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Wednesday, 18 March 2020

277. सुकुल की बीवी- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

हिन्दी साहित्य के इतिहास में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का नाम वास्तव में सूर्य की तरह दैदीप्यमान है। छायावाद के चार स्तंभों में से एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहे हैं‌ निराला जी। साहित्य के अंदर कुछ प्रयोग इनके नाम भी दर्ज हैं। मूलतः कवि निराला जी पद्य में भी हाथ आजमाया है।
विद्यालय के पुस्तकालय में इनका एक कहानी संग्रह 'सुकुल की बीवी' उपलब्ध था, समय का सदुपयोग करते हुए वह संग्रह पढा। इस संग्रह में कुल चार कहानियाँ है चारो अलग-अलग रंग की हैं।

सुकुल की बीवी-
                     यह कहानी समाज सदभाव और निराला के विचारों की वाहक है। हिन्दु- मुस्लिम समाज में एकता स्थापित करने में सहायक कहानी है।
एक ऐसी महिला की कहानी जिसने हिन्दु- मुस्लिम दोनों समाजों के रंग देखे हैं और वह कैसे निराला की सहायता से अपना जीवन व्यवस्थित करती है।

श्रीमति गजानंद शास्त्रिणी-
                          यह कहानी आरम्भ में जहाँ अनमेल विवाह जैसे विषय को रेखांकित करती नजर आती है वहीं अंत में यह कहानी छायावाद का विरोध करती एक नारी की कहानी है जो विरोध से, या अवसर का फायदा उठाकर लोकप्रियता अर्जित जरती है।

कला की रूप रेखा-
                      यह कहानी यह स्पष्ट करती है की कला समाज/ जीवन से अलग नहीं है।

क्या देखा-
                 यह कहानी हीरा नामक महिला की है। उसके जीवन की कथा व्यथा है।

हालांकि चारों कहानियों विविध परिवेश की हैं पर मुझे कोई भी कहानी रुचिकर नहीं लगी। इस छोटे से संग्रह की कोई भी कहानी मेरी दृष्टि से प्रभावशाली नहीं या फिर मेरी समझ से बाहर की कहानियाँ है। क्योंकि अधिकांश कहानियाँ कला को व्यक्त करती हैं, कुछ उलझे में से चलती हैं।

कहानी संग्रह- सुकुल की बीवी
लेखक- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
प्रकाशक- भारती भण्डार, लीडर प्रेस, इलाहाबाद
पृष्ठ- 96