Sunday, 23 August 2026

739. वन वे स्ट्रीट- सुरेन्द्र मोहन‌‌ पाठक

नशे के व्यापारी और मौत का खेल
वन वे स्ट्रीट- सुरेन्द्र मोहन‌‌ पाठक
सुधीर कोहली सीरीज

हर कोई जानता था कि वो एक ऐसा रास्ता था जिसके सिरे पर निश्चित मौत खड़ी थी, फिर भी शहर में ऐसे लोगों की कमी नहीं थी जो निश्चित मौत से खौफजदा होने की जगह उस एक तरफा रास्ते पर खुशी-खुशी कदम रखते थे।
ऐसे ही दीवानों की वजह से उन लोगों का व्यापार चलता था जो कि नारकॉटिक्स ट्रेड का कन्ट्रोल हासिल करने के लिये एक दूसरे के खून के प्यासे थे। 

नमस्ते पाठक मित्रो,
एक बार फिर हम उपस्थित हैं सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के उपन्यास 'वन वे स्ट्रीट' के साथ । यह कहानी है नशे के उस रास्ते की जहां आदमी एक बार चला गया फिर वापस नहीं लौट सकता, इसलिए तो उसे कहा जाता है- One way street.

यह उपन्यास मैंने 26.05.2002, 27.06.2003 में पढा और अब एक लम्बे समय पश्चात पुनः उपन्यास को अगस्त 2026 में पढा। 
उपन्यास समीक्षा से पहले हम उपन्यास के प्रथम पृष्ठ पर एक नजर डाल लेते हैं।

Thursday, 20 August 2026

738. मौत आई दबे पांव- सुरेन्द्र मोहन पाठक

एक थ्रिलर मर्डर मिस्ट्री
मौत आई दबे पांव- सुरेन्द्र मोहन पाठक

सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित उपन्यास 'मौत आई दबे पांव' एक बेहतरीन और रोमांचक हिंदी थ्रिलर उपन्यास है। यह एक मर्डर मिस्ट्री कथानक है जो आदि से अंत तक रोचक है।

मौत आई दबे पांव- सुरेन्द्र मोहन पाठक

दिल के उम्रदराज मरीज वी० एम० अधिकारी की मौत निश्चित थी, महज वक्त की बात थी और ऐन वैसे ही दबे पांव आयी थी, जैसे कि उस का आना अपेक्षित था। फिर भी वो खामोश मौत एक भीषण हाहाकार की बुनियाद बनी।(आवरण पृष्ठ से)
नमस्ते पाठक‌ मित्रो,
अगस्त 2026 में सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के पांच उपन्यास पढने के लिए उपलब्ध हैं, जिन्हें पढाऔर पढना जारी है। इन पांच उपन्यासों की समीक्षा ब्लॉग पर प्रकाशित हो रही है।
इसी क्रम में आज हम पढेंगे थ्रिलर उपन्यास 'मौत आई दबे पांव' की समीक्षा । पर समीक्षा से पूर्व हम उपन्यास के प्रथम पृष्ठ को देखते हैं।

Saturday, 15 August 2026

737. ट्रिपल क्राॅस- सुरेन्द्र मोहन पाठक

ब्लैकमेल, हमशक्ल और मर्डर मिस्ट्री
ट्रिपल क्राॅस- सुरेन्द्र मोहन पाठक
सुनील सीरीज- 54

सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित प्रसिद्ध उपन्यास 'ट्रिपल क्रॉस' सुनील श्रृंखला संख्या का 54 वां उपन्यास है । यह एक थ्रिलर मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है। उपन्यास में मर्डर मिस्ट्री गौण अन्य कथा प्रधान है और यही कथा उपन्यास को ज्यादा रोचक बनाती है।
ट्रिपल क्राॅस उपन्यास जैसा की अपने शीर्षक से ही अपनी कथा का आभास करवा रही है। अब देखना यह है की कौन, किसको और कैसे क्राॅस कर रहा है और किस माध्यम से और किसलिए ।

