Sunday, 3 May 2026

भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज

कबाड़ी, मदारी,तातारी का एक और कारनामा
भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज

लोकप्रिय कथाकार श्री वेदप्रकाश काम्बोज जी ने जासूसी साहित्य में जासूसी उपन्यासों में हास्य जासूसी उपन्यासों का भी सृजन किया है। हम इस से पूर्व 'मौत की आवाज' नामक उपन्यास की चर्चा कर चुके हैं और अब प्रस्तुत है इन्हीं की कलम से निकला एक और हास्य जासूसी उपन्यास 'भेदभरी हत्या' ।
यह उपन्यास वेदप्रकाश काम्बोज जी के तीन पात्र कुंदन कबाड़ी, गोकुल मदारी और फन्ने खां तातारी सीरीज का एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है। 

भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज

विज्ञापनबाजी करने के बावजूद जब के० एफ० जी० प्राइवेट डिटेक्टिव कम्पनी के अन्दर कोई भी केस नहीं आया तो उस कम्पनी के तीनों मालिकनुमा चपरासियों को कारण पर विचार करने के लिए विवश होना पड़ा।
बनाई जैसी कि अन्तिम दृश्य में सोचने के समय कुन्दन कबाड़ी ने ऐसी ही मुद्रा देवदास की भूमिका में दिलीप कुमार ने फिल्म के पारो के घर के सामने बनाई थी। इसके पश्चात मस्तिष्क की खुली सड़क पर विचारों का ताँगा कारण की तलाश में बिना कोचवान के खुला छोड़ दिया गया ।
रैड एण्ड ह्वाईट के दो पैकेट और कोकाकोला की चार बोतलें, एक गिलास और बन्द कमरा । सोचने के लिए यह चीजें चुनीं गोकुल मदारी ने । बाँए हाथ की पहली दो उंगलियों के बीच में सिगरेट दबी हुई थी और उसी हाथ पर चेहरा इस प्रकार टिका हुआ था कि उंगलियों में दबी हुई सिगरेट का एक सिरा उसके माथे के कोने से टकरा रहा था । बाँए हाथ में दबा हुआ था गिलास जिसमें कोका-कोला डालकर उसको रम की तरह पिया जा रहा था। गोकुल मदारी का ख्याल था कि इस ढंग से सोचने पर अक्ल की बात जल्दी ही सूझ जाती है।
         सोचने का सर्वाधिक विचित्र तरीका था फन्नेखाँ तातारी का । कारण तलाश करने के लिए उस शेर ने रात में जागना और दिन में सोना आरम्भ कर दिया था। रात जब अपना तारों भरा आंचल फैलाती और फन्नेखाँ तांतारी पलंग पर से उठकर छत पर जा बैठता और तारे गिनना आरम्भ कर देता और फिर जब सुबह के समय रात का तारों भरा आँचल सिमटता तो फन्नेखाँ तातारी छत से उठकर पलंग पर पहुंच जाता। गनीमत यही हुई कि किसी ने भी तातारी को विरही प्रेमी समझने की सुनहरी भूल नहीं की ।
(प्रथम पृष्ठ, भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज)
    हमने पूर्व उपन्यास 'मौत की आवाज' में पढा था कि कबाड़ी, मदारी और तातारी अपनी 'के० एफ० जी० प्राइवेट डिटेक्टिव कम्पनी' के उद्घाटन के लिए जासूस विजय को आमंत्रित करने जाते हैं और विजय उनके सामने अफ्रीका के जंगलों से काले शेर का शिकार कर लाने का प्रस्ताव रखता है। -मैं चाहता हूं कि मेरे तीनों चेले तीन काले शेरों का शिकार करें और उनकी खाल लाकर दें।'
      अब वही तीनों चेले अपनी 'के० एफ० जी० प्राइवेट डिटेक्टिव कम्पनी' सूंदरनगर में खोल कर बैठे हैं पर उनके पास कोई केस नहीं आता । 
उन्हें अब कारण मालूम हुआ कि उनकी डिटेक्टिव कंपनी जिस कारण से इतने भारी विज्ञापन के बाद भी नहीं चली। कारण मामूली किन्तु उनके दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण था। कारण के जानने पर उन्हें यह मानने पर विवश होना पड़ा कि इसीलिए उनकी प्राइवेट कंपनी में कोई केस नहीं आया ।
आखिर केस आता कहाँ से ? उन्होंने जासूसी उपन्यास के प्राइवेट जासूस की भाँति कोई लेडी सैक्रेटरी नहीं रखी हुई थी जो वि पत्नी के अतिरिक्त प्रत्येक कर्त्तव्य का पालन बड़ी तत्परता के साथ करती है।
      उन्होंने बड़ी गम्भीरता के साथ मनन किया और माना वास्तव में जिस डिटेक्टिव कंपनी के पास एक लेडी सैक्रेटरी भी हो वह क्या खाक चलेगी ।
फिर विचार विमर्श के बाद वह एक लड़की को सही सैक्रेटरी रखते हैं जिसका नाम है रजनी । और रजनी कम से कम इन तीनों जासूसों से ज्यादा बुद्धिमान तो है।
'जी मेरा नाम रजनी है और पिताजी का नाम श्री जानकी दास और माताजी का नाम श्रीमती दयावती है। मेरे कोई भाई नहीं है।'
   और संयोग देखे की सेक्रेटरी रखने के बाद एक केस उनके पास आ ही गया।
कापी खोलकर मेज पर रखी और पेंसिल हाथ में पकड़कर उस से पूछा- 'आपका नाम ?'
'केदारनाथ ।'
'पता ?'
'रानी बिला, करोलबाग, देहली
यह लिखने के पश्चात रजनी ने पूछा- 'आपकी पत्नी देहली में खोई थीं या यहां सुन्दरनगर में?' 
'यहीं सुन्दरनगर में ।'

