Sunday, 3 May 2026

भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज

कबाड़ी, मदारी,तातारी का एक और कारनामा
भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज

लोकप्रिय कथाकार श्री वेदप्रकाश काम्बोज जी ने जासूसी साहित्य में जासूसी उपन्यासों में हास्य जासूसी उपन्यासों का भी सृजन किया है। हम इस से पूर्व 'मौत की आवाज' नामक उपन्यास की चर्चा कर चुके हैं और अब प्रस्तुत है इन्हीं की कलम से निकला एक और हास्य जासूसी उपन्यास 'भेदभरी हत्या' ।
यह उपन्यास वेदप्रकाश काम्बोज जी के तीन पात्र कुंदन कबाड़ी, गोकुल मदारी और फन्ने खां तातारी सीरीज का एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है। 

भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज

विज्ञापनबाजी करने के बावजूद जब के० एफ० जी० प्राइवेट डिटेक्टिव कम्पनी के अन्दर कोई भी केस नहीं आया तो उस कम्पनी के तीनों मालिकनुमा चपरासियों को कारण पर विचार करने के लिए विवश होना पड़ा।
बनाई जैसी कि अन्तिम दृश्य में सोचने के समय कुन्दन कबाड़ी ने ऐसी ही मुद्रा देवदास की भूमिका में दिलीप कुमार ने फिल्म के पारो के घर के सामने बनाई थी। इसके पश्चात मस्तिष्क की खुली सड़क पर विचारों का ताँगा कारण की तलाश में बिना कोचवान के खुला छोड़ दिया गया ।
रैड एण्ड ह्वाईट के दो पैकेट और कोकाकोला की चार बोतलें, एक गिलास और बन्द कमरा । सोचने के लिए यह चीजें चुनीं गोकुल मदारी ने । बाँए हाथ की पहली दो उंगलियों के बीच में सिगरेट दबी हुई थी और उसी हाथ पर चेहरा इस प्रकार टिका हुआ था कि उंगलियों में दबी हुई सिगरेट का एक सिरा उसके माथे के कोने से टकरा रहा था । बाँए हाथ में दबा हुआ था गिलास जिसमें कोका-कोला डालकर उसको रम की तरह पिया जा रहा था। गोकुल मदारी का ख्याल था कि इस ढंग से सोचने पर अक्ल की बात जल्दी ही सूझ जाती है।
         सोचने का सर्वाधिक विचित्र तरीका था फन्नेखाँ तातारी का । कारण तलाश करने के लिए उस शेर ने रात में जागना और दिन में सोना आरम्भ कर दिया था। रात जब अपना तारों भरा आंचल फैलाती और फन्नेखाँ तांतारी पलंग पर से उठकर छत पर जा बैठता और तारे गिनना आरम्भ कर देता और फिर जब सुबह के समय रात का तारों भरा आँचल सिमटता तो फन्नेखाँ तातारी छत से उठकर पलंग पर पहुंच जाता। गनीमत यही हुई कि किसी ने भी तातारी को विरही प्रेमी समझने की सुनहरी भूल नहीं की ।
(प्रथम पृष्ठ, भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज)
    हमने पूर्व उपन्यास 'मौत की आवाज' में पढा था कि कबाड़ी, मदारी और तातारी अपनी 'के० एफ० जी० प्राइवेट डिटेक्टिव कम्पनी' के उद्घाटन के लिए जासूस विजय को आमंत्रित करने जाते हैं और विजय उनके सामने अफ्रीका के जंगलों से काले शेर का शिकार कर लाने का प्रस्ताव रखता है। -मैं चाहता हूं कि मेरे तीनों चेले तीन काले शेरों का शिकार करें और उनकी खाल लाकर दें।'
      अब वही तीनों चेले अपनी 'के० एफ० जी० प्राइवेट डिटेक्टिव कम्पनी' सूंदरनगर में खोल कर बैठे हैं पर उनके पास कोई केस नहीं आता । 
उन्हें अब कारण मालूम हुआ कि उनकी डिटेक्टिव कंपनी जिस कारण से इतने भारी विज्ञापन के बाद भी नहीं चली। कारण मामूली किन्तु उनके दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण था। कारण के जानने पर उन्हें यह मानने पर विवश होना पड़ा कि इसीलिए उनकी प्राइवेट कंपनी में कोई केस नहीं आया ।
आखिर केस आता कहाँ से ? उन्होंने जासूसी उपन्यास के प्राइवेट जासूस की भाँति कोई लेडी सैक्रेटरी नहीं रखी हुई थी जो वि पत्नी के अतिरिक्त प्रत्येक कर्त्तव्य का पालन बड़ी तत्परता के साथ करती है।
      उन्होंने बड़ी गम्भीरता के साथ मनन किया और माना वास्तव में जिस डिटेक्टिव कंपनी के पास एक लेडी सैक्रेटरी भी हो वह क्या खाक चलेगी ।
फिर विचार विमर्श के बाद वह एक लड़की को सही सैक्रेटरी रखते हैं जिसका नाम है रजनी । और रजनी कम से कम इन तीनों जासूसों से ज्यादा बुद्धिमान तो है।
'जी मेरा नाम रजनी है और पिताजी का नाम श्री जानकी दास और माताजी का नाम श्रीमती दयावती है। मेरे कोई भाई नहीं है।'
   और संयोग देखे की सेक्रेटरी रखने के बाद एक केस उनके पास आ ही गया।
कापी खोलकर मेज पर रखी और पेंसिल हाथ में पकड़कर उस से पूछा- 'आपका नाम ?'
'केदारनाथ ।'
'पता ?'
'रानी बिला, करोलबाग, देहली
यह लिखने के पश्चात रजनी ने पूछा- 'आपकी पत्नी देहली में खोई थीं या यहां सुन्दरनगर में?' 
'यहीं सुन्दरनगर में ।'

