एक प्यारी सी पत्रिका
Thursday, 31 July 2025
Sunday, 31 December 2023
595. चंपक 2023, दिसम्बर -द्वितीय
बाल पत्रिका चंपक
चंपक 2023, दिसम्बर -द्वितीय
लो जी, एक साल और खत्म हो गया। जिस वर्ष )2023) का उत्साह के साथ स्वागत किया था, वह साल अपने साथ बहुत सी यादें लेकर चला गया।
जब नया आयेगा तो तय है पुराना तो जायेगा ही। सन् 2023 चला गया और हम नववर्ष 2024 का स्वागत करते हैं। जब से मैंने यह ब्लॉग आरम्भ किया है तो उसमें सन् 2023 पहला वर्ष है जिसमें सब से कम किताबें पढी हैं और उस से भी कम किताबों पर अपने विचार लिखे हैं। इस साल कुल 40 किताबों पर अपनी समीक्षाएं लिखी हैं और लगभग पचास किताबें पढी हैं।
इस वर्ष (2024) में यह संख्या कैसी रहेगी,यह तो पता नहीं, फिर भी अच्छी किताबें पढने की कोशिश रहेगी।
वर्ष 2023 का समापन बाल पत्रिका चंपक के साथ किया है। चंपक वह पत्रिका है जिसमें मेरी सब से पहले रचना 'जंगल में प्रजातंत्र' प्रकाशित हुयी थी।
अब बात करते हैं पत्रिका चंपक की। समय के साथ चंपक में बहुत परिवर्तन आये हैं। अब इसका आकार भी बदल गया है। प्रस्तुत अंक (दिसंबर- द्वितीय, 2023) क्रिसमिस पर आधारित है। इस अंक में कुल सात कहानियाँ है, जिसमें से तीन कहानियाँ क्रिसमस से संबंधित हैं। कुछ चित्रकथाएं और नियमित स्तम्भ भी है।
Saturday, 30 December 2023
Tuesday, 26 December 2023
593. मनोहर कहानियां- नवम्बर 1998
रहस्य-रोमांच विशेषांक
मनोहर कहानियां- नवम्बर 1998
हिंदी रोमांच साहित्य में मनोहर कहानियाँ पत्रिका का कभी अतिविशिष्ट नाम रहा है। इलाहाबाद के मित्र प्रकाशन से सन् 1944 में प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका में काल्पनिक रोमांचक कहानियों के साथ-साथ सत्य पर आधारित कहानियाँ भी प्रकाशित होती थी। इन कहानियाँ में अपराध पर आधारित कहानियाँ ही होती थी। इसके अतिरिक्त छोटी-छोटी रोचक जानकारियाँ भी समाहित थी।
लम्बे समय पश्चात मनोहर कहानियाँ पत्रिका का एक पुराना अंक 'नवम्बर 1998' पढने को मिला। यह अंक 'रहस्य- रोमांच' विशेषांक है।
इस अंक की प्रथम रचना है 'सलमान खान-मुल्जिम बने शिकार के'
Wednesday, 30 December 2020
Wednesday, 30 September 2020
Thursday, 30 July 2020
360. साईकिल- बाल पत्रिका
इस पत्रिका में बच्चों के लिए कहानियाँ, कविताएं और अन्य बाल उपयोगी सामग्री उपलब्ध है।
इस अंक की मुझे विशेष कहानी लगी वह है प्रभात जी द्वारा लिखित कहानी 'घर' यह मनुष्य के मानवेतर संबंधों पर आधारित बहुत ही मार्मिक रचना है। इसके अतिरिक्त मुझे कहानी 'समानता' रोचक लगी, यह एक सनकी राजा की हास्य कथा है।
इस अंक में कहानियों के अतिरिक्त कविताएँ, आलेख, बाल पहेलियाँ जैसे विविध सामग्री भी उपलब्ध है।
