Tuesday, 16 June 2026

727. पूनम का चाँद- सुरेश साहिल

प्रेम और वासना के बीच का कड़वा सच
पूनम का चांद- सुरेश साहिल

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के सितारे सुरेश साहिल जी द्वारा लिखा गया 'पूनम का चांद' उपन्यास समाज से खत्म होते रिश्ते, बढती लालसा, मजबूर जनता के साथ अच्छे लोगों की कथा कहता यह उपन्यास तात्कालिक समय का एक बोल्ड कथा‌नक है। 
  पूनम का चांद उपन्यास की समीक्षा से पूर्व हम इसके प्रथम दृश्य को देखते हैं।

पूनम का चांद- सुरेश साहिल

"अमरपुर आ गया बाबू...।" पास बैठे वृद्ध की आवाज उसके कानों में पड़ी थी। चौंककर ही उसने आंखें खोली थीं।
प्लेटफार्म पर ट्रेन रुक चुकी थी। इधर-उधर नजर डाली। डिब्बा खाली हो चुका था...। वह उठा था। उठकर जूते निकाले थे सीट के नीचे से...। बालों में हाथों की उंगलियों से कंघी करते हुए ही प्लेटफार्म पर उतरा था।
प्लेटफार्म पर नजर दौड़ाई, तो इक्का-दुक्का ही लोग घूमते दिखाई दिये थे उसे ।
"क्या टाइम हुआ है?" उसने पूछा था बराबर से गुजरते हुए व्यक्ति से। रेलवे का ही कोई कर्मचारी लगा था।
"चार बजे हैं।" समय बताकर वह व्यक्ति आगे बढ़ गया था।
"प्लेटफार्म पर ही सुबह होने का इन्तजार करना पड़ेगा...।" वह बड़बड़ाया था।

Wednesday, 10 June 2026

726. अछूत - दया पवार

‘अछूत’ : दलित जीवन की पीड़ा, संघर्ष और आत्मसम्मान का दस्तावेज़
अछूत - दया पवार, दलित आत्मकथा

मराठी दलित साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर दया पवार की आत्मकथात्मक कृति ‘अछूत’ भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, गरीबी, अपमान और संघर्ष की ऐसी मार्मिक कथा है, जो केवल एक व्यक्ति की जीवन-गाथा नहीं रह जाती, बल्कि पूरे दलित समाज के सामूहिक अनुभव का दस्तावेज़ बन जाती है। यह रचना पाठक को भावुक ही नहीं करती, बल्कि उसे सामाजिक यथार्थ से सीधा सामना करने के लिए विवश भी करती है।

अछूत - दया पवार- दलित आत्मकथा

   ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की आत्मकथा 'जूठन' बहुत समय पहले पढी थी और उसके बाद दलित साहित्य में दया पवार जी की आत्मकथा 'अछूत' पढने का अकसर मिला है।
        जब कभी भी वह अकेला होता है, उससे अक्सर मेरी मुलाक़ात हो जाती है। जब से मैंने होश सँभाला है, तब से मैं उसे अच्छी तरह पहचानता हूँ। जितना अपनी परछाईं से परिचय हो, उतना परिचित है वह। पर कभी-कभी अँधेरा छा जाने पर या बदली छा जाने पर जैसे स्वयं की परछाई लुप्त हो जाती है, वैसे ही वह भी लुप्त हो जाता है। पिछले कई वर्षों से उसे भीड़ से बड़ा लगाव रहा है। हमेशा किसी के साथ या सभा-सम्मेलनों में दिखाई देता है।(प्रथम पृष्ठ से चंद पंक्तियां)
  

Saturday, 23 May 2026

725. रेत का संगीत- वेदप्रकाश काम्बोज

अंतरराष्ट्रीय अपराधी की डकैती कथा
रेत का संगीत- वेदप्रकाश काम्बोज

वेदप्रकाश काम्बोज जी का एक रोचक उपन्यास 'रेत का संगीत' पढने को मिला है। यह जासूस विजय शृंखला का उपन्यास है। यह एक अंतरराष्ट्रीय अपराधी की डकैती की रोमांच कहानी है। एक ऐसा अपराधी जिसे अमेरिका जैसे देश भी पकड़ने में असफल रहे और जब उस अपराधी की विजय से भिड़ंत हुयी तब जन्मी एक रोमांचक कहानी रेत का संगीत ।

