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Friday, 19 June 2026

728. निर्मला- प्रेमचंद

दहेज, अनमेल विवाह और स्त्री-त्रासदी का मार्मिक कहानी
निर्मला -  प्रेमचंद

हिंदी साहित्य में यदि सामाजिक यथार्थ को सबसे प्रभावशाली ढंग से चित्रित करने वाले उपन्यासों की चर्चा की जाए तो प्रेमचंद का ‘निर्मला’ अग्रणी कृतियों में गिना जाएगा। यह उपन्यास केवल एक युवती की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि उस समाज का दर्पण है जहाँ दहेज, अनमेल विवाह, संदेह और रूढ़ सामाजिक मान्यताएँ एक स्त्री का जीवन नष्ट कर देती हैं। प्रेमचंद ने इस कृति के माध्यम से तत्कालीन भारतीय समाज की उन कुरीतियों पर तीखा प्रहार किया है, जिनकी पीड़ा आज भी कहीं न कहीं दिखाई देती है।

निर्मला- प्रेमचंद 

नमस्ते पाठक मित्रो,

Wednesday, 10 June 2026

726. अछूत - दया पवार

‘अछूत’ : दलित जीवन की पीड़ा, संघर्ष और आत्मसम्मान का दस्तावेज़
अछूत - दया पवार, दलित आत्मकथा

मराठी दलित साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर दया पवार की आत्मकथात्मक कृति ‘अछूत’ भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, गरीबी, अपमान और संघर्ष की ऐसी मार्मिक कथा है, जो केवल एक व्यक्ति की जीवन-गाथा नहीं रह जाती, बल्कि पूरे दलित समाज के सामूहिक अनुभव का दस्तावेज़ बन जाती है। यह रचना पाठक को भावुक ही नहीं करती, बल्कि उसे सामाजिक यथार्थ से सीधा सामना करने के लिए विवश भी करती है।

अछूत - दया पवार- दलित आत्मकथा

   ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की आत्मकथा 'जूठन' बहुत समय पहले पढी थी और उसके बाद दलित साहित्य में दया पवार जी की आत्मकथा 'अछूत' पढने का अकसर मिला है।
        जब कभी भी वह अकेला होता है, उससे अक्सर मेरी मुलाक़ात हो जाती है। जब से मैंने होश सँभाला है, तब से मैं उसे अच्छी तरह पहचानता हूँ। जितना अपनी परछाईं से परिचय हो, उतना परिचित है वह। पर कभी-कभी अँधेरा छा जाने पर या बदली छा जाने पर जैसे स्वयं की परछाई लुप्त हो जाती है, वैसे ही वह भी लुप्त हो जाता है। पिछले कई वर्षों से उसे भीड़ से बड़ा लगाव रहा है। हमेशा किसी के साथ या सभा-सम्मेलनों में दिखाई देता है।(प्रथम पृष्ठ से चंद पंक्तियां)
  

Saturday, 23 May 2026

725. रेत का संगीत- वेदप्रकाश काम्बोज

अंतरराष्ट्रीय अपराधी की डकैती कथा
रेत का संगीत- वेदप्रकाश काम्बोज

वेदप्रकाश काम्बोज जी का एक रोचक उपन्यास 'रेत का संगीत' पढने को मिला है। यह जासूस विजय शृंखला का उपन्यास है। यह एक अंतरराष्ट्रीय अपराधी की डकैती की रोमांच कहानी है। एक ऐसा अपराधी जिसे अमेरिका जैसे देश भी पकड़ने में असफल रहे और जब उस अपराधी की विजय से भिड़ंत हुयी तब जन्मी एक रोमांचक कहानी रेत का संगीत ।

रेत का संगीत - वेदप्रकाश काम्बोज

        भारिया सोनापुर के सबसे खूबसूरत होटल नियाग्रा के कम्पाउन्ड में टैक्सी से उतरी और उसने मीटर देखकर ड्राइवर को पैसे दिये कुछ पैसे अधिक ही दिये गये थे। इसलिये ड्राइवर ने उसे सलाम किया किन्तु उसके सलाम का कोई उत्तर न देकर वह होटल के दरवाजे की ओर बढ़ गई ।