हां, यह तो रजनी थी जिसने इस केस को संभाल लिया वरना तीनों जासूसों ने तो हमदर्दी का अलग ही राग छेड़ दिया था। 
जब केदारनाथ उनके पास आता है तो और उनसे बातचीत करता है यह दृश्य देखें-
'मेरी पत्नी खो गई है।'
फन्नेखाँ तातारी ने केदार के स्वर में छिपे दर्द को अनुभव किया । और सहानुभूति जताते हुए कहा- 'हाय, हाय, हाय कितना बुरा हुआ है ? क्या खुदा की मार पड़ी है? बीवी खो गई, ओए... होए।'
शोक प्रकट करने में वे दोनों भी पीछे नहीं रहे, बोले 'ओ... हो पत्नी खो गई ? भगवान यह दिन किसी को न दिखाए कि उसकी पत्नी खो जाए।'
अभी तक रजनी अपने स्थान पर ही बैठी हुई थी। उसने जब उनकी यह बेतुकी बातें सुनी तो सिर को इस ढंग से हिलाया जैसे मन ही मन कह रही हो कि इन लोगों को अक्ल नहीं आएगी ।

     और रजनी के निर्देशानुसार ही तीनों जासूस केदारनाथ की पत्नी को खोजने का काम करते हैं। तीनों जासूस महोदय का अपना कोई विशेष दृष्टिकोण नहीं है वह तो सैक्रेटरी रजनी के आदेश की पालना में एक स्थान से दूसरे स्थान तक, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पूछताछ अवश्य करते हैं और उस में भी मात खा जाते हैं।- तीनों में से जब भी कोई किसी काम पर भेजा जाता है तो उसकी वापसी लगभग पिटे हुए सिपाही की भाँति ही होती है । (पृष्ठ)
   वहीं एक घटनाक्रम में तो मिस्टर कबाड़ी अपनी प्रशंसा सुन कर ही बौरा जाते हैं और स्वयं को एक महान जासूस मानकर वह काम भी कर लेते हैं जो आज तक नहीं किया था।
कबाडी को बौखलाते देखकर चाँद बोला- 'दुनिया का प्रत्येक महान व्यक्ति पीता है और आप भी तो एक महान जासूस हैं जिसकी समता कोई नहीं कर सकता ।' (49)
  अब किस्सा मदारी का भी सुन लीजिए- 
- इससे पहले कि वह सम्भल सकता मदारी पूरी तेजी के साथ वहां से भाग लिया । वेटर भी उसके पीछे भागा । किन्तु मदारी और किसी चीज में उस्ताद था या नहीं, यह एक विवादास्पद विषय है किन्तु यह सच है कि वह दौड़ने में उस्ताद था ।
 तो यह कहानी है तीन जासूसों की जिनके पास एक गायब स्त्री को खोजने केस आता है और फिर वह अपने कार्य को अंजाम देते हैं। उपन्यास गायब स्त्री से लेकर हत्या की कहानी तक में परिवर्तित हो जाता है। और इसी गायब स्त्री और हत्या के रहस्य को हल करते की जिम्मेदार केदरानाथ से मिल चुकी है तीन जासूस मित्रो को। आप जासूस मित्रो के कारनामे तो जानते ही हैं, जासूस इनके बस का काम नहीं है यह तो भली है इनकी सेक्रेटरी रजनी जिस के बल पर कार्य आगे बढता है।
   बात करें कहानी की तो कहानी चाहे सामान्य है पर रोचकता लिये हुये है। कहानी में ट्विस्ट है, एक्शन, रोमांच है और हास्य भी । कथा का कलेवर थोड़ा छोटा है लेकिन उतना ही कसावट लिये हुये है। 
उपन्यास में जो कमी है वही हास्य का आधार है और कमी है तीनों जासूसों की अपरिपक्वता । 
निष्कर्ष में हम कस सकते हैं वेदप्रकाश काम्बोज जी का उपन्यास 'भेदभरी हत्या' एक मर्डर मिस्ट्री और एक गायब स्त्री की मध्यम स्तर की कहानी है। कहानी में रोचकता और हास्य है। उपन्यास मनोरंजन की दृष्टि से पठनीय है, विशेषकर उन पाठकों के लिए अच्छा है जो कबाड़ी, मदारी और तातारी के उपन्यास पसंद करते हैं या हास्य कथा पढना चाहते हैं।