रेत का संगीत - वेदप्रकाश काम्बोज

        भारिया सोनापुर के सबसे खूबसूरत होटल नियाग्रा के कम्पाउन्ड में टैक्सी से उतरी और उसने मीटर देखकर ड्राइवर को पैसे दिये कुछ पैसे अधिक ही दिये गये थे। इसलिये ड्राइवर ने उसे सलाम किया किन्तु उसके सलाम का कोई उत्तर न देकर वह होटल के दरवाजे की ओर बढ़ गई ।

Saturday, 16 May 2026

724. खून‌ की कसम- वेदप्रकाश काम्बोज

चीनी षड्यंत्र और भारतीय जासूस 
खून की कसम - वेदप्रकाश काम्बोज

वेदप्रकाश काम्बोज उपन्यास साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं और उनका एक प्रसिद्ध पात्र है विजय । जासूस सम्राट विजय । विजय को आधार बनाकर काम्बोज जी ने विभिन्न प्रकार के उपन्यास लिखे हैं जिनमें मुख्य हैं अंतर्राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर आधारित उपन्यास । ऐसा ही कहानी है प्रस्तुत उपन्यास की जहां एक पात्र ने विजय को खून की कसम दी थी, क्या थी वह खून‌ की कसम।
  अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र पर आधारित एक रोचक उपन्यास है -खून की कसम
           भारतीय सीक्रेट सर्विस में एक बहुत बड़ा हेर फेर हो गया ।
चीनी खतरे को देखते हुए प्रतिरक्षा मंत्रालय से विजय के पास आदेश आए कि सीक्रेट सर्विस का कुछ विस्तार किया जाए ताकि चीनी कार्यवाहियों को और देश के दुश्मनों की कार्यवाहियों को समय पर रोक कर देश की रक्षा की जाए ।

Saturday, 9 May 2026

723. गुप्त हत्यारा- वेदप्रकाश काम्बोज

एक हत्यारे की तलाश में मित्र
गुप्त हत्यारा- वेदप्रकाश काम्बोज

आदरणीय वेदप्रकाश काम्बोज जी ने बहुत लिखा है और उनकर लेखन में विविधता भी रही है। जहां उन्होंने दीर्घ उपन्यासों से पाठकों का मनोरंजन किया है वहीं अपने लेखक के आरम्भिक दौर में लघु उपन्यासों का भी सृजन किया है। 
उनका प्रस्तुत उपन्यास मात्र एक कहानी नहीं है, यह मात्र यह जानने का प्रयास नहीं है कि 'गुप्त हत्यारा' कौन है । यह मित्रों के विश्वास की कहानी है, उनके ठहाकों का समंदर है, उनके अपनत्व का आसमान है।  
गुप्त हत्यारा- वेदप्रकाश काम्बोज

'ओ गुरुमुख ?'
'हो चन्दर !' इसी स्वर में उत्तर मिला ।
'ओ, यह पत्र क्या कहता होए ?'
'क्या कहता है ?'
'यह कहता है कि इसे मुझे नहीं पढ़ना चाहिए !'
'क्यों ?'
'उस हरामजादे ने पत्र केवल तुझे ही लिखा है !'
'देखू !'
चन्द्रप्रकाश ने, जिसे कि चन्दर कहकर पुकारा जाता था, पत्र, सरदार गुरुमुखसिंह की ओर बढ़ा दिया। गुरुमुख ने अपनी एक ओर की मूंछ को बल देते हुए लिफाफे का पता देखा, ऊपर केवल उसका नाम लिखा हुआ था ।

Sunday, 3 May 2026

722. भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज

कबाड़ी, मदारी,तातारी का एक और कारनामा
भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज

लोकप्रिय कथाकार श्री वेदप्रकाश काम्बोज जी ने जासूसी साहित्य में जासूसी उपन्यासों में हास्य जासूसी उपन्यासों का भी सृजन किया है। हम इस से पूर्व 'मौत की आवाज' नामक उपन्यास की चर्चा कर चुके हैं और अब प्रस्तुत है इन्हीं की कलम से निकला एक और हास्य जासूसी उपन्यास 'भेदभरी हत्या' ।
यह उपन्यास वेदप्रकाश काम्बोज जी के तीन पात्र कुंदन कबाड़ी, गोकुल मदारी और फन्ने खां तातारी सीरीज का एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है। 

भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज

विज्ञापनबाजी करने के बावजूद जब के० एफ० जी० प्राइवेट डिटेक्टिव कम्पनी के अन्दर कोई भी केस नहीं आया तो उस कम्पनी के तीनों मालिकनुमा चपरासियों को कारण पर विचार करने के लिए विवश होना पड़ा।
बनाई जैसी कि अन्तिम दृश्य में सोचने के समय कुन्दन कबाड़ी ने ऐसी ही मुद्रा देवदास की भूमिका में दिलीप कुमार ने फिल्म के पारो के घर के सामने बनाई थी। इसके पश्चात मस्तिष्क की खुली सड़क पर विचारों का ताँगा कारण की तलाश में बिना कोचवान के खुला छोड़ दिया गया ।

721. मौत की आवाज- वेदप्रकाश काम्बोज

कबाड़ी, तातारी और मदारी का प्रथम उपन्यास
मौत की आवाज- वेदप्रकाश काम्बोज

विजय ने दरवाजा खोला ।
और गुरुदेव का उच्च नाद करते हुए तीन नमूनों ने उसके पैर पकड़ लिए। चकित सा विजय पहले तो उन तीनों के काले सिरों को देखता रहा जो उसके पैरों के निकट इस तरह एकत्रित हो गए थे जैसे तीन विभिन्न रेखाएं एक बिन्दु पर आकर मिल गई हों।
विजय ने आशीर्वाद की मुद्रा में अपने हाथ फैलाये और फिर गुरू ने गम्भीर मुद्रा में कहा- 'सदा खाओ गुड़ के सेव ।'

'धन्य हैं गुरुदेव आप धन्य हैं।' उन तीनों ने उसके पैर पकड़े हुए समवेत स्वर में कहा। किसी ने भी सिर उठाकर देखने की चेष्टा नहीं की।  

Wednesday, 29 April 2026

720. मौत की परछाई - कर्नल रंजीत 1981

विदेशी षड्यंत्र और वैज्ञानिकों की हत्या
मौत की परछाई-  कर्नल रंजीत

कर्नल रंजीत के विचित्र संसार में आपका एक बार फिर स्वागत है। राजस्थान के संगरिया निवासी मित्र रतन चौधरी जी से प्राप्त कर्नल रंजीत के 15 उपन्यासों की समीक्षा के क्रम में यह 15 वां उपन्यास है‌ इस से पूर्व रतन चौधरी जी से प्राप्त चौदह उपनिवेश की समीक्षा पढे चुके हैं जिनके क्रमश: नाम हैं- ' दुल्हन की चीख, पीले बिच्छू, प्रेतात्मा की डायरी, उलटी लाशें, नकली चेहरे, ट्रेन एक्सीडेंट, हत्यारे की पत्नी, खूनी बदला, चण्डीमंदिर का रहस्य, जापानी पंखा, मेजर बलवंत बांगलादेश में, विजयदुर्ग का रहस्य, उलटी खोपड़ी, कातिल मेरा नाम'  और अब प्रस्तुत है पन्द्रहवें उपन्यास  'मौत की परछाई' की समीक्षा। 
मौत के साये
एयर इंडिया का विभान उड़ान भरने के लिए रनवे पर तैयार खड़ा था। अधिकांश यात्री अपनी-अपनी सीट पर बैठ चुके थे ।

Saturday, 25 April 2026

719. कातिल‌ मेरा नाम- कर्नल रंजीत

मुम्बई पुलिस का सीरियल किलर
कातिल‌ मेरा नाम- कर्नल रंजीत

नमस्ते पाठक‌ मित्रो,
एक बार हम फिर से उपस्थित है मेजर बलवंत शृंखला का एक रोचक और रहस्यमयी उपन्यास 'कातिल मेरा नाम' लेकर । कर्नल रंजीत की विशेष शैली में‌ लिखा गया यह उपन्यास 'मुम्बई पुलिस का सीरियल किलर' खोज पर आधारित है। एक ऐसे सिरफिरे कातिल की कहानी जो सिर्फ पुलिसवालों का ही कत्ल करता था, आखिर क्यों ?