Saturday, 9 May 2026

723. गुप्त हत्यारा- वेदप्रकाश काम्बोज

एक हत्यारे की तलाश में मित्र
गुप्त हत्यारा- वेदप्रकाश काम्बोज

आदरणीय वेदप्रकाश काम्बोज जी ने बहुत लिखा है और उनकर लेखन में विविधता भी रही है। जहां उन्होंने दीर्घ उपन्यासों से पाठकों का मनोरंजन किया है वहीं अपने लेखक के आरम्भिक दौर में लघु उपन्यासों का भी सृजन किया है। 
उनका प्रस्तुत उपन्यास मात्र एक कहानी नहीं है, यह मात्र यह जानने का प्रयास नहीं है कि 'गुप्त हत्यारा' कौन है । यह मित्रों के विश्वास की कहानी है, उनके ठहाकों का समंदर है, उनके अपनत्व का आसमान है।  
गुप्त हत्यारा- वेदप्रकाश काम्बोज

'ओ गुरुमुख ?'
'हो चन्दर !' इसी स्वर में उत्तर मिला ।
'ओ, यह पत्र क्या कहता होए ?'
'क्या कहता है ?'
'यह कहता है कि इसे मुझे नहीं पढ़ना चाहिए !'
'क्यों ?'
'उस हरामजादे ने पत्र केवल तुझे ही लिखा है !'
'देखू !'
चन्द्रप्रकाश ने, जिसे कि चन्दर कहकर पुकारा जाता था, पत्र, सरदार गुरुमुखसिंह की ओर बढ़ा दिया। गुरुमुख ने अपनी एक ओर की मूंछ को बल देते हुए लिफाफे का पता देखा, ऊपर केवल उसका नाम लिखा हुआ था ।

Sunday, 3 May 2026

721. मौत की आवाज- वेदप्रकाश काम्बोज

कबाड़ी, तातारी और मदारी का प्रथम उपन्यास
मौत की आवाज- वेदप्रकाश काम्बोज

विजय ने दरवाजा खोला ।
और गुरुदेव का उच्च नाद करते हुए तीन नमूनों ने उसके पैर पकड़ लिए। चकित सा विजय पहले तो उन तीनों के काले सिरों को देखता रहा जो उसके पैरों के निकट इस तरह एकत्रित हो गए थे जैसे तीन विभिन्न रेखाएं एक बिन्दु पर आकर मिल गई हों।
विजय ने आशीर्वाद की मुद्रा में अपने हाथ फैलाये और फिर गुरू ने गम्भीर मुद्रा में कहा- 'सदा खाओ गुड़ के सेव ।'

'धन्य हैं गुरुदेव आप धन्य हैं।' उन तीनों ने उसके पैर पकड़े हुए समवेत स्वर में कहा। किसी ने भी सिर उठाकर देखने की चेष्टा नहीं की।  

Saturday, 18 April 2026

718. उलटी खोपड़ी- कर्नल रंजीत- 1980

मूर्ति चोरी और ब्लैकमेल की रोचक कथा
उलटी खोपड़ी- कर्नल रंजीत

एक बार फिर SVNLIBRARY पर प्रस्तुत है कर्नल रंजीत द्वारा लिखा गया एक ऐसा रोचक उपन्यास जो आपको सम्मोहित कर लेगा। एक ऐसे व्यक्ति की कहानी जो अप‌नी मृत्यु के छह महीने बाद एक प्रश्न स्वयं से करता है- मरने के छः महीने बाद क्या वह फिर जीवित हो उठा था ?

