्छा होती है की छोटे बच्चे भी विवेकानन्द जी को जाने और इस दृष्टि से यह पुस्तक बहुत उपयोगी है।
    लेखक का यह प्रयास बहुत अच्छा है। बच्चों के लिए ऐसी प्रेरणादायक किताबें आनी चाहिए ताकी बच्चें सरलता से भारतीय सभ्यता और संस्कृति का अध्ययन कर भारतीय युुुग पुुुुरुषोंं को जान सके।

कुछ रोचक पंक्तियाँ
- गुरु वो होता है जो हमारे अज्ञान के अंधकार को दूर करता है। हमें सभी मार्ग बताता है। (पृष्ठ-25)
-भय का सामना करने से भय स्वयं खत्म हो जाएगा।
(पृष्ठ-31)
पुस्तक- अन्नु और स्वामी विवेकानन्द
लेखक- राम पुजारी
प्रकाशक- निखिल पब्लिशर्स और डिस्ट्रीब्युटर्स, उत्तर प्रदेश
पृष्ठ- 48

मूल्य- 50₹

माउंट आबू स्थित 'चंपा गुफा' जहां विवेकानन्द जी ने शिकागो धर्म सम्मेलन में जाने से कुछ समय पूर्व ध्यान किया था।

 

Saturday, 15 June 2019

208. असाधारण नायक ओमपुरी- नंदिता सी. पुरी

 असाधारण नायक की जीवन कथा।
ओमपुरी की जीवनी

फिल्म अभिनेता ओम पुरी की जीवनी 'असाधारण नायक ओमपुरी' उनकी द्वितीय पत्नी नंदिता सी. पुरी द्वारा लिखित है। जिसमें ओमपुरी के जीवन के एक-एक भाग को बहुत रोचक और दिलचस्प तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
ओम पुरी के बचपन के कठिन संघर्षों से लेकर उनके सफल जीवन का स्पष्ट और बेबाक चित्रण इस जीवन में उपलब्ध है।
हरियाणा के अंबाला शहर से संबंध रखने वाले ओमपुरी जी का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। जहां गरीबी का साम्राज्य स्थापित था। ओमपुरी का जीवन चाय ढाबे पर, कोयला बीनने और मजदूरी करते बीता है।
ओमपुरी के जीवनी में एक बात स्पष्ट होती है वह है उनका संघर्ष और हार न मानना। वे किसी भी परिस्थिति में घबराये नहीं।
ओम की एक ट्रेजडी यह भी रही की न तो वे नायक की तरह लगते थे और न ही खलनायक की तरह और उस पर भी उनका चेहरा भी दागदार था। जो छोटी उम्र में ही चेचक के कारण हो गया।

Saturday, 23 February 2019

172. जेल डायरी - शेर सिंह राणा

 एक शेर की साहसिक यात्रा।
जेल डायरी- शेरसिंह राणा
             शेर सिंह राणा का नाम सुनते ही दो तस्वीरें सामने आती हैं।   क्या आपने शेर सिंह राणा का नाम सुना है, अगर सुना है तो आपके दिमाग में एक सकारात्मक  तस्वीर उभरी होगी और साथ ही एक नकारात्मक तस्वीर भी। एक सिक्के के दो पक्ष की तरह शेर सिंह राणा का जीवन। जहां एक पक्ष पर सारे देश को गर्व है तो द्वितीय पक्ष पर रोष भी।
     लेकिन शेर सिंह राणा के बारे में एक बात तय है वह है आदमी बहादुर है। ऐसा बहादुर जो शेर की गुफा में जाकर शेर के दाँत तोड़ने की क्षमता रखता है। 
विश्व पुस्तक मेला- नई दिल्ली, 2018
     ‌पहली बार जब यह पता लगा की शेर सिंह राणा ने अपनी आत्मकथा लिखी है तब से मेरे मन में इस किताब को पढने की अदम्य इच्छा बलवती हो उठी। आत्मकथा का शीर्षक और शेर सिंह राणा को कारनामा ही इस किताब को पढने के लिए प्रेरित करता है।