रात के ग्यारह बज चुके थे। पुलिस इन्स्पेक्टर रामसिंह ड्यूटी खत्म करके घर जाने की तैयारी कर रहा था कि फोन की घंटी बजी। इन्स्पेक्टर ने रिसीवर उठाकर कहा :
"हलो, पुलिस स्टेशन बाईकला।"
जवाब में किसी औरत की आवाज ने कहा, "मैं जिम्मेदार पुलिस अफसर से बात करना चाहती हूं।"
"आप कौन बोल रही हैं ?"
"प्लीज, आप मेरी बात किसी अफसर से करा दीजिए।" औरत ने जवाब दिया।
"मैं स्टेशन इन्चार्ज इन्स्पेक्टर रामसिंह बोल रहा हूं। क्या मैं आपकी कोई सेवा कर सकता हूं ?"
"ओह, इन्स्पेक्टर साहब, थैंक्स गाड, कि आप मिल गये । क्या आप मशहूर डाकू राजन को गिरफ्तार करना' चाहेंगे जो दो महीने पहले जेल से फरार हो गया था और जिसकी गिरफ्तारी पर आपके विभाग ने दस हजार का इनाम रखा है ?"

Saturday, 18 April 2026

718. उलटी खोपड़ी- कर्नल रंजीत- 1980

मूर्ति चोरी और ब्लैकमेल की रोचक कथा
उलटी खोपड़ी- कर्नल रंजीत

एक बार फिर SVNLIBRARY पर प्रस्तुत है कर्नल रंजीत द्वारा लिखा गया एक ऐसा रोचक उपन्यास जो आपको सम्मोहित कर लेगा। एक ऐसे व्यक्ति की कहानी जो अप‌नी मृत्यु के छह महीने बाद एक प्रश्न स्वयं से करता है- मरने के छः महीने बाद क्या वह फिर जीवित हो उठा था ?

इनाम
यह बात आज से छः महीने पहले की है । अगस्त का महीना था। स्थानीय समाचारपत्न 'दि क्रानिकल' के फोटोग्राफर कमलकिशोर को, बम्बई में मैक्सिको के राष्ट्राध्यक्ष के आगमन पर खींचे गए फोटो के लिए समाचार-पत्र के मालिक ने पांच सौ रुपये इनाम दिया। उसने इनाम मिलने पर सोचा कि आज तो उसे अपनी पत्नी का उलाहना दूर कर ही देना चाहिए और उसे 'उन्यालो बन्दर' ले जाकर चीनी खाना खिला ही देना चाहिए जो उसे बहुत पसन्द था । उसकी पत्नी ज्योत्स्ना 'परेल' की टैक्सटाइल मिल के अकाउंट्स विभाग में नियुक्त थी। उसका विवाह हुए एक वर्ष हुआ था। यहू प्रेम-विवाह था। पति पत्नी के जीवन में पहले एक और समानता भी थी ज्योत्स्ना भी अकेली थी और कमल किशोर भी। उन दोनों का कोई सम्बन्धी नहीं था। विवाह से एक महीना पहले कमलकिशोर ने 'अन्धेरी' में 'मधुबन' नामक भवन की पहली मंजिल पर चालीस हजार रुपये में एक शानदार फ्लैट खरीदा था ।
कमलकिशोर ने ज्योत्स्ना को फोन किया कि वह आज अपने आफिस से पांच की बजाय चार बजे उठ आए और घर पहुंच जाए । उसने अपनी पत्नी को यह निर्देश इसलिए किया कि ज्योत्स्ना को जब भी बाहर जाना होता था तो बनाव-शृंगार में वह बहुत देर लगा देती थी । ज्योत्स्ना ने वचन दिया कि वह चार बजे आफिस से उठकर पांच बजे घर पहुंच जाएगी ।
(उलटी खोपड़ी- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)

Saturday, 11 April 2026

717. विजय दुर्ग का रहस्य- कर्नल रंजीत- 1983

राजमहल के षड्यंत्र की कहानी
विजय दुर्ग का रहस्य- कर्नल रंजीत

  लोकप्रिय कथा साहित्य में प्रतिशोध और रहस्यमयी- विचित्र कथाओं के लिए कर्नल रंजीत का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। उलझे कथानक, ज्यादा पात्र और शृंखलाबद्ध हत्याएं उ‌नके उपन्यासों की विशेषता रही है। 
मैं इन दिनों सतत् कर्नल रंजीत के उपन्यास पढ रहा हूँ और मनोरंजन की एक अलग ही दुनिया में विचरण कर रहा हूँ। मनोरंजन की इस अनोखी दुनिया में आप भी मेरे साथ-साथ घूम लीजिए- विजयदुर्ग का रहस्य उपन्यास में।

