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Wednesday, 23 August 2023

572. करिश्मा आँखों का - टाइगर

आखिर क्या रहस्य था उन नीली आँखों‌ का
करिश्मा आँखों का - टाइगर

राजा पॉकेट बुक्स, दिल्ली से प्रकाशित उपन्यास 'करिश्मा आँखों का' टाइगर द्वारा लिखित 'लाश की जिंदा आँखें' उपन्यास का अंतिम और द्वितीय भाग है। 

"यानि तुम अंधे नहीं हो ?"
"नहीं ।'
"तुम... तुम शुरू से ही अंधे नहीं थे फिर भी तुम मुझे धोखा देते रहे ? सारी दुनिया को धोखा देते रहे? क्यों ? क्यों किया तुमने यह नाटक ?” - सोना तिलमिलाकर बोली - "क्यों किया तुमने ऐसा ?" 
"यह नाटक मुझे करने पर मजबूर होना पड़ा।"- अशोक इस बार दांत भींचकर गुर्रा उठा- "अगर यह नाटक नहीं किया होता तो मैंने इस दुनिया का असली रूप शायद आज भी न पहचाना होता। यह सच है सोना, आज मैं अंधा नहीं हूं । लेकिन मैं अंधा था, आंखें होते हुए भी मैं अंधा था। तभी तो इस दुनिया की हकीकत को नहीं देख रुका था मैं तभी तो मैं सांप को भी रस्सी समझता रहा— तभी तो मैं नागों को अपनी आस्तीन में पालकर दूध पिलाता रहा।" (उपन्यास अंश)

प्रस्तुत उपन्यास का कथानक डाक्टर कामत के द्वारा अशोक प्रधान के किये गये ऑप्रेशन से होता है। डॉक्टर कामत का यह ऑप्रेशन तो सफल हो जाता है लेकिन वह अशोक प्रधान के शांत जीवन में तूफान खड़ा कर देता है, अशोक का विश्वास और दुनिया दोनों ही खत्म हो जाते हैं।

Saturday, 19 August 2023

571. लाश की जिंदा आँखें- टाइगर

बैंक डकैती और आँखों का रहस्य
लाश की जिंदा आँखें- टाइगर
प्रथम भाग
 वह एक लाश में तबदील हो चुका था और उसकी लाश खंडाला घाट की हजारों फुट गहराई में धकेली जा चुकी थी लेकिन उसकी आंखें फिर भी जिंदा थीं। उन आंखों ने बहुत कहर ढाया, उत्पात मचाया लेकिन उन आंखों का रहस्य कोई न जान पाया।
कैसा अनसुलझा रहस्य था वो, आंखें तो जिन्दा थी, मगर इन्सान लाश में तबदील हो चुका था।
(उपन्यास के अंतिम आवरण पृष्ठ से)
लाश की जिंदा आँखें- टाइगर

 राजा पॉकेट बुक्स के लेखक 'टाइगर' के उपन्यास रहस्य-रोमांच के साथ-साथ हास्य से परिपूर्ण होते हैं। इनका रहस्य जितना कथा में होता है उतना ही उपन्यास शीर्षक में भी। उपन्यास शीर्षक देखें- लाश की जिंदा आँखें, मुँह बोला पति जैसे शीर्षक पाठक को सहज ही आकृष्ट कर लेते हैं। उस पर अगर आप टाइगर के नियमित पाठक हैं तो आपको पता ही है टाइगर के उपन्यासों में जो कथा कहने का तरीका, हास्य रस और आमजन पात्रों का वर्णन होता है वह बहुत प्रभावित करता है।
   प्रस्तुत उपन्यास 'लाश की जिंदा आँखें' अपने समय का अत्यंत चर्चित उपन्यास रहा है। इसका कथानक एक बैंक डकैती से आरम्भ होता है।
कथा का मुख्य पात्र है बाबू राव पेंडरकर जो एक सजाप्राप्त, उम्रदराज व्यक्ति है और उसके साथ है उस जैसे ही तीन और सदाबहार दोस्त।

Friday, 8 June 2018

118. सुनील रैप काण्ड-

एक अनोखा रैप काण्ड
सुनील रैप काण्ड- , जासूसी उपन्यास, रोचक, पठनीय, लघु कलेवर।
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सुनील कोठारी‌ ने टैक्सी रुकवाई।
वह टैक्सी से नीचे उतरा और ड्राइविंग सीट पर बैठे ड्राइवर की ओर बढ गया।
"कितने पैसे?"- उसने पूछा।
" साहब...यहाँ? "- ड्राइवर ने हैरानी ने हैरानी से उसके चेहरे की ओर देखा था-" इस निर्जन तट पर क्या करेंगे आप?"
सुनील कोठारी के होंठों पर क्षीण सी मुस्कान उभरी।
"थोङी देर टहलूंगा ड्राइवर।"
"इतनी रात गए!"
"चांदनी रात का आनंद रात गए ही लिया जा सकता है।"- सुनील के होंठों पर मुस्कान गहरी हो गयी थी- " और फिर अभी तो शाम विदा ही हुई है।"

               निर्जन सागर किनारे रात को घूमने गये सुनील कोठारी की अगले दिन लाश मिली।
आखिर क्या वजह रही थी सुनील कोठारी की मौत की। इंस्पेक्टर तेंदुलकर और खोजी पत्रकार अमर भी इस केस में उलझ कर रह गये।
"इतनी मामूली नोच-खसोट से 'हष्ट-पुष्ट लंबे तगङे' युवक की मौत तो दूर, बेहोश भी नहीं किया जा सकता।"
"ओह!"- तेंदुलकर के मुँह से निकला था।
" और ये युवक मर गया।"- अमर आहिस्ता से बोला-"जबकि इसके जिस्म पर कोई भी ऐसा जख्म नहीं, जो जानलेवा हो सके।"

        और जब सुनील कोठारी की हत्या के कारण का रहस्य खुला तो पूरा शहर चौंक उठा।
- क्या वजह थी सुनील कौठारी की मौत की?
- निर्जन तट पर सुनील कौठारी क्यों घूमने गया?
- ऐसा क्या कारण था मौत का की  पूरा शहर चौंक उठा?