          भारत के महान राजा पृथ्वी राज चौहान और मोहम्मद शहाबुद्दीन गौरी के मध्य हुये तराईन के युद्ध (सन् 1191 और 1192 ई.) को सभी ने पढा ही होगा। प्रथम युद्ध में हारने के बाद गौरी ने द्वितीय युद्ध में कुटिल नीति से युद्ध जीता और पृथ्वी राज चौहान को बंदी बना कर अपने देश गजनी ले गया।  पृथ्वी राज चौहान के एक परममित्र और कवि चंदबरदाई थे। चंदबरदाई ने  'पृथ्वी राज रासो' नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की है। यह वीर रस का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है।
                        गौरी ने गजनी ले जाकर पृथ्वी राज चौहान को बंदी बना लिया और चौहान की आँखे खत्म कर दी। पृथ्वी राज चौहान की एक विशेषता थी 'शब्दभेदी' बाण चलाने की। इसी विशेषता के चलते एक 'पद्य' के माध्यम से चंदबराई ने पृथ्वी राज चौहान को गजनी की स्थिति बता दी।
     चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण
       ता उपर सुल्तान है,मत चूको चौहान।।
                        चंदबराई के इस संकेत से पृथ्वी राज चौहान ने शब्द भेदी बाण से गौरी को खत्म कर दिया। दोनों मित्रों ने वहीं पर अपनी जीवन लीला भी समाप्त कर ली।
                        गजनी में इन‌ तीनों की समाधी है। गजनी में पृथ्वी राज चौहान‌ की समाधी को अपमानित किया जाता है। बस यही बात शेर सिंह राणा के मन में थी की इस समाधी को भारत लाना है और इस बहादुर व्यक्तित्व ने इस महान कार्य के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी।
                        एक केस के सिलसिले में शेर सिंह राणा को तिहाड़ जेल जाना पड़ा। लेकिन दिल में एक आग सुलग रही थी। वह आग थी पृथ्वी राज चौहान की अस्थियों को भारत लाने की।
                         यह आत्मकथा तिहाड़ से ही आरम्भ होती है।  तिहाड़ से होते हुए बांग्लादेश और वहाँ से काबुल, कांधार तक घूमती है। 

Wednesday, 30 January 2019

170. विवेकानंद की आत्मकथा

सत्य मेरा ईश्वर है, समग्र जगत् मेरा देश है।- स्वामी विवेकानंद

             12 जनवरी स्वामी विवेकानंद जी का जन्म दिवस है जिसे युवा दिवस के रूप में‌ मनाते हैं। मेरी यह इच्छा रहती है की विवेकानन्द जी साहित्य यथासंभव पढा जाये। इसी क्रम में एक रचना हाथ लगी 'विवेकानंद की आत्मकथा' शीर्षक से।
         इस रचना में विवेकानंद जी के जीवन को सहजता से समझना जा सकता है। युवा वर्ग के प्रेरणा पुरुष विवेकानंद जी ने अपने जीवन में जो परेशानियां देखी, जो संघर्ष किया और जिस सफलता के मुकाम पर वे पहुंचे वे सब तथ्य इस आत्मकथा में उपलब्ध हैं।
          विवेकानन्द जी के बचपन से लेकर उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस से होते हुये यह आत्मकथा शिकागो धर्म सम्मेलन और पुन: भारत यात्रा का लंबा वर्णन है।

              विवेकानंद जी पर लिखना तो संभव नहीं है, हाँ, उनकी आत्मकथा की कुछ बाते यहाँ सांझा की जा सकती है जिससे उनके जीवन या उनकी रचना 'विवेकानंद की आत्मकथा' को समझा जा सके।

           धर्म के विषय पर इस रचना में जो पंक्तियाँ मिलती है वे वास्तव में धर्म और धर्म के नाम पर अंधविश्वास को रेखांकित करती हैं।
"तरह जब तक तुम्हारा धर्म तुम्हें ईश्वर की उपलब्धि न कराए, तब तक वह व्यर्थ है! जो लोग धर्म के नाम पर सिर्फ ग्रंथ-पाठ करते हैं, उनकी हालत उस गधे जैसी है, जिसकी पीठ पर चीनी का बोझा लदा हुआ है, लेकिन वह उसकी मिठास की खबर नहीं रखता।’’

        "धर्म सत्य है, इसकी अनुभूति की जा सकती है। हम सब जैसे यह जगत् प्रत्यक्ष कर सकते हैं, उससे ईश्वर के अनंत गुणों को स्पष्ट रूप से प्रत्यक्ष किया जा सकता है।’’


सच ही, ईश्वर में दृढ़ विश्वास और उन्हें पाने के लिए अनुरूप आग्रह को ही ‘श्रद्धा’ कहते हैं।

जीवन की कठिन परिस्थितियों से निकल कर वे एक दिन संन्यासी मार्ग पर चल दिये। संन्यासी किसे कहते हैं? -

    "मैं जिस संप्रदाय में शामिल हूँ, उसे कहते हैं—संन्यासी संप्रदाय। संन्यासी शब्द का अर्थ है—‘जिस व्यक्ति ने सम्यक॒रूप से त्याग किया हो।’ यह अति प्राचीन संप्रदाय है। ईसा के जन्म से 560 वर्ष पहले महात्मा बुद्ध भी इसी संप्रदाय में शामिल थे। वे अपने संप्रदाय के अन्यतम संस्कारक भर थे। पृथ्वी के प्राचीनतम ग्रंथ ‘वेद’ में भी आप लोगों को संन्यासी का उल्लेख मिलेगा।

गुरु किसे कहते हैं? इस रचना में 'गुरु' शब्द की जो परिभाषा दी गयी है वह पठनीय और अनुकरणीय भी है।

      भारत में ‘गुरु’ का हम क्या अर्थ लेते हैं, हमें यह भी याद रखना होगा। शिक्षक का अर्थ सिर्फ ग्रंथकीट नहीं होता। गुरु वे ही हैं, जिन्होंने प्रत्यक्ष की उपलब्धि की हो, जिन्होंने सत्य को साक्षात् जाना हो, किसी दूसरे से सुनकर नहीं।