हां, यह तो रजनी थी जिसने इस केस को संभाल लिया वरना तीनों जासूसों ने तो हमदर्दी का अलग ही राग छेड़ दिया था। 
जब केदारनाथ उनके पास आता है तो और उनसे बातचीत करता है यह दृश्य देखें-
'मेरी पत्नी खो गई है।'
फन्नेखाँ तातारी ने केदार के स्वर में छिपे दर्द को अनुभव किया । और सहानुभूति जताते हुए कहा- 'हाय, हाय, हाय कितना बुरा हुआ है ? क्या खुदा की मार पड़ी है? बीवी खो गई, ओए... होए।'
शोक प्रकट करने में वे दोनों भी पीछे नहीं रहे, बोले 'ओ... हो पत्नी खो गई ? भगवान यह दिन किसी को न दिखाए कि उसकी पत्नी खो जाए।'
अभी तक रजनी अपने स्थान पर ही बैठी हुई थी। उसने जब उनकी यह बेतुकी बातें सुनी तो सिर को इस ढंग से हिलाया जैसे मन ही मन कह रही हो कि इन लोगों को अक्ल नहीं आएगी ।

     और रजनी के निर्देशानुसार ही तीनों जासूस केदारनाथ की पत्नी को खोजने का काम करते हैं। तीनों जासूस महोदय का अपना कोई विशेष दृष्टिकोण नहीं है वह तो सैक्रेटरी रजनी के आदेश की पालना में एक स्थान से दूसरे स्थान तक, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पूछताछ अवश्य करते हैं और उस में भी मात खा जाते हैं।- तीनों में से जब भी कोई किसी काम पर भेजा जाता है तो उसकी वापसी लगभग पिटे हुए सिपाही की भाँति ही होती है । (पृष्ठ)
   वहीं एक घटनाक्रम में तो मिस्टर कबाड़ी अपनी प्रशंसा सुन कर ही बौरा जाते हैं और स्वयं को एक महान जासूस मानकर वह काम भी कर लेते हैं जो आज तक नहीं किया था।
कबाडी को बौखलाते देखकर चाँद बोला- 'दुनिया का प्रत्येक महान व्यक्ति पीता है और आप भी तो एक महान जासूस हैं जिसकी समता कोई नहीं कर सकता ।' (49)
  अब किस्सा मदारी का भी सुन लीजिए- 
- इससे पहले कि वह सम्भल सकता मदारी पूरी तेजी के साथ वहां से भाग लिया । वेटर भी उसके पीछे भागा । किन्तु मदारी और किसी चीज में उस्ताद था या नहीं, यह एक विवादास्पद विषय है किन्तु यह सच है कि वह दौड़ने में उस्ताद था ।
 तो यह कहानी है तीन जासूसों की जिनके पास एक गायब स्त्री को खोजने केस आता है और फिर वह अपने कार्य को अंजाम देते हैं। उपन्यास गायब स्त्री से लेकर हत्या की कहानी तक में परिवर्तित हो जाता है। और इसी गायब स्त्री और हत्या के रहस्य को हल करते की जिम्मेदार केदरानाथ से मिल चुकी है तीन जासूस मित्रो को। आप जासूस मित्रो के कारनामे तो जानते ही हैं, जासूस इनके बस का काम नहीं है यह तो भली है इनकी सेक्रेटरी रजनी जिस के बल पर कार्य आगे बढता है।
