Wednesday, 10 June 2026

अछूत - दया पवार

‘अछूत’ : दलित जीवन की पीड़ा, संघर्ष और आत्मसम्मान का दस्तावेज़
अछूत - दया पवार, दलित आत्मकथा

मराठी दलित साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर दया पवार की आत्मकथात्मक कृति ‘अछूत’ भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, गरीबी, अपमान और संघर्ष की ऐसी मार्मिक कथा है, जो केवल एक व्यक्ति की जीवन-गाथा नहीं रह जाती, बल्कि पूरे दलित समाज के सामूहिक अनुभव का दस्तावेज़ बन जाती है। यह रचना पाठक को भावुक ही नहीं करती, बल्कि उसे सामाजिक यथार्थ से सीधा सामना करने के लिए विवश भी करती है।

अछूत - दया पवार- दलित आत्मकथा

   ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की आत्मकथा 'जूठन' बहुत समय पहले पढी थी और उसके बाद दलित साहित्य में दया पवार जी की आत्मकथा 'अछूत' पढने का अकसर मिला है।
        जब कभी भी वह अकेला होता है, उससे अक्सर मेरी मुलाक़ात हो जाती है। जब से मैंने होश सँभाला है, तब से मैं उसे अच्छी तरह पहचानता हूँ। जितना अपनी परछाईं से परिचय हो, उतना परिचित है वह। पर कभी-कभी अँधेरा छा जाने पर या बदली छा जाने पर जैसे स्वयं की परछाई लुप्त हो जाती है, वैसे ही वह भी लुप्त हो जाता है। पिछले कई वर्षों से उसे भीड़ से बड़ा लगाव रहा है। हमेशा किसी के साथ या सभा-सम्मेलनों में दिखाई देता है।(प्रथम पृष्ठ से चंद पंक्तियां)
  

Saturday, 16 May 2026

खून‌ की कसम- वेदप्रकाश काम्बोज

चीनी षड्यंत्र और भारतीय जासूस 
खून की कसम - वेदप्रकाश काम्बोज

वेदप्रकाश काम्बोज उपन्यास साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं और उनका एक प्रसिद्ध पात्र है विजय । जासूस सम्राट विजय । विजय को आधार बनाकर काम्बोज जी ने विभिन्न प्रकार के उपन्यास लिखे हैं जिनमें मुख्य हैं अंतर्राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर आधारित उपन्यास । ऐसा ही कहानी है प्रस्तुत उपन्यास की जहां एक पात्र ने विजय को खून की कसम दी थी, क्या थी वह खून‌ की कसम।
  अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र पर आधारित एक रोचक उपन्यास है -खून की कसम
           भारतीय सीक्रेट सर्विस में एक बहुत बड़ा हेर फेर हो गया ।
चीनी खतरे को देखते हुए प्रतिरक्षा मंत्रालय से विजय के पास आदेश आए कि सीक्रेट सर्विस का कुछ विस्तार किया जाए ताकि चीनी कार्यवाहियों को और देश के दुश्मनों की कार्यवाहियों को समय पर रोक कर देश की रक्षा की जाए ।

Sunday, 3 May 2026

भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज

कबाड़ी, मदारी,तातारी का एक और कारनामा
भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज

लोकप्रिय कथाकार श्री वेदप्रकाश काम्बोज जी ने जासूसी साहित्य में जासूसी उपन्यासों में हास्य जासूसी उपन्यासों का भी सृजन किया है। हम इस से पूर्व 'मौत की आवाज' नामक उपन्यास की चर्चा कर चुके हैं और अब प्रस्तुत है इन्हीं की कलम से निकला एक और हास्य जासूसी उपन्यास 'भेदभरी हत्या' ।
यह उपन्यास वेदप्रकाश काम्बोज जी के तीन पात्र कुंदन कबाड़ी, गोकुल मदारी और फन्ने खां तातारी सीरीज का एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है। 

भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज

विज्ञापनबाजी करने के बावजूद जब के० एफ० जी० प्राइवेट डिटेक्टिव कम्पनी के अन्दर कोई भी केस नहीं आया तो उस कम्पनी के तीनों मालिकनुमा चपरासियों को कारण पर विचार करने के लिए विवश होना पड़ा।
बनाई जैसी कि अन्तिम दृश्य में सोचने के समय कुन्दन कबाड़ी ने ऐसी ही मुद्रा देवदास की भूमिका में दिलीप कुमार ने फिल्म के पारो के घर के सामने बनाई थी। इसके पश्चात मस्तिष्क की खुली सड़क पर विचारों का ताँगा कारण की तलाश में बिना कोचवान के खुला छोड़ दिया गया ।
रैड एण्ड ह्वाईट के दो पैकेट और कोकाकोला की चार बोतलें, एक गिलास और बन्द कमरा । सोचने के लिए यह चीजें चुनीं गोकुल मदारी ने । बाँए हाथ की पहली दो उंगलियों के बीच में सिगरेट दबी हुई थी और उसी हाथ पर चेहरा इस प्रकार टिका हुआ था कि उंगलियों में दबी हुई सिगरेट का एक सिरा उसके माथे के कोने से टकरा रहा था । बाँए हाथ में दबा हुआ था गिलास जिसमें कोका-कोला डालकर उसको रम की तरह पिया जा रहा था। गोकुल मदारी का ख्याल था कि इस ढंग से सोचने पर अक्ल की बात जल्दी ही सूझ जाती है।
         सोचने का सर्वाधिक विचित्र तरीका था फन्नेखाँ तातारी का । कारण तलाश करने के लिए उस शेर ने रात में जागना और दिन में सोना आरम्भ कर दिया था। रात जब अपना तारों भरा आंचल फैलाती और फन्नेखाँ तांतारी पलंग पर से उठकर छत पर जा बैठता और तारे गिनना आरम्भ कर देता और फिर जब सुबह के समय रात का तारों भरा आँचल सिमटता तो फन्नेखाँ तातारी छत से उठकर पलंग पर पहुंच जाता। गनीमत यही हुई कि किसी ने भी तातारी को विरही प्रेमी समझने की सुनहरी भूल नहीं की ।
(प्रथम पृष्ठ, भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज)
    हमने पूर्व उपन्यास 'मौत की आवाज' में पढा था कि कबाड़ी, मदारी और तातारी अपनी 'के० एफ० जी० प्राइवेट डिटेक्टिव कम्पनी' के उद्घाटन के लिए जासूस विजय को आमंत्रित करने जाते हैं और विजय उनके सामने अफ्रीका के जंगलों से काले शेर का शिकार कर लाने का प्रस्ताव रखता है। -मैं चाहता हूं कि मेरे तीनों चेले तीन काले शेरों का शिकार करें और उनकी खाल लाकर दें।'
      अब वही तीनों चेले अपनी 'के० एफ० जी० प्राइवेट डिटेक्टिव कम्पनी' सूंदरनगर में खोल कर बैठे हैं पर उनके पास कोई केस नहीं आता । 
उन्हें अब कारण मालूम हुआ कि उनकी डिटेक्टिव कंपनी जिस कारण से इतने भारी विज्ञापन के बाद भी नहीं चली। कारण मामूली किन्तु उनके दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण था। कारण के जानने पर उन्हें यह मानने पर विवश होना पड़ा कि इसीलिए उनकी प्राइवेट कंपनी में कोई केस नहीं आया ।
आखिर केस आता कहाँ से ? उन्होंने जासूसी उपन्यास के प्राइवेट जासूस की भाँति कोई लेडी सैक्रेटरी नहीं रखी हुई थी जो वि पत्नी के अतिरिक्त प्रत्येक कर्त्तव्य का पालन बड़ी तत्परता के साथ करती है।
      उन्होंने बड़ी गम्भीरता के साथ मनन किया और माना वास्तव में जिस डिटेक्टिव कंपनी के पास एक लेडी सैक्रेटरी भी हो वह क्या खाक चलेगी ।
फिर विचार विमर्श के बाद वह एक लड़की को सही सैक्रेटरी रखते हैं जिसका नाम है रजनी । और रजनी कम से कम इन तीनों जासूसों से ज्यादा बुद्धिमान तो है।
'जी मेरा नाम रजनी है और पिताजी का नाम श्री जानकी दास और माताजी का नाम श्रीमती दयावती है। मेरे कोई भाई नहीं है।'
   और संयोग देखे की सेक्रेटरी रखने के बाद एक केस उनके पास आ ही गया।
कापी खोलकर मेज पर रखी और पेंसिल हाथ में पकड़कर उस से पूछा- 'आपका नाम ?'
'केदारनाथ ।'
'पता ?'
'रानी बिला, करोलबाग, देहली
यह लिखने के पश्चात रजनी ने पूछा- 'आपकी पत्नी देहली में खोई थीं या यहां सुन्दरनगर में?' 
'यहीं सुन्दरनगर में ।'