साईकिल पत्रिका एक अच्छा प्रयास है लेकिन प्रस्तुत अंक शामिल रचनाएँ बाल साहित्य की श्रेणी की होती हुए भी मुझे बच्चों के लिए उपयोगी नहीं लगी। अधिकांश रचनाएँ (कहानी, कविता) रोचक नहीं है, इनमें बाल रस होने की जगह बौद्धिकता हावी है।
अगर पत्रिका बच्चों के लिए है रचनाएँ भी उन्हीं के मानसिक स्तर की होनी चाहिए।
अधिकांश रचनाएँ बहुत छोटी हैं लेकिन पृष्ठ पर चित्र बड़े और शब्द छोटे हैं। अधिकांश पृष्ठ तो मात्र चित्रों से भरे गये हैं। हालांकि यह चित्र वाला प्रयोग भी अच्छा है।
इस पत्रिका को हम अगर कागज के स्तर पर देखे तो यह वास्तव में बहुत अच्छे कागज मुद्रित है, लेकिन कहानी के स्तर पर अभी प्रकाशक/संपादक महोदय को बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। बच्चों को रोचक और हास्यप्रद कहानियाँ अच्छी लगती हैं लेकिन ये कहानियाँ कुछ अलग श्रेणी की हैं।
पत्रिका- साईकिल
आवृत्ति- द्वि मासिक
प्रकाशक-
पृष्ठ- 68
संपर्क
Wednesday, 29 July 2020
359. शिविरा- पत्रिका
शिविरा का जुलाई 2020 अंक पढने को मिला। जिसके प्रधान सम्पादक हैं सौरभ स्वामी जी, जो बीकानेर शिक्षा निदेशालय के निदेशक भी हैं।
राजस्थान शिक्षा मंत्री गोविन्द सिंह टोडासरा जी ने शिक्षा के क्षेत्र में काफी महत्वपूर्ण कार्य किये हैं और बहुत से तत्काल लिये गये निर्णय शिक्षा जगत में हमेशा याद किये जायेंगे। इस अंक में गोविन्द सिंह टोडासरा जी का साक्षात्कार पढनीय है।।
शिक्षा मंत्री जी याद किया स्वतंत्र भारत के प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालचारी राजाजी का कथन मुझे बहुत अपील करता है। उन्होंने कहा कि बालक वे चमकते हुए सितारे हैं जो भगवान के हाथ से छूटकर धरती पर गिर पड़े।
कुछ हैरानीजनक भी है- इस साक्षात्कार में बताया गया है की गत सत्र 2019-20 में 1,31,19,38,156.
हैरानी की बात एक अरब से ज्यादा पाठ्यपुस्तकों पर खर्च करने के पश्चात आगामी सत्र 2020-21 में सारा पाठयक्रम (कक्षा10,12 के अतिरिक्त) बदल दिया गया।
राजीव अरोड़ा जी का आलेख 'गुरु पूर्णिमा' एक महत्वपूर्ण आलेख है जो गुरु की महिमा का बखान करता है।
अगर गुरु की महिमा हो और कबीर का जिक्र न आये यह तो असंभव है। आगामी आलेख डाॅ. कृष्णा आचार्य जी का 'कबीर' शीर्षक से ही है।
'गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय।।'
डाॅ. रमेश 'मयंक' जी का आलेख 'प्रभावी शिक्षण' प्रत्येक अध्यापक के लिए उपयोगी आलेख है। उन्होंने क ई बिन्दुओं के माध्यम से शिक्षण को प्रभावी बनाने के उपाय बताये हैं।
वैश्विक महामारी कोरोना पर एक आलेख है-'कोरोना-19 के बाद का शैक्षिक परिदृश्य' यह जयनारायण द्विवेदी जी का आलेख कोरोना के बाद. शैक्षिक स्थिति का आंकलन करता है।
