Saturday, 14 February 2026

उलटी लाशे- कर्नल रंजीत- 1984

प्रतिशोध कथा
उलटी लाशे- कर्नल रंजीत- 1984

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में कर्नल रंजीत अद्भुत रहस्यमयी कथाओं के लेखक के रूप में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखते हैं। इनकी कहानी और पात्र दोनों ही गहरे होते हैं। अत्यंत उलझाव और ज्यादा पात्रों को एकत्र करना और फिर उन्हीं के मध्य रोचक संघर्ष दिखाने में कर्नल रंजीत अपना एक अलग कौशल रखते हैं। इनकी अधिकांश कहानियों में प्रतिशोध मुख्य बिंदु उभरकर सामने आता है । 
प्रस्तुत उपन्यास 'उलटी लाशें' भी एक प्रतिशोध से संबंधित के मर्डर मिस्ट्री रचना है। जहां हत्यारा कत्ल करने के पश्चात लाश को उलटा लटका देता है। 
वह ऐसा क्यों करता है ? 
National Highway-911

जहरीला धुआं
रात का अन्तिम पहर बीत रहा था।
अभी सूर्योदय होने में लगभग एक घंटा था। सारा बंगला खामोशी की चादर में लिपटा शान्त सोया पड़ा था। अचानक टेलीफोन की घंटी की आवाज बंगले में छाये सन्नाटे चीरकर गूंज उठी ।
सोनिया की नींद उचट गई। उसने लेटे-लेटे ही टेलीफोन पर एक नजर डाली। टेलीफोन की घंटी निरन्तर बजे चली जा रही थी।
उसने उटकर एक लम्बी अंगड़ाई ली और फिर हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठा लिया।
"हैलो ।" उसने नींद से बोझिल आवाज में कहा । 
"तुम कौन बोल रही हो ?" दूसरी ओर से किसी ने बड़ी
अशिष्टता से फटे बांस जैसी आवाज में पूछा ।
सोनिया को उस व्यक्ति के बात करने के ढंग पर गुस्सा आ गया। जी चाहा उसे अच्छी तरह फटकारकर टेलीफोन डिस्कनेक्ट कर दे। लेकिन न जाने क्या सोचकर उसने जल्दी से अपने आपको संयत किया और बड़ी नर्मी से पूछा, "आपने कौन-सा नम्बर डायल किया है ?"
"तुम मेजर बलवंत के बंगले से ही बोल रही हो न ?"- दूसरी ओर से फोन करने वाले ने पूछा ।
"जी हां, आप कौन साहब बोल रहे हैं ?" सोनिया ने फिर पहले की ही तरह नर्मी से पूछा ।
"इससे तुम्हें कोई मतलब नहीं कि मैं कौन बोल रहा हूं और कहां से बोल रहा हूँ। खैर, यह बताओ मेजर बलवंत कहां है ?''
(उलटी लाशें- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)
पाठक मित्रो, आपके लिए प्रस्तुत है कर्नल रंजीत की अदभुत लेखनी का एक और रोचक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास 'उलटी लाशे' । एक ऐसे हत्यारे की कहानी जो बहुत ही वीभत्स तरीके से हत्या करता था और जिसने मेजर बलवंत की कोठी पर भी हमला कर दिया था ।
वासना, प्रतिशोध, तस्करी । गैरकानूनी हथियारों का व्यापार आदि ।
कई ऐसे कारण थे जिन्होंने भयानक हत्याकांडों की कहानी खून से लिखी ।
इस सबके लिए जिम्मेदार कौन था ? 
एक के पीछे अनेक रहस्यों का जाल बुनने वाली कहानी ।
रोमांच, सस्पेंस और कौतूहल से भरपूर है। हत्यारों ने जासूस मेजर बलवंत को भी छुपा दिया।
जब उसे संदूक में बंद कर लाश का पार्सल भेजा गया ।
पढ़िये कर्नल रंजीत का आश्चर्यजनक घटनाओं से पूर्ण नवीनतम उपन्यास - '
उलटी लाशें' ।