इनाम
यह बात आज से छः महीने पहले की है । अगस्त का महीना था। स्थानीय समाचारपत्न 'दि क्रानिकल' के फोटोग्राफर कमलकिशोर को, बम्बई में मैक्सिको के राष्ट्राध्यक्ष के आगमन पर खींचे गए फोटो के लिए समाचार-पत्र के मालिक ने पांच सौ रुपये इनाम दिया। उसने इनाम मिलने पर सोचा कि आज तो उसे अपनी पत्नी का उलाहना दूर कर ही देना चाहिए और उसे 'उन्यालो बन्दर' ले जाकर चीनी खाना खिला ही देना चाहिए जो उसे बहुत पसन्द था । उसकी पत्नी ज्योत्स्ना 'परेल' की टैक्सटाइल मिल के अकाउंट्स विभाग में नियुक्त थी। उसका विवाह हुए एक वर्ष हुआ था। यहू प्रेम-विवाह था। पति पत्नी के जीवन में पहले एक और समानता भी थी ज्योत्स्ना भी अकेली थी और कमल किशोर भी। उन दोनों का कोई सम्बन्धी नहीं था। विवाह से एक महीना पहले कमलकिशोर ने 'अन्धेरी' में 'मधुबन' नामक भवन की पहली मंजिल पर चालीस हजार रुपये में एक शानदार फ्लैट खरीदा था ।
कमलकिशोर ने ज्योत्स्ना को फोन किया कि वह आज अपने आफिस से पांच की बजाय चार बजे उठ आए और घर पहुंच जाए । उसने अपनी पत्नी को यह निर्देश इसलिए किया कि ज्योत्स्ना को जब भी बाहर जाना होता था तो बनाव-शृंगार में वह बहुत देर लगा देती थी । ज्योत्स्ना ने वचन दिया कि वह चार बजे आफिस से उठकर पांच बजे घर पहुंच जाएगी ।
(उलटी खोपड़ी- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)

Monday, 30 March 2026

715. जापानी पंखा- कर्नल रंजीत

हत्या का अनोखा जापानी ढंग
जापानी पंखा- कर्नल रंजीत 1974

कर्नल रंजीत के इस उपन्यास की समीक्षा से पूर्व हम संक्षिप्त चर्चा कर लेते हैं इनके रहस्यमयी हत्याओं के तरीकों पर, ध्यान दें संक्षिप्त चर्चा है।
कर्नल रंजीत के आपने उपन्यास/ समीक्षा पढी है तो आपको पता होगा की इनके हत्यारे पात्र जब भी किसी की हत्या करते हैं तो वह इतने अजीब और रहस्यमयी तरीके इस्तेमाल करते हैं जो सामान्य लेखक तो सोच भी नहीं सकता‌ । प्रस्तुत उपन्यास में तो हत्या का तरीका भी जापानी है। तो चलो आज इसी जापानी तरीके को देखते हैं इस उपन्यास में-

            मित्र की परेशानी
मेजर बलवंत दोपहर का खाना खाकर अखबार पढ़ रहा था का आज सुबह वह अखबार नहीं देख सका था कि टेलीफोन घंटी बज उठी। ऑपरेटर गर्ल ने मेजर के रिसीवर उठाने पर कहा, "मेजर साहब ! लांग डिस्टेंट कॉल, वाराणसी से। आधा मिनट इन्तजार कीजिए।" मेजर ने रिसीवर कान से लगाए रखा। वह सोच रहा था कि वाराणसी से उसे कौन फोन कर रहा था कि फोन पर धीमी-सी आवाज़ आई, "मेजर साहब ! मैं मिसेज विनोद बोल रही हूं। क्या आप दो-चार दिन के लिए वाराणसी आ सकते हैं ?" अब मेजर को याद आया कि उसका घनिष्ठ मित्र विनोद, जो कई केस सुलझाने में उसकी सहायता कर चुका था, तब्दील होकर वाराणसी जा चुका था ।
"क्यों अनीता, क्या बात है ? तुम मुझे वाराणसी क्यों बुला रही हो ?"

Sunday, 29 March 2026

714. चण्डी मंदिर का रहस्य- कर्नल रंजीत- 1990

एक देश की सत्ता पलटने की कहानी
चण्डी मंदिर का रहस्य- कर्नल रंजीत- 1990

एकान्त और रहस्यमय था चण्डी द्वीप। बहुत पुराना मंदिर था यहां। इसी में छिपे थे एटम का रहस्य चुराने वाले और वैज्ञानिकों के हत्यारे। ये विद्रोह कराने में सफल हो गए, पर एक दिन पकड़े गए। पढ़िए रोंगटे खड़े कर देने वाला धमाका।

चण्डीमंदिर का रहस्य - कर्नल रंजीत
एक बार फिर आपका स्वागत है #svnlibrary में जहां आप पढेंगे कर्नल रंजीत के एक विदेशी अभियान को। एक छोटे से देश में किस तरह मेजर बलवंत अपने साथियों के साथ देश को गुलाम बनाने वाले अपराधियों के खतरनाक षडयंत्र को खत्म करता है।
  समीक्षा से पूर्व हम उपन्यास के प्रथम पृष्ठ/ दृश्य को पढते हैं और फिर बात करेंगे उपन्यास के रोचक कथानक की ।