शिक्षा विमर्श में चैनाराम सीरवी का आलेख 'गिजुभाई बधेका का दर्शन' बहुत रोचक आलेख है जो हमें बताना है की बच्चों को शारीरिक दण्ड नहीं देना चाहिये बल्कि उनकी बौद्धिकता के अनुसार शिक्षण कार्य की व्यवस्था होनी चाहिए।
पर्यावरण संरक्षण पर दो आलेख हैं एक कुलदीप सिंह का 'पारिवारिक उत्सवों का हिस्सा बनें वृक्षारोपण' और दूसरा आलेख है स्नेहलता शर्मा का 'पर्यावरण एवं जल संरक्षण'।
स्तम्भ बाल शिविरा में बच्चों की रचनाओं को शामिल करना वास्तव में प्रशंसनीय और बच्चों के उत्साह को बढाने में उपयोगी है।
इसके अतिरिक्त अन्य आलेख, स्तंभ, सूचनाएं और रचनाएँ पठनीय है।
पत्रिका- शिविरा
अंक- जुलाई-2020
पृष्ठ- 50
संपर्क- वरिष्ठ संपादक, शिविरा पत्रिका
माध्यमिक शिक्षा राजस्थान, बीकानेर-334011
Tuesday, 31 March 2020
284. शिविरा- पत्रिका
शिविरा- मार्च-2020
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| Mount Abu in Room |
Monday, 30 December 2019
260. कादम्बिनी पत्रिका
कादम्बिनी- दिसंबर,2019
कादम्बिनी दिसंबर 2019 अंक पढने को मिला।
'शब्दों की दुनिया' आवरण कथा है। यह अंक सन् 2019 में साहित्य की विभिन्न विधाओं में आयी हुयी किताबों पर आधारित है। विभिन्न विषयों की किताबें हिन्दी में आयी और नये-नये लेखक भी उपस्थित हुये हैं।
स्थायी स्तंभ के अतिरिक्त कहानियाँ, आलेख, रोचक जानकारी जैसे अन्य काॅलम भी आकर्षक हैं।
अनामिका जी का आलेख 'खुल रही हैं अलग-अलग राहें' में से 'किताबों की दुनिया इस साल काफी समृद्ध रही, लगभग सभी विधाओं में। अच्छी बात यह रही कि अब बड़े और छोटे प्रकाशकों का भेद मिट रहा है और साहित्येतर विधाओं में, खासकर ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में भी प्रकाशकों की रूचि बढी है। यह हिन्दी की अपनी जनतांत्रिक परम्परा है, जो निरंतर विकसित हो रही है।'
इस आलेख में सन् 2019 में प्रकाशित विभिन्न किताबों की चर्चा की गयी है। यह आलेख बहुत सी किताबों से परिचय करवाता है। मुझे कुछ और पठनीय किताबों की जानकारी उपलब्ध हुयी।
सबसे अच्छी चर्चा लगी चित्रा मुद्गल जी की। वे 'हाशिये पर नहीं रहे हाशिये के लोग' शीर्षक से साहित्य में फैले भ्रष्ट वातावरण का खुल कर चित्रण करती नजर आती हैं। इस आलेख में चित्रा जी ने कुछ पठनीय रचनाओं का जिक्र किया है तो साथ ही उन रचनाओं की चर्चा भी की है जो साहित्य के नाम पर कचरा फैला रहे हैं। इस क्रम को आगे बढाते हुए सविता सिंह जी 'जगर-मगर बाजार लेकिन...'' शीर्षक आलेख में लिखती हैं की "...साहित्य को कतई सिर्फ कलात्मक मनोरंजन के लिए नहीं, अपितु परिवर्तन के औजार के रूप में लिया गया है। ऐसे कवि जब मिलते हैं, तो देश दुनिया के बारे में चिंता करते हैं।"