हां, यह तो रजनी थी जिसने इस केस को संभाल लिया वरना तीनों जासूसों ने तो हमदर्दी का अलग ही राग छेड़ दिया था। 
जब केदारनाथ उनके पास आता है तो और उनसे बातचीत करता है यह दृश्य देखें-
'मेरी पत्नी खो गई है।'
फन्नेखाँ तातारी ने केदार के स्वर में छिपे दर्द को अनुभव किया । और सहानुभूति जताते हुए कहा- 'हाय, हाय, हाय कितना बुरा हुआ है ? क्या खुदा की मार पड़ी है? बीवी खो गई, ओए... होए।'
शोक प्रकट करने में वे दोनों भी पीछे नहीं रहे, बोले 'ओ... हो पत्नी खो गई ? भगवान यह दिन किसी को न दिखाए कि उसकी पत्नी खो जाए।'
अभी तक रजनी अपने स्थान पर ही बैठी हुई थी। उसने जब उनकी यह बेतुकी बातें सुनी तो सिर को इस ढंग से हिलाया जैसे मन ही मन कह रही हो कि इन लोगों को अक्ल नहीं आएगी ।

     और रजनी के निर्देशानुसार ही तीनों जासूस केदारनाथ की पत्नी को खोजने का काम करते हैं। तीनों जासूस महोदय का अपना कोई विशेष दृष्टिकोण नहीं है वह तो सैक्रेटरी रजनी के आदेश की पालना में एक स्थान से दूसरे स्थान तक, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पूछताछ अवश्य करते हैं और उस में भी मात खा जाते हैं।- तीनों में से जब भी कोई किसी काम पर भेजा जाता है तो उसकी वापसी लगभग पिटे हुए सिपाही की भाँति ही होती है । (पृष्ठ)
   वहीं एक घटनाक्रम में तो मिस्टर कबाड़ी अपनी प्रशंसा सुन कर ही बौरा जाते हैं और स्वयं को एक महान जासूस मानकर वह काम भी कर लेते हैं जो आज तक नहीं किया था।
कबाडी को बौखलाते देखकर चाँद बोला- 'दुनिया का प्रत्येक महान व्यक्ति पीता है और आप भी तो एक महान जासूस हैं जिसकी समता कोई नहीं कर सकता ।' (49)
  अब किस्सा मदारी का भी सुन लीजिए- 
- इससे पहले कि वह सम्भल सकता मदारी पूरी तेजी के साथ वहां से भाग लिया । वेटर भी उसके पीछे भागा । किन्तु मदारी और किसी चीज में उस्ताद था या नहीं, यह एक विवादास्पद विषय है किन्तु यह सच है कि वह दौड़ने में उस्ताद था ।
 तो यह कहानी है तीन जासूसों की जिनके पास एक गायब स्त्री को खोजने केस आता है और फिर वह अपने कार्य को अंजाम देते हैं। उपन्यास गायब स्त्री से लेकर हत्या की कहानी तक में परिवर्तित हो जाता है। और इसी गायब स्त्री और हत्या के रहस्य को हल करते की जिम्मेदार केदरानाथ से मिल चुकी है तीन जासूस मित्रो को। आप जासूस मित्रो के कारनामे तो जानते ही हैं, जासूस इनके बस का काम नहीं है यह तो भली है इनकी सेक्रेटरी रजनी जिस के बल पर कार्य आगे बढता है।
   बात करें कहानी की तो कहानी चाहे सामान्य है पर रोचकता लिये हुये है। कहानी में ट्विस्ट है, एक्शन, रोमांच है और हास्य भी । कथा का कलेवर थोड़ा छोटा है लेकिन उतना ही कसावट लिये हुये है। 
उपन्यास में जो कमी है वही हास्य का आधार है और कमी है तीनों जासूसों की अपरिपक्वता । 
निष्कर्ष में हम कस सकते हैं वेदप्रकाश काम्बोज जी का उपन्यास 'भेदभरी हत्या' एक मर्डर मिस्ट्री और एक गायब स्त्री की मध्यम स्तर की कहानी है। कहानी में रोचकता और हास्य है। उपन्यास मनोरंजन की दृष्टि से पठनीय है, विशेषकर उन पाठकों के लिए अच्छा है जो कबाड़ी, मदारी और तातारी के उपन्यास पसंद करते हैं या हास्य कथा पढना चाहते हैं।