Saturday, 21 March 2026

712. हत्यारे की पत्नी- कर्नल रंजीत -1974

समान नाम के लोगों की हत्या का रहस्य
हत्यारे की पत्नी- कर्नल रंजीत -1974

यह 29 साल का रहस्य क्या है ? 
प्रत्येक आदमी दो बार कैसे मर रहा है ? 
हत्या करने वाला किस महान शक्ति का दास है ? 
और मरने वाले को कैसे पता चल जाता है कि उसकी मौत का दिन आ पहुंचा है ?
अपराध-जगत् की सबसे सनसनीखेज और आश्चर्यजनक घटना, जिसमें हत्या तो होती है पर हत्यारा कोई नहीं। मेजर बलवन्त के चारों तरफ एक मायाजाल-सा बुन जाता है। उसे अपराधी का नहीं प्रकृति और भाग्य के गूढ़तम रहस्य का पता लगाना है। वह रहस्य क्या है ? और मेजर बलवन्त उसका कैसे पता लगाता है ?
कर्नल रंजीत ने इस नवीनतम उपन्यास में एकदम अछूते विषय को छुआ है। विषय हजारों साल से उलझा हुआ है और उसे मेजर बलवन्त जैसा तीक्ष्णबुद्धि जासूस ही सुलझा सकता था ।

Saturday, 14 February 2026

708.प्रेतात्मा की डायरी - कर्नल रंजीत

अलौकिक शक्तियां और मर्डर मिस्ट्री
प्रेतात्मा की डायरी - कर्नल रंजीत

मनुष्य के जीवन में बहुत कुछ ऐसा घटित होता है जो उसकी कल्पनाओं से बाहर का होता है। भारत प्रसिद्ध जासूस मेजर बलवंत के जीवन में भी एक ऐसा केस आया था जिसकी कल्पना मेजर बलवंत ने कभी नहीं की थी। वैसे तो मेजर भूत-प्रेत पर यकीन नहीं करता लेकिन 'प्रेतात्मा की डायरी' में उसे कुछ अलग कल ताकतों का आभास होता है। मेरे विचार से कर्नल रंजीत का यह एकमात्र उपन्यास ही ऐसा होना चाहिए जिसमें अलौकिक शक्ति का वर्णन है अन्यथा कर्नल रंजीत भूत-प्रेत जैसी बातों का खण्डन करते नजर आते हैं।
  
रहस्यपूर्ण हत्याएं
सुबह से ही आकाश पर बादल छाए हुए थे। और शाम होते-होते मटियाले और भूरे बादलों ने काली घटाओं का रूप ले लिया था। शाम के सूरज के डूबते ही हवा में तेजी आ गई थी जिसके कारण हिमाचल प्रदेश के उस पर्वतीय भाग में सदियों के बीत जाने पर भी सर्दी बढ़ गई थी।
ऐसा लग रहा था जैसे सर्दी का मौसम फिर लौटकर आ गया हो।
रामनगर शहर से लगभग पांच मील दूर छोटा-सा गांव राजनगर रात की बांहों में लिपटा शान्त सोया पड़ा था। अचानक सर्दी बढ़ जाने के कारण लोग शाम से ही अपने-अपने घर में जा घुसे थे। जो धन सम्पन्न थे वे गर्म बिस्तरों में पड़े सर्दी मिटाने की कोशिश कर रहे थे। और जो निर्धन थे वे अलाव के पास बैठे सर्दी भगाने का असफल प्रयास कर रहे थे ।
हवा के तेज झोंकों से जब कमरा बर्फ की तरह ठंडा हो गया तो राजेश ने हाथ बढ़ाकर खिड़की बन्द कर दी और पर्दा गिरा दिया।
(प्रेतात्मा की डायरी- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)