सस्पेंस, रोमांच, साहसपूर्ण घटनाओं के जादूगर कर्नल रंजीत का रोंगटे खड़े कर देने वाली अनूठी कहानी से पूर्ण चौंका देने वाला नया विशेषांक
विजयदुर्ग का रहस्य
उपन्यास के मुख्य आकर्षण
- पतंग के आकार के दिल दहलाने वाले जैट विमान।
- कांच की गोली से राजमहल में धमाका ।
- तालों में बंद लाश का गायब हो जाना ।
- मेजर बलवंत और सोनिया के बेजान शरीर हिलाने - डुलाने पर भी न हिले ।
- मंदिर में पूजा करती हुई महिला सहसा लापता ।
- प्रेम में असफलता और राज घराने की पुश्तैनी दुश्मनी कितना भयानक रूप धारण कर गई यह जानने के लिए पढ़िए 'विजयदुर्ग का रहस्य' ।(अंतिम आवरण पृष्ठ से)

Saturday, 4 April 2026

716. मेजर बलवंत बांगलादेश में- कर्नल रंजीत

मेजर की बांग्ला यात्रा और मुक्तिवाहिनी का संघर्ष
मेजर बलवंत बांगलादेश में‌- कर्नल रंजीत

बंगला देश में, मानवता को लज्जित करने वाले पाकिस्तानी तानाशाहों के घोर अत्याचारों तथा भीषण गोला-बारी के बीच, भारतीय जासूस मेजर बलवंत के अत्यन्त साहसिक कार्यों और हैरत में डाल देने वाले जासूसी के चमत्कारों से भरपूर उपन्यास
नमस्ते पाठक मित्रो,
   कर्नल रंजीत के उपन्यासों की समीक्षा में हम संगरिया (राजस्थान) निवासी मित्र रतन चौधरी जी से पढने के लिए प्राप्त हुये 15 उपन्यासों की समीक्षा के क्रम में आज हम पढ रहे हैं 'मेजर बलवंत बांगलादेश में' उपन्यास की समीक्षा ।
     पूर्व में हम 'पीले बिच्छू' नामक उपन्यास पढ चुके हैं जिसमें मेजर बलवंत बांगला देश जाते हैं  और प्रस्तुत उपन्यास में भी वह बांगलादेश जाते हैं पर दोनों उपन्यासों की यात्रा में एक बड़ा अंतर है जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे। 
पहले हम 'मेजर बलवंत बांगलादेश में' उपन्यास के प्रथम पृष्ठ का अवलोकन करते हैं। प्रथम अध्याय का नाम है- मनुष्य का भाग्य ।

Monday, 30 March 2026

715. जापानी पंखा- कर्नल रंजीत

हत्या का अनोखा जापानी ढंग
जापानी पंखा- कर्नल रंजीत 1974

कर्नल रंजीत के इस उपन्यास की समीक्षा से पूर्व हम संक्षिप्त चर्चा कर लेते हैं इनके रहस्यमयी हत्याओं के तरीकों पर, ध्यान दें संक्षिप्त चर्चा है।
कर्नल रंजीत के आपने उपन्यास/ समीक्षा पढी है तो आपको पता होगा की इनके हत्यारे पात्र जब भी किसी की हत्या करते हैं तो वह इतने अजीब और रहस्यमयी तरीके इस्तेमाल करते हैं जो सामान्य लेखक तो सोच भी नहीं सकता‌ । प्रस्तुत उपन्यास में तो हत्या का तरीका भी जापानी है। तो चलो आज इसी जापानी तरीके को देखते हैं इस उपन्यास में-

            मित्र की परेशानी
मेजर बलवंत दोपहर का खाना खाकर अखबार पढ़ रहा था का आज सुबह वह अखबार नहीं देख सका था कि टेलीफोन घंटी बज उठी। ऑपरेटर गर्ल ने मेजर के रिसीवर उठाने पर कहा, "मेजर साहब ! लांग डिस्टेंट कॉल, वाराणसी से। आधा मिनट इन्तजार कीजिए।" मेजर ने रिसीवर कान से लगाए रखा। वह सोच रहा था कि वाराणसी से उसे कौन फोन कर रहा था कि फोन पर धीमी-सी आवाज़ आई, "मेजर साहब ! मैं मिसेज विनोद बोल रही हूं। क्या आप दो-चार दिन के लिए वाराणसी आ सकते हैं ?" अब मेजर को याद आया कि उसका घनिष्ठ मित्र विनोद, जो कई केस सुलझाने में उसकी सहायता कर चुका था, तब्दील होकर वाराणसी जा चुका था ।
"क्यों अनीता, क्या बात है ? तुम मुझे वाराणसी क्यों बुला रही हो ?"