ऐसे सभी प्रश्नों के उत्तर इस लघु उपन्यास को पढकर ही जाने जा सकते हैं।
   उपन्यास चाहे कलेवर में छोटा है पर है बहुत ही रोचक।

उपन्यास के संवाद रोचक और उपन्यास के पात्रों के अनुकूल हैं। कुछ संवाद पठनीय और स्मरणीय हैं।
 
- कानून की नजर में अमीर की गर्दन भी उतनी ही नरम हुआ करती है जितनी की गरीब की।

- जो बांह-भर चूङियां पहनाने की हिम्मत रखता हो वह चुटकी भर सिंदूर का बंदोबस्त कर ही लेगा।

- बच्चों को प्यार करने का अर्थ ये नहीं होता की उन्हें अपराध करने की छूट दे दी जाये।
   

यह उपन्यास वेदप्रकाश शर्मा के उपन्यास 'रहस्य के बीच' के पीछे दिया गया है। उपन्यास 'रहस्य के बीच' स्वयं एक लघु उपन्यास है इसलिए पृष्ठ संख्या बढाने के लिए दूसरा लघु उपन्यास 'सुनील रैप काण्ड' इसमें और जोङा गया। प्रकाशक ने दूसरे उपन्यास के लेखक का कहीं‌ कोई वर्णन नहीं किया। हालांकि ऐसा अन्यत्र कभी देखने को नहीं मिला की लेखक का नाम‌ न दिया गया हो यहाँ पता नहीं किस कारण से लेखक का नाम‌ नहीं छापा गया।

निष्कर्ष- 
उपन्यास चाहे लघु कलेवर में है पर है अच्छा और रोचक। पाठक को आकृष्ट करने में सक्षम है। कहानी और प्रस्तुतीकरण शानदार है।

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उपन्यास- सुनील रैप काण्ड
लेखक- .............(कहीं कोई नाम नहीं दिया गया।)
प्रकाशन- राजा पॉकेट बुक्स- दिल्ली

Sunday, 24 September 2017

64. सैकण्ड चांस- कंवल शर्मा

जिंदगी के सैकण्ड चांस की कहानी।

सैकण्ड चांस, थ्रिलर उपन्यास, पठनीय, उत्तम।
वन शाॅट के पश्चात रवि पॉकेट से प्रकाशित होने वाल यह प्रस्तुत उपन्यास सैकण्ड चांस कंवल शर्मा का द्वितीय मौलिक उपन्यास है।इनका प्रस्तुत उपन्यास सैकण्ड चांस भी एक जबरदस्त उपन्यास है। यह एक ऐसे युवक की कहानी है जिसे प्रथम बार जीवन में बहुत बुरी तरह से धोखा मिलता है लेकिन जिंदगी उसे सैकण्ड चांस भी देती है। अब पठनीय यह भी  है की वह युवक जिंदगी के सैकण्ड चांस में सफल हो पाया या फिर उसी तरह फिर फंस गया।
   जब कोई खूबसूरत बला किसी को दौलतमंद बनाने के रास्ते उसे एक मामूली फोन काॅल के बदले पांच लाख का आॅफर दे तो कौन आदमी भला मना करेगा। लेकिन फिर जब वही फोन काॅल किसी र ईस  जबर बिल्डर की इकलौती औलाद के अगवा किये जाने की साजिश का हिस्सा हो तो कोई मूढ, जङबुद्धि, अहमक या बेवकूफ ही इसमें हाथ डालेगा
   और कैजाद पैलोंजी- भूतपूर्व पत्रकार और मौजूदा एक्स-जेलबर्ड में सारी खूबियां थी। (लेखक की कलम से)
           कैजाद पैलोंजी जो की एक पत्रकार था लेकिन ईमानदरी के चलते एक जेल की सजा पा गया। जब जेल से छूट कर बाहर आया तो उसे एक आॅफर मिला। सिर्फ एक फोन काॅल करनी है और बदले में पांच करोङ रकम मिलेगी। अब कौन मूर्ख होगा जो पांच करोङ की दौलत को ठुकरा देगा।
बस यही एक फोन काॅल पत्रकार के गले की मुसीबत बन गयी। कैजांद पैलोंजी के गले एक लाश पङ गयी।
 
संवाद/ कथन
   उपन्यास के जबरदस्त संवाद के लिए लेखक कंवल शर्मा को विशेष धन्यवाद देना चाहुंगा की उन्होंने जितना अच्छा उपन्यास लिखा है, उसकी कहानी है उतने ही अच्छे उपन्यास के संवाद हैं।
जहां संवाद कहानी को रोचक बनाते हैं वहीं पात्र के विचारों को और स्वयं पात्र को भी परिभाषित करते हैं।
- वेबकूफी और अक्लमंदी में केवल एक ये महीन फर्क होता है कि अक्लमंदी की एक हद होती है। (पृष्ठ-36)
- रिश्ते टूटने में अक्सर ये सबसे बङी वजह होती है कि बाज दफा लोग टूटना पसंद करते हैं, झुकना नहीं।"- (पृष्ठ- 38)
- पैसे वाला जहां अपनी कमाई में‌ किसी को कोई हिस्सा देकर राजी नहीं, वहीं गरीब अपनी किस्मत को कोसने के अलावा अपने हाथ -पांव हिलाने को राजी नहीं । इस मुल्क में कोई संतुष्ट नहीं । यहाँ हर कोई परेशान है, हर कोई गर्म है। (पृष्ठ-40)
- शादीशुदा जिंदगी हवा में उङती उस पतंग की तरह होती है जिसे आसमान में और ऊंचा चढाने, उठाने के लिए उसकी डोर को अपनी ओर खींचना पङता है, उसे धक्का नहीं देना होता। (पृष्ठ-74)
- जब जहरीला सांप पकङना हो तो हाथ हमेशा अपने दुश्मन का इस्तेमाल करो। (पृष्ठ- 91)
- जीवन को दो ही शब्द नष्ट करते हैं- अहम और वहम। (पृष्ठ-123)
              सैकण्ड चांस उन उपन्यासों में से ही जिन्हें आपने एक बार पढना आरम्भ कर दिया तो क्लाइमैक्स पढकर ही आप किताब को बंद करोगे।
कहानी है हि इतनी जबर्दस्त की पाठक स्वयं को भूल जाता है।
      उपन्यासकार टाइगर का एक उपन्यास है आखिरी केस। यह उपन्यास पूर्णतः उसी उपन्यास पर आधारित है। पूरी कहानी वही है लेकिन लेखक ने इसमें कुछ अच्छे प्रयोग किये हैं जो इस उपन्यास को मूल उपन्यास से भी अच्छा बनाते हैं।
   बात करें इसके क्लाइमैक्स की तो इसका क्लाइमैक्स आखिरी केस उपन्यास से बहुत ही अलग है। जहां आखिरी केस वकील मोनिका पण्डित पर आधारित है और वही उस केस को हल करती है वहीं सैकण्ड चांस में वकील की पूरी भूमिका ही गायब है।
  अपने प्रयोग के तौर पर कंवल शर्मा कामयाब रहे हैं लेकिन लेखक कंवल शर्मा ने इस उपन्यास में कहीं भी टाइगर के उपन्यास आखिरी केस का वर्णन नहीं किया। यह नैतिक दृष्टि से पूर्णतः अनुचित है।
     हालांकि दोनों उपन्यास ही पठनीय है और रोचक हैं।
आखिरी केस उपन्यास की समीक्षा यहाँ उपलब्ध है।
आखिरी केस - टाइगर
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उपन्यास- सैकण्ड चांस
ISBN- 81-7789-494-3
लेखक- कंवल शर्मा
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ-317
मूल्य- 80₹