ट्रिपल क्राॅस- सुरेन्द्र मोहन पाठक

        सभ्य लोगों की असभ्य हरकतों की सनसनीखेज दास्तान जिसमें धोखा-दर-धोखा अहमतरीन किरदार की तरह शामिल था और जिसमें खिचड़ी में घी की तरह घुला-मिला हुआ था ब्लास्ट का स्पेशल कोरस्पोंडेंट सुनील कुमार चक्रवर्ती । एक सदाबहार मर्डर मिस्ट्री । (आवरण पृष्ठ से)

उपन्यास की समीक्षा से पूर्व हम उपन्यास के प्रथम पृष्ठ पर एक नजर डालते हैं और फिर समीक्षा को आगे बढाते हैं।

Tuesday, 4 August 2026

736. कमरा नम्बर 303- सुरेन्द्र मोहन‌ पाठक

नशा के व्यापारी और मर्डर मिस्ट्री
कमरा नम्बर 303 - सुरेन्द्र मोहन पाठक
सुनील सीरीज 105 - मर्डर मिस्ट्री

एक अत्यन्त रोमांचक कथानक जिसका केन्द्र बिन्दु एक ऐसी रहस्यमयी युवती थी जो एक पार्टी में से एकाएक यूं गायब हुई जैसे वो कभी वहां थी ही नहीं, जिसके बारे में उसके मेजबान का दावा था कि वो उसे नहीं जानता था।
एक अत्यन्त रोचक मर्डर मिस्ट्री। आदि से अन्त तक एक ही बैठक में पठनीय । (आवरण पृष्ठ से)

कमरा नम्बर 303- सुरेन्द्र मोहन पाठक

एक लम्बे समय पश्चात सुरेन्द्र मोहन पाठक जी का उपन्यास पढा है। जहां तक मुझे याद है (ब्लॉग अनुसार) मैंने अप्रेल 2022 में सुनील सीरीज का इक्कीसवां उपन्यास 'झूठी औरत' पढा था और उसके बाद अब अगस्त 2026 में सुनील सीरीज का उपन्यास 'कमरा नम्बर 303' पढा। हालांकि यह उपन्यास पूर्व में 01.11.2012 में पढी थी । इसके अतिरिक्त मेरे मित्र चेतराम, रमेश बरोड़(जुलाई 2007) और विकास पचार ने 21.06.2009 में इसे पढा था। तब उपन्यास पाठक भी थे और हम मित्र उपन्यास पढने के बाद उस पर दिनांक भी अंकित करते थे।

Friday, 19 June 2026

728. निर्मला- प्रेमचंद

दहेज, अनमेल विवाह और स्त्री-त्रासदी का मार्मिक कहानी
निर्मला -  प्रेमचंद

हिंदी साहित्य में यदि सामाजिक यथार्थ को सबसे प्रभावशाली ढंग से चित्रित करने वाले उपन्यासों की चर्चा की जाए तो प्रेमचंद का ‘निर्मला’ अग्रणी कृतियों में गिना जाएगा। यह उपन्यास केवल एक युवती की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि उस समाज का दर्पण है जहाँ दहेज, अनमेल विवाह, संदेह और रूढ़ सामाजिक मान्यताएँ एक स्त्री का जीवन नष्ट कर देती हैं। प्रेमचंद ने इस कृति के माध्यम से तत्कालीन भारतीय समाज की उन कुरीतियों पर तीखा प्रहार किया है, जिनकी पीड़ा आज भी कहीं न कहीं दिखाई देती है।