       "मैं एक ऐसे इंसान को जानता था, लोग जिसे पागल कहते थे, वे उत्तर देते थे, ‘‘बंधुगण, समस्त जगत् ही तो एक पागलखाना है। कोई सांसारिक प्रेम में उन्मत्त है, कोई नाम के लिए पगलाया हुआ है, कोई यश के लिए, कोई धन-दौलत के लिए और कोई स्वर्ग-लाभ के लिए पागल है। इस विराट् पागलखाने में मैं भी एक पागल हूँ। मैं भगवान् के लिए पागल हूँ। तुम अगर रुपए-पैसों के लिए पागल हो, मैं ईश्वर के लिए पागल हूँ। तुम भी पागल, मैं भी पागल! मुझे लगता है कि अंत में मेरा पागलपन ही सबसे ज्यादा खरा है।’’

       'विवेकानंद की आत्मकथा' में बहुत से रोचक प्रसंग हैं‌‌। उन्हीं में से एक प्रसंग यहाँ उपलब्ध है।

        -एक बार मैं काशी की किसी सड़क से होकर जा रहा था। उस सड़क के एक तरफ विशाल जलाशय था और दूसरी तरफ ऊँची दीवार! जमीन पर ढेरों बंदर थे। काशी के बंदर दीर्घकाय और बहुत बार अशिष्ट होते हैं। बंदरों के दिमाग में अचानक झख चढ़ी कि वे मुझे उस राह से नहीं जाने देंगे। वे सब भयंकर चीखने-चिल्लाने लगे और मेरे पास आकर मेरे पैरों को जकड़ लिया। सभी मेरे और नजदीक आने लगे। मैंने दौड़ लगा दी। लेकिन जितना-जितना मैं दौड़ता गया, उतना ही वे सब मेरे और करीब आकर मुझे काटने-बकोटने लगे। बंदरों के पंजों से बचना असंभव हो गया। ऐसे में अचानक किसी अपरिचित ने मुझे आवाज देकर कहा, ‘‘बंदरों का मु़काबला करो।’’
     मैंने पलटकर जैसे ही उन बंदरों को घूरकर देखा, वे सब पीछे हट गए और भाग खड़े हुए। समस्त जीवन हमें यह शिक्षा ग्रहण करनी होगी—जो कुछ भी भयानक है, उसका मु़काबला करना है, साहस के साथ उसे रोकना है। दुःख-कष्ट से डरकर भागने के बजाय उसका मु़काबला करना है। बंदरों की तरह वे सब भी पीछे हट जाएँगे।



         हिंदू धर्म तो यह सिखाता है कि जगत् में जितने भी प्राणी हैं, सब तुम्हारी ही आत्मा के बहुरूप मात्र हैं। 

         जब मैंने ‘अमेरिकावासी बहनो और भाइयो’ कहकर सभा को संबोधित किया तो दो मिनट तक ऐसी तालियाँ बजीं कि कान बहरे हो आए। उसके बाद मैंने बोलना शुरू किया। जब मेरा बोलना खत्म हुआ तो हृदय के आवेग के मारे अवश होकर मैं एकदम से बैठ गया।

शिकागो, सितंबर 1894
      इन दिनों मैं इस देश में सर्वत्र घूमता फिर रहा हूँ और सबकुछ देख रहा हूँ और इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि समग्र पृथ्वी में एकमात्र एक ही देश है, जहाँ लोग समझते हैं कि धर्म क्या चीज है! वह देश है—भारतवर्ष! हिंदुओं में तमाम दोष-त्रुटियाँ हों, इसके बावजूद नैतिक चरित्र और आध्यात्मिकता में अन्य जाति से भी काफी ऊर्ध्व हैं। 




         "लंदन में जब मैं व्याख्यान देता था, तब एक सुपंडित मेधावी मित्र अकसर ही मुझसे बहस किया करते थे। उनके तरकश में जितने भी तीर थे, सब-के-सब मुझ पर निक्षेप करने के बाद एक दिन अचानक तार-स्वर में बोल उठे, ‘‘तो फिर आप लोगों के ऋषि-मुनि हमें इंग्लैंड में शिक्षा देने क्यों नहीं आए?’’ जवाब में मैंने कहा, ‘‘क्योंकि उस जमाने में इंग्लैंड नामक कोई जगह थी ही नहीं, जहाँ वे आते। वे क्या अरण्य में पेड़-पौधों में प्रचार करते?’’