Saturday, 7 February 2026

707. पीले बिच्छू- कर्नल रंजीत

मेजर बलवंत बांग्लादेश में
पीले बिच्छू- कर्नल रंजीत

राजस्थान के हनुमानगढ जिले के उपखंड संगरिया के मित्र हैं श्री रतन लाल चौधरी । दिसम्बर 2025 में रतन भाई के यहाँ जाना हुआ और उनसे मैं 15 उपन्यास कर्नल रंजीत के लेकर आया । फरवरी 2026 से उन्हीं उपन्यासों को पढा जा रहा है। और समयानुसार उनकी समीक्षा यहाँ प्रस्तुत की जा रही है। 
इन 15 उपन्यासों में से एक उपन्यास है पीले बिच्छू ।
हम समीक्षा की शुरुआत उपन्यास के प्रथम पृष्ठ के दृश्य से करते हैं।

आदेश भी, निवेदन भी
मेजर बलवन्त एक खूबसूरत और खुशबूदार फूल सोनिया के बालों में लगा रहा था। तभी उसने बंगले के अहाते में एक मोटर साइकल की आवाज सुनी । मेजर बलवन्त ने वह फूल जल्दी से सोनिया के बालों में लगा दिया और एक ओर हट गया। मोटर साइकल बरामदे में आकर रुक गई। आफिस के सदर दरवाजे के बाहर फर्श पर भारी बूटों की आवाज पैदा हुई और कुछ पल के बाद एक लम्बे कद का नौजवान, जिसने सुर्ख और खाकी पगड़ी बांध रखी थी, दरवाजे में दिखाई दिया ।
वह दोनों एड़ियां जोड़कर खड़ा हो गया, जिसका अर्थ था कि वह अन्दर आने की अनुमति मांग रहा था ।
मेजर बलवन्त ने उसके विशेष अभिवादन का उत्तर उसीके विशेष अंदाज़ में दिया और सिर के इशारे से अन्दर आने का इशारा किया । वह नौजवान मेजर की मेज़ तक आया। उसने सोनिया को देखकर उसका अभिवादन किया। मेजर यह देखकर बहुत प्रसन्न हुआ कि वह एक शिष्ट नौजवान था। नौजवान ने अपने कंधे पर लटके हुए थैले में से एक लम्बा लिफाफा निकालकर मेज पर रख दिया। उस लिफाफे पर सील-मुहर लगी हुई थी ।
मेजर बलवन्त ने उस लिफाफे पर नजर डाली। उस पर उभरे हुए काले अक्षरों में लिखा था- 'देश-सेवा के लिए' । एक कोने में लाल रोशनाई से तीन शब्द लिखे हुए थे- 'गुप्त तथा गोपनीय' । 
लिफाफे की बाईं ओर एक छपा हुआ पता था :
'देश सेवक मंडल, बम्बई शाखा
शिवाजी पार्क, बम्बई'

नमस्ते पाठक मित्रो,
कर्नल रंजीत के उपन्यास 'पीले बिच्छू' की समीक्षा में आपका हार्दिक स्वागत है। 

Sunday, 21 December 2025

696. पिंजरा- कुमार कश्यप

चल उड़ जा रे पंछी...
 पिंजरा- कुमार कश्यप

एक युवा लड़की जो एक पिंजरे में कैद थी । सिर्फ कैद ही नहीं उस पर अमानवीय अत्याचार भी होते थे और अत्याचारी था उसका परिवार । भाई की हरकतें सुन कर तो मानवता भी शरमा जाये।
एक दिन एक अजनबी ने पिंजरे में बंद पक्षी को हिम्मत दी और कहा - चल उड़ जा रे पंछी...

  आज हम यहां चर्चा कर रहे हैं कुमार कश्यप जी के एक सामाजिक उपन्यास 'पिंजरा' की ।

बादलों से घिरी अंधेरी शाम । ठंड और उस पर गरजते हुये बादल । जैसे कोढ़ में खाज । रात होने से पहले ही घटा-टोप अंधकार छा गया था, पूरे आसार थे कि पानी अब बरसा तब बरसा । सड़कों पर एकदम सन्नाटा था। ठिठुरती ठण्ड की वर्षा से कौन नहीं डरता । बार-बार बिजली चमक उठती थी उसकी कार तेज गति से ढलान से उतर कर सामने दिखाई देते नगर में प्रवेश करने को उतावली होती जा रही थी । कार की खिड़कियों के शीशे चढ़े हुये थे तथा कार की पिछली सीट पर एक गम्भीर व्यक्तित्व की गोर्ण स्त्री बैठी थी। उम्र यही चालीस की रही होगी। आंखों पर सुनहरी फ्रेम का चश्मा, जिनसे झांकती हुई पत्थर सी कठोर आंखें । गम्भीर और चुप।

