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Thursday, 2 July 2020

Tuesday, 24 March 2020

281. चित्रलेखा- भगवतीचरण वर्मा

समीक्षा पाप और पुण्य की
चित्रलेखा- भगवतीचरण वर्मा, उपन्यास
 


श्वेतांक ने पूछा—“और पाप !”
महाप्रभु रत्नाम्बर मानो एक गहरी निद्रा से चौंक उठे। उन्होंने श्वेतांक की ओर एक बार बड़े ध्यान से देखा—“पाप ? बड़ा कठिन प्रश्न है वत्स ! पर साथ ही बड़ा स्वाभाविक ! तुम पूछते हो पाप क्या है !" इसके बाद रत्नाम्बर ने कुछ देर तक कोलाहल से भरे पाटलिपुत्र की ओर, जिसके गगनचुम्बन करने का दम भरनेवाले ऊँचे-ऊँचे प्रासाद अरुणिमा के धुँधले प्रकाश में अब भी दिखलाई दे रहे थे, देखा—“हाँ, पाप की परिभाषा करने की मैंने भी कई बार चेष्टा की है, पर सदा असफल रहा हूँ। पाप क्या है, और उसका निवास कहाँ है; यह एक बड़ी कठिन समस्या है, जिसको आज तक नहीं सुलझा सका हूँ। अविकल परिश्रम करने के बाद, अनुभव के सागर सें उतराने के बाद भी जिस समस्या को नहीं हल कर सका हँ, उसे किस प्रकार तुमको समझा दूँ ?”

भगवतीचरण वर्मा द्वारा लिखा गया उपन्यास 'चित्रलेखा' मुख्यतः पाप-पुण्य को रेखांकित है। आखिर पाप क्या है और पुण्य क्या ह? यह स्वाभाविक सा प्रश्न है और इसे आधार लिखा गया यह उपन्यास पठनीय और विचारणीय भी है।
महाप्रभु रत्नाकर के दो शिष्य शिक्षा पूर्ण करने पर अपने गुरु से प्रश्न पूछते है कि पाप और पुण्य क्या है?
     श्वेतांक और विशाल को इसी बात को पता लगाने के लिए महाप्रभु दोनों को दो अलग-अलग प्रवृति के दो लोगों के पास भेजते हैं।
एक योगी है और दूसरा भोगी। योगी का नाम है कुमारगिरि और भोगी का नाम है बीजगुप्त।