   बात करें कहानी की तो कहानी चाहे सामान्य है पर रोचकता लिये हुये है। कहानी में ट्विस्ट है, एक्शन, रोमांच है और हास्य भी । कथा का कलेवर थोड़ा छोटा है लेकिन उतना ही कसावट लिये हुये है। 
उपन्यास में जो कमी है वही हास्य का आधार है और कमी है तीनों जासूसों की अपरिपक्वता । 
निष्कर्ष में हम कस सकते हैं वेदप्रकाश काम्बोज जी का उपन्यास 'भेदभरी हत्या' एक मर्डर मिस्ट्री और एक गायब स्त्री की मध्यम स्तर की कहानी है। कहानी में रोचकता और हास्य है। उपन्यास मनोरंजन की दृष्टि से पठनीय है, विशेषकर उन पाठकों के लिए अच्छा है जो कबाड़ी, मदारी और तातारी के उपन्यास पसंद करते हैं या हास्य कथा पढना चाहते हैं।

उपन्यास-  भेदभरी हत्या
लेखक-     वेदप्रकाश काम्बोज
पृष्ठ -         108
प्रकाशक-  कथाकार पॉकेट बुक्स, दिल्ली
आवरण पृष्ठ- शैले
संपादक-      श्रद्धानंद

मौत की आवाज- वेदप्रकाश काम्बोज

कबाड़ी, तातारी और मदारी का प्रथम उपन्यास
मौत की आवाज- वेदप्रकाश काम्बोज

विजय ने दरवाजा खोला ।
और गुरुदेव का उच्च नाद करते हुए तीन नमूनों ने उसके पैर पकड़ लिए। चकित सा विजय पहले तो उन तीनों के काले सिरों को देखता रहा जो उसके पैरों के निकट इस तरह एकत्रित हो गए थे जैसे तीन विभिन्न रेखाएं एक बिन्दु पर आकर मिल गई हों।
विजय ने आशीर्वाद की मुद्रा में अपने हाथ फैलाये और फिर गुरू ने गम्भीर मुद्रा में कहा- 'सदा खाओ गुड़ के सेव ।'

'धन्य हैं गुरुदेव आप धन्य हैं।' उन तीनों ने उसके पैर पकड़े हुए समवेत स्वर में कहा। किसी ने भी सिर उठाकर देखने की चेष्टा नहीं की।  

Sunday, 29 March 2026

714. चण्डी मंदिर का रहस्य- कर्नल रंजीत- 1990

एक देश की सत्ता पलटने की कहानी
चण्डी मंदिर का रहस्य- कर्नल रंजीत- 1990

एकान्त और रहस्यमय था चण्डी द्वीप। बहुत पुराना मंदिर था यहां। इसी में छिपे थे एटम का रहस्य चुराने वाले और वैज्ञानिकों के हत्यारे। ये विद्रोह कराने में सफल हो गए, पर एक दिन पकड़े गए। पढ़िए रोंगटे खड़े कर देने वाला धमाका।