Wednesday, 26 November 2025

685. भयानक भिखारी - आरिफ मारहर्वी

विमान अपहरण काण्ड
भयानक भिखारी - आरिफ मारहर्वी
जासूसी उपन्यास - अगस्त -1971

एकाएक माइक पर स्वर गूंजने लगा-
'पेसेंजर्स प्लीज..! राखनपुर जाने वाला जहाज अपनी उड़ान के लिए तैयार है। आप लोग कृपया अपनी-अपनी सीटें ले लीजिये । पेलेंजर्स प्लीज राखनपुर जाने वाला प्लेन अपनी उड़ान के लिए तैयार है। कृपया आप लोग अपनी-अपनी सीटें ले लीजिये ।'

सोजी ने काफी का अन्तिम घूंट भरा तथा कप काउंटर पर रखकर केन्टीन के द्वार की ओर बढ़ी। सहसा पीछे से किसी ने उसके कन्धे पर हाथ रख दिया ।
सोजी भिन्नाकर घूमी उसके कन्धे पर हाथ रखकर सम्बोधित करने वालों से अत्यन्त तीव्र घृणा थी, परन्तु अपने सम्मुख एक बूढ़े को देखकर वह केवल होंठ हिलाकर रह गई। यदि उसके स्थान पर कोई दूसरा होता तो वह कंदाचित कोई घोर अपमान से भरी बात कह बैठती किन्तु उस बूढ़ की अवस्था बड़ी दयनीय थी। 
सोजी ने कोमल स्वर में कहा-'आज्ञा करें!'
बूढ़ा कुछेक क्षणों तक इस मुद्रा में हांफता रहा जैसे उसे दमे का रोग हो । उसके कंधे आगे को ढलके हुए थे और गर्दन इतनी झुकी हुई थी कि पोठ पर कूबड़-सा उभर आया था। गालों का माँस लटका हुआ था तथा घनी पलकें सफेद हो रही थीं।
उसके शरीर पर एक अति बहुमूल्य कपड़े का किन्तु अत्यन्त बेढंगा एवं ढीला-ढाला सिला हुआ सूट था। उसने बड़ी कठिनाई से अपनी गर्दन सोजी की ओर उठाई तथा हांफता हुआा बोला--
'आप' आप राखनपुर... राखनपुर के प्लेन में सवार होने जा रही हैं ?'
'जी हाँ!' सोजी ने ऊबे हुए स्वर में उत्तर दिया ।
'देखिये... देखिये म..म... मुझे भी उसी प्लेन में
यात्रा करनी है, मैं...मैं तेज नहीं चल सकता मुझे....मुझे सहारे की भी आवश्यकता है । मैं... मैं आपका बहुत बहुत आभारी होंगा अगर....अगर आप मेरा हाथ थाम लें ?'
सोजी का मन तो चाहा कि स्पष्ट रूप से नकार कर दे परन्तु बूढ़े के मुख पर बरसती हुई विवशता ने उसे ऐसा करने से रोका तथा अनिच्छापूर्वक हाथ बढ़ाकर बोली-
"आइये... ।"
"धन्यवाद...धन्यवाद।"

(भयानक भिखारी- आरिफ मारहर्वी, प्रथम पृष्ठ)
   नमस्ते पाठक मित्रो,

Tuesday, 21 October 2025

675. मुझे मौत चाहिए - अनिल सलूजा

दिल्ली के डाॅन से बलराज गोगिया की टक्कर
मुझे मौत चाहिए - अनिल सलूजा
# साठ लाख शृंखला +
- बलराज गोगिया सीरीज- 14

  एक कातिल को ढूंढकर उस मौत के घाट उतारने का काम मिला था बलराज गोगिया को। तफ्तीश करते हुये वह आगे बढा तो उल्टा अपनी ही जान के लाले पड़ गये उसे और....
और किसने कहा था- मुझे मौत चाहिए