             उपन्यास का आरम्भ में ही अपराधी मेजर बलवंत को फोन कर चेतावनी देता है। और बाद में भी उसके घर पर हमला करता है। अब पता नहीं क्यों अपराधी बिना मतलब मेजर बलवंत से उलझने की कोशिश कर रहा है। जबकि हर अपराधी पुलिस-जासूस से दूर भागने की कोशिश करता है और यहाँ इसके विपरीत कार्य हो रहा है।
स्वयं मेजर बलवंत का कथन देखें- "एक बात अभी तक मेरी समझ में नहीं आ रही। इन दिनों मेरे हाथ में कोई केस नहीं है और न मैंने आज तक किसी भी केस से सम्बन्धित किसी अपराधी को ही बख्शा है जो कुछ दिनों बाद मौका पाकर मुझसे बदला लेने की कोशिश करता । फिर ये आक्रमणकारी कौन थे और इन्होंने किसके कहने पर मेरे बंगले पर आक्रमण किया ?" (पृष्ठ-15) 
   अभी मेजर बलवंत अपने बंगले पर हुये आक्रमण पर का कारण समझ ही नही पाये थे की एक नया केस उनके सामने आ गया । 
"मेजर साहब, मैं सावरकर कालोनी पुलिस स्टेशन का इंचार्ज इस्पेक्टर जोगलेकर बोल रहा हूं।" इंस्पेक्टर जोगलेकर ने बड़ी विनम्रता से कहा, "अममय आपको कष्ट दे रहा हूं।" (पृष्ठ-31)
   इंस्पेक्टर जोगलेकर ने असमय फोन ऐसे ही नहीं किया था। उसका कारण था एक वीभत्स हत्या ।
सावरकर कालोनी के सेठ मदन मोहन की लाश उनकी कोठी पर लटकी हुयी मिली थी- सेठजी के बेडरूम की अधखुली खिड़की में से लहू में डूबी वह लाश विभिन्न ढंग से उलटी लटकी हुई थी। उसके एक पांव में रस्सा बंधा हुआ था जो खिड़की के पट के नीचे फंसा हुआ था, दूसरी टांग हवा में टेढ़ी होकर लहरा रही थी और लाश तिरछी हो गई थी। लाश की इस स्थिति ने उसकी भयानकता को और अधिक बढा दिया था ।(पृष्ठ-28)
   मेजर बलवंत ने सेठ मदन मोहन के विषय में जो जाना उसके अनुसार सेठ जी के परिवार के सदस्य जामनगर (गुजरात) में रहते हैं। 
"क्या सेठजी की पत्नी यशोदा उनके साथ नहीं रहती थीं ?" मेजर बलवंत ने मोरनी की आंखों में झांकते हुए पूछा ।
"मैंने तो जब से होश संभाला है उन्हें यहां कभी आते-जाते देखा नहीं।" मोरनी बोली ।