उपन्यास-  भेदभरी हत्या
लेखक-     वेदप्रकाश काम्बोज
पृष्ठ -         108
प्रकाशक-  कथाकार पॉकेट बुक्स, दिल्ली
आवरण पृष्ठ- शैले
संपादक-      श्रद्धानंद

मौत की आवाज- वेदप्रकाश काम्बोज

कबाड़ी, तातारी और मदारी का प्रथम उपन्यास
मौत की आवाज- वेदप्रकाश काम्बोज

विजय ने दरवाजा खोला ।
और गुरुदेव का उच्च नाद करते हुए तीन नमूनों ने उसके पैर पकड़ लिए। चकित सा विजय पहले तो उन तीनों के काले सिरों को देखता रहा जो उसके पैरों के निकट इस तरह एकत्रित हो गए थे जैसे तीन विभिन्न रेखाएं एक बिन्दु पर आकर मिल गई हों।
विजय ने आशीर्वाद की मुद्रा में अपने हाथ फैलाये और फिर गुरू ने गम्भीर मुद्रा में कहा- 'सदा खाओ गुड़ के सेव ।'

'धन्य हैं गुरुदेव आप धन्य हैं।' उन तीनों ने उसके पैर पकड़े हुए समवेत स्वर में कहा। किसी ने भी सिर उठाकर देखने की चेष्टा नहीं की।  

Wednesday, 29 April 2026

मौत की परछाई - कर्नल रंजीत 1981

विदेशी षड्यंत्र और वैज्ञानिकों की हत्या
मौत की परछाई-  कर्नल रंजीत

कर्नल रंजीत के विचित्र संसार में आपका एक बार फिर स्वागत है। राजस्थान के संगरिया निवासी मित्र रतन चौधरी जी से प्राप्त कर्नल रंजीत के 15 उपन्यासों की समीक्षा के क्रम में यह 15 वां उपन्यास है‌ इस से पूर्व रतन चौधरी जी से प्राप्त चौदह उपनिवेश की समीक्षा पढे चुके हैं जिनके क्रमश: नाम हैं- ' दुल्हन की चीख, पीले बिच्छू, प्रेतात्मा की डायरी, उलटी लाशें, नकली चेहरे, ट्रेन एक्सीडेंट, हत्यारे की पत्नी, खूनी बदला, चण्डीमंदिर का रहस्य, जापानी पंखा, मेजर बलवंत बांगलादेश में, विजयदुर्ग का रहस्य, उलटी खोपड़ी, कातिल मेरा नाम'  और अब प्रस्तुत है पन्द्रहवें उपन्यास  'मौत की परछाई' की समीक्षा। 
मौत के साये
एयर इंडिया का विभान उड़ान भरने के लिए रनवे पर तैयार खड़ा था। अधिकांश यात्री अपनी-अपनी सीट पर बैठ चुके थे ।

Saturday, 25 April 2026

कातिल‌ मेरा नाम- कर्नल रंजीत

मुम्बई पुलिस का सीरियल किलर
कातिल‌ मेरा नाम- कर्नल रंजीत

नमस्ते पाठक‌ मित्रो,
एक बार हम फिर से उपस्थित है मेजर बलवंत शृंखला का एक रोचक और रहस्यमयी उपन्यास 'कातिल मेरा नाम' लेकर । कर्नल रंजीत की विशेष शैली में‌ लिखा गया यह उपन्यास 'मुम्बई पुलिस का सीरियल किलर' खोज पर आधारित है। एक ऐसे सिरफिरे कातिल की कहानी जो सिर्फ पुलिसवालों का ही कत्ल करता था, आखिर क्यों ?