63. आखिरी केस- टाइगर

मोनिका पण्डित के पास रात के साढे तीन बजे एक आदमी आया जिसने कत्ल नहीं किया था, लेकिन फिर भी उसे झूठे कत्ल के इल्जाम में फंसाया गया। उसने अपनी सारी कहानी मोनिका पण्डित को सुनाई तो मोनिका पण्डित ने कसम खाई कि वह बाइज्जत बरी करवाएगी और अगर वह नहीं करवा सकी तो ये उसका होगा.....
                       आखिरी केस
प्यार, बेवफाई, दोस्ती, नफरत और इन्वेस्टीगेशन की एक ऐसी अनूठी दास्तान जिसे आप एक बार पढनें बैठेंगे तो जब तक आप कातिल कर बारे में न जान लेंगे आप इस उपन्यास को छोङेंगे नहीं। ( उपन्यास के अंदर के शीर्षक पृष्ठ से)
यह मोनिका पण्डित सीरीज का पांचवा उपन्यास है। 

Nakki lake- Mount Abu
कहानी-

Sunday, 30 July 2017

52. मुहँ बोला पति- टाइगर

मुँह बोला पति- अजीब शीर्षक वाला गजब उपन्यास
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आपने मुँह बोला भाई या मुँह बोली बहन तो सुनी होगी, क्या आपने कभी मुँह बोला पति सुना है। जी, हाँ, मुँह बोला पति। एक शादीशुदा औरत का दावा है की उसका मुँह बोला एक पति भी है।
अब पाठक को कुतूहल होगा की ये मुँह बोला पति कैसे हो गया। तो इसके लिए तो राजा पॉकेट बुक्स- दिल्ली से प्रकाशित टाइगर का उपन्यास "मुँह बोला पति" पढना होगा।
  उपन्यास का नाम जितना रोचक है स्वयं उपन्यास भी उतना ही रोचक है। पाठक एक बार पढना शुरु करेगा तो अंत तक सतत पढता ही चला जायेगा।
आप स्वयं उपन्यास की झलक देख लीजिएगा।
"देखो!"- अनिता अपने पति के सामने हाथ जोङकर गिङगिङाने लगी -" मैंने आज तक कभी तुमसे कुछ नहीं मांगा। पहली बार मांग रही हूँ । मुझे संयम ला दो।"
"खबरदार!"- संतोख सिंह दहाङा -" जो तुमने मेरे सामने किसी गैरमर्द का नाम लिया- जूबान खींच लूंगा।"
"संयम कोई गैर नहीं है। वह मेरा मुहँ बोला पति है। मैं उसे बहुत चाहती हूँ । मैं उसके बिना जिंदा नहीं रह सकती।"
कौन था वह अजनबी?
जिसे देखते ही एक पतिव्रता स्त्री सरेआम चीख-चीखकर उसे अपना पति कहने लगी।
शुरु से अंत तक, संस्पेंश से लबरेज एक ऐसी पतिव्रता स्त्री की कहानी,जिसने अपने मुँह बोले पति को बचाने के लिए अपने सगे पति का कत्ल कर डाला।
       वह कोई सम्मोहनकर्त्ता- कोई तांत्रिक या कोई जादूगर था? या फिर कोई जालसाज!
इन उलझने भरे प्रश्नों के उत्तर तो टाइगर द्वारा लिखित इस मर्डर मिस्ट्री में ही मिल सकते हैं।
विशेष- टाइगर (JK VERMA) ने एक बार फेसबुक पर बताया था की यह उपन्यास उन्होंने पंजाब के भटिण्डा शहर के एक कस्बे भुचो मण्डी में रहकर लिखा है जहाँ की ये कहानी है।
लेखक महोदय का दावा है इस उपन्यास के दो पात्र मिथिलेश बाबू और लेडिज टेलर रंगीला दोनों वास्तविक पात्र है।
कहानी-
उपन्यास एक मर्डर मिस्ट्री है। बैंक कर्मचारी मिथिलेश बाबू अपने भानजे मनोचिकित्सक संयम अरोङा को एक विशेष काम के लिए भुच्चो मण्डी (पंजाब) बुलाते हैं।
भटिण्डा शहर में संयम को एक लङकी सुरभि मिलती है जो स्वयं को भुच्चो मण्डी की निवासी बताती है और संयम के साथ ही सफर करती है।
  भुच्चो मण्डी पहुंचने के अगले दिन उस लङकी सुरभि की हत्या हो जाती है और उसका कातिल संयम अरोङा को ठहराया जाता है।
  कस्बे के विधायक त्रिलोचन सिंह की पौत्रवधू अनिता जब संयम को देखती है तो वह उसे अपना मुँह बोला पति मानने लगती है और चिल्लाने लगती।
जब अनिता का पति इसका विरोध करता है तो अनिता अपने पति का कत्ल कर देती है।
इस प्रकार कत्ल दर कत्ल होते हैं और कहानी उलझती चली जाती है।
- सुरभि कौन थी?, उसका कातिल कौन था?
- अनिता संयम को अपना मुँह बोला पति क्यों कहती है?
- अनिता अपने पति का कत्ल क्यों करती है?
- मिथिलेश बाबू संयम को अपने  शहर क्यों बुलाते हैं?
- असली कातिल कौन है?
- क्या रहस्य है मुँह बोले पति का?
ऐसे असंख्य प्रश्नों के उत्तर तो टाइगर के मर्डर मिस्ट्री उपन्यास 'मुँह बोला पति' को पढकर ही मिलेंगे।