चण्डीमंदिर का रहस्य - कर्नल रंजीत
एक बार फिर आपका स्वागत है #svnlibrary में जहां आप पढेंगे कर्नल रंजीत के एक विदेशी अभियान को। एक छोटे से देश में किस तरह मेजर बलवंत अपने साथियों के साथ देश को गुलाम बनाने वाले अपराधियों के खतरनाक षडयंत्र को खत्म करता है।
  समीक्षा से पूर्व हम उपन्यास के प्रथम पृष्ठ/ दृश्य को पढते हैं और फिर बात करेंगे उपन्यास के रोचक कथानक की ।

Thursday, 26 March 2026

713. खूनी बदला- कर्नल रंजीत -1980

एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास
खूनी बदला- कर्नल रंजीत- 1980

जवानी की दहलीज पर पैर रखते ही रुक्मिणी देवी ऐसी भयंकर भूल कर बैठती है, जो समाज की निगाह में पाप है। वे चाहती हैं कि उनका पाप छिपा रहे और बेटी पर उस पाप की छाया भी न पड़े। जवान होकर बेटी भी वही पाप कर बैठती है। जीवन का यह रहस्य जैसे-जैसे, जिस-जिस पर प्रकट होता जाता है, एक मोटी औरत वैसे ही उन लोगों की हत्या करती जाती है। पाप बदले का रूप धारण कर लेता है।
बदला लेने वाली औरत कौन है, इसके लिए पढ़िए, रहस्य-रोमांच के चितेरे कर्नल रंजीत का नया उपन्यास - खूनी बदला

    आप इन दिनों @svnlibrary पर लगातार पढ रहे हैं कर्नल रंजीत के उपन्यासों की समीक्षा । मित्र रतन चौधरी से प्राप्त कर्नल रंजीत के उपन्यासों को पढा जा रहा है और उन्हीं से प्राप्त उपन्यास 'खूनी बदला' की समीक्षाएं यहां प्रस्तुत है।
  कर्नल रंजीत के उपन्यास मर्डर मिस्ट्री और प्रतिशोध युक्त होते हैं। प्रस्तुत उपन्यास भी इसी आधार पर रचित एक मनोरंजक उपन्यास है।

Saturday, 21 March 2026

712. हत्यारे की पत्नी- कर्नल रंजीत -1974

समान नाम के लोगों की हत्या का रहस्य
हत्यारे की पत्नी- कर्नल रंजीत -1974

यह 29 साल का रहस्य क्या है ? 
प्रत्येक आदमी दो बार कैसे मर रहा है ? 
हत्या करने वाला किस महान शक्ति का दास है ? 
और मरने वाले को कैसे पता चल जाता है कि उसकी मौत का दिन आ पहुंचा है ?
अपराध-जगत् की सबसे सनसनीखेज और आश्चर्यजनक घटना, जिसमें हत्या तो होती है पर हत्यारा कोई नहीं। मेजर बलवन्त के चारों तरफ एक मायाजाल-सा बुन जाता है। उसे अपराधी का नहीं प्रकृति और भाग्य के गूढ़तम रहस्य का पता लगाना है। वह रहस्य क्या है ? और मेजर बलवन्त उसका कैसे पता लगाता है ?
कर्नल रंजीत ने इस नवीनतम उपन्यास में एकदम अछूते विषय को छुआ है। विषय हजारों साल से उलझा हुआ है और उसे मेजर बलवन्त जैसा तीक्ष्णबुद्धि जासूस ही सुलझा सकता था ।