शीर्षक- विवेकानंद की आत्मकथा
विधा- आत्मकथा
लेखक- स्वामी विवेकानंद
प्रकाशक- प्रभात पैपरबैक्स

Friday, 9 November 2018

152. स्वामी विवेकानंद- अपूर्वानंद

स्वामी विवेकानंद-संक्षिप्त जीवनी तथा उपदेश
- स्वामी अपूर्वानंद
स्वामी विवेकानंद जी युवाओं के प्रेरणा स्रोत हैं। इनके जन्म दिवस (12 जनवरी) को 'युवा दिवस' के रूप में मनाया जाता है। कम उम्र में स्वामी‌ जी ने जो मार्ग/उपदेश विश्व को दिया वह अतुलनीय है।
      प्रस्तुत पुस्तक स्वामी जी सम्पूर्ण जीवन की एक छोटी सी झलक प्रस्तुत करती है। उनके जीवन का आदि -अंत इस पुस्तक में वर्णित है। स्वामी जी के जीवन को पढना बहुत रोचक और प्रेरणादायक है। उनके जीवन के संघर्ष मनुष्य को बहुत कुछ सिखाते हैं।
       उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस ने तो वह विवेकानंद जी के बारे में कहा था,-"नरेन्द्र मानो सहस्रकमल है। इतने सारे लोग यहाँ आते हैं, किंतु नरेन्द्र जैसा दूसरा कोई भी नहीं आया।"
          गुरु रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानंद (नरेंद्र) की दैवीय प्रतिभा को सबसे पहले पहचान‌ लिया था। उन्हीं के ही मार्गदर्शन में स्वामी जी आगे बढे और आगे 'स्वामी विवेकानंद  रामकृष्ण की वाणी के मूर्तरूप थे।(पृष्ठ-03)
          प्रस्तुत पुस्तक में स्वामी जी के जीवन का काफी रोचक वर्णन मिलता है।  नरेन्द्र के अंतर में जो विराट पुरुष वास करता था, उसी की सक्रिय शक्ति के प्रभाव से उसमें बाल्यावस्था से ही महान तेज दिखायी देता था। (पृष्ठ-7)
             स्वामी विवेकानंद ने भारतवर्ष का भ्रमण भी किया और इस दौरान उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिला। स्वामी जी भारत की दशा देखकर बहुत परेशान होते थे। वे कहते थे-"मैंने समूचे भारत का भ्रमण किया है।....सर्वत्र ही आम जनता का भयावह दुःख-दैन्य मैंने अपनी आँखों से देखा। वह सब देखकर मैं व्याकुल हो उठता हूँ। "(पृष्ठ-37)
             गुरु रामकृष्ण जी के सोलह शिष्य थे जिन्होंने संन्यास ग्रहण किया और यही वो शिष्य थे जो बाद में विवेकानंद जी के सहयोगी रहे।
          कुछ सीखने के उद्देश्य से स्वामी जी विदेश यात्रा पर भी गये और यही विदेश यात्रा ने संपूर्ण विश्व के सम्मुख भारत की पहचान बदल दी। विवेकानंद जी के लिए यह यात्रा प्रवास बहुत ही कठिन रहा। श्वेतांग युरोपीय न होने के कारण उन्हे पग-पग पर अपमान और तिरस्कार का सामना करना पड़ा। (पृष्ठ-47)
            11 सितंबर 1883 ई. सोमवार धर्मजगत के इतिहास में चिरस्मरणीय रहेगा। ...इसी दिन प्राचीन भारत के वेदांत धर्म ने स्वामी विवेकानंद को अपना यंत्र बनाकर महान् धर्मसम्मेलन में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था।(पृष्ठ-48)
                     उन्होंने अपना संबोधन 'बहनों और भाईयों '  शब्दों से आरम्भ किया। स्वामी जी के संबोधन में विश्व भ्रातृत्व का बीज, विश्व मानवता की झंकार, वैदिक ऋषि की वाणी सभी कुछ निहित था। (पृष्ठ-49)। स्वामी जी के भाषण से आर्यधर्म, आर्यजाति और आर्य भूमि संसार की नजरों में पूजनीय हो गयी। (पृष्ठ-51)
          स्वामी जी की शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति के लिए मार्गदर्शन का काम करती है। उनके विचार किसी धर्म, सभ्यता या देश के न होकर सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याणार्थ हैं।
         
                    हमारे प्रिय प्रेरणा पुरुष भारतीय धर्म संस्कृति के ध्वजावाहक अपने पीछे हम युवा वर्ग पर एक जिम्मेदारी छोड़ कर इस नश्वर संसार से चले गये।
4 जुलाई 1902 ई. को स्वामी विवेकानंद की आत्मा देह-पिंजर से मुक्त होकर असीम में विलीन हो गयी। (पृष्ठ-78)
                        शान्ति:! शान्तिः! शान्तिः!!
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पुस्तक-   स्वामी विवेकानंद, संक्षिप्त जीवनी तथा उपदेश
लेखक-   स्वामी अपूर्वानंद
अनुवाद-  स्वामी वागीश्वरानंद, स्वामी विदेहात्मानंद
प्रकाशक- स्वामी ब्रह्मास्थानंद, धंतोली, नागपुर-440012
पृष्ठ-         90
मूल्य-       10₹
प्रथम प्रकाशन- 1984
प्रकाशन-    सत्रहवाँ-07.06.2013
 