उपन्यास-  भेदभरी हत्या
लेखक-     वेदप्रकाश काम्बोज
पृष्ठ -         108
प्रकाशक-  कथाकार पॉकेट बुक्स, दिल्ली
आवरण पृष्ठ- शैले
संपादक-      श्रद्धानंद

मौत की आवाज- वेदप्रकाश काम्बोज

कबाड़ी, तातारी और मदारी का प्रथम उपन्यास
मौत की आवाज- वेदप्रकाश काम्बोज

विजय ने दरवाजा खोला ।
और गुरुदेव का उच्च नाद करते हुए तीन नमूनों ने उसके पैर पकड़ लिए। चकित सा विजय पहले तो उन तीनों के काले सिरों को देखता रहा जो उसके पैरों के निकट इस तरह एकत्रित हो गए थे जैसे तीन विभिन्न रेखाएं एक बिन्दु पर आकर मिल गई हों।
विजय ने आशीर्वाद की मुद्रा में अपने हाथ फैलाये और फिर गुरू ने गम्भीर मुद्रा में कहा- 'सदा खाओ गुड़ के सेव ।'

'धन्य हैं गुरुदेव आप धन्य हैं।' उन तीनों ने उसके पैर पकड़े हुए समवेत स्वर में कहा। किसी ने भी सिर उठाकर देखने की चेष्टा नहीं की।  

Saturday, 18 April 2026

उलटी खोपड़ी- कर्नल रंजीत- 1980

मूर्ति चोरी और ब्लैकमेल की रोचक कथा
उलटी खोपड़ी- कर्नल रंजीत

एक बार फिर SVNLIBRARY पर प्रस्तुत है कर्नल रंजीत द्वारा लिखा गया एक ऐसा रोचक उपन्यास जो आपको सम्मोहित कर लेगा। एक ऐसे व्यक्ति की कहानी जो अप‌नी मृत्यु के छह महीने बाद एक प्रश्न स्वयं से करता है- मरने के छः महीने बाद क्या वह फिर जीवित हो उठा था ?