कमियां-
उपन्यास में लेखक ने एक जाति/समुदाय विशेष पर बार-बार गलत टिप्पणी की है।
इस विषय पर जुलाई 2017 को फेसबुक के दीवाने नामक ग्रुप पर बहस भी चली जिसमें लेखक महोदय ने भविष्य में ऐसी गलती न होने का वादा किया।
- लेखक का दावा है यह एक उपन्यास पंजाब के भुच्चो मण्डी कस्बे में रहकर लिखा है लेकिन उपन्यास में पंजाब के भुच्चो मण्डी के नाम का वर्णन मात्र है, वहाँ के परिवेश और स्थानों का कहीं कोई जिक्र नहीं। अगर वहाँ के स्थानों आदि का वर्णन होता तो उपन्यास की विश्वसनीयता बढ जाती।
  उपन्यास रोचक है, पाठक को किसी भी स्तर पर निराश नहीं करेगा।
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उपन्यास - मुँह बोला पति
लेखक- टाइगर (JK VERMA, हरियाणा)
प्रकाशन- राजा पॉकेट बुक्स- दिल्ली
पृष्ठ- 271
मूल्य-20₹

Saturday, 22 July 2017

51. किसका कत्ल करुं- टाइगर

क्या आप में एक जासूसी दिमाग है?
अगर हां! तो प्लीज बताइए...
मेरे परिवार का कातिल मेरा कौन सा ब्वाॅयफ्रेण्ड है? और कैसे है?
यह चैलेंज है टाइगर द्वारा लिखित उपन्यास 'किसका कत्ल करुं' में।
प्रस्तुत उपन्यास एक दिमागी जंग है।
लेखक का दावा है कि इस जंग को सिर्फ वही पाठक जीत सकता है, जिसके दिमाग के दरवाजे और खिङकियां खुली हुयी हैं।
  दावे में कितनी सच्चाई है- यह जानने के लिए पढिए प्रस्तुत उपन्यास और ईनामी प्रतियोगिता में शामिल होकर जीतिए 5100/- के आकर्षक पुरस्कार।
(उपन्यास के अंदर के शीर्षक पृष्ठ से)
यह उपन्यास स्वयं में एक पहेली होने के साथ-साथ एक नया प्रयोग भी है।
पहेली तो इस दृष्टि से है की पाठक को उपन्यास की नायिका सोनाली महाजन के परिवार के हत्यारे को पकङना है। पाठक के समक्ष चार पात्र हैं और उन्हीं चारों में से एक कातिल भी है।
प्रयोग इस दृष्टि से है की उपन्यास का कोई अन्य भाग नहीं है, उपन्यास स्वयं में पूर्ण है, लेकिन पाठक के समक्ष एक प्रश्न छोङकर चला जाता है  और वह प्रश्न है की सोनाली महाजन के परिवार का कातिल कौन है?
कहानी-
       उपन्यास की कहानी सोनाली महाजन को मिले उस पत्र से होती है जिसमें यह वर्णन होता है की उसका पङोसी अनिल वर्मा उसके परिवार को मौत के घाट उतार देगा।
  सोनाली इस पत्र को लेकर सब-इंस्पेक्टर सुधीर गुप्ता से मिलती है और क्रिमिनल वकील रंजीत चौहान से भी संपर्क करती है।
मुकेश चांदना, जो की सोनाली के बचपन का मित्र है और एक और पात्र है नरेश मेहता जो की एक विशेष घटना के दौरान सोनाली से मिलता है।
सोनाली के जन्मदिन की एक छोटी सी पार्टी में सुधीर गुप्ता, नरेश मेहता, मुकेश चांदना, रंजीत चौहान और रंजीत की बहन प्रिया शामिल होते हैं।
इस पार्टी के दौरान सोनाली की बहन पर जानलेवा हमला होता है और सोनाली के पापा प्रमोद महाजन के टांग में कोई अज्ञात शख्स गोली मार देता है।
यहीं से सोनाली के परिवार पर मुसीबतों के पहाङ टूट पङते हैं और एक दिन सोनाली के मम्मी-पापा व बहन की हत्या हो जाती है।
हत्यारा कौन है यह प्रश्न अंत तक यथावत बना रहता है।
पात्र- उपन्यास में पात्रों की संख्या बहुत है लेकिन कोई भी पात्र ऐसा नहीं है जो कहानी के अनुकूल न हो।
सभी पात्र यथासंभव अपने किरदार को अच्छी तरह से निभाते हैं।
मुख्य पात्रों के अतिरिक्त अन्य पात्र हैं- चांदराम, कब्बाङी, रिश्तेदार, सुनंदा, ख्याली राम,बाॅस, मनीषा इत्यादि ।
कब्बाङी और रिश्तेदार -
उपन्यास के यह दो ऐसे पात्र हैं जो स्वयं में एक अजूबा होते हुए भी महत्वपूर्ण हैं‌। कहानी का अधिकांश भाग इन्हीं दो पात्रों पर टिका है‌।
दोनों पात्र रहस्यमय होते हुए भी पाठक को हँसाने में सक्षम है।
उपन्यास में कमी-
उपन्यास में कत्ल पर कत्ल होते हैं और अंत तक कातिल का पता नहीं चलता, भविष्य में किस उपन्यास में यह रहस्य खोला गया है इसका कहीं भी वर्णन नहीं ।
- सोनाली महाजन को जो व्यक्ति सर्वप्रथम एक पत्र लाकर देता है, अगर सोनाली उससे यह पूछ लेती की तुम्हें कैसे पता चला की मैं सोनाली महाजन हूँ, यह मेरा घर है, तो कहानी बहुत हद तक बदल जाती।
- इसके अलावा और भी बहुत सी उपन्यास में कमियां है पर वो कातिल पकङे जाने तक न बताने योग्य हैं।
उपन्यास पढें-
उपन्यास बहुत ही रोचक है, उक्त कमियों को नजरंदाज करके पढें तो मुझे विश्वास है ये उपन्यास पाठक को लंबे समय तक याद रहेगा।
जब भी टाइगर या इस उपन्यास का नाम आयेगा तब भी कातिल को तलाशता रहेगा, वर्षां बाद भी।
क्योंकि यह एक
अनसुलझी मर्डर मिस्ट्री है।