Monday, 2 March 2026

711. ट्रेन एक्सीडेंट- कर्नल रंजीत

 कहानी नकली दवाइयों की 
ट्रेन एक्सीडेंट- कर्नल रंजीत- 1983

इन दिनों मैं कर्नल रंजीत के उपन्यास ही पढ रहा हूँ। संगरिया (हनुमानगढ़, राजस्थान) निवासी मित्र श्री रतन चौधरी जी से कर्नल रंजीत के 15 उपन्यास लेकर आया था वर अब उन्हीं को पढने का क्रम जारी है।
 और इस क्रम में मेरा यह छठा उपन्यास है। इस से पूर्व में 'पीले बिच्छू, प्रेतात्मा की डायरी, उलटी लाशें, नकली चेहरे और जापानी पंखा' पढ चुका हूँ। 
अद्भुत कथाओं के लेखक कर्नल रंजीत का एक और रोमांच से भरपूर उपन्यास 'ट्रेन एक्सीडेंट' पढा। यह उपन्यास उनकी विशिष्ट शैली में लिखा गया है। जिसनें रहस्यमयी पात्र और उलझाव से भरपूर कहानी का आनंद मिलेगा । 

हिन्दी जासूसरी उपन्यासों के क्षेत्र में रिकार्ड कायम करने वाले कर्नल रंजीत का एक जबर्दस्त सनसनी खेज उपन्यास - ट्रेन एक्सीडेंट
इस उपन्यास में आप पढ़ेंगे -
- अपनी खुशबू से बेहोशी की नींद सुलाने वाली सुन्दरी के अद्भुत कारनामे
- गेरूए वस्त्र धारण किये साधु- बालकों का हत्याकांड
- कृष्ण की मूर्ति द्वारा जबर्दस्त बम विस्फोट
- मेजर बलवंत के घर में जबर्दस्त अग्निकांड
- वैज्ञानिकों की जीभ का काटा जाना और उनके कानों के पर्दों का फाड़ दिया जाना 
हैरानी से भरे हथकंडों की सस्पेंस भरी रोमांचक कहानी -ट्रेन एक्सीडेंट 

Friday, 20 February 2026

710. नकली चेहरे - कर्नल रंजीत

175 साल पुरानी प्रतिशोध कथा
नकली चेहरे - कर्नल रंजीत- 1974

मनुष्य जीवन बहुत ही अनोखा है। उसका जीवन किस पद्धति से संचालित होता है यह कहना कभी-कभी बहुत मुश्किल हो जाता है । मनुष्य कभी तो अपना सर्वस्व अपर्ण तक कर देता है और कभी कभी अपने प्रतिशोध में इतना डूब जाता है कि वह सदियों तक प्रतिशोध की अग्नि में जलता रहता है। 

कर्नल रंजीत के उपन्यासों में प्रतिशोध जैसे विषय पर बहुत कुछ लिखा गया है। इ‌नके पात्र वर्षों- सदियों बाद तक प्रतिशोध की अग्नि में जलते रहते हैं और अवसर मिलते ही अपना प्रतिशोध पूरा करते नजर आते हैं। प्रस्तुत उपन्यास भी कुछ ऐसा है जहां एक व्यक्ति लगभग 175 वर्ष पश्चात अपना प्रतिशोध लेता है।
क्या यह संभव था ? 
अगर संभव था तो कैसे ? 
इसी संभव को जानने का प्रयास है कर्नल रंजीत का उपन्यास 'नकली चेहरे' जो सन् 1974 में प्रकाशित हुआ था । यह मूलतः एक मर्डर मिस्ट्री कहानी है।

Saturday, 14 February 2026

709. उलटी लाशें- कर्नल रंजीत- 1984

प्रतिशोध कथा
उलटी लाशें- कर्नल रंजीत- 1984

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में कर्नल रंजीत अद्भुत रहस्यमयी कथाओं के लेखक के रूप में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखते हैं। इनकी कहानी और पात्र दोनों ही गहरे होते हैं। अत्यंत उलझाव और ज्यादा पात्रों को एकत्र करना और फिर उन्हीं के मध्य रोचक संघर्ष दिखाने में कर्नल रंजीत अपना एक अलग कौशल रखते हैं। इनकी अधिकांश कहानियों में प्रतिशोध मुख्य बिंदु उभरकर सामने आता है । 
प्रस्तुत उपन्यास 'उलटी लाशें' भी एक प्रतिशोध से संबंधित के मर्डर मिस्ट्री रचना है। जहां हत्यारा कत्ल करने के पश्चात लाश को उलटा लटका देता है। 
वह ऐसा क्यों करता है ? 
National Highway-911