एक मोरनी और एक नौकर गंगाराम ही सेठ जी के खास थे । यह मेजर बलवंत के लिए अचरज से कम न था । हत्या के पश्चात सेठ जी की स्टील की अलमारी की चाबियां गायब थी ।
"लगता है हत्यारा सेठजी की हत्या करने के बाद चाबियों का गुच्छा उठा ले गया।" मोरनी ने सोच में डूबी आवाज में कहा, "इसका मतलब है कि वह कुछ-न-कुछ स्टील की इन तीनों अलमारियों में से जरूर निकालकर ले गया होगा । वरना उसे चाबियों के गुच्छे को ले जाने की जरूरत ही क्या थी ?"
"यही बात हो सकती है मोरनी !" मेजर बलवंत ने कहा ।
(पृष्ठ-35)
   मेजर बलवंत अभी इस केस को हल भी नहीं कर पाया था कि उनके समक्ष इसी केस से मिलता एक और केस आ गया ।
           इंस्पेक्टर कुलकर्णी ने जल्दी से उठकर मेजर बलवंत से हाथ मिलाया और फिर मुस्कराते हुए बोला, “मेजर साहब, असल में इंसान बहुत ही स्वार्थी प्राणी है। जब उस पर कोई बहुत बड़ा संकट आ पड़ता है तो वह एकदम आस्तिक बन जाता है और मन्दिर में जाकर भगवान की मूर्ति के आगे रोना गिड़गिड़ाना शुरू कर देता है। इसी तरह जब हम लोगों के सामने कोई उलझा हुआ केस आ जाता है तो हम दौड़े हुए आपके पास बले आते हैं।"(पृष्ठ-39)
   इंस्पेक्टर कुलकर्णी के अनुसार सुप्रीम ऑटोमोबाइल के मालिक सेठ अमृतलाल धूपिया की किसी ने बेहरमी से हत्या कर दी ।
बेरहमी से ?” मेजर बलवंत ने बड़ी उत्सुकता से पूछा ।
"जी हां, हत्यारे ने पहले तो उनके बदन के सारे कपड़े उतारकर उनके नंगे बदन पर इतनी बेरहमी से हंटर बरसाए हैं कि उनके बदन की सारी चमड़ी उधेड़ फेंकी है। सारा बदन मांस का लोथड़ा दिखाई दे रहा था। और हंटरों की मार से फूली हुई लहू में लिथड़ी लाश बहुत ही भयानक दिखाई दे रही थी। हो सकता है हंटरों की मार से ही सेठ अमृतलाल धूपिया की मृत्यु हो गई हो। फिर भी शायद हत्यारे को इत्मीनान नहीं हुआ था। उसने उनके सीने में दिन के ठीक ऊपर सुए जैसे पतले फलवाला छुरा भोंक दिया था जो उनके दिल को चीरता हुआ निकल गया था। और फिर उनकी नंगी लहूलुहान लाश के पैरों में नाइलोन का रस्सा बांधकर सीलिंग फैन से उलटी लटकाई थी और फिर सीलिंग फैन का स्विच ऑन कर दिया था । पंखे की पंखुड़ियों के साथ-साथ उलटी लटकी हुई लाश भी घूमने लगी थी । जिससे उड़ने वाले खून के छींटों से बेडरूम की दीबारें गोलाई में डेढ दो फुट तक रंग गई हैं।" (पृष्ठ-40)
“बिलकुल इसी ढंग से रात मोहन फैब्रिक्स के मालिक सेठ मदन मोहन देसाई की भी हत्या की गई है। हत्यारे ने उनकी लाश पंखे से लटकाने के बजाय खिड़की से बाहर टांग में रस्सा बांधकर लटका दी थी। हंटरों से बुरी तरह पीट-पीट कर उनकी चमड़ी भी उधेड़ दी गई थी। और फिर उनके सीने में भी ठीक दिल के ऊपर सुए जैसी बारीक धार वाला छुरा भोंक दिया गया था ।" मेजर बलवंत ने बताया ।
"इसका मतलब है एक ही रात में एक जैसी दो हत्याएं ।"
(पृष्ठ-40)
    पाठकगण कहानी यही तक ही नहीं क्योंकि इस उपन्यास के एक अध्याय का नाम है 'तीसरी हत्या' । और जब अध्याय का यह नाम है तो तय है तीसरी हत्या भी होगी और हुयी भी ।
सेठ भीमदेव जोशी की हत्या भी ठीक उसी ढंग से की गई थी जिस ढंग से पिछनी रात सेठ मदनमोहन देसाई और सेठ अमृत धूपिया की हत्या की गई थी ।"(पृष्ठ-52)
  मेजर बलवंत ने जाना की तीनों सेठ गरीब से अमीर बने हैं औए इनके पारिवारिक रिश्ते अत्यंत बिखराव वाले रहे हैं । किसी ने शादी नहीं की, किसी का पत्नी से मनमुटाव है,किसी को पत्नी सुख नहीं तो किसी की पत्नी की मृत्यु हो गयी लेकिन फिर भी सभी सेठ अच्छा जीवन जीते थे और शारीरिक आवश्यकताओं को पूर्ण करते थे और उनके घर पर नौकरानियों‌की संख्या भी ज्यादा थी।
वहीं मेजर बलवंत ने जाना की सेठों की स्टील की अलमारियों से कुछ तो गायब है पर वह क्या गायब है यह अभी तक कुछ पता नहीं चला था ।
वहीं मेजर बलवंत पर फिर जानलेवा हमला होता है और अपराधी एक के बाद एक अपराध करता चला जाता है यहां तक मेजर के सामने आये गवाह भी वह खत्म कर देता है और मेजर इस अज्ञात अपराधी की चाल तक समझ नहीं पाता । लेकिन फिर भी मेजर अपने इरादे से पीछे नहीं हटता और अपनी टीम के साथ असली अपराधी को खोज ही निकालता है।
    प्रस्तुत उपन्यास एक मर्डर मिस्ट्री रचना है इसमें होने वाले मर्डर भी भयानक ढंग से होते है और एक विशेष तरीके से होते हैं । यहीं भयानकता मेजर को सोचने को विवश करती है की कोई मात्र हत्या ही नहीं कर रहा बल्कि वह प्रतिशोध ले रहा है क्योंकि उसके हत्या करने का तरीका बताता है की वह मृतकों से कितनी गहरी नफरत करता है। 
       जैसे जैसे कार्यवाही आगे बढती है तो कुछ रहस्य स्पष्ट होते चले जाते हैं और यही रहस्य वास्तविक अपराधी तक पहुंचाने में मददगार बनते हैं। 
उपन्यास में कुछ त्रासदियां है जो भावुक करती है। जैसे शकूर पहलवान के साथ जो घटित होता है वह बहुत ही मार्मिक है। 
रूबी की के विषय में मेजर भी सिहर उठता है।
चमन लाल की मृत्यु भी भावुक करती है। 
उपन्यास का एक किरदार है मोरनी । मोरनी की कहानी पाठक के मन को छू लेने वाली है और वहीं ऐसे लोगों के चरित्र को उजागर करती है जिनकी कथनी और करनी में दिन रात का अंतर है।
  ‌ ‌‌यह कहानी है उन पांच नौजवानों की जो मुम्बई की धरा पर अपने सपने को पूर्ण करने के लिए आते हैं। मुम्बई सपनों की नगरी है लेकिन सभी के सपने तो यहां भी पूरे नहीं होते । बस कुछ लोग अपने सपनों को पूरा करने के लिए गलत रास्ता अपना लेते हैं‌। ऐसा ही कुछ गलत राह इन मित्रों ने पकड़ा और एक के बाद एक अपराध करते चले गये और अपराध से, गलत राह से अपने सपने पूर्ण करते गये लेकिन कहते है भगवान के घर देर है अंधेर नहीं ।
 यहां भी देर ही थी अंधेर नहीं था। क्योंकि पच्चीस साल बाद वह देर पूरी हुयी, अंधेर दूर हुआ और पापों का कर्म सामने आने लगा । वहीं उपन्यास को थोड़ा पेचीदा और घुमावदार बनाने के लिए इसमें अंतरराष्ट्रीय समग्लर अलबर्ट को शामिल कर लिया गया है ताकि उपन्यास में मर्डर मिस्ट्री के अतिरिक्त रोचकता बनी रहे।
तथ्यात्मक-
"आपको पता नहीं डॉक्टर साहब, मेजर साहब ने इस साल जून से पहले ही ईगतपुरी के पास सौ एकड़ का फार्म खरीदा था । जहां हमारे फिल्म स्टारों के फार्म हैं।" सोनिया ने। बताया, “फार्म में एक छोटा-सा दो मंजिला फार्म-हाउस भी बनवा लिया है। हम लोग जब भी बम्बई में रहते-रहते ऊब जाते हैं या किसी केस में काफी दिन उलझे रहने पर थक जाते हैं तो ईगतपुरी चले जाते हैं ।(पृष्ठ-13)
   कर्नल रंजीत द्वारा लिखित 'उलटी लाशे' उपन्यास एक प्रतिशोध से भरा हुआ कथानक है जो एक वीभत्स हत्या से आरम्भ होता है और आगे भी वीभत्स हत्याओं का क्रम जारी रहता है। मेजर बलवंत की तीक्ष्ण दृष्टि से बुद्धि कौशल से अपराधी आखिर में कड़ा जाता है।