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  उपन्यास- किसका कत्ल करुं
लेखक- टाइगर (JK Verma)
प्रकाशन- राजा पाकेट बुक्स, दिल्ली
पृष्ठ-272
मूल्य-20₹

Sunday, 16 April 2017

38. हस्ती मिटा दूंगा- टाइगर

एक ईमानदार पुलिस अफसर है। जिसके घर में उसकी पत्नी व एक छोटा भाई। छोटे भाई को माँ-बाप के अभाव में छोटे पुत्र की तरह पाला गया है, इसलिए छोटा भाई थोङा बिगङ गया है।
  पुलिस अफसर ईमानदार है, रिश्वत नहीं लेता। इसलिए खलनायक से दुश्मनी हो जाती है। इस दुश्मनी का परिणाम है पुलिस अफसर की मौत। अब पुलिस अफसर का छोटा भाई आवारागर्दी छोङकर खलनायक से बदला लेता है।
        जी, ये है कहानी टाइगर के उपन्यास ' हस्ती मिटा दूंगा' की।
अब कहानी और नाम से ही स्पष्ट है कौन-किसकी हस्ती मिटाना चाहता है।
उपन्यास वही पुरानी भारतीय फिल्मों की तरह है। इसमें कुछ भी नया या हटकर नहीं है, जिसके दम पर उपन्यास पढा जाये। प्रारंभ के कुछ पृष्ठ पढते ही कहानी आईने की तरह साफ हो जाती है और पाठक को पता चल जाता है की उपन्यास में आगे क्या होगा। अगर आगे होने वाला दृश्य रोचक हो तो भी कहानी पढी जा सकती है, पर यहाँ तो ऐसी रोचकता भी नहीं है।
                    कहानी- पुलिस अफसर डी.सी.पी. शमशेर सिंह राणा, एक ईमानदार व्यक्ति है। दूसरी तरफ उसी शहर में एक स्मगलर है सांगा ठाकुर। एक बार शमशेर सिंह, सांगा ठाकुर के अवैध माल को पकङ लेता है। अब सांगा ठाकुर, डी.सी.पी. शमशेर सिंह को रिश्वत देने की कोशिश करता है और शमशेर सिंह मना कर देता है।
  शमशेर सिंह अब सांगा के अवैध धंधों पर कार्यवाही कर उसे बंद करवा देता है तब गुस्से में आकर खलनायक सांगा, डी.सी.पी. शमशेर सिंह की एक योजना के तहत हत्या करवा देता है।
      जब शमशेर सिंह के छोटे भाई शक्ति सिंह को हकीकत पता चलती है तो वह अपने भाई की मौत का बदला लेना चाहता है। उसी शहर में एक और खलनायक है, शाकाल। जो की सांगा का दुश्मन है और एक ईमानदार खलनायक है। जिन लोगों पर अत्याचार होते हैं उन्हें शाकाल शरण देता है।
अब शाकाल और शक्ति सिंह एक साथ आ जाते हैं, क्योंकि दोनों का दुश्मन एक ही है, वह है सांगा। अब शेष कहानी सांगा से बदला लेने में बीत जाती है।
हैरानी तो तब होती है जब पता चलता है की इस उपन्यास के दो भाग हैं। दूसरा भाग है 'सोने की लंका'।

संवाद- उपन्यास के कुछ संवाद पढने लायक हैं। संवाद उपन्यास के पात्र का चरित्र-चित्रण करने के साथ-साथ उपन्यास की कथावस्तु को भी आगे बढ़ाने में सहायक हैं।
सांगा ने कहा,-"किस जमाने की बात कर रहे हो डी.सी.पी. साहब। आज पाप की लंका ही फलती-फूलती है। शराफत और सच्चाई का नाम आप जैसे लोग अपने-आप को तसल्ली देने के सिवा और कुछ नहीं कर सकते।  ........सच्चाई और आदर्शों की चक्की में ऐसा कोई गेहूँ नहीं पिसता जिससे पेट की भूख मिटाई जा सके।"
"पेट तो रोटी से ही भरता है सांगा साहब। और रोटी आदमी मेहनत से कमा लेता है। बात रोटी तक ही सीमित रहे- तब अलग बात है। बात हवस तक पहुँच जाए तो उसका कोई अंत नहीं । और सांगा साहब-आप इसी हवस के शिकार हो चुके हो। और इस हवस की वजह से ही हर रास्ते पर आपको कानून का सामना करना पङेगा"
     उपर्युक्त सांगा और शमशेर सिंह के परस्पर कथन से दोनों के चारित्रिक गुणों का स्पष्ट पता चलता है।
शमशेर सिंह का एक कथन और देखिए जिसमें वह अपने भाई शक्ति सिंह को संबोधित करता है।
"हां शक्ति- हमने आज तक अपनी मर्यादाओं के घेरे से बाहर पंख फङफङाने की कोशिश कभी नहीं की। हम आज तक जीते रहे हैं, तो अपने आदर्शों के बलबूते पर, अपनी ईमानदारी की नीव पर। अपनी सच्चाई की डगर पर ....।" (पृष्ठ-98)
   एक जगह पर शक्ति सिंह का कथन देखिए- "आज की दुनिया में अन्याय से लङना है तो अपने हाथ में जुल्म की तलवार पकङनी पङेगी। इसी तलवार से अन्याय को खत्म किया जा सकता है" (पृष्ठ-130)
अब ये बात जरा अजीब सी है की आदमी जुल्म कर कैसे अन्याय को खत्म कर सकता है। जब वह जुल्म की तलवार उठाऐगा तब तो अन्याय खत्म नहीं होगा, बल्कि बढेगा।
अब पता नहीं लेखक महोदय क्या कहना चाहते हैं।
     टाइगर का उपन्यास हस्ती मिटा दूंगा एक बदला प्रधान उपन्यास है। पढने के तौर पर उपन्यास में कोई विशेष बात नहीं है। उपन्यास में पाठक को प्रभावित करने की क्षमता नहीं है। पाठक अगर प्रथम भाग पढ भी लेगा तो वर्तमान समय में शायद ही वह इस उपन्यास के दूसरे भाग को पढने की इच्छा जताये।
  अगर लेखक चाहता तो इस उपन्यास को एक भाग में समेट सकता था, पर सोचने वाली बात ये है की लेखक दूसरे भाग 'सोने की लंका' में क्या लिखेगा। क्योंकि कहानी का इतना विस्तार नहीं है।
    