जहरीला धुआं
रात का अन्तिम पहर बीत रहा था।
अभी सूर्योदय होने में लगभग एक घंटा था। सारा बंगला खामोशी की चादर में लिपटा शान्त सोया पड़ा था। अचानक टेलीफोन की घंटी की आवाज बंगले में छाये सन्नाटे चीरकर गूंज उठी ।
सोनिया की नींद उचट गई। उसने लेटे-लेटे ही टेलीफोन पर एक नजर डाली। टेलीफोन की घंटी निरन्तर बजे चली जा रही थी।
उसने उटकर एक लम्बी अंगड़ाई ली और फिर हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठा लिया।

708.प्रेतात्मा की डायरी - कर्नल रंजीत

अलौकिक शक्तियां और मर्डर मिस्ट्री
प्रेतात्मा की डायरी - कर्नल रंजीत

मनुष्य के जीवन में बहुत कुछ ऐसा घटित होता है जो उसकी कल्पनाओं से बाहर का होता है। भारत प्रसिद्ध जासूस मेजर बलवंत के जीवन में भी एक ऐसा केस आया था जिसकी कल्पना मेजर बलवंत ने कभी नहीं की थी। वैसे तो मेजर भूत-प्रेत पर यकीन नहीं करता लेकिन 'प्रेतात्मा की डायरी' में उसे कुछ अलग कल ताकतों का आभास होता है। मेरे विचार से कर्नल रंजीत का यह एकमात्र उपन्यास ही ऐसा होना चाहिए जिसमें अलौकिक शक्ति का वर्णन है अन्यथा कर्नल रंजीत भूत-प्रेत जैसी बातों का खण्डन करते नजर आते हैं।
  
रहस्यपूर्ण हत्याएं
सुबह से ही आकाश पर बादल छाए हुए थे। और शाम होते-होते मटियाले और भूरे बादलों ने काली घटाओं का रूप ले लिया था। शाम के सूरज के डूबते ही हवा में तेजी आ गई थी जिसके कारण हिमाचल प्रदेश के उस पर्वतीय भाग में सदियों के बीत जाने पर भी सर्दी बढ़ गई थी।
ऐसा लग रहा था जैसे सर्दी का मौसम फिर लौटकर आ गया हो।
रामनगर शहर से लगभग पांच मील दूर छोटा-सा गांव राजनगर रात की बांहों में लिपटा शान्त सोया पड़ा था। अचानक सर्दी बढ़ जाने के कारण लोग शाम से ही अपने-अपने घर में जा घुसे थे। जो धन सम्पन्न थे वे गर्म बिस्तरों में पड़े सर्दी मिटाने की कोशिश कर रहे थे। और जो निर्धन थे वे अलाव के पास बैठे सर्दी भगाने का असफल प्रयास कर रहे थे ।
हवा के तेज झोंकों से जब कमरा बर्फ की तरह ठंडा हो गया तो राजेश ने हाथ बढ़ाकर खिड़की बन्द कर दी और पर्दा गिरा दिया।
(प्रेतात्मा की डायरी- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)

Saturday, 7 February 2026

707. पीले बिच्छू- कर्नल रंजीत

मेजर बलवंत बांग्लादेश में
पीले बिच्छू- कर्नल रंजीत

राजस्थान के हनुमानगढ जिले के उपखंड संगरिया के मित्र हैं श्री रतन लाल चौधरी । दिसम्बर 2025 में रतन भाई के यहाँ जाना हुआ और उनसे मैं 15 उपन्यास कर्नल रंजीत के लेकर आया । फरवरी 2026 से उन्हीं उपन्यासों को पढा जा रहा है। और समयानुसार उनकी समीक्षा यहाँ प्रस्तुत की जा रही है। 
इन 15 उपन्यासों में से एक उपन्यास है पीले बिच्छू ।
हम समीक्षा की शुरुआत उपन्यास के प्रथम पृष्ठ के दृश्य से करते हैं।