इनाम
यह बात आज से छः महीने पहले की है । अगस्त का महीना था। स्थानीय समाचारपत्न 'दि क्रानिकल' के फोटोग्राफर कमलकिशोर को, बम्बई में मैक्सिको के राष्ट्राध्यक्ष के आगमन पर खींचे गए फोटो के लिए समाचार-पत्र के मालिक ने पांच सौ रुपये इनाम दिया। उसने इनाम मिलने पर सोचा कि आज तो उसे अपनी पत्नी का उलाहना दूर कर ही देना चाहिए और उसे 'उन्यालो बन्दर' ले जाकर चीनी खाना खिला ही देना चाहिए जो उसे बहुत पसन्द था । उसकी पत्नी ज्योत्स्ना 'परेल' की टैक्सटाइल मिल के अकाउंट्स विभाग में नियुक्त थी। उसका विवाह हुए एक वर्ष हुआ था। यहू प्रेम-विवाह था। पति पत्नी के जीवन में पहले एक और समानता भी थी ज्योत्स्ना भी अकेली थी और कमल किशोर भी। उन दोनों का कोई सम्बन्धी नहीं था। विवाह से एक महीना पहले कमलकिशोर ने 'अन्धेरी' में 'मधुबन' नामक भवन की पहली मंजिल पर चालीस हजार रुपये में एक शानदार फ्लैट खरीदा था ।
कमलकिशोर ने ज्योत्स्ना को फोन किया कि वह आज अपने आफिस से पांच की बजाय चार बजे उठ आए और घर पहुंच जाए । उसने अपनी पत्नी को यह निर्देश इसलिए किया कि ज्योत्स्ना को जब भी बाहर जाना होता था तो बनाव-शृंगार में वह बहुत देर लगा देती थी । ज्योत्स्ना ने वचन दिया कि वह चार बजे आफिस से उठकर पांच बजे घर पहुंच जाएगी ।
(उलटी खोपड़ी- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)
         नमस्ते पाठक मित्रो, प्रसिद्ध लेखक कर्नल रंजीत के एक और रहस्यमयी विचित्र उपन्यास समीक्षा में आपका हार्दिक स्वागत है। यह उपन्यास उनके अन्य उपन्यासों से कुछ हटकर है, वैसे तो आपको उनकी शैली का पता ही होगा लेकिन प्रस्तुत उपन्यास का आरम्भ इतने रोचक ढंग से होता है की पाठक उसे छोड़ ही नहीं सकता। आपने ऊपर उपन्यास का प्रथम पृष्ठ पढ लिया है और अब हम उस से आगे बढकर उपन्यास समीक्षा की तरफ चलते हैं।
     'दी क्रॉनिकल' समाचार पत्र के फोटोग्राफर कमलकिशोर के साथ एक अत्यंत अनोखी घटना घटित होती है। वह जब घर पहुंचता है और उसके बाद जब वह होश में आता है तो स्वयं कमलकिशोर के साथ-साथ पाठक भी चकित रह जाता है कि आखिर यह हो क्या गया।
"....क्या उसे मरे हुए पूरे छः महीने बीत चुके थे ? मरने के छः महीने बीत चुके थे ? मरने के छः महीने बाद क्या वह फिर जीवित हो उठा था ? लेकिन मरने के बाद भी कभी कोई जीवित बचा है ? वह हजरत ईसा तो था नहीं। वह यह सोचने पर विवश हो उठा कि वह कमलकिशोर था या कोई और था ।(पृष्ठ- 14)
   आखिर यह रहस्य क्या था ? एक आदमी जो छह महीनों बाद स्वयं से यह प्रश्न करता है की वह जीवित है या मर चुका है। जबकि उसके पास उपलब्ध समाचार पत्र यह प्रमाणित करते हैं कि वह मर चुका है। अगर वह मर चुका है तो अब कहां है? अगर वह जीवित है तो मर कौन चुका है ? और फिर छह महीने का लम्बा समय कहां गायब हो गया ? 
एक अजीब से पहेली है यह घटना जिसे 'दि क्रॉनिकल' कथित मृतक फोटोग्राफर कमलकिशोर नहीं सुलझा सकता था। तो इस पहेली को हल कौन करेगा।  उन दिनों ऊटी में मेजर बलवंत अपने साथियों के साथ आया हुआ था जब 'दि क्रोनिकल' के संपादक और फोटोग्राफर कमलकिशोर जासूस मेजर बलवंत से मिले और संपादक महोदय ने मेजर बलवंत को कहा- 
          जब 'दि क्रानिकल' के मालिक सेठ पुरुषोत्तम नागर मेजर बलवन्त के पास ही सोफे पर बैठ गए तो उन्होंने अपने साथी नौजवान की ओर इशारा करके कहा, "मेजर साहब, यह वही हमारे प्रेस फोटोग्राफर कमलकिशोर हैं, जिनकी छः महीने पहले हत्या कर दी गई थी।"
"क्या ?” मेजर बलवन्त ने आश्चर्य से कहा और कमल-किशोर की ओर फटी-फटी आंखों से देखने लगा ।
(पृष्ठ...)
     और इस तरह यह केस आता है मेजर बलवंत के पास । हालांकि मेजर बलवंत समाचार पत्रों के माध्यम से पहले ही फोटोग्राफर कमलकिशोर हत्याकांड के विषय में दिलचस्पी ले रहा था लेकिन जब उसके ‌पास यह केस आया तो वह सक्रिय हो उठा। 
कहानी सिर्फ यही नहीं है की कमलकिशोर हत्याकांड कैसे और किसने अंजाम दिया इसके साथ एक और पहलू जुड़ा हुआ है और वह पहलू है कमलकिशोर की पत्नी ज्योत्स्ना से । पूरे प्रकरण में ज्योत्स्ना कहीं नहीं है। वह अपने घर से लापता है और किसी को भी नहीं पता की आखिर ज्योत्स्ना कहां गायब हो गयी। 
      अब मेजर बलवंत को एक तरफ जहां कथित हत्याकांड को हल करना था वहीं उसे ज्योत्स्ना को भी तलाश करना था । लेकिन जैसे जैसे मेजर बलवंत की जांच आगे बढती है उसके राह में आ खड़ा होता है 'ईंट का बादशाह ', जी हां, ईंट का बादशाह ।
चलो पहले आपको इस ईंट के बादशाह से ही मिलवा देते हैं और वह भी पुलिस के माध्यम से।
"रुकिए, मैं आपको दिखाता हूं।" कहकर इन्स्पेक्टर ने अपना बैग खोला। बैग में से उसने एक खंजर निकाला जिसकी नोक पर ताश का एक पत्ता था। वह ईंट का बादशाह था । और खंजर की नोक ईंट के बादशाह के होंठों में से गुजर रही थी। इन्स्पेक्टर ने खंजर की नोक में से ताश का पत्ता निकाला बौर मेजर को दिखाते हुए कहा, "देखिए ! ताश के पत्ते की सफेद जगह पर लिखा हुआ है- 'जो कोई मुंह खोलेगा, खंजर उसके मुंह में घोंप दिया जाएगा।' मेजर साहब, इसका क्या मतलब हो सकता है ?"
    जब ऐसी धमकी दी जा रही हो तो कौन अपना मुँह खोलना पसंद करेगा और कौन अपनी जान का दुश्मन बनेगा। क्या पता कब ईंट का बादशाह उसकी जान ले ले ।
   वहीं कहानी में एक और घटनाक्रम भी साथ- साथ में चलता है। क्योंकि कहानी सिर्फ फोटोग्राफर कमलकिशोर या उसकी पत्नी तक सीमित नहीं है कहानी में और भी बहुत से छोटे- बड़े ट्विस्ट साथ-साथ में चलते हैं और वहीं ट्विस्ट कहानी को रोचक और पठनीय भी बनाते हैं। जैसे की मूर्ति चोरी,भगवान बुद्ध का चमकदार पैर आदि।
"मेजर साहब, मूर्तियों के बिना यह मन्दिर उजाड़ और वीरान दिखाई देने लगा है। भगवान शिव ही जानें कि उनकी इच्छा क्या है। फिर भी मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप उन मूर्तियों का किसी तरह पता लगाइए । वे मूर्तियां इस मन्दिर की ही नहीं बल्कि हमारे समूचे देश की धार्मिक, ऐतिहासिक और कलात्मक धरोहर हैं। मन्दिर के पास धन की कमी नहीं है। आपको मुंह मांगा पारिश्रमिक दूंगा मेजर साहब !" आचार्य  विठ्ठल पन्त ने अनुरोध-भरे स्वर में कहा ।(73)
      अब कहानी कमलकिशोर और ज्योत्स्ना से आगे बढकर मूर्ति चोरी तक आ गयी है। क्योंकि उपन्यास में एक ऐसा गिरोह भी सक्रिय है जो ऐतिहासिक मूर्तियाँ की चोरी करता है । और अब एक पहलू और रह गया और वह है 'लाल साहब और मैम' का । यह उपन्यास के दो महत्वपूर्ण पात्र हैं। बाकी आपको पता ही कर्नल रंजीत के उपन्यास मर्डर मिस्ट्री होते हैं।
  तो अब एक तरफ कमलकिशोर की कथित हत्या, लापता ज्योत्स्ना, मूर्ति चोरी, लाल साहब- मैम, ईंट का बादशाह और हत्या । इन सब को अब एक माला में पिरो कर एक शानदार, रहस्य-रोमांच से भरपूर उपन्यास बनती है 'उलटी खोपड़ी' ।
 विशेषता:-
कर्नल रंजीत के उपन्यासों की कुछ विशेषताओं का हम वर्णन करते आये हैं । इ‌नकी एक विशेषता है पात्र का नख शिख वर्णन । यहाँ भी एक आठ साल पहले के पात्र का वर्णन इतना स्टीक है जैसे अभी की बात हो।
"कैसा व्यक्ति था ?” मेजर ने पूछा ।
"उस व्यक्ति की आंखें नीले शोलों की तरह थीं और बड़ी-बड़ी थीं। आंखों पर पलकें नहीं थीं। सांप या पक्षी की तरह वह आंखें नहीं झपकता था। सिर से बह पूरी तरह गंजा था। सिर बहुत अधिक बड़ा था। उसका माथा चौड़ी तख्ती की तरह था । कान उसके लम्बे थे और कानों की लवें बहुत नुकीली थीं । उसकी नाक मोटी थी और कुछ मुड़ी हुई थी। देखने में वह प्राचीन मूर्ति-सा लगता था।  