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उपन्यास- हस्ती मिटा दूंगा
दूसरा भाग- सोने की लंका
लेखक- टाइगर (JK VERMA, जगदीश कुमार वर्मा)
प्रकाशक- राजा पाॅकेट बुक्स
पृष्ठ- 240
मूल्य- 15₹ (अब मूल्य परिवर्तन संभव है)

37. अदालत मेरा क्या करेगी- टाइगर

दिल्ली के विज्ञान भवन में संत जांभोजी के विचारों के प्रचार हेतु एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 18,19.03.2017 को हुआ था।
इस सम्मेलन में एक प्रतिभागी के रूप में में भी शामिल हुआ था। वहाँ से वापस आते वक्त बुराङी रोङ, दिल्ली से मैंने राजा पाॅकेट बुक्स से कुछ उपन्यास खरीदे थे।
वेदप्रकाश शर्मा का अंतिम उपन्यास ' छठी उंगली' संजय गुप्ता का हवेली के दुश्मन के अतिरिक्त टाइगर के पांच उपन्यास इच्छाधारी, जुर्म का चक्रव्यूह, इंसाफ में करुंगा गोलियों की बरसात, हस्ती मिटा दूंगा और अदालत मेरा क्या करेगी।
टाइगर के अन्य उपन्यासों की समीक्षा के बाद अब प्रस्तुत है 'अदालत मेरा क्या करेगी' उपन्यास की समीक्षा।
अदालत मेरा क्या करेगी- टाइगर
प्रस्तुत उपन्यास को हम दो भागों में विभक्त कर सकते हैं। प्रथम भाग वहाँ तक जब गौतम सरीन दुश्मन देश की कैद से मुक्त होकर वापस आता है और दूसरा भाग जब गौतम सरीन हरिपुर आता है।
अगर देखा जाये तो उपन्यास का प्रथम भाग बहुत ही बोरियत है। प्रत्येक पात्र लंबे-लंबे संवाद बोलता है, कई संवाद तो एक-एक पृष्ठ के हैं।
उपन्यास का दूसरा भाग ही उपन्यास को संभाल पाता है, गति देता है और उपन्यास को पढने लायक बनाता है।
हालांकि उपन्यास में इस प्रकार का कोई भाग का विभाजन नहीं है, पर कहानी को देखा जाये तब महसूस होता है की मध्यांतर से पूर्व मध्यांतर के पश्चात वाली कहानी में बहुत फर्क है, मानों दो अलग-अलग व्यक्तियों ने कहानी लिखी हो। अगर उपन्यास का प्रथम भाग न भी होता तो उपन्यास ज्यादा अच्छी बन सकती थी।
कहानी- सेठ शामनाथ चावला एक बिजनेस मैन है और उनकी सोच है की नौकरीपेशा व्यक्ति की कोई जिंदगी नहीं होती।
शामनाथ चावला की पुत्री गीता एक एयरफोर्स के जवान गौतम सरीन से प्यार करती है लेकिन शामनाथ चावला को एक पसंद नहीं की एक बिजनेस मैन की पुत्री एक ऐसे व्यक्ति से प्यार करे व शादी के सपने देखे जिसकी एक निश्चित तनख्वाह है। वो गौतम सरीन व गीता की शादी के लिए मना कर देते हैं।
दूसरी तरफ एक युद्ध के दौरान गौतम सरीन दुश्मन देश में कैद कर लिए जाते हैं और तीन साल बाद उनकी वापसी होती है। यहाँ तक अप उपन्यास का प्रथम भाग सकते हो।
अब बात करें उपन्यास के दूसरे भाग की।
वापसी पर पता चलता है की गीता की शादी हो गयी और गीता व उसका बाप एक बदतर जिंदगी जीने जो मजबूर हैं। कारण गीता का पति उन पर जुल्म करता है।
इस ज़ुल्म से बचाने के लिए गौतम आगे आते है व गीता और शामनाथ चावला को बचाता है।
अब पाठक स्वयं समझ सकता है की उपन्यास के प्रथम व द्वितीय भाग में कोई ज्यादा सामंजस्य नहीं है। प्रथम भाग जहाँ हद से ज्यादा बोरियत है तो वहीं द्वितीय भाग अति तीव्र गति से चलता है जो की पाठक को बाँधें रखने में पूर्णतः सक्षम है।
उपन्यास के संवाद-
उपन्यास के कुछ संवाद पठनीय है।
-"जहाँ रिश्ते होते हैं- भावनात्मक संबंध होते हैं- उनकी बातों का बुरा नहीं माना जाता।"- (पृष्ठ-10)
-"हल जीवन का प्रतीक है और बंदूक मौत का दूसरा नाम है।" (पृष्ठ-54)
-"जिंदगी बङी नायाब चीज हुआ करती है दोस्त- एक बार गुम हो जाए, फिर नहीं मिला करती।' (पृष्ठ-90)
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उपन्यास में कुछ बातें है जो कहानी की दृष्टि से थोङी अजीब लगती है।
- गीता का पति गीता व अपने ससुर पर अत्याचार करता है, वह भी तब, जब की सब प्रोपर्टी उसके नाम हो चुकी है और बाकी भी भविष्य में उसे मिलने वाली है। इस स्थिति में आदमी ऐसा करेगा थोङा अजीब सा लगता है।
- जब गौतम सरीन युद्ध पर जा रहा होता है तब गीता उससे मिलने आती है, वह भी रात को लेकिन क्यों मिलने आती है कोई कारण स्पष्ट नहीं होता, सिर्फ कुछ लंबे-लंबे संवादों के।
-उपन्यास के मध्यांतर के पुर्व व पश्चात वाले भाग में सामंजस्य नहीं बैठता।
शीर्षक-
जैसा की उपन्यास का शीर्षक है- अदालत मेरा क्या करेगी। वैसा उपन्यास में कुछ भी नहीं है। यहाँ तक की उपन्यास में न तो कोई अदालत का दृश्य है, न कोई जज न कोई वकील।
जहाँ मध्यांतर से पुर्व उपन्यास पूर्णतः सामाजिक है वहीं बाद में शुद्ध थ्रिलर।
अगर उपन्यास के प्रथम भाग में लंबे-लंबे संवादों को काट कर छोटा कर दिया जाये और द्वितीय भाग पर ध्यान दिया जाये तो उपन्यास एक बार पढा का सकता है।
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उपन्यास- अदालत मेरा क्या करेगी
लेखक- टाइगर
प्रकाशक- राजा पाॅकेट बुक्स
पृष्ठ- 240
मूल्य- 20₹
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इन दिनों मैंने टाइगर को इंटरनेट पर खूब सर्च किया पर इनके उपन्यासों के बारे में कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं।
पर एक साइट पर इनके बारे में बहुत कुछ मिला।
इनका परिचय, असली नाम आदि।
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टाइगर की साइट