आदेश भी, निवेदन भी
मेजर बलवन्त एक खूबसूरत और खुशबूदार फूल सोनिया के बालों में लगा रहा था। तभी उसने बंगले के अहाते में एक मोटर साइकल की आवाज सुनी । मेजर बलवन्त ने वह फूल जल्दी से सोनिया के बालों में लगा दिया और एक ओर हट गया। मोटर साइकल बरामदे में आकर रुक गई। आफिस के सदर दरवाजे के बाहर फर्श पर भारी बूटों की आवाज पैदा हुई और कुछ पल के बाद एक लम्बे कद का नौजवान, जिसने सुर्ख और खाकी पगड़ी बांध रखी थी, दरवाजे में दिखाई दिया ।
वह दोनों एड़ियां जोड़कर खड़ा हो गया, जिसका अर्थ था कि वह अन्दर आने की अनुमति मांग रहा था ।
मेजर बलवन्त ने उसके विशेष अभिवादन का उत्तर उसीके विशेष अंदाज़ में दिया और सिर के इशारे से अन्दर आने का इशारा किया । वह नौजवान मेजर की मेज़ तक आया। उसने सोनिया को देखकर उसका अभिवादन किया। मेजर यह देखकर बहुत प्रसन्न हुआ कि वह एक शिष्ट नौजवान था। नौजवान ने अपने कंधे पर लटके हुए थैले में से एक लम्बा लिफाफा निकालकर मेज पर रख दिया। उस लिफाफे पर सील-मुहर लगी हुई थी ।
मेजर बलवन्त ने उस लिफाफे पर नजर डाली। उस पर उभरे हुए काले अक्षरों में लिखा था- 'देश-सेवा के लिए' । एक कोने में लाल रोशनाई से तीन शब्द लिखे हुए थे- 'गुप्त तथा गोपनीय' । 
लिफाफे की बाईं ओर एक छपा हुआ पता था :
'देश सेवक मंडल, बम्बई शाखा
शिवाजी पार्क, बम्बई'

नमस्ते पाठक मित्रो,
कर्नल रंजीत के उपन्यास 'पीले बिच्छू' की समीक्षा में आपका हार्दिक स्वागत है। 