निर्मला- प्रेमचंद 

नमस्ते पाठक मित्रो,

Tuesday, 16 June 2026

727. पूनम का चाँद- सुरेश साहिल

प्रेम और वासना के बीच का कड़वा सच
पूनम का चांद- सुरेश साहिल

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के सितारे सुरेश साहिल जी द्वारा लिखा गया 'पूनम का चांद' उपन्यास समाज से खत्म होते रिश्ते, बढती लालसा, मजबूर जनता के साथ अच्छे लोगों की कथा कहता यह उपन्यास तात्कालिक समय का एक बोल्ड कथा‌नक है। 
  पूनम का चांद उपन्यास की समीक्षा से पूर्व हम इसके प्रथम दृश्य को देखते हैं।

पूनम का चांद- सुरेश साहिल

"अमरपुर आ गया बाबू...।" पास बैठे वृद्ध की आवाज उसके कानों में पड़ी थी। चौंककर ही उसने आंखें खोली थीं।
प्लेटफार्म पर ट्रेन रुक चुकी थी। इधर-उधर नजर डाली। डिब्बा खाली हो चुका था...। वह उठा था। उठकर जूते निकाले थे सीट के नीचे से...। बालों में हाथों की उंगलियों से कंघी करते हुए ही प्लेटफार्म पर उतरा था।
प्लेटफार्म पर नजर दौड़ाई, तो इक्का-दुक्का ही लोग घूमते दिखाई दिये थे उसे ।
"क्या टाइम हुआ है?" उसने पूछा था बराबर से गुजरते हुए व्यक्ति से। रेलवे का ही कोई कर्मचारी लगा था।
"चार बजे हैं।" समय बताकर वह व्यक्ति आगे बढ़ गया था।
"प्लेटफार्म पर ही सुबह होने का इन्तजार करना पड़ेगा...।" वह बड़बड़ाया था।

Wednesday, 10 June 2026

726. अछूत - दया पवार

‘अछूत’ : दलित जीवन की पीड़ा, संघर्ष और आत्मसम्मान का दस्तावेज़
अछूत - दया पवार, दलित आत्मकथा

मराठी दलित साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर दया पवार की आत्मकथात्मक कृति ‘अछूत’ भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, गरीबी, अपमान और संघर्ष की ऐसी मार्मिक कथा है, जो केवल एक व्यक्ति की जीवन-गाथा नहीं रह जाती, बल्कि पूरे दलित समाज के सामूहिक अनुभव का दस्तावेज़ बन जाती है। यह रचना पाठक को भावुक ही नहीं करती, बल्कि उसे सामाजिक यथार्थ से सीधा सामना करने के लिए विवश भी करती है।

अछूत - दया पवार- दलित आत्मकथा

   ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की आत्मकथा 'जूठन' बहुत समय पहले पढी थी और उसके बाद दलित साहित्य में दया पवार जी की आत्मकथा 'अछूत' पढने का अकसर मिला है।
        जब कभी भी वह अकेला होता है, उससे अक्सर मेरी मुलाक़ात हो जाती है। जब से मैंने होश सँभाला है, तब से मैं उसे अच्छी तरह पहचानता हूँ। जितना अपनी परछाईं से परिचय हो, उतना परिचित है वह। पर कभी-कभी अँधेरा छा जाने पर या बदली छा जाने पर जैसे स्वयं की परछाई लुप्त हो जाती है, वैसे ही वह भी लुप्त हो जाता है। पिछले कई वर्षों से उसे भीड़ से बड़ा लगाव रहा है। हमेशा किसी के साथ या सभा-सम्मेलनों में दिखाई देता है।(प्रथम पृष्ठ से चंद पंक्तियां)
  

Saturday, 23 May 2026

725. रेत का संगीत- वेदप्रकाश काम्बोज

अंतरराष्ट्रीय अपराधी की डकैती कथा
रेत का संगीत- वेदप्रकाश काम्बोज

वेदप्रकाश काम्बोज जी का एक रोचक उपन्यास 'रेत का संगीत' पढने को मिला है। यह जासूस विजय शृंखला का उपन्यास है। यह एक अंतरराष्ट्रीय अपराधी की डकैती की रोमांच कहानी है। एक ऐसा अपराधी जिसे अमेरिका जैसे देश भी पकड़ने में असफल रहे और जब उस अपराधी की विजय से भिड़ंत हुयी तब जन्मी एक रोमांचक कहानी रेत का संगीत ।