उपन्यास-  उलटी लाशें
लेखक-    कर्नल रंजीत
पृष्ठ-        109
प्रकाशक- हिंद पॉकेट बुक्स, दिल्ली

कर्नल रंजीत के अन्य उपन्यासों की समीक्षा

प्रेतात्मा की डायरी - कर्नल रंजीत

अलौकिक शक्तियां और मर्डर मिस्ट्री
प्रेतात्मा की डायरी - कर्नल रंजीत

मनुष्य के जीवन में बहुत कुछ ऐसा घटित होता है जो उसकी कल्पनाओं से बाहर का होता है। भारत प्रसिद्ध जासूस मेजर बलवंत के जीवन में भी एक ऐसा केस आया था जिसकी कल्पना मेजर बलवंत ने कभी नहीं की थी। वैसे तो मेजर भूत-प्रेत पर यकीन नहीं करता लेकिन 'प्रेतात्मा की डायरी' में उसे कुछ अलग कल ताकतों का आभास होता है। मेरे विचार से कर्नल रंजीत का यह एकमात्र उपन्यास ही ऐसा होना चाहिए जिसमें अलौकिक शक्ति का वर्णन है अन्यथा कर्नल रंजीत भूत-प्रेत जैसी बातों का खण्डन करते नजर आते हैं।
  