    अब देखिये आठ साल पहले के आदमी का कितना गजब वर्णन किया गया है। और ऐसा वर्णन इनके बहुत से उपन्यासों में मिलता है।
लाल साहब:-
उपन्यास में लाल साहब और मैम का विशेष वर्णन हैपर लाल साहब का दोहरीकरण समझ से बाहर है। लाल साहब दो क्यों थे ?
शे'र- 
चलते- चलते मेजर बलवंत का एक शे'र हो जाये-
दूध है पानी यहां और इसका पानी जहर है। 
एक कब्रिस्तान है, यारो, कि अपना शहर है।"
(148)
 निष्कर्ष में कर्नल रंजीत द्वारा लिखे गये 'उलटी खोपड़ी' उपन्यास को एक रोचक और पठान उपन्यास कह सकते हैं। एक विचित्र और रोचक घटनाक्रम से आरम्भ होकर मूर्ति चोरी, ब्लैकमेल और हत्या जैसे घटनाओं से गुजरता हुआ यह उपन्यास पाठक का मनोरंजन करने में सक्षम है।

उपन्यास-  उलटी खोपड़ी
लेखक-     कर्नल रंजीत
संस्करण-  1980
पृष्ठ -         183
प्रकाशक-  हिंद पॉकेट बुक्स, दिल्ली

कर्नल रंजीत के अन्य उपन्यासों की समीक्षा
विजय दुर्ग का रहस्य ।। मेजर बलवंत बांगलादेश में ।। नकली चेहरे ।।  उलटी लाशें ।। प्रेतात्मा की डायरी ।।  पीले बिच्छू ।। आग का समंदर ।। रात के अंधेरे में ।। भयानक बौने ।। देख लिया तेरा कानून ।। टेडा मकान ।।  हत्यारा पुल ।। रेत की दीवार ।। जानी दुश्मन ।। चीखती चट्टानें ।। खून के छींटें ।। सिरकटी लाशें ।। सफेद खून ।। चांदी की मछली ।। काला चश्मा ।। बोलते सिक्के ।। 11 बजकर 12 मिनट ।। हांगकांग के हत्यारे ।। लहू और मिट्टी  ।। मृत्यु भक्त ।। वह कौन था ।। सांप की बेटी ।।  खामोश ! मौत आती है ।। काली आंधी ।। हत्या का रहस्य ।।  अधूरी औरत ।।  ट्रेन एक्सीडेंट ।। हत्यारे की पत्नी ।। खूनी बदला ।।