रात के ग्यारह बज चुके थे। पुलिस इन्स्पेक्टर रामसिंह ड्यूटी खत्म करके घर जाने की तैयारी कर रहा था कि फोन की घंटी बजी। इन्स्पेक्टर ने रिसीवर उठाकर कहा :
"हलो, पुलिस स्टेशन बाईकला।"
जवाब में किसी औरत की आवाज ने कहा, "मैं जिम्मेदार पुलिस अफसर से बात करना चाहती हूं।"
"आप कौन बोल रही हैं ?"
"प्लीज, आप मेरी बात किसी अफसर से करा दीजिए।" औरत ने जवाब दिया।
"मैं स्टेशन इन्चार्ज इन्स्पेक्टर रामसिंह बोल रहा हूं। क्या मैं आपकी कोई सेवा कर सकता हूं ?"
"ओह, इन्स्पेक्टर साहब, थैंक्स गाड, कि आप मिल गये । क्या आप मशहूर डाकू राजन को गिरफ्तार करना' चाहेंगे जो दो महीने पहले जेल से फरार हो गया था और जिसकी गिरफ्तारी पर आपके विभाग ने दस हजार का इनाम रखा है ?"

Saturday, 18 April 2026

उलटी खोपड़ी- कर्नल रंजीत- 1980

मूर्ति चोरी और ब्लैकमेल की रोचक कथा
उलटी खोपड़ी- कर्नल रंजीत

एक बार फिर SVNLIBRARY पर प्रस्तुत है कर्नल रंजीत द्वारा लिखा गया एक ऐसा रोचक उपन्यास जो आपको सम्मोहित कर लेगा। एक ऐसे व्यक्ति की कहानी जो अप‌नी मृत्यु के छह महीने बाद एक प्रश्न स्वयं से करता है- मरने के छः महीने बाद क्या वह फिर जीवित हो उठा था ?

इनाम
यह बात आज से छः महीने पहले की है । अगस्त का महीना था। स्थानीय समाचारपत्न 'दि क्रानिकल' के फोटोग्राफर कमलकिशोर को, बम्बई में मैक्सिको के राष्ट्राध्यक्ष के आगमन पर खींचे गए फोटो के लिए समाचार-पत्र के मालिक ने पांच सौ रुपये इनाम दिया। उसने इनाम मिलने पर सोचा कि आज तो उसे अपनी पत्नी का उलाहना दूर कर ही देना चाहिए और उसे 'उन्यालो बन्दर' ले जाकर चीनी खाना खिला ही देना चाहिए जो उसे बहुत पसन्द था । उसकी पत्नी ज्योत्स्ना 'परेल' की टैक्सटाइल मिल के अकाउंट्स विभाग में नियुक्त थी। उसका विवाह हुए एक वर्ष हुआ था। यहू प्रेम-विवाह था। पति पत्नी के जीवन में पहले एक और समानता भी थी ज्योत्स्ना भी अकेली थी और कमल किशोर भी। उन दोनों का कोई सम्बन्धी नहीं था। विवाह से एक महीना पहले कमलकिशोर ने 'अन्धेरी' में 'मधुबन' नामक भवन की पहली मंजिल पर चालीस हजार रुपये में एक शानदार फ्लैट खरीदा था ।
कमलकिशोर ने ज्योत्स्ना को फोन किया कि वह आज अपने आफिस से पांच की बजाय चार बजे उठ आए और घर पहुंच जाए । उसने अपनी पत्नी को यह निर्देश इसलिए किया कि ज्योत्स्ना को जब भी बाहर जाना होता था तो बनाव-शृंगार में वह बहुत देर लगा देती थी । ज्योत्स्ना ने वचन दिया कि वह चार बजे आफिस से उठकर पांच बजे घर पहुंच जाएगी ।
(उलटी खोपड़ी- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)

Saturday, 11 April 2026

विजय दुर्ग का रहस्य- कर्नल रंजीत- 1983

राजमहल के षड्यंत्र की कहानी
विजय दुर्ग का रहस्य- कर्नल रंजीत

  लोकप्रिय कथा साहित्य में प्रतिशोध और रहस्यमयी- विचित्र कथाओं के लिए कर्नल रंजीत का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। उलझे कथानक, ज्यादा पात्र और शृंखलाबद्ध हत्याएं उ‌नके उपन्यासों की विशेषता रही है। 
मैं इन दिनों सतत् कर्नल रंजीत के उपन्यास पढ रहा हूँ और मनोरंजन की एक अलग ही दुनिया में विचरण कर रहा हूँ। मनोरंजन की इस अनोखी दुनिया में आप भी मेरे साथ-साथ घूम लीजिए- विजयदुर्ग का रहस्य उपन्यास में।