Friday, 17 November 2017

82. मेरी जीवन यात्रा- अब्दुल कलाम

कलाम की कहानी, उन्ही की जुबानी।
मेरी जीवन यात्रा, आत्मकथा, पठनीय।
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  एक साधारण परिवार के सामान्य से बच्चे से वैज्ञानिक और वैज्ञानिक से राष्ट्रपति बनने  का सफर वास्तव में पढने योग्य है। कलाम की आत्मकथा उनके कई अच्छे-बुरे संघर्षों का चित्रण करती है जो कि पाठक को आगे बढने की प्रेरणा भी देती है।
कलाम लिखते हैं- " मेरे जीवन की यात्रा के कुछ महत्वपूर्ण अनुभव है, जिन्हें मैंने अपने बचपन से अब तक सँजोया है और अपने जीवन के 80 से अधिक वर्षों में प्राप्त किया है।"
                 इस पुस्तक में क्या है, -" मेरी अन्य पुस्तकों की तरह ' मेरी जीवन यात्रा' में मुख्य केन्द्र कुछ छोटी तथा अनजान सी घटनाएं थी, जो मेरे जीवन में घटित हुयी। अपने माता- पिता से जुङी अनेक घटनाओं की व्याख्या मैंने इस पुस्तक में की है।"
         संपूर्ण किताब को छोटे- छोटे 12 खण्डों में विभक्त किया है, यह किताब की रोचकता भी है। इस आत्मकथा में अधिकतर घटनाएं कलाम जी के बचपन और उनके परिवार का चित्रण करती नजर आती है। 
   कलाम जी के जीवन में अनेक अवरोधक पैदा हुए लेकिन कलाम जी ने कभी हार नहीं स्वीकार की।
जहाँ आजकल शिक्षित वर्ग ईश्वर के अस्तित्व का पूर्णत नकार देते हैं वहीं कलाम उस अदृश्य सत्ता से प्रभावित होकर लिखते हैं, - " हम सबके जीवन में दिव्य शक्ति विद्यमान है, जो हमें नकारात्मक क्षणों में तथा दुःख के पलों से उबरने की शक्ति देती है।" (पृष्ठ-21)
   आठ बरस का कमाऊ लङका नामक खण्ड में कलाम साहब के बचपन के संघर्ष का वर्णन है। मात्र आठ वर्ष की उम्र में कलाम साहब सुबह उठकर घर-घर
अखबार पहुंचाते थे और ट्युशन और विद्यालय भी जाते थे।
छोटी सी उम्र में कठिन मेहनत और उस पर भी कभी उनके चेहरे पर कभी निराशा नहीं झलकी।
     अपने शहर के प्रेम- साम्प्रदायिक सौहार्दपूर्ण वातावरण का चित्रण संकट मोचक तीन व्यक्ति नामक खण्ड में करते हैं।
         शहर के तीन नामी व्यक्ति और वह भी तीनों अलग- अलग धर्म से संबंधित थे पर शहर के अमन-चैन उन तीनों के लिए प्राथमिक था। और सच्चा धर्म भी वही है जो मनुष्य को सच्ची शांति प्रदान करे। इस वातावरण का कलाम के जीवन पर गहरा असर रहा
" अगर मेरे धर्म की बात की जाये तो निश्चित रूप से मेरे भाग्य ने मुझे विज्ञान और तकनीक क्षेत्र में पहुंचाया था, उसकी बुनियाद रामेश्वरम् से बनी थी। मैं हमेशा से ही विज्ञान में विश्वास करने वाला था, लेकिन इसके साथ ही मेरा आध्यात्मिक विश्वास था, जो कि युवावस्था में हि स्थापित हो चुका था।........मुझे ज्ञान की प्राप्ति कुरान, गीता तथा बाइबिल से मिली। इनके मिलाप से ही मेरे जीवन व संस्कारों का मिलाप मुझे अपनी जन्मभूमि से मिला था  और इस शहर के अनूठे संस्कारों ने मेरा पूर्ण विकास किया। (पृष्ठ 53)