36. गोलियों की बरसात- टाइगर

उपन्यासकार टाइगर का उपन्यास 'गोलियों की बरसात' एक रोचक व थ्रिलर उपन्यास है। उपन्यास की कहानी में कई रोचक मोङ हैं जो पाठक को प्रभावित करते हैं‌। पाठक जैसे -जैसे आगे बढता है वैसे -वैसे उसके सामने नये-नये रहस्य आते जाते हैं।
    उपन्यास का आधार एक कत्ल है, जिसमें एक युवक अनायास ही फस जाता है, और असली अपराधी आजाद घूमता है। युवक का दोस्त इस षडयंत्र को बेनकाब करने के लिए निकलता है तो उसे चौंकाने वाले कई रहस्य बता चलते हैं।
  जब वह कत्ल की वजह पता लगाने के लिए निकलता है तो दूसरी तरफ खलनायक भी इस युवक को मारने के लिए व्यग्र हो उठता है।
लेकिन जीत सत्य की होती है।
उपन्यास बहुत ही रोचक है।
         उपन्यास की कहानी की बात करें तो प्रशांत और संतराम दो चोर-जेबकतरे हैं। छोटी-मोटी चोरी कर अपना पेट पालने वाले हैं। एक रात संतराम उर्फ संतु एक घर में चोरी करने घुसता है। तिजोरी से रुपये निकालने के समय कोई अन्य व्यक्ति, उसी  कमरे में सोये घर के मालिक ' दीवान साहब' का खून कर देता है और इल्जाम आ जाता है चोर संतु पर।
जब संतु के दोस्त प्रशांत  को इस बात का पता लगता है तो वह सत्य का पता लगाने की कोशिश करता है।
   प्रशांत को पता चलता है की संतु जिस व्यक्ति की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार है, वह दीवान साहब वही है जिसकी फैक्ट्री में प्रशांत का भाई मैनेजर था।
यह वही दीवान है जिसकी बेटी कभी प्रशांत को प्यार करती थी।
          प्रशांत का भाई फैक्ट्री में काम करते वक्त एक ऐसा रहस्य जान गया था जिसके कारण उसकी जान चली गयी, और उसके पास जो महत्वपूर्ण कागज थे वे गायब हैं।
  प्रशांत जब दीवान साहब के घर जाता है तब दीवान साहब की बेटी, प्रशांत की प्रेयसी, उसे बताती है की दीवान साहब कुछ ऐसी बात जान गये थे जिसके कारण उनकी जान को खतरा पैदा हो गया था।
-आखिर वह क्या बात थी?
-क्या रहस्य था?
-जिसके कारण पहले फैक्ट्री का मैनेजर जान गवा बैठा और फिर फैक्ट्री का मालिक?
-कौन था असली कातिल?
-क्या था फैक्ट्री का राज?
-क्या प्रशांत उस रहस्य को जान सका?
-क्या संतु बेगुनाह साबित हो सका?
इस रहस्य ने और किस-किस की जान ली।
इन सब बातों का पता तो टाइगर का उपन्यास 'गोलियों की बरसात' पढ कर ही चलेगा।
उपन्यास के कथन-
  "रिश्ता जब जोङा जाता है- तब तोङा नहीं जा सकता।  जो तोङ देते हैं- वे रिश्ता जोङने के काबिल ही नहीं होते।"
      "पुलिस जनता की हिफाजत के लिए बनाई गयी है- लेकिन सरकारी वर्दी पहन लेने के बाद .........वही लोग रक्षा की आङ में स्वयं ही जनता को लूटते चले जाते हैं।
" पांचों उंगलियाँ तो एक समान नहीं होती......
मैं नहीं जानता । ये जरूर जानता हूँ, दोनों हाथों के अंगूठे एक बराबर होते हैं।"
उपन्यास की एक संक्षिप्त झलक- जो उपन्यास की कहानी को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है।
"आप सोच रहें है- आपको जिंदा देखकर मुझे हैरानी क्यों नहीं हुयी?"-प्रशांत मुस्कुराया- " और फिर वह लाश किसकी थी- जिसका कत्ल किया गया था। आखिर एक हत्या तो हुयी थी। कोठी में गोली चली थी- किसी इन्सान का खून भी बहा था, और उस आदमी की सूरत हू-ब- हू आपसे कैसे मिलती थी। उस आदमी ने कोई मास्क नहीं पहना था। पहना होता तो पोस्टमार्टम के समय यह भेद जरूर खुल जाता। वह लाश किसकी थी मैं जानता हू।"
          थ्रिलर उपन्यास है जिसमें एक के बाद एक घटना घटती चली जाती है। प्रशांत के साथ-साथ भी इस रहस्य में उलझ जाता है की कातिल कत्ल क्यों कर रहा है।
हालांकि उपन्यास की गति धीमी है जिसके कारण पढने का स्वाद कम हो जाता है, लेकिन फिर भी कहानी पढी जा सकती है।
उपन्यास में किसी का कोई उलझाव या बिखराव नहीं है, यह उपन्यास की विशेषता है। पूरी कहानी एक ही सीध में निरंतर बिना रुकावट के चलती है।
       उपन्यास में ज्यादा पात्र नहीं हैं। जितने भी पात्र हैं सब कहानी के अनुसार उचित हैं। उपन्यास में कहीं भी अनावश्यक वार्ता या दृश्य नहीं है।है।
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उपन्यास- गोलियों की बरसात
लेखक- टाइगर
प्रकाशक- राजा पाॅकेट बुक्स- दिल्ली
पृष्ठ- 208
मूल्य- 15₹
(वर्तमान कीमतों में मूल्य परिवर्तन संभव है)
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जुर्म का चक्रव्यूह