सस्पेंस, रोमांच, साहसपूर्ण घटनाओं के जादूगर कर्नल रंजीत का रोंगटे खड़े कर देने वाली अनूठी कहानी से पूर्ण चौंका देने वाला नया विशेषांक
विजयदुर्ग का रहस्य
उपन्यास के मुख्य आकर्षण
- पतंग के आकार के दिल दहलाने वाले जैट विमान।
- कांच की गोली से राजमहल में धमाका ।
- तालों में बंद लाश का गायब हो जाना ।
- मेजर बलवंत और सोनिया के बेजान शरीर हिलाने - डुलाने पर भी न हिले ।
- मंदिर में पूजा करती हुई महिला सहसा लापता ।
- प्रेम में असफलता और राज घराने की पुश्तैनी दुश्मनी कितना भयानक रूप धारण कर गई यह जानने के लिए पढ़िए 'विजयदुर्ग का रहस्य' ।(अंतिम आवरण पृष्ठ से)

Saturday, 4 April 2026

मेजर बलवंत बांगलादेश में- कर्नल रंजीत

मेजर की बांग्ला यात्रा और मुक्तिवाहिनी का संघर्ष
मेजर बलवंत बांगलादेश में‌- कर्नल रंजीत

बंगला देश में, मानवता को लज्जित करने वाले पाकिस्तानी तानाशाहों के घोर अत्याचारों तथा भीषण गोला-बारी के बीच, भारतीय जासूस मेजर बलवंत के अत्यन्त साहसिक कार्यों और हैरत में डाल देने वाले जासूसी के चमत्कारों से भरपूर उपन्यास
नमस्ते पाठक मित्रो,
   कर्नल रंजीत के उपन्यासों की समीक्षा में हम संगरिया (राजस्थान) निवासी मित्र रतन चौधरी जी से पढने के लिए प्राप्त हुये 15 उपन्यासों की समीक्षा के क्रम में आज हम पढ रहे हैं 'मेजर बलवंत बांगलादेश में' उपन्यास की समीक्षा ।
     पूर्व में हम 'पीले बिच्छू' नामक उपन्यास पढ चुके हैं जिसमें मेजर बलवंत बांगला देश जाते हैं  और प्रस्तुत उपन्यास में भी वह बांगलादेश जाते हैं पर दोनों उपन्यासों की यात्रा में एक बड़ा अंतर है जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे। 
पहले हम 'मेजर बलवंत बांगलादेश में' उपन्यास के प्रथम पृष्ठ का अवलोकन करते हैं। प्रथम अध्याय का नाम है- मनुष्य का भाग्य ।

Monday, 30 March 2026

715. जापानी पंखा- कर्नल रंजीत

हत्या का अनोखा जापानी ढंग
जापानी पंखा- कर्नल रंजीत 1974

कर्नल रंजीत के इस उपन्यास की समीक्षा से पूर्व हम संक्षिप्त चर्चा कर लेते हैं इनके रहस्यमयी हत्याओं के तरीकों पर, ध्यान दें संक्षिप्त चर्चा है।
कर्नल रंजीत के आपने उपन्यास/ समीक्षा पढी है तो आपको पता होगा की इनके हत्यारे पात्र जब भी किसी की हत्या करते हैं तो वह इतने अजीब और रहस्यमयी तरीके इस्तेमाल करते हैं जो सामान्य लेखक तो सोच भी नहीं सकता‌ । प्रस्तुत उपन्यास में तो हत्या का तरीका भी जापानी है। तो चलो आज इसी जापानी तरीके को देखते हैं इस उपन्यास में-

            मित्र की परेशानी
मेजर बलवंत दोपहर का खाना खाकर अखबार पढ़ रहा था का आज सुबह वह अखबार नहीं देख सका था कि टेलीफोन घंटी बज उठी। ऑपरेटर गर्ल ने मेजर के रिसीवर उठाने पर कहा, "मेजर साहब ! लांग डिस्टेंट कॉल, वाराणसी से। आधा मिनट इन्तजार कीजिए।" मेजर ने रिसीवर कान से लगाए रखा। वह सोच रहा था कि वाराणसी से उसे कौन फोन कर रहा था कि फोन पर धीमी-सी आवाज़ आई, "मेजर साहब ! मैं मिसेज विनोद बोल रही हूं। क्या आप दो-चार दिन के लिए वाराणसी आ सकते हैं ?" अब मेजर को याद आया कि उसका घनिष्ठ मित्र विनोद, जो कई केस सुलझाने में उसकी सहायता कर चुका था, तब्दील होकर वाराणसी जा चुका था ।
"क्यों अनीता, क्या बात है ? तुम मुझे वाराणसी क्यों बुला रही हो ?"