Saturday, 11 April 2026

विजय दुर्ग का रहस्य- कर्नल रंजीत- 1983

राजमहल के षड्यंत्र की कहानी
विजय दुर्ग का रहस्य- कर्नल रंजीत

  लोकप्रिय कथा साहित्य में प्रतिशोध और रहस्यमयी- विचित्र कथाओं के लिए कर्नल रंजीत का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। उलझे कथानक, ज्यादा पात्र और शृंखलाबद्ध हत्याएं उ‌नके उपन्यासों की विशेषता रही है। 
मैं इन दिनों सतत् कर्नल रंजीत के उपन्यास पढ रहा हूँ और मनोरंजन की एक अलग ही दुनिया में विचरण कर रहा हूँ। मनोरंजन की इस अनोखी दुनिया में आप भी मेरे साथ-साथ घूम लीजिए- विजयदुर्ग का रहस्य उपन्यास में।

सस्पेंस, रोमांच, साहसपूर्ण घटनाओं के जादूगर कर्नल रंजीत का रोंगटे खड़े कर देने वाली अनूठी कहानी से पूर्ण चौंका देने वाला नया विशेषांक
विजयदुर्ग का रहस्य
उपन्यास के मुख्य आकर्षण
- पतंग के आकार के दिल दहलाने वाले जैट विमान।
- कांच की गोली से राजमहल में धमाका ।
- तालों में बंद लाश का गायब हो जाना ।
- मेजर बलवंत और सोनिया के बेजान शरीर हिलाने - डुलाने पर भी न हिले ।
- मंदिर में पूजा करती हुई महिला सहसा लापता ।
- प्रेम में असफलता और राज घराने की पुश्तैनी दुश्मनी कितना भयानक रूप धारण कर गई यह जानने के लिए पढ़िए 'विजयदुर्ग का रहस्य' ।(अंतिम आवरण पृष्ठ से)

Saturday, 4 April 2026

मेजर बलवंत बांगलादेश में- कर्नल रंजीत

मेजर की बांग्ला यात्रा और मुक्तिवाहिनी का संघर्ष
मेजर बलवंत बांगलादेश में‌- कर्नल रंजीत

बंगला देश में, मानवता को लज्जित करने वाले पाकिस्तानी तानाशाहों के घोर अत्याचारों तथा भीषण गोला-बारी के बीच, भारतीय जासूस मेजर बलवंत के अत्यन्त साहसिक कार्यों और हैरत में डाल देने वाले जासूसी के चमत्कारों से भरपूर उपन्यास
नमस्ते पाठक मित्रो,
   कर्नल रंजीत के उपन्यासों की समीक्षा में हम संगरिया (राजस्थान) निवासी मित्र रतन चौधरी जी से पढने के लिए प्राप्त हुये 15 उपन्यासों की समीक्षा के क्रम में आज हम पढ रहे हैं 'मेजर बलवंत बांगलादेश में' उपन्यास की समीक्षा ।
     पूर्व में हम 'पीले बिच्छू' नामक उपन्यास पढ चुके हैं जिसमें मेजर बलवंत बांगला देश जाते हैं  और प्रस्तुत उपन्यास में भी वह बांगलादेश जाते हैं पर दोनों उपन्यासों की यात्रा में एक बड़ा अंतर है जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे। 
पहले हम 'मेजर बलवंत बांगलादेश में' उपन्यास के प्रथम पृष्ठ का अवलोकन करते हैं। प्रथम अध्याय का नाम है- मनुष्य का भाग्य ।

Sunday, 29 March 2026

714. चण्डी मंदिर का रहस्य- कर्नल रंजीत- 1990

एक देश की सत्ता पलटने की कहानी
चण्डी मंदिर का रहस्य- कर्नल रंजीत- 1990

एकान्त और रहस्यमय था चण्डी द्वीप। बहुत पुराना मंदिर था यहां। इसी में छिपे थे एटम का रहस्य चुराने वाले और वैज्ञानिकों के हत्यारे। ये विद्रोह कराने में सफल हो गए, पर एक दिन पकड़े गए। पढ़िए रोंगटे खड़े कर देने वाला धमाका।

चण्डीमंदिर का रहस्य - कर्नल रंजीत
एक बार फिर आपका स्वागत है #svnlibrary में जहां आप पढेंगे कर्नल रंजीत के एक विदेशी अभियान को। एक छोटे से देश में किस तरह मेजर बलवंत अपने साथियों के साथ देश को गुलाम बनाने वाले अपराधियों के खतरनाक षडयंत्र को खत्म करता है।
  समीक्षा से पूर्व हम उपन्यास के प्रथम पृष्ठ/ दृश्य को पढते हैं और फिर बात करेंगे उपन्यास के रोचक कथानक की ।

Thursday, 26 March 2026

713. खूनी बदला- कर्नल रंजीत -1980

एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास
खूनी बदला- कर्नल रंजीत- 1980