रहस्यपूर्ण हत्याएं
सुबह से ही आकाश पर बादल छाए हुए थे। और शाम होते-होते मटियाले और भूरे बादलों ने काली घटाओं का रूप ले लिया था। शाम के सूरज के डूबते ही हवा में तेजी आ गई थी जिसके कारण हिमाचल प्रदेश के उस पर्वतीय भाग में सदियों के बीत जाने पर भी सर्दी बढ़ गई थी।
ऐसा लग रहा था जैसे सर्दी का मौसम फिर लौटकर आ गया हो।
रामनगर शहर से लगभग पांच मील दूर छोटा-सा गांव राजनगर रात की बांहों में लिपटा शान्त सोया पड़ा था। अचानक सर्दी बढ़ जाने के कारण लोग शाम से ही अपने-अपने घर में जा घुसे थे। जो धन सम्पन्न थे वे गर्म बिस्तरों में पड़े सर्दी मिटाने की कोशिश कर रहे थे। और जो निर्धन थे वे अलाव के पास बैठे सर्दी भगाने का असफल प्रयास कर रहे थे ।
हवा के तेज झोंकों से जब कमरा बर्फ की तरह ठंडा हो गया तो राजेश ने हाथ बढ़ाकर खिड़की बन्द कर दी और पर्दा गिरा दिया।
(प्रेतात्मा की डायरी- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)

Saturday, 7 February 2026

706. पीले बिच्छू- कर्नल रंजीत

मेजर बलवंत बांग्लादेश में
पीले बिच्छू- कर्नल रंजीत

राजस्थान के हनुमानगढ जिले के उपखंड संगरिया के मित्र हैं श्री रतन लाल चौधरी । दिसम्बर 2025 में रतन भाई के यहाँ जाना हुआ और उनसे मैं 15 उपन्यास कर्नल रंजीत के लेकर आया । फरवरी 2026 से उन्हीं उपन्यासों को पढा जा रहा है। और समयानुसार उनकी समीक्षा यहाँ प्रस्तुत की जा रही है। 
इन 15 उपन्यासों में से एक उपन्यास है पीले बिच्छू ।
हम समीक्षा की शुरुआत उपन्यास के प्रथम पृष्ठ के दृश्य से करते हैं।

आदेश भी, निवेदन भी
मेजर बलवन्त एक खूबसूरत और खुशबूदार फूल सोनिया के बालों में लगा रहा था। तभी उसने बंगले के अहाते में एक मोटर साइकल की आवाज सुनी । मेजर बलवन्त ने वह फूल जल्दी से सोनिया के बालों में लगा दिया और एक ओर हट गया। मोटर साइकल बरामदे में आकर रुक गई। आफिस के सदर दरवाजे के बाहर फर्श पर भारी बूटों की आवाज पैदा हुई और कुछ पल के बाद एक लम्बे कद का नौजवान, जिसने सुर्ख और खाकी पगड़ी बांध रखी थी, दरवाजे में दिखाई दिया ।
वह दोनों एड़ियां जोड़कर खड़ा हो गया, जिसका अर्थ था कि वह अन्दर आने की अनुमति मांग रहा था ।
मेजर बलवन्त ने उसके विशेष अभिवादन का उत्तर उसीके विशेष अंदाज़ में दिया और सिर के इशारे से अन्दर आने का इशारा किया । वह नौजवान मेजर की मेज़ तक आया। उसने सोनिया को देखकर उसका अभिवादन किया। मेजर यह देखकर बहुत प्रसन्न हुआ कि वह एक शिष्ट नौजवान था। नौजवान ने अपने कंधे पर लटके हुए थैले में से एक लम्बा लिफाफा निकालकर मेज पर रख दिया। उस लिफाफे पर सील-मुहर लगी हुई थी ।
मेजर बलवन्त ने उस लिफाफे पर नजर डाली। उस पर उभरे हुए काले अक्षरों में लिखा था- 'देश-सेवा के लिए' । एक कोने में लाल रोशनाई से तीन शब्द लिखे हुए थे- 'गुप्त तथा गोपनीय' । 
लिफाफे की बाईं ओर एक छपा हुआ पता था :
'देश सेवक मंडल, बम्बई शाखा
शिवाजी पार्क, बम्बई'