Sunday, 29 March 2026

714. चण्डी मंदिर का रहस्य- कर्नल रंजीत- 1990

एक देश की सत्ता पलटने की कहानी
चण्डी मंदिर का रहस्य- कर्नल रंजीत- 1990

एकान्त और रहस्यमय था चण्डी द्वीप। बहुत पुराना मंदिर था यहां। इसी में छिपे थे एटम का रहस्य चुराने वाले और वैज्ञानिकों के हत्यारे। ये विद्रोह कराने में सफल हो गए, पर एक दिन पकड़े गए। पढ़िए रोंगटे खड़े कर देने वाला धमाका।

चण्डीमंदिर का रहस्य - कर्नल रंजीत
एक बार फिर आपका स्वागत है #svnlibrary में जहां आप पढेंगे कर्नल रंजीत के एक विदेशी अभियान को। एक छोटे से देश में किस तरह मेजर बलवंत अपने साथियों के साथ देश को गुलाम बनाने वाले अपराधियों के खतरनाक षडयंत्र को खत्म करता है।
  समीक्षा से पूर्व हम उपन्यास के प्रथम पृष्ठ/ दृश्य को पढते हैं और फिर बात करेंगे उपन्यास के रोचक कथानक की ।

Thursday, 26 March 2026

713. खूनी बदला- कर्नल रंजीत -1980

एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास
खूनी बदला- कर्नल रंजीत- 1980

जवानी की दहलीज पर पैर रखते ही रुक्मिणी देवी ऐसी भयंकर भूल कर बैठती है, जो समाज की निगाह में पाप है। वे चाहती हैं कि उनका पाप छिपा रहे और बेटी पर उस पाप की छाया भी न पड़े। जवान होकर बेटी भी वही पाप कर बैठती है। जीवन का यह रहस्य जैसे-जैसे, जिस-जिस पर प्रकट होता जाता है, एक मोटी औरत वैसे ही उन लोगों की हत्या करती जाती है। पाप बदले का रूप धारण कर लेता है।
बदला लेने वाली औरत कौन है, इसके लिए पढ़िए, रहस्य-रोमांच के चितेरे कर्नल रंजीत का नया उपन्यास - खूनी बदला

    आप इन दिनों @svnlibrary पर लगातार पढ रहे हैं कर्नल रंजीत के उपन्यासों की समीक्षा । मित्र रतन चौधरी से प्राप्त कर्नल रंजीत के उपन्यासों को पढा जा रहा है और उन्हीं से प्राप्त उपन्यास 'खूनी बदला' की समीक्षाएं यहां प्रस्तुत है।
  कर्नल रंजीत के उपन्यास मर्डर मिस्ट्री और प्रतिशोध युक्त होते हैं। प्रस्तुत उपन्यास भी इसी आधार पर रचित एक मनोरंजक उपन्यास है।

Saturday, 21 March 2026

712. हत्यारे की पत्नी- कर्नल रंजीत -1974

समान नाम के लोगों की हत्या का रहस्य
हत्यारे की पत्नी- कर्नल रंजीत -1974

यह 29 साल का रहस्य क्या है ? 
प्रत्येक आदमी दो बार कैसे मर रहा है ? 
हत्या करने वाला किस महान शक्ति का दास है ? 
और मरने वाले को कैसे पता चल जाता है कि उसकी मौत का दिन आ पहुंचा है ?
अपराध-जगत् की सबसे सनसनीखेज और आश्चर्यजनक घटना, जिसमें हत्या तो होती है पर हत्यारा कोई नहीं। मेजर बलवन्त के चारों तरफ एक मायाजाल-सा बुन जाता है। उसे अपराधी का नहीं प्रकृति और भाग्य के गूढ़तम रहस्य का पता लगाना है। वह रहस्य क्या है ? और मेजर बलवन्त उसका कैसे पता लगाता है ?
कर्नल रंजीत ने इस नवीनतम उपन्यास में एकदम अछूते विषय को छुआ है। विषय हजारों साल से उलझा हुआ है और उसे मेजर बलवन्त जैसा तीक्ष्णबुद्धि जासूस ही सुलझा सकता था ।