जवानी की दहलीज पर पैर रखते ही रुक्मिणी देवी ऐसी भयंकर भूल कर बैठती है, जो समाज की निगाह में पाप है। वे चाहती हैं कि उनका पाप छिपा रहे और बेटी पर उस पाप की छाया भी न पड़े। जवान होकर बेटी भी वही पाप कर बैठती है। जीवन का यह रहस्य जैसे-जैसे, जिस-जिस पर प्रकट होता जाता है, एक मोटी औरत वैसे ही उन लोगों की हत्या करती जाती है। पाप बदले का रूप धारण कर लेता है।
बदला लेने वाली औरत कौन है, इसके लिए पढ़िए, रहस्य-रोमांच के चितेरे कर्नल रंजीत का नया उपन्यास - खूनी बदला

    आप इन दिनों @svnlibrary पर लगातार पढ रहे हैं कर्नल रंजीत के उपन्यासों की समीक्षा । मित्र रतन चौधरी से प्राप्त कर्नल रंजीत के उपन्यासों को पढा जा रहा है और उन्हीं से प्राप्त उपन्यास 'खूनी बदला' की समीक्षाएं यहां प्रस्तुत है।
  कर्नल रंजीत के उपन्यास मर्डर मिस्ट्री और प्रतिशोध युक्त होते हैं। प्रस्तुत उपन्यास भी इसी आधार पर रचित एक मनोरंजक उपन्यास है।

Saturday, 21 March 2026

712. हत्यारे की पत्नी- कर्नल रंजीत -1974

समान नाम के लोगों की हत्या का रहस्य
हत्यारे की पत्नी- कर्नल रंजीत -1974

यह 29 साल का रहस्य क्या है ? 
प्रत्येक आदमी दो बार कैसे मर रहा है ? 
हत्या करने वाला किस महान शक्ति का दास है ? 
और मरने वाले को कैसे पता चल जाता है कि उसकी मौत का दिन आ पहुंचा है ?
अपराध-जगत् की सबसे सनसनीखेज और आश्चर्यजनक घटना, जिसमें हत्या तो होती है पर हत्यारा कोई नहीं। मेजर बलवन्त के चारों तरफ एक मायाजाल-सा बुन जाता है। उसे अपराधी का नहीं प्रकृति और भाग्य के गूढ़तम रहस्य का पता लगाना है। वह रहस्य क्या है ? और मेजर बलवन्त उसका कैसे पता लगाता है ?
कर्नल रंजीत ने इस नवीनतम उपन्यास में एकदम अछूते विषय को छुआ है। विषय हजारों साल से उलझा हुआ है और उसे मेजर बलवन्त जैसा तीक्ष्णबुद्धि जासूस ही सुलझा सकता था ।

Monday, 2 March 2026

711. ट्रेन एक्सीडेंट- कर्नल रंजीत

 कहानी नकली दवाइयों की 
ट्रेन एक्सीडेंट- कर्नल रंजीत- 1983

इन दिनों मैं कर्नल रंजीत के उपन्यास ही पढ रहा हूँ। संगरिया (हनुमानगढ़, राजस्थान) निवासी मित्र श्री रतन चौधरी जी से कर्नल रंजीत के 15 उपन्यास लेकर आया था वर अब उन्हीं को पढने का क्रम जारी है।
 और इस क्रम में मेरा यह छठा उपन्यास है। इस से पूर्व में 'पीले बिच्छू, प्रेतात्मा की डायरी, उलटी लाशें, नकली चेहरे और जापानी पंखा' पढ चुका हूँ। 
अद्भुत कथाओं के लेखक कर्नल रंजीत का एक और रोमांच से भरपूर उपन्यास 'ट्रेन एक्सीडेंट' पढा। यह उपन्यास उनकी विशिष्ट शैली में लिखा गया है। जिसनें रहस्यमयी पात्र और उलझाव से भरपूर कहानी का आनंद मिलेगा । 

हिन्दी जासूसरी उपन्यासों के क्षेत्र में रिकार्ड कायम करने वाले कर्नल रंजीत का एक जबर्दस्त सनसनी खेज उपन्यास - ट्रेन एक्सीडेंट
इस उपन्यास में आप पढ़ेंगे -
- अपनी खुशबू से बेहोशी की नींद सुलाने वाली सुन्दरी के अद्भुत कारनामे
- गेरूए वस्त्र धारण किये साधु- बालकों का हत्याकांड
- कृष्ण की मूर्ति द्वारा जबर्दस्त बम विस्फोट
- मेजर बलवंत के घर में जबर्दस्त अग्निकांड
- वैज्ञानिकों की जीभ का काटा जाना और उनके कानों के पर्दों का फाड़ दिया जाना 
हैरानी से भरे हथकंडों की सस्पेंस भरी रोमांचक कहानी -ट्रेन एक्सीडेंट 

Friday, 20 February 2026

710. नकली चेहरे - कर्नल रंजीत

175 साल पुरानी प्रतिशोध कथा
नकली चेहरे - कर्नल रंजीत- 1974

मनुष्य जीवन बहुत ही अनोखा है। उसका जीवन किस पद्धति से संचालित होता है यह कहना कभी-कभी बहुत मुश्किल हो जाता है । मनुष्य कभी तो अपना सर्वस्व अपर्ण तक कर देता है और कभी कभी अपने प्रतिशोध में इतना डूब जाता है कि वह सदियों तक प्रतिशोध की अग्नि में जलता रहता है। 