अगर देखा जाये तो वर्तमान अधिकांश साहित्य मात्र पठन-पाठन तक सीमित होकर रह गया, लेखक को सिर्फ 'वाह-वाही' चाहिए उसे समाज से कोई सरोकार नहीं रहा। आजकल तो अश्लिलता भी साहित्य होकर बिक रही है और ऐसे लोग, अश्लील लिखने वाले स्वयं को साहित्यकार भी कहलवाने लग गये। इस बात को आधार बना कर कभी प्रेमचंद ने लिखा है- 'कला संयम और संकेत में है।' जब यह संयम और संकेत तोड़ दिये जाते हैं तो कला भी विकृत हो जाती है।
'साहित्य की नई प्रवृत्ति' आलेख में प्रेमचंद जी लिखते है की 'नंगे चित्र और मूर्तियाँ बनाना कला का चमत्कार समझा जाता है। वह भूल जाता है कि वह काजल जो आंखों को शोभा प्रदान करता है, अगर मुँह पर पोत दिया जाए, तो रूप को विकृत कर देता है। (पृष्ठ-46)
इस अंक में कुल तीन कहानियाँ है। यू. आर. अनंतमूर्ति की 'घटश्राद्ध', कृष्णा अग्निहोत्री की 'मुखोटे' और राजेन्द्र राव की 'वत्सल'। तू तो तीनों कहानियाँ अच्छी हैं लेकिन 'घटश्राद्ध' बहुत ही मार्मिक रचना है। इस कहानी को पढने वक्त मेरे मानस में जैनेन्द्र का उपन्यास 'त्यागपत्र' घूमता रहा। 'वत्सल' कहानी आधुनिक दौर की कहानी है जहां एक दादा-पोते के प्रेम को पोते की माँ से सहन नहीं होता। कहानी 'मुखौटे' भाव स्तर पर अच्छी रचना है पर उसमें ज्यादा पात्र और नकारात्मक विचारों के कार मुझे अच्छी नहीं लगी।
गीतकार शैलेन्द्र जी के पुत्र 'दिनेश शैलेन्द्र' का अपने पिता की पुण्यतिथि 14 दिसंबर पर आलेख 'राजकपूर की आत्मा थे शैलेन्द्र' बहुत ही दिलचस्प है। इस आलेख में राजकपूर और शैलेन्द्र जी के कुछ रोचक किस्से वर्णित है।
'नई हिन्दी' के नाम से आजकल चर्चित साहित्य पर दिव्य प्रकाश दूबे ने अच्छी सामग्री दी है। अज्ञेय और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के आलेख भी काफी रोचक और ज्ञानवर्धक हैं।
प्रस्तुत अंक में स्थायी स्तंभ के अतिरिक्त और बहुत कुछ पठनीय सामग्री उपलब्ध है। साहित्य प्रेमियों के लिए यह अंक अच्छी जानकारी प्रदान करता है।
पत्रिका- कादम्बिनी
अंक- दिसंबर-2019
मूल्य- 30₹
259. विज्ञान प्रगति- पत्रिका
विज्ञान प्रगति का मैं बचपन से ही पाठक रहा हूँ। विज्ञान प्रगति घर पर आती थी। तब इसके रंगीन चित्र अच्छे लगते थे, फिर कल्प कथा अच्छी लगने लगी और समय के अनुसार विज्ञान प्रगति के आलेख और भी रूचिकर लगने लगे।
विद्यालय में पुस्तकालय (रा. उ.मा. वि.- माउंट आबू, सिरोही) का प्रभार मेरे पास है। पुस्तकालय में पुस्तकें तो हजारों की संख्या में है लेकिन पत्रिकाएं नहीं आती तब हमने विज्ञान प्रगति की द्विवर्षीय सदस्यता ग्रहण की ताकी विद्यालय के बच्चे इसे पढ सकें।
बच्चों का पुस्तकालय के प्रति बढता रूझान हार्दिक आनंद प्रदान करता है।
विज्ञान प्रगति का दिसंबर-2019 अंक उपलब्ध है। इसकी कवर स्टोरी 'नोबेल पुरस्कार' से संबंधित है।
यह आलेख सन् 2019 में विभिन्न विधाओं में मिले नोबेल पुरस्कार विजेताओं की अच्छी जानकारी प्रदान करता है।