नमस्ते पाठक मित्रो,
कर्नल रंजीत के उपन्यास 'पीले बिच्छू' की समीक्षा में आपका हार्दिक स्वागत है। 

Friday, 9 January 2026

702. विज्ञान के व्यापारी - वेदप्रकाश काम्बोज

कौन ले जायेगा भारतीय वैज्ञानिक को ?
विज्ञान के व्यापारी - वेदप्रकाश काम्बोज
#विजय सीरीज

वेदप्रकाश काम्बोज जी जासूसी उपन्यास साहित्य में एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनकी जासूसी रचनाएं मनोरंजन और एक्शन से भरपूर होती हैं।
  प्रस्तुत उपन्यास 'विज्ञान के व्यापारी' एक वैज्ञानिक के अपहरण की रोचक कहानी है, जिसमें भारतीय जासूस विजय का किरदार उसे मनोरंजक भी बनाता है।

विजय ने बड़े आराम से पलंग पर पसरते हुए कहा- 'तो मियां झानझरोखे, जिक्र है उस काली रात का जब आकाश में चांद चमक रहा था किन्तु रोशनी नहीं दे रहा था। जब ठण्डी हवायें आग बरसा रही थीं और सुनसान सन्नाटा बड़ी भयंकरता के साथ चारों ओर फैला हुआ था। तो मियां झानझरोखे उस काली और भयावली रात में जान हथेली पर सिर गुड की भेली पर लिये हुए कुछ जासूस एक खतरनाक अपराधी को पकड़ने के लिये जा रहे थे। तुम्हें याद नहीं होगा लेकिन मैं याद दिलाता हूं उन जासूसों में तुम भी थे, मैं भी था, अपना वो तुलाराशि सुपर रघुनाथ भी था अमरीकी जासूस वह साईकिल चेन भी था और रूसी जासूस बागारोफ भी था ।

Wednesday, 31 December 2025

700. रानी साहिबा- राम पुजारी

प्रेम के विभिन्न रंगों का गुलदस्ता
रानी साहिबा- राम पुजारी

उपन्यास लेखक के बाद राम पुजारी जी ने कहानी लेखन में हाथ आज आजमाया है और इसमें वह सफल होते भी नजर आ रहे हैं। एक उपन्यास लेखक के लिए अपनी बात को कम शब्दों में कहना कुछ मुश्किल अवश्य होता होगा लेकिन एक सफल लेखक वही है जो कथ्य को उसी अनुरूप आकार दे जैसी कथा की मांग है।
रानी साहिबा कथा संग्रह राम पुजारी जी की दस कहानियों को समेटे हुए है और सभी कहानियों की पृष्ठभूमि में प्यार की झलक स्पष्ट नजर आती है। सभी कहानियां लेखक के चरित्र की तरह है जिनमें बनावटीपन जरा भी नजर नहीं आता ।
     'रानी साहिबा' का प्रकाशन जनवरी 2024 में हुआ था और फरवरी में यह कथा संग्रह मेरे हाथ आया । इसकी पहली कहानी पढी जो अच्छी लगी । दूसरी कहानी पढने से पहले में अन्यत्र व्यस्त हो गया और कहानी पढने का समय न मिला जबकि राम पुजारी का निरंतर आग्रह था कि आप इसकी समीक्षा करें। पर कभी-कभी चाहकर भी समय नहीं निकल पाता और फिर 'रानी साहिबा' मेरी नजरों से यूं गायब हुये की ढूढे भी न मिले । इधर-उधर सब जगह तलाश किया पर....हाये री किस्मत...किसकी ?
फरवरी 2025 भी आया दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में राम पुजारी जी से मुलाकात भी हुयी, रानी साहिबा पर चर्चा भी चली और मेरा आश्वासन भी चला की शीघ्र ही रानी साहिबा को पढा जायेगा।

Monday, 29 December 2025

699. उसने खून कर दिया- एच. इकबाल

 बंद कमरे में खून

उसने खून कर दिया- एच. इकबाल

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य का एक समय वह था जब उपन्यास मासिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे ।‌ इनमें लगभग 120 पृष्ठ के उपन्यास होते थे और कहानी अधिकांश में मर्डर मिस्ट्री थी।
  एच. इकबाल अपने समय के प्रसिद्ध उर्दू उपन्यासकार रहे हैं और इनके उपन्यास हिंदी में अनुदित होते रहे हैं। प्रस्तुत उपन्यास एच. इकबाल साहब का मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है।
कहानी है एक ऐसे व्यक्ति की जिसे एक हीरे के मार दिया जाता है और पुलिस का मानना है यह आत्महत्या है जबकि जासूसी कर्नल विनोद ने कहा- उसने खून कर दिया ।
अब यह खून किसने किया, यह हमें उपन्यास पढकर ही पता चलेगा।