     यह पुस्तक जो की कलाम जी के परिवार का मुख्यतः परिचय देती है। इसमें इनके परिवार को जानने- समझने का काफी अच्छा अवसर मिलता है। इसी पुस्तक का एक खण्ड है मेरी माँ और मेरी बहन
  इस खण्ड का आरम्भ इन पक्तियों से होता है
" सागर की लहरें, सुनहरी रेत, यात्रियों की आस्था,
   रामेश्वरम् की मस्जिद वाली गली, सब आपस में मिलकर एक हो जाती हैं,
वह है मेरी माँ।"
  द्वितीय विश्व युद्ध के उन कठिन दिनों का वर्णन भी मिलता है जब पूरे परिवार को राशन तय कोटे के अनुसार ही मिलता था लेकिन कलाम जी की ममतामयी माँ स्वयं भूखी रहकर अपने बच्चों को भरपेट खाना खिलाती थी।
और वहीं बहन जौहरा का वर्णन भी है जिसने कलाम जी की शिक्षा के लिए अपने आभूषण तक बेच दिये।
       कलाम जी का पुस्तक प्रेम तो सर्वविदित है, उन्होने जितना अच्छा पढा है उतना अच्छा लिखा भी है। 
" ...पुस्तकों से मेरा घनिष्ठ संबंध रहा है। वे मेरे अच्छे मित्रों की तरह है।"(पृष्ठ -87)
इस खण्ड में कलाम जी ने अपनी प्रिय पुस्तकों का भी जिक्र किया है।
प्रेरणादायक कथन-
- हमारे अंदर का दृढ विश्वास तथा हमारे अंदर के विचार है, जो हमारे कार्यों को प्रभावित करते हैं।
- मेरा मानना है की एक ही सत्ता (ईश्वर) है जो हर किसी सुनती है।(पृष्ठ 70)
- जो शिक्षक अपने विद्यार्थी की प्रगति का ध्यान रखता है, वही हमारा सर्वश्रेष्ठ मित्र होता है। (पृष्ठ-82)
- निराशा के भाव समाप्त होने के बाद इंसान की सोच में बदलाव आता है और उसके दृष्टिकोण में भी बदलाव आता है। (पृष्ठ 99)
- हम सिर्फ राजनीतिक घटनाओं को ही देश-निर्माण समझते हैं, परंतु बलिदान, परिश्रम तथा निर्भयता ही सही अर्थों में देश बनाती है। (पृष्ठ-106)
- विज्ञान एक आनंद और जुनून है।
         डाॅ. अब्दुल कलाम जी ने स्वयं के बारे में बहुत सुंदर शब्दों में बहुत ही अच्छी बात कही है, - कठिन परिश्रम, अध्ययन करना सीखना, सद्भाव तथा क्षमा कर देना- ये सब मेरी जिंदगी में मील के पत्थर हैं।
     पुस्तक में कई जगह करुण प्रसंग भी हैं जो कलाम जी को ताउम्र याद रहे और किसी भी पाठक को प्रभावित करने में सक्षम हैं।
अगर किसी भी पाठक को कलाम जी के जीवन को समझना है तो यह पुस्तक उनके परिवार और बचपन का अच्छा चित्रण करती है।
इस पुस्तक का अधिकांश चित्रण इनके परिवार से ही संबंधित है और कुछ अंश इनके वैज्ञानिक जीवन से  भी हैं लेकिन‌ पुस्तक में कलाम जी के राष्ट्रपति कार्यकाल का नाम मात्र वर्णन ही मिलता है।
पुस्तक भी भाषा शैली बहुत ही सरल और सरस है जो किसी भी पाठक को सहज ही समझ में आ जाती है। कहीं भी भारी भरकम या तकनीकी शब्दावली का प्रयोग नहीं किया गया।
हालांकि यह पुस्तक मूलतः अंग्रेजी में थी और यह इसका हिंदी अनुवाद है।
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पुस्तक-  मेरी जीवन यात्रा
ISBN -978-93-5048-797-6
लेखक - ए.पी. जे. अब्दुल कलाम आजाद
( 15.10.1931- 27.07.2015)
मूल पुस्तक- My journey
अनुवादक- महेन्द्र यादव
प्रकाशन- प्रभात पेपरबैक्स
www.prabhatbooks.com
संस्करण- 2017
पृष्ठ- 143
मूल्य- 150₹