रेत का संगीत - वेदप्रकाश काम्बोज

        भारिया सोनापुर के सबसे खूबसूरत होटल नियाग्रा के कम्पाउन्ड में टैक्सी से उतरी और उसने मीटर देखकर ड्राइवर को पैसे दिये कुछ पैसे अधिक ही दिये गये थे। इसलिये ड्राइवर ने उसे सलाम किया किन्तु उसके सलाम का कोई उत्तर न देकर वह होटल के दरवाजे की ओर बढ़ गई ।

Saturday, 16 May 2026

724. खून‌ की कसम- वेदप्रकाश काम्बोज

चीनी षड्यंत्र और भारतीय जासूस 
खून की कसम - वेदप्रकाश काम्बोज

वेदप्रकाश काम्बोज उपन्यास साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं और उनका एक प्रसिद्ध पात्र है विजय । जासूस सम्राट विजय । विजय को आधार बनाकर काम्बोज जी ने विभिन्न प्रकार के उपन्यास लिखे हैं जिनमें मुख्य हैं अंतर्राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर आधारित उपन्यास । ऐसा ही कहानी है प्रस्तुत उपन्यास की जहां एक पात्र ने विजय को खून की कसम दी थी, क्या थी वह खून‌ की कसम।
  अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र पर आधारित एक रोचक उपन्यास है -खून की कसम
           भारतीय सीक्रेट सर्विस में एक बहुत बड़ा हेर फेर हो गया ।
चीनी खतरे को देखते हुए प्रतिरक्षा मंत्रालय से विजय के पास आदेश आए कि सीक्रेट सर्विस का कुछ विस्तार किया जाए ताकि चीनी कार्यवाहियों को और देश के दुश्मनों की कार्यवाहियों को समय पर रोक कर देश की रक्षा की जाए ।

Saturday, 9 May 2026

723. गुप्त हत्यारा- वेदप्रकाश काम्बोज

एक हत्यारे की तलाश में मित्र
गुप्त हत्यारा- वेदप्रकाश काम्बोज

आदरणीय वेदप्रकाश काम्बोज जी ने बहुत लिखा है और उनकर लेखन में विविधता भी रही है। जहां उन्होंने दीर्घ उपन्यासों से पाठकों का मनोरंजन किया है वहीं अपने लेखक के आरम्भिक दौर में लघु उपन्यासों का भी सृजन किया है। 
उनका प्रस्तुत उपन्यास मात्र एक कहानी नहीं है, यह मात्र यह जानने का प्रयास नहीं है कि 'गुप्त हत्यारा' कौन है । यह मित्रों के विश्वास की कहानी है, उनके ठहाकों का समंदर है, उनके अपनत्व का आसमान है।  
गुप्त हत्यारा- वेदप्रकाश काम्बोज

'ओ गुरुमुख ?'
'हो चन्दर !' इसी स्वर में उत्तर मिला ।
'ओ, यह पत्र क्या कहता होए ?'
'क्या कहता है ?'
'यह कहता है कि इसे मुझे नहीं पढ़ना चाहिए !'
'क्यों ?'
'उस हरामजादे ने पत्र केवल तुझे ही लिखा है !'
'देखू !'
चन्द्रप्रकाश ने, जिसे कि चन्दर कहकर पुकारा जाता था, पत्र, सरदार गुरुमुखसिंह की ओर बढ़ा दिया। गुरुमुख ने अपनी एक ओर की मूंछ को बल देते हुए लिफाफे का पता देखा, ऊपर केवल उसका नाम लिखा हुआ था ।

Sunday, 3 May 2026

722. भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज

कबाड़ी, मदारी,तातारी का एक और कारनामा
भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज

लोकप्रिय कथाकार श्री वेदप्रकाश काम्बोज जी ने जासूसी साहित्य में जासूसी उपन्यासों में हास्य जासूसी उपन्यासों का भी सृजन किया है। हम इस से पूर्व 'मौत की आवाज' नामक उपन्यास की चर्चा कर चुके हैं और अब प्रस्तुत है इन्हीं की कलम से निकला एक और हास्य जासूसी उपन्यास 'भेदभरी हत्या' ।
यह उपन्यास वेदप्रकाश काम्बोज जी के तीन पात्र कुंदन कबाड़ी, गोकुल मदारी और फन्ने खां तातारी सीरीज का एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है। 

भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज

विज्ञापनबाजी करने के बावजूद जब के० एफ० जी० प्राइवेट डिटेक्टिव कम्पनी के अन्दर कोई भी केस नहीं आया तो उस कम्पनी के तीनों मालिकनुमा चपरासियों को कारण पर विचार करने के लिए विवश होना पड़ा।
बनाई जैसी कि अन्तिम दृश्य में सोचने के समय कुन्दन कबाड़ी ने ऐसी ही मुद्रा देवदास की भूमिका में दिलीप कुमार ने फिल्म के पारो के घर के सामने बनाई थी। इसके पश्चात मस्तिष्क की खुली सड़क पर विचारों का ताँगा कारण की तलाश में बिना कोचवान के खुला छोड़ दिया गया ।

721. मौत की आवाज- वेदप्रकाश काम्बोज

कबाड़ी, तातारी और मदारी का प्रथम उपन्यास
मौत की आवाज- वेदप्रकाश काम्बोज

विजय ने दरवाजा खोला ।
और गुरुदेव का उच्च नाद करते हुए तीन नमूनों ने उसके पैर पकड़ लिए। चकित सा विजय पहले तो उन तीनों के काले सिरों को देखता रहा जो उसके पैरों के निकट इस तरह एकत्रित हो गए थे जैसे तीन विभिन्न रेखाएं एक बिन्दु पर आकर मिल गई हों।
विजय ने आशीर्वाद की मुद्रा में अपने हाथ फैलाये और फिर गुरू ने गम्भीर मुद्रा में कहा- 'सदा खाओ गुड़ के सेव ।'

'धन्य हैं गुरुदेव आप धन्य हैं।' उन तीनों ने उसके पैर पकड़े हुए समवेत स्वर में कहा। किसी ने भी सिर उठाकर देखने की चेष्टा नहीं की।  

Wednesday, 29 April 2026

720. मौत की परछाई - कर्नल रंजीत 1981

विदेशी षड्यंत्र और वैज्ञानिकों की हत्या
मौत की परछाई-  कर्नल रंजीत

कर्नल रंजीत के विचित्र संसार में आपका एक बार फिर स्वागत है। राजस्थान के संगरिया निवासी मित्र रतन चौधरी जी से प्राप्त कर्नल रंजीत के 15 उपन्यासों की समीक्षा के क्रम में यह 15 वां उपन्यास है‌ इस से पूर्व रतन चौधरी जी से प्राप्त चौदह उपनिवेश की समीक्षा पढे चुके हैं जिनके क्रमश: नाम हैं- ' दुल्हन की चीख, पीले बिच्छू, प्रेतात्मा की डायरी, उलटी लाशें, नकली चेहरे, ट्रेन एक्सीडेंट, हत्यारे की पत्नी, खूनी बदला, चण्डीमंदिर का रहस्य, जापानी पंखा, मेजर बलवंत बांगलादेश में, विजयदुर्ग का रहस्य, उलटी खोपड़ी, कातिल मेरा नाम'  और अब प्रस्तुत है पन्द्रहवें उपन्यास  'मौत की परछाई' की समीक्षा। 
मौत के साये
एयर इंडिया का विभान उड़ान भरने के लिए रनवे पर तैयार खड़ा था। अधिकांश यात्री अपनी-अपनी सीट पर बैठ चुके थे ।