            सड़क पर फर्राटे भरती लिंकन, ट्रैफिक के बीच से किसी नागिन की तरह लहराती चली जा रही थी। आज ट्रैफिक भी कुछ ज्यादा था । कर्नल विनोद की बार-बार घड़ी पर उठती नजर बता रही थी कि वह बड़ी जल्दी में है और शायद इसी कारण लिंकन इतनी गति से दौड़ रही है।
पन्द्रह मिनट बाद लिंकन एक कोठी के शानदार फाटक में प्रविष्ट हुई और पोर्टिको में जाकर रुक गई ।

Sunday, 28 December 2025

698. सफेदपोश गुण्डा- अंजुम अर्शी

मास्टर ब्रेन का कारनामा
सफेदपोश गुण्डा- अंजुम अर्शी

वह मर मर गया था और उसकी अंतिम इच्छा थी इसके हड्डियों के ढांचे को उस द्वारा बनाई गयी संस्था की मीटिंग में  प्रधान की कुर्सी पर रखा जाये और वही उस मिटिंग का प्रधान होगा।
      प्रधान की पुत्री ने अपने पिता के हड्डियों के ढांचे को अखबार पढते देखा था और 'मास्टर ब्रेन' तो उस वक्त बौखला उठा जब उसने हड्डियों के ढांचे को प्रयोगशाला में कार्य करते देखा।

   लोकप्रिय कथा साहित्य में जासूसी और थ्रिलर उपन्यासों की शृंखला में एक से बढकर एक हैरत जनक उपन्यासों की कतार में आज पढें अंजुम अर्शी जी के उपन्यास 'सफेदपोश  गुण्डा' की समीक्षा ।

वह इन्सानी हड्डियों का भयानक ढाँचा ही था जिसके शरीर पर पुरानी किस्म का लिबास था और सिर पर फैल्ट कैप पहना दी गई थी। उसके दोनों हाथ मेज पर फैले हुए थे और हड्डियों की उंगलियाँ बहुत भयानक और खौफनाक लग रही थीं ।

Monday, 22 December 2025

697. The Adventures of Tom Sawyer- Mark Twain

शरारती टाॅम के साहसी कारनामें
The Adventures of Tom Sawyer- Mark Twain

  आज प्रस्तुत है एक प्रसिद्ध बाल उपन्यास की समीक्षा । एक शरारती और बहादुर बच्चे की रोमांच से भरपूर कहानी । 

"टॉम !"
कोई उत्तर नहीं ।
"ओ टॉम ! आखिय हो क्या गया है इस लड़के को ? ओ टॉम !"
बूढ़ी पाली मौसी ने अपना चश्मा नाक पर नीचे गिराकर, उसके ऊपर से कमरे में चारों ओर नजर दौड़ाई । फिय उन्होंने चश्मे को माथे पर चढ़ाकर चारों ओर देखा । चश्मे के अन्दर से शायद ही कभी उन्होंने देखने की कोशिश की हो। और सच तो यह है कि वह चश्मा आंख की कमजोरी के कारण नहीं, फैशन के लिए लिया गया था। वे थोड़ी देश तक उलझन में पड़ी खड़ी रहीं, फिर ककंश स्वर में तो नहीं, किन्तु स्वर को इतना तेज बनाकर जरूर बोलीं कि कम से कम कमरे में रखे फर्नीचर उनकी बात सुन सकें, "आज अगर मैं तुझे पकड़ पाऊं तो मैं..."
किन्तु वे अपनी बात पूरी नहीं कर सकीं, क्योंकि उन्होंने झुककर बिस्तर के नीचे झाड़ पीटना शुरू कर दिया था। किन्तु झाड़ पीटकर वे बिस्तर के नीचे से एक बिल्ली के अतिरिक्त और कुछ नहीं निकाल सकीं ।
"ओफ्, ऐसा लड़का तो मैंने कहीं देखा ही नहीं !" दरवाजे पर जाकर उन्होंने बाग में फैले टमाटर के पौधों और 'जिम्पसन' के वृक्षों के बीच भी देखा मगर कहीं भी टॉम का पता न था। सो अब स्वर को काफी ऊंचा करके चिल्लाई, "ओ टॉम !"