Sunday, 16 April 2017

32. जूठन-2, ओमप्रकाश वाल्मीकि

आत्मकथा के इस दूसरे भाग की शुरुआत उन्होंने देहरादून की आॅर्डिनेंस फैक्ट्री में अपनी नियुक्ति से की है। नई जगह पर अपनी पहचान को लेकर आई समस्याओं के साथ-साथ यहाँ मजदूरों के साथ जुङी अपनी गतिविधियों का जिक्र करते हुए उन्होंने अपनी साहित्यिक सक्रियता का भी विस्तार से उल्लेख किया है। सहज, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय भाषा में लिखी गयी यह पुस्तक देहरादून की यात्रा करती हुयी शिमला उच्च अध्ययन संस्थान और फिर उनके अस्वस्थ होने तक जाती है।
(जूठन आत्मकथा के अंतिम कवर पृष्ठ से)
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समीक्षा शीघ्र प्रकाशित
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पुस्तक- जूठन
विधा- आत्मकथा
लेखक- ओमप्रकाश वाल्मीकि
प्रकाशक- राधाकृष्ण पेपरबैक
पृष्ठ-152
मूल्य-150₹

Tuesday, 4 April 2017

31. जूठन-1 ओमप्रकाश वाल्मीकि

जूठन ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा है। यह आत्मकथा इसलिए विशेष है क्योंकि यह एक तरफ एक दलित की आत्मकथा है, वहीं एक तथाकथित सभ्य समाज की सभ्यता पर पर प्रश्न चिह्न भी है। यह प्रश्न चिह्न सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक और शिक्षितजन के सामने लगा है।
  एक व्यक्ति मात्र एक जाति के कारण किस प्रकार की उपेक्षा, तिरस्कार, अपमान झेलता है इसका कटु अनुभव तो वही जानता है जिसने इस दर्द को महसूस किया है।
  इस आत्मकथा के लेखक स्वयं दलित समाज से हैं इसलिए इनकी रचना में भोगा हुआ यथार्थ है। एक ऐसा यथार्थ जो सामान्य पाठक को एक ऐसी निर्दय दुनियाँ के बारे में बताता है जिसका बाहरी आवरण चमकदार है, वहीं यह आत्मकथा उस जाति/समाज/समुदाय के आंतरिक व बाहरी जीवन का करुणाजनक वर्णन भी करती है जिसने इस दर्द, उपेक्षा, अपमान को सहन किया है या कर रहा है।
      ओमप्रकाश वाल्मीकि का जन्म इस सभ्य समाज में एक निम्न समझी जाने वाली जात में हुआ और वह जाति ताउम्र उनसे चिपकी रही, उनकी योग्यता भी जाति के नीचे दबकर रह गयी।
जातिगत भेदभाव का असर उनके बाल जीवन से ही आरम्भ हो गया। जब पहली बार स्कूल गये तब अध्यापक ने तीन दिन लगातार सफाई में लगा दिया।
"क्या नाम है बे तेरा?"- हेडमास्टर कलीराम ने पूछा।
" ओमप्रकाश "-मैंने डरते-डरते बताया
" चूहङे का है?"
"जी"
"ठीक है...वह जो सामने शीशम का पेङ खङा है, उस पर चढ जा और टहनियाँ तोङ के झाङू बणा ले। पूरे स्कूल कू ऐसा चमका दे जैसा सीसा......।" (पृष्ठ-14,15)
और यह प्रकिया तीन चली। नन्हां बालक ओमप्रकाश कक्षा में न बैठ सका तीन दिन स्कूल की सफाई करता है। यह टीस जो बचपन मे दिल में बैठ गयी वह कभी न निकल सकी।
इस प्रकार के एक नहीं, अनेक शिक्षक आये थे इनके जीवन में इसलिए ओमप्रकाश जी लिखते हैं कि - उस समय मुझे लगता था जैसे मेरे सामने कोई शिक्षक नहीं, जातिय अहम् में डूबा हुआ कोई अनपढ़ सामंत खङा है। (पृष्ठ-80)
जो उम्र स्कूल जाने की थी उस उम्र में लोगों के खेतों में काम किया वह भी नगें पाँव और बेगार में। जिस गर्मी में लोग घर से बाहर नहीं निकल सकते उस गर्मी में लोग नग्न पाँव खेतों में काम करते हैं।
तपती दोपहरी में गेहूँ काटना बहुत कष्टप्रद और कठिन होता है। सिर पर बरसती धूप। नीचे तपती जमीन, नंगे पाँव में कटे पौधों की जङें शूल की तरह तलवों में चुभती थी। (पृष्ठ-18)
          सारा दिन लोगों के खेतों में अपना जीवन खपा देने वाले लोग। धूप-छाह, गर्मी- सर्दी में एक जैसी स्थिति। लोगों के खेतों में परिश्रम कर पूरा जीवन बीता दिया और उसके बदले में क्या मिलता।
दिन-रात मर-खपकर भी हमारे पसीने की कीमत मात्र जूठन, फिर भी किसी को कोई शिकायत नहीं। कोई शर्मिंदगी नहीं, कोई पश्चाताप नहीं। (पृष्ठ-20)
                जो लोग कुत्तों को अच्छा खाना खिला सकते हैं पर एक मनुष्य को नहीं। कारण मात्र एक जातिगत भेदभाव। एक ऐसा भेदभाव जो बचपन से ही बुरी तरह से मन में बैठा दिया जाता है। क्या कोई मनुष्य इसलिए छोटा हो जाता है की उसने एक निम्न समझी जाने वाली जाति में जन्म लिया है।
          भारतीय समाज में 'जाति' एक महत्वपूर्ण घटक है। जाति पैदा ही व्यक्ति की नियति तय कर देती है। पैदा होना व्यक्ति के अधिकार में नहीं । (पृष्ठ163)