35. इंसाफ मैं करुंगा- टाइगर

कहानी इंसाफ की
इंसाफ मैं करूंगा - टाइगर

एक साधारण सी कहानी है और वैसा ही उसका समापन है। अक्सर ऐसी कहानियाँ हिंदी फिल्मों में खूब देखने को मिलती हैं। अब पता नहीं उपन्यासकार वैसी ही बोरियत कथा क्यों लिख देते हैं जैसी ना जाने कितनी बार दोहराई जा चुकी हैं।
हालांकि समीक्षा वाला यह उपन्यास काफी पुराना है और हो सकता है तब इस प्रकार की कहानियाँ काफी प्रसिद्ध रही हों, पर अब कई वर्षों पश्चात ये उपन्यास/कहानी कोई असर नहीं छोङती।
        उपन्यास पढ लिया और इस पर समीक्षा लिखनी थी ताकी भविष्य के पाठक इन लेखकों की रचनाओं से परिचित हो सकें, बस इसलिए ये समीक्षा लिख रहा हूँ ।
हालांकि टाइगर के सभी उपन्यास ऐसे नहीं हैं, बहुत गजब उपन्यास भी इन्होंने लिखे हैं।
        अभी 17.04.2017 को टाइगर का क्रमशः पांचवां उपन्यास 'इंसाफ मैं करुंगा' पढा।
प्रस्तुत उपन्यास की कहानी पूर्णतः साधारण है।
सेठ किशन लाल और रूपचंद दोनों संयुक्त रूप से एक फैक्ट्री स्थापित करते हैं। इस फैक्ट्री की पनाह में सेठ रूपचंद स्मग्लिंग का कार्य करता है। एक दिन सेठ रूपचंद अपने मित्र किशनलाल की हत्या करवा कर उस फैक्ट्री पर कब्जा कर लेता है।
         सेठ किशन लाल की पत्नी अपने पुत्र-पुत्री के साथ शहर छोङ देती है। समयानुसार किशन लाल का पुत्र अजय जवान होकर सेठ रूपचंद से प्रतिशोध लेता है और फैक्ट्री का मालिक बन जाता है।
लो जी हो गयी 'इंसाफ मैं करूंगा' उपन्यास की कथा पूर्ण।
उपन्यास में कोई रोचकता नहीं है, धीमी रफ्तार व परम्परागत कहानी कोई खास असर पाठक पर नहीं छोड़ती । उपन्यास के कुछ संवाद अवश्य पढने लायक हैं।
उपन्यास नाम के अनुसार थ्रिलर है पर वास्तव में ये सामाजिक ज्यादा हो गयी।
संवाद-
-"दौलत की हवस आदमी को अंधा कर देती है। तब वह कुछ भी नहीं देख पाता। रिश्तों की बात भी भूल जाता है। इसी हवस के बढ जाने से वह अच्छे -बुरे  की तमीज खो बैठता है।"
- " आदमी के पास अगर दौलत का जहर एकत्र हो जाये तो वह नाग बन जाता है।" (पृष्ठ-27)
-"पूंजीपति लोग जब तक मजदूर के खून की आखिरी बूंद भी नहीं चूस लेते उसे मरने कहां देते हैं।" (पृष्ठ-39)
- "गरीबी में दर्जे नहीं हुआ करते। दर्जे तो अमीरों के होते हैं- लखपति, करोङपति और अरबपति। गरीब तो हर हाल में गरीब है। एक रूप है- एक ही परिभाषा।" (पृष्ठ-54)
- "गरीबी से ही जन्म लेता है कम्युनिज्म....और बराबरी का नारा।" (पृष्ठ-64)
-"गरीब के लिए प्यार जैसी भावना अनमोल है। वह जिसे चाहने लगता है- उसे निभाने के लिए टूट जाना कबूल कर लेता है। लेकिन अमीरों के लिए तो प्यार शब्द एक खेल से ज्यादा महत्व नहीं रखता। यह लोग अगर सुबह ब्रेकफास्ट करना भूल जाते हैं तो प्यार कर लेते हैं।" (पृष्ठ-102)
-" जहाँ इंसान को दो रोटी मिले - वहाँ सिर झुकाना पङता है। उस जगह का दर्जा मंदिर- मस्जिद के समान ही होता है।" (पृष्ठ-153)
- "बाहर जलती आग का तमाशा सभी देख पाते हैं...उसी आग की कुछ चिंगारियों से अपना घर जलने लगे तो आदमी सहन नहीं कर पाता, पीङा से चीख उठता है।" (पृष्ठ-177)
           उपर्युक्त संवाद पढ ही पता चलता है की उपन्यास में प्रेम-नफरत, ईर्ष्या-द्वेष, प्रतिशोध का रूप शामिल है।
उपन्यास का समापन सुखांत है।
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उपन्यास- इंसाफ मैं करूंगा
लेखक - टाइगर
प्रकाशक- राजा पाकेट बुक्स
पृष्ठ- 208
मूल्य- 15₹
(वर्तमान कीमतों के अनुसार मूल्य परिवर्तन संभव है)