Sunday, 21 December 2025

696. पिंजरा- कुमार कश्यप

चल उड़ जा रे पंछी...
 पिंजरा- कुमार कश्यप

एक युवा लड़की जो एक पिंजरे में कैद थी । सिर्फ कैद ही नहीं उस पर अमानवीय अत्याचार भी होते थे और अत्याचारी था उसका परिवार । भाई की हरकतें सुन कर तो मानवता भी शरमा जाये।
एक दिन एक अजनबी ने पिंजरे में बंद पक्षी को हिम्मत दी और कहा - चल उड़ जा रे पंछी...

  आज हम यहां चर्चा कर रहे हैं कुमार कश्यप जी के एक सामाजिक उपन्यास 'पिंजरा' की ।

बादलों से घिरी अंधेरी शाम । ठंड और उस पर गरजते हुये बादल । जैसे कोढ़ में खाज । रात होने से पहले ही घटा-टोप अंधकार छा गया था, पूरे आसार थे कि पानी अब बरसा तब बरसा । सड़कों पर एकदम सन्नाटा था। ठिठुरती ठण्ड की वर्षा से कौन नहीं डरता । बार-बार बिजली चमक उठती थी उसकी कार तेज गति से ढलान से उतर कर सामने दिखाई देते नगर में प्रवेश करने को उतावली होती जा रही थी । कार की खिड़कियों के शीशे चढ़े हुये थे तथा कार की पिछली सीट पर एक गम्भीर व्यक्तित्व की गोर्ण स्त्री बैठी थी। उम्र यही चालीस की रही होगी। आंखों पर सुनहरी फ्रेम का चश्मा, जिनसे झांकती हुई पत्थर सी कठोर आंखें । गम्भीर और चुप।

Saturday, 20 December 2025

695. बाल भारती- दिसंबर - 2025

एक बाल पत्रिका
बाल भारती- दिसंबर 2025

GSSS-6LC बाल भारती के बाल पाठक

 

Thursday, 4 December 2025

691. अधूरी प्यास- दत्त भारती

एक व्यक्ति की जीवनगाथा-
अधूरी प्यास- दत्त भारती
मनुष्य जीवन भी बहुत विचित्र है । इस विचित्र जीवन में न जाने कौन कौन से रंग भरे हुये हैं । न जाने कौनसा रंग सुख देगा और कौनसा दुख । सुख- दुख का संगम ही जीवन है । ऐसे ही संगम के साथ जीवन बीता था हमारे कथानायक जनक का । जिनसे जीवन में सभी रंग थे, पर कब कौनसा प्रभावशाली होगा यह कोई नहीं जानता था । न लेखक, न पाठक और न कथानायक ।


    उपन्यास के प्रथम पृष्ठ से आरम्भ करते हैं इस उपन्यास की समीक्षा ।
फलों की दुकान और मछली की दुकान साथ-साथ थीं । मुझे बालकोनी में खड़े एक घण्टे से अधिक हो गया था। दोनों ग्राहकों के इन्तज़ार में बैठे थे और ग्राहक नज़र न आ रहा था ।

ग्राहक आता भी कहां से ? अभी सिर्फ सवा आठ बजे थे । शाम अभी भीगी भी नहीं थी। अभी तो चिराग़ जले थे और मयखाने आबाद होने शुरू हुए थे। इसी लिए वह सिर्फ दुकान सजा कर ही बैठ सके थे। फल बेचने वाला और मछली बेचने वाला दोनों ही भारी भरकम थे और उन्होंने तोंद छोड़ रखी थी ।
मैंने तो सुना था कि तोंद सिर्फ बनिए ही छोड़ते हैं। लेकिन यह फल बेचने वाला और मछली बेचने वाला किस तरह के पूंजीपति थे जिन्होंने तोंद छोड़ दी थी।
दोनों दुकानें पटड़ी पर थीं। यानी बात यह थी कि कमेटी और पुलिस से मिलकर 'दुकानें' जमाए बैठे थे । बाज़ारे हुस्न की तवायफों की तरह सजधज कर दुकान सजाकर बैठे थे ।