Friday, 6 February 2026

706. दुल्हन की चीख- कर्नल रंजीत - 1973

 प्रतिशोध की कथा
दुल्हन की चीख- कर्नल रंजीत 1973

विचित्र प्रतिशोध का रहस्योद्घाटन करने वाला एक सशक्त जासूसी उपन्यास...
मेजर बलवन्त सुबह सवेरे फोन पर किसीसे बात कर रहा था। थोड़ी देर पहले टेलीफोन की घंटी बजी थी। मेजर बाथरूम में था। वह तौलिया लपेटकर शयनकक्ष में फोन सुनने आया था । दूसरी ओर से उसने जो आवाज सुनी, वह बड़ी विचित्र थी। कोई अपने होंठों पर टिशू पेपर अर्थात् बारीक कागज लगाकर उससे बात कर रहा था ताकि उसकी आवाज पहचानी न जा सके। मेजर ने इस बात का अनुमान दूसरी ओर से बोलने वाले की पहली बात से ही लगा लिया था। मेजर के कान में जो आवाज पड़ रही थी उसमें थरथरी थी, लेकिन शब्द स्पष्ट थे ।
"मेजर साहब, आप बहुत बड़े जासूस माने जाते हैं। हम आपको एक चैलेंज दे रहे हैं।" थरथराती हुई आवाज आई, "आज शाम को शहर का कोई न कोई बैंक लूट लिया जाएगा - ठीक उस समय जब लोग बैंक में आ-जा रहे होंगे। आप तो जानते ही हैं कि बम्बई के कुछ बैंक शाम के चार बजे से शाम के सात बजे तक पुनः अपना कारोबार करने लगते हैं। आपमें हिम्मत हो तो आज शाम को यह डाका रोककर दिखाइए !"
"क्या मैं पूछ सकता हूं कि मुझे यह चैलेंज क्यों दिया जा रहा है ? बैंक पर डाके की सूचना पुलिस को देनी चाहिए थी, मुझे नहीं। मैं ऐसे चैलेंज स्वीकार नहीं करता। अभी कोई घटना हुई नहीं । किसी ने मुझे उस घटना की खोजबीन करने के लिए कुछ कहा नहीं
।(दुल्हन‌ की चीख- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)
नमस्ते पाठक मित्रो,
    एक बार हम फिर उपस्थिति हैं कर्नल रंजीत के रोचक उपन्यासों की एक शृंखला के साथ और इस शृंखला में हमारे पास हैं कर्नल रंजीत के 15 उपन्यास । हम गत वर्ष 2025 में कर्नल रंजीत के लगभग 20 उपन्यासों की समीक्षा प्रस्तुत की थी और इस बार 2026 में हम फरवरी माह से एक बार फिर उसी शृंखला को आरम्भ कर रहे हैं। इस में हमारे पास हनुमानगढ़ के संगरिया तहसील के निवासी रतन चौधरी साहब से हमें पन्द्रह उपन्यास प्राप्त हुये हैं। इन पन्द्रह की समीक्षा आपको लगातार प्राप्त होती रहेगी। कोशिश रहेगी एक माह में पांच उपन्यासों की समीक्षा की और इसके अतिरिक्त मेरे पास जो कर्नल रंजीत के शेष उपलब्ध उपन्यास हैं उनकी समीक्षा का प्रयास रहेगा। 
भाई रतन चौधरी से प्राप्त उपन्यास हैं - दुल्हन की चीख, पीले बिच्छू, प्रेतात्मा की डायरी, उलटी लाशे, नकली चेहरे, ट्रेन एक्सीडेंट, हत्यारे की पत्नी, खूनी बदला,चण्डी मंदिर का रहस्य, उलटी खोपड़ी, जापानी पंखा, कातिल मेरा नाम, मौत की परछाई, मेजर बलवंत बंगलादेश में, विजय दुर्ग का रहस्य, खूनी रिश्ते  इत्यादि ।
  चलो अब आरम्भ करते हैं उपन्यास 'दुल्हन की चीख' की समीक्षा । सर्वप्रथम तो हम बता दें यह एक प्रतिरोधात्मक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है।

Friday, 9 January 2026

702. विज्ञान के व्यापारी - वेदप्रकाश काम्बोज

कौन ले जायेगा भारतीय वैज्ञानिक को ?
विज्ञान के व्यापारी - वेदप्रकाश काम्बोज
#विजय सीरीज

वेदप्रकाश काम्बोज जी जासूसी उपन्यास साहित्य में एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनकी जासूसी रचनाएं मनोरंजन और एक्शन से भरपूर होती हैं।
  प्रस्तुत उपन्यास 'विज्ञान के व्यापारी' एक वैज्ञानिक के अपहरण की रोचक कहानी है, जिसमें भारतीय जासूस विजय का किरदार उसे मनोरंजक भी बनाता है।

विजय ने बड़े आराम से पलंग पर पसरते हुए कहा- 'तो मियां झानझरोखे, जिक्र है उस काली रात का जब आकाश में चांद चमक रहा था किन्तु रोशनी नहीं दे रहा था। जब ठण्डी हवायें आग बरसा रही थीं और सुनसान सन्नाटा बड़ी भयंकरता के साथ चारों ओर फैला हुआ था। तो मियां झानझरोखे उस काली और भयावली रात में जान हथेली पर सिर गुड की भेली पर लिये हुए कुछ जासूस एक खतरनाक अपराधी को पकड़ने के लिये जा रहे थे। तुम्हें याद नहीं होगा लेकिन मैं याद दिलाता हूं उन जासूसों में तुम भी थे, मैं भी था, अपना वो तुलाराशि सुपर रघुनाथ भी था अमरीकी जासूस वह साईकिल चेन भी था और रूसी जासूस बागारोफ भी था ।