कर्नल रंजीत के उपन्यासों में प्रतिशोध जैसे विषय पर बहुत कुछ लिखा गया है। इ‌नके पात्र वर्षों- सदियों बाद तक प्रतिशोध की अग्नि में जलते रहते हैं और अवसर मिलते ही अपना प्रतिशोध पूरा करते नजर आते हैं। प्रस्तुत उपन्यास भी कुछ ऐसा है जहां एक व्यक्ति लगभग 175 वर्ष पश्चात अपना प्रतिशोध लेता है।
क्या यह संभव था ? 
अगर संभव था तो कैसे ? 
इसी संभव को जानने का प्रयास है कर्नल रंजीत का उपन्यास 'नकली चेहरे' जो सन् 1974 में प्रकाशित हुआ था । यह मूलतः एक मर्डर मिस्ट्री कहानी है।

Saturday, 14 February 2026

709. उलटी लाशें- कर्नल रंजीत- 1984

प्रतिशोध कथा
उलटी लाशें- कर्नल रंजीत- 1984

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में कर्नल रंजीत अद्भुत रहस्यमयी कथाओं के लेखक के रूप में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखते हैं। इनकी कहानी और पात्र दोनों ही गहरे होते हैं। अत्यंत उलझाव और ज्यादा पात्रों को एकत्र करना और फिर उन्हीं के मध्य रोचक संघर्ष दिखाने में कर्नल रंजीत अपना एक अलग कौशल रखते हैं। इनकी अधिकांश कहानियों में प्रतिशोध मुख्य बिंदु उभरकर सामने आता है । 
प्रस्तुत उपन्यास 'उलटी लाशें' भी एक प्रतिशोध से संबंधित के मर्डर मिस्ट्री रचना है। जहां हत्यारा कत्ल करने के पश्चात लाश को उलटा लटका देता है। 
वह ऐसा क्यों करता है ? 
National Highway-911

जहरीला धुआं
रात का अन्तिम पहर बीत रहा था।
अभी सूर्योदय होने में लगभग एक घंटा था। सारा बंगला खामोशी की चादर में लिपटा शान्त सोया पड़ा था। अचानक टेलीफोन की घंटी की आवाज बंगले में छाये सन्नाटे चीरकर गूंज उठी ।
सोनिया की नींद उचट गई। उसने लेटे-लेटे ही टेलीफोन पर एक नजर डाली। टेलीफोन की घंटी निरन्तर बजे चली जा रही थी।
उसने उटकर एक लम्बी अंगड़ाई ली और फिर हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठा लिया।

708.प्रेतात्मा की डायरी - कर्नल रंजीत

अलौकिक शक्तियां और मर्डर मिस्ट्री
प्रेतात्मा की डायरी - कर्नल रंजीत

मनुष्य के जीवन में बहुत कुछ ऐसा घटित होता है जो उसकी कल्पनाओं से बाहर का होता है। भारत प्रसिद्ध जासूस मेजर बलवंत के जीवन में भी एक ऐसा केस आया था जिसकी कल्पना मेजर बलवंत ने कभी नहीं की थी। वैसे तो मेजर भूत-प्रेत पर यकीन नहीं करता लेकिन 'प्रेतात्मा की डायरी' में उसे कुछ अलग कल ताकतों का आभास होता है। मेरे विचार से कर्नल रंजीत का यह एकमात्र उपन्यास ही ऐसा होना चाहिए जिसमें अलौकिक शक्ति का वर्णन है अन्यथा कर्नल रंजीत भूत-प्रेत जैसी बातों का खण्डन करते नजर आते हैं।
  
रहस्यपूर्ण हत्याएं
सुबह से ही आकाश पर बादल छाए हुए थे। और शाम होते-होते मटियाले और भूरे बादलों ने काली घटाओं का रूप ले लिया था। शाम के सूरज के डूबते ही हवा में तेजी आ गई थी जिसके कारण हिमाचल प्रदेश के उस पर्वतीय भाग में सदियों के बीत जाने पर भी सर्दी बढ़ गई थी।
ऐसा लग रहा था जैसे सर्दी का मौसम फिर लौटकर आ गया हो।
रामनगर शहर से लगभग पांच मील दूर छोटा-सा गांव राजनगर रात की बांहों में लिपटा शान्त सोया पड़ा था। अचानक सर्दी बढ़ जाने के कारण लोग शाम से ही अपने-अपने घर में जा घुसे थे। जो धन सम्पन्न थे वे गर्म बिस्तरों में पड़े सर्दी मिटाने की कोशिश कर रहे थे। और जो निर्धन थे वे अलाव के पास बैठे सर्दी भगाने का असफल प्रयास कर रहे थे ।
हवा के तेज झोंकों से जब कमरा बर्फ की तरह ठंडा हो गया तो राजेश ने हाथ बढ़ाकर खिड़की बन्द कर दी और पर्दा गिरा दिया।
(प्रेतात्मा की डायरी- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)