"नहीं... नहीं... भगवान के लिये मेरे बेटे को कुछ मत कहना... मुझ गरीब का बस एक ही बेटा है...। अगर उसे कुछ हो गया तो मेरी पत्नी रो-रो कर अपनी जान दे देगी...। त... तुम मेरी पत्नी की हालत जा कर देखो... बेटे की जुदाई में वह मरने को हो रही है।" अपने कमरे की तरफ बढ़ते बलराज गोगिया के कदम वहीं ठिठक गये।
मोहन गेस्ट हाउस के बारह नम्बर कमरे में ठहरा हुआ था वह... ।

Friday, 10 October 2025

674. शूटर- अनिल सलूजा

एक मंत्री की हत्या का मामला
शूटर- अनिल सलूजा
- बलराज गोगिया- राघव सीरीज - 05

   आज हम चर्चा कर रहे हैं अनिल सलूजा जी और बलराज गोगिया सीरीज के पांचवें उपन्यास शूटर की। यह एक एक्शन-थ्रिलर उपन्यास है। बलराज गोगिया एक महिला की सहायता के लिए मंत्री की हत्या करने मैदान में उतरता है और एक गहरी साजिश में फंस जाता है।
     आपने पिछले दो भागों में विभक्त उपन्यास 'बारूद की आंधी' और 'खूंखार' में पढा होगा की बलराज गोगिया और राघव का पासपोर्ट और वीजा तैयार है और दोनों शांति का जीवन जीने के लिए देश छोड़ने के लिए एयरपोर्ट पहुंचते हैं लेकिन वहां की विक्टर बनर्जी के धोखे के चलते पुलिस पहुँच जाती है और दोनों जान बचाकर दिल्ली छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।
एक लम्बे समय पश्चात दोनों आगरा से दिल्ली पहुंचते हैं और वह भी सीधे विक्टर बनर्जी के दरवाजे पर दस्तक देते हैं।

"खट... खट... खट।"
दरवाजे पर दस्तक पड़ी।
विक्टर बनर्जी फोल्डिंग पलंग से नीचे उतरा... चप्पल पहनी और चश्मा उतारकर उसे अपनी मैली शर्ट के पल्लू से साफ करते हुए दरवाजे की तरफ बढ़ा।
"कौन...?"

Friday, 3 October 2025

Monday, 29 September 2025

670. भयानक बौने- कर्नल रंजीत

विश्व पर छाया बौनों का आतंक
भयानक बौने- कर्नल रंजीत

चार और खूंख्वार जीव उस गढ़े में से निकले । उनकी शक्लें बौनों जैसी थीं । उनकी आंखें क्रोध से अंगारा बन गईं । चारों तेज़ी से उछले और दो बलदेव के सीने से और दो उसकी गर्दन से चिपट गए-जोंकों की तरह ! देखते ही देखते उसके सारे कपड़े खून से तर हो गए। वह आकाश की ओर देखने लगा । उसकी आंखें खुली की खुली रह गई थीं । उसपर अचानक विषैले खूंख्वार बौनों ने आक्रमण कर दिया था । एक सनसनीभरा उपन्यास, जिसमें मानवता के शत्रुओं का भयानक षड्यंत्र विफल हो जाता है ।

       कर्नल रंजीत अपने अनोखे कथानक और रहस्यमयी पात्रों के लिए विशेष तौर पर जाने जाते हैं। उनके उपन्यासों के कथानक मर्डर मिस्ट्री होते हुये भी बहुत अलग होते हैं और पात्र भी बहुत अजीब ।
   एक ऐसे ही अलग कथा पर आधारित उनका उपन्यास मिला है- भयानक बौने। प्रस्तुत उपन्यास ऐसे भयानक और जानलेवा चूहों पर आधारित है जो एक तरफ जहां लोगों की जान ले रहे हैं वहीं वह खाद्यान्न भी खत्म कर रहे हैं ।
ऐसे खतरनाक और जानलेवा चूहे कहां से आये ?