            जन्म से कोई छोटा-बङा नहीं होता, मनुष्य तो अपने कर्म से छोटा-बङा हो सकता है। हिंदू समाज में कभी जाति प्रथा कभी कर्मगत थी। एक परिवार में चारों वर्णों के लोग हो सकते थे, लेकिन जब से जातिप्रथा कर्म से जन्म की ओर हो गयी तब से हिंदू समाज गर्त में समाता चला गया और मनुष्य, मनुष्य से भेदभाव करने लग गया।
यहाँ तक की इन्हें मटके से पानी नहीं पीने दिया जाता, स्कूल में अलग बैठाया जाता(स्कूल में एडमिशन तक नहीं दिया जाता), उच्चवर्ग के समक्ष चारपाई पर नहीं बैठ सकते, धोबी कपङे इस्तरी नहीं करते और मकानों की स्थिति ये की एक बरसात में सब मकान धराशायी।
ऐसी ही एक 1962 की बरसात का वर्णन ओमप्रकाश वाल्मीकि जी करते हैं, जिसमें दलित समुदाय के समक्ष खाने-पीने तक का संकट आ जाता है।
अगले दिन सुबह से लेकर दोपहर तक कोई चूल्हा नहीं जला था। बरसात ने फाकों की नौबत पैदा कर दी थी। जीवन जैसे पंगु हो गया था।..........साहित्य में नरक की कल्पना है। हमारे लिए बरसात के दिन किसी नारकीय जीवन से कम न थे। (पृष्ठ-33, 35)
             यह जातिगत भेदभाव मात्र गाँव तक ही सीमित नहीं था, यह तो बङे शहरों में भी उसी तरह पसरा था जैसा की गाँवों में। और ओमप्रकाश वाल्मीकि जी यह भी दृढ विशेषता रही की उन्होंने कभी अपनी जाति को छुपाया नहीं । जो है वह प्रत्यक्ष है, जाति के विषय पर कभी झूठ का सहारा नहीं लिया। अगर कोई उनकी प्रतिभा का सम्मान करे तो इसी जाति के साथ स्वीकार करे अन्यथा नहीं ।
मुंबई, देहरादून और जबलपुर कहीं भी गये लेकिन उन्हें अपनी जाति विशेष के कारण दोहरे बर्ताव का सामना करना ही पङा। हालांकि सभी एक जैसे नहीं होते, कुछ अच्छे मित्र भी मिले।
               इस आत्मकथा में मात्र एक दलित समाज का ही वर्णन नहीं, बल्कि साथ-साथ में उन घटनाओं/परिस्थितियों का चित्रण भी है जो वर्तमान में अप्रासंगिक है या कुछ लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए बना ली।
ऐसा ही एक वर्णन गीता नामक पुस्तक के संदर्भ में है। वह गीता जो कर्म को महत्व देती है फल को नहीं, लेकिन ओमप्रकाश जी को जो गीता मिली उसमें एक अलग से अध्याय जोङा कर फल को महत्व दिया गया।
यानी गीता-दर्शन के ठीक विपरीत फल की लालसा के लिए पाठकों, श्रद्धालुऒं और आस्थावानों को उकसाया जा रहा है। यह बेचैनी मेरे मन में एक नई चेतना पैदा कर रही थी यानि कर्मकांड को स्थापित किया जा रहा था। (पृष्ठ-78)
इसी आत्मकथा में जे.पी. आंदोलन का वर्णन भी है और स्वयं की शादी का भी, 27 दिसंबर, 1973.। पुलिस की कार्यशैली का वर्णन भी पुलिस की सत्यता ब्यान करता है। (पृष्ठ-145)
भदंत आनन्द कौसल्यायन से मुलाकात का भी और उनके जीवन पर महात्मा बुद्ध के विचारों का भी। हालांकि ये वर्णन संक्षिप्त हैं।
बुद्ध के मानवीय स्वतंत्रता के विचार ने मुझे प्रभावित किया था। परिवर्तित समष्टि में कुछ भी अपरिवर्तनीय नहीं है। मानव ही सर्वोपरि है। करुणा और प्रज्ञा व्यक्ति को उच्चता की ओर ले जाती है। (पृष्ठ-123)
  दलित समुदाय का जिस तरह से सत्यता के साथ ओमप्रकाश वाल्मीकि जी ने चित्रण किया है, वह प्रशंसा के योग्य है।
दलित समुदाय इसी समाज का ही एक भाग है, लेकिन परिस्थिति कहो या चालाकी उसे मुख्यधारा से विलग कर दिया गया उसकी उन्नति के अवसर खत्म कर दिये गये।
  दलित पढ-लिखकर समाज की मुख्यधारा से जुङना चाहते हैं, लेकिन सवर्ण (?) उन्हें इस धारा से रोकता है। (पृष्ठ-155)
लेकिन यह सच है कि बदलाव पलायन से नहीं, संघर्ष और संवाद से आएगा। (पृष्ठ-155)
   ओमप्रकाश वाल्मीकि द्वारा अपनी आत्मकथा जूठन लिखना एक साहसिक कदम माना जा सकता है। इस आत्मकथा में भारतीय समाज के उस समुदाय का चित्रण किया गया है जिसे दलित मान कर समाज की मुख्यधारा से अलग कर दिया गया है।
   अगर कोई पाठक दलित समाज के साथ हुये दुर्व्यवहार को समझना चाहता है तो उसे इस रचना को अवश्य पढना चाहिए।
इस आत्मकथा का 'जूठन' नामकरण हंस के तात्कालिक संपादक राजेन्द्र यादव ने किया था।
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पुस्तक- जूठन (आत्मकथा)
ISBN: 978-81-7119-854-2
लेखक- ओमप्रकाश वाल्मीकि
प्रकाशन- राधाकृष्ण प्रकाशन
पृष्ठ- 163
मूल्य-150₹