Friday, 26 September 2025

667. टेढा मकान- कर्नल रंजीत

शिलखण्डी से सावधान
टेढा मकान - कर्नल रंजीत
मेजर बलवंत सीरीज

नमस्ते पाठक मित्रो,
आज 'SVNLIBRARY' ब्लॉग पर हम लेकर उपस्थित हैं प्रसिद्ध उपन्यासकार कर्नल रंजीत के एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास 'टेढा मकान' की समीक्षा।
इस उपन्यास का घटनाक्रम उत्तर प्रदेश के शहर गाजियाबाद से संबंध रखता है।
तो चलो हम पहले उस मकान के विषय में ही पढ लेते हैं ।
गाजियाबाद के मुकुन्दनगर मुहल्ले की आठवीं गली में एक मकान था, जो एक मंजिल का होते हुए भी बहुत ऊंचा था। अधिक पुराना नहीं था, लेकिन टेढ़ा जरूर था। यह मकान एक बहुत ही कंजूस बूढ़े का था। उस कंजूस बूढ़े के बारे में यह प्रसिद्ध था कि उसके पास सोने-चांदी और हीरे-जवाहरात का विशाल भंडार है जिसकी वह रात-दिन चौकीदारी करता रहता है और जानबूझकर फटे हाल रहता है। बूढ़े की इस बनी हुई साख ने कि उसके पास सोने-चांदी और हीरे-जवाहरात का विशाल भंडार है, उसे परेशान कर रखा था । कई बार उसके घर में सेंध लगाई गई। उसके हाथ-पांव और मुंह बांधकर मकान के फर्श की खुदाई की गई। दीवारें जगह-जगह से खोद डाली गई । छतों के शहतीर टटोले गए; लेकिन हीरे-जवाहरात का भंडार किसी को नहीं मिला। चोरों के हाथ बल आठ-दस रुपये या थोड़ी-सी रेजगारी लगी। कंजूस बूढ़ा एक समय में अपने आठ-दस रुपये से अधिक नहीं रखता था। उसके संदूक में पुराने घिसे पिटे और पैबन्द लगे कपड़े भरे रहते थे, जिन्हें चोर भी चुराना अपना अपमान समझते थे । 
    उस कंजूस बूढे का नाम था देवकीनन्दन पराशर । वह स्वयं जैसा था उसे ठीक वैसा ही एक नौकर मिल गया था। उस कंजूस पराशर के नौकर को लोग विद्वान रतनू कहते थे।
एक प्रसिद्ध कंजूस और एक कथित विद्वान । दोनों का इस दुनिया में नितांत अकेले थे और यह अकेलापन उन दोनों ने मालिक नौकर बनकर दूर किया।
और एक दिन बूढा पराशर उस मकान के सबसे गंदे कमरे में एक पुरानी और टूटी हुयी कुर्सी पर मृत्यु पाया गया ।(पृष्ठ-11)
बूढा और कंजूस पराशर तो मर गया लेकिन उसके साथ ही कुछ कहानियाँ प्रचलित हो गयी।
बूढे नौकर रतनू का बयान था कि सागरचंद के भूत ने उसके मालिक को डराकर उसकी जान ली है ।(पृष्ठ-11)
अब यह सागरचंद कौन है और वह भूत कैसे बना यह भी जान लीजिए-

Friday, 1 August 2025

661. खून के छींटे- कर्नल रंजीत

खत्म होते रिश्तों की हत्या
खून के छींटे- कर्नल रंजीत

नमस्ते पाठक मित्रो,
उपन्यास समीक्षा लेखन के इस सफर में आप इन दिनों पढ रहे हैं कर्नल रंजीत द्वारा लिखित मेजर बलवंत सीरीज के अदभुत उपन्यास ।
 यह उपन्यास अदभुत कैसे हैं, यह आप समीक्षाएं पढकर जान चुके होंगे, अगर नहीं जान पाये तो आप इंतजार करें हमारे कर्नल रंजीत के उपन्यासों पर आधारित आलेख 'कर्नल रंजीत के उपन्यासों की रहस्यमयी दुनिया' का । इस आलेख में आपको कर्नल रंजीत के उपन्यासों के विषय मे अदभुत और रोचक जानकारी मिलेगी।
कर्नल रंजीत के अब तक पढे गये उपन्यास 'हत्या का रहस्य, सफेद खून, चांद की मछली, वह कौन था, सांप की बेटी, काला चश्मा, बोलते सिक्के, लहू और मिट्टी, खामोश ! मौत आती है , मृत्यु भक्तअधूरी औरत, हांगकांग के हत्यारे, 11 बजकर 12 मिनट, और अब प्रस्तुत है आपके लिए कर्नल रंजीत के उपन्यास 'खून के छींटे' की समीक्षा ।