इस अंक के कुछ आलेख मुझे बहुत अच्छे लगे।
टेपवर्म फैलाते हैं खतरनाक वायरस- यह आलेख हमारे रहन सहन के सुधार पर जोर देता है। यह एक पठनीय आलेख है। जो हमें टेपवर्म जैसी बिमारी और उसके बचाव के उपाय बताता है।
दूसरा आकर्षण है विज्ञान गल्प 'वसुधैव कुटुंबकम'। हर बार की तरह यह गल्प भी रोचक और दिलचस्प है।
विशेष आकर्षण है
- भारतीय गणित- इतिहास के झरोखे से
- विमानन प्रौद्योगिकी: जमीन से आसमान छूने की चाह
- टेपवर्म फैलाते हैं खतरनाक वायरस
- प्रकृति के बेहतरीन जलीय हवाई विमान: ड्रेगनफ्लाई व डैमजलफ्लाई।
विज्ञान प्रगति हर वर्ग के पाठक के लिए एक आवश्यक पत्रिका की तरह है। यह बच्चों में जहाँ ज्ञान की वृद्धि करती है, उन्हें कुछ नया सीखाती है वही बड़े वर्ग के लिए बहुत से आवश्यक बिंदुओं पर चर्चा करती है
पत्रिका- विज्ञान प्रगति
अंक- दिसंबर-2019, अंक-12, पूर्णांक-787
मूल्य- 30₹
258. कथादेश- पत्रिका
साहित्यिक पत्रिका कथादेश का दिसंबर-2019 अंक मिला। जयपुर आवागमन के दौरान दिसंबर माह की चार पत्रिकाएं खरीदी थी। कथादेश, हंस, कादम्बिनी और विज्ञान प्रगति। पत्रिकाएं समसामयिक साहित्यिक और समाज से अच्छा परिचय करवा देती हैं। मैं पहले पत्रिकाएं खूब पढता था लेकिन अब समयाभाव के कारण कभी-कभार पढी जाती हैं, कई बार तो पत्रिकाएं/किताबें खरीद के रख ली जाती हैं और कभी पढी भी नहीं जाती। लेकिन मेरा मानना है की पत्रिकाओं को समय पर पढना ज्यादा प्रासंगिक होता है।
अब चर्चा करते हैं कथादेश पत्रिका के दिसंबर 2019 अंक की।
इस अंक में जो कहानियाँ है वे सब अलग-अलग परिवेश को व्यक्त करती हैं। पहली कहानी 'राजा सुनता है!' शीर्षक से है यह एक लंबी कहानी है जो इटली के लेखक 'इटालो काल्विनो की रचना है।
कलाकारों के शोषण को रेखांकित करती पंकज स्वामी की कहानी 'पानी में फड़फड़ता कौआ' वर्तमान भौतिक वादी समाज का आइना दिखाती है। आज स्मार्ट सीटी तो बना रहे हैं लेकिन इन स्मार्ट सीटी के लोग कितने शोषण वाले हैं इस कहानी को पढकर जाना जा सकता है।
एक पंजाबी कहानी का अनुवाद प्रस्तुत है। केसरा राम नामक लेखक की कहानी 'रामकिशन बनाम स्टेट हाजिर हो!' शीर्षक की कहानी का अनुवाद किया है 'भरत ओळा' ने।
इस अंक की यह कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी। किसान वर्ग का शोषण अधिकारीवर्ग किस तरह सड करता है इस विषय को लेखक ने बहुत अच्छे तरीके से परिभाषित किया है। किसान को मिलने वाले लाभ का (वह भी नाममात्र) अन्य लोग हड़प जाते हैं और गरीब किसान अपनी किस्मत पर रोता रह जाता है।
दो और कहानी है राजगोपाल सिंह वर्मा की 'जिसे बयाँ न किया जा सके....' और प्रकाश कांत की 'रामधुन' दोनों कहानी पत्रिका के पृष्ठों पर फैली स्याही के कारण पढी न जा सकी ऐसा अन्य रचनाओं के साथ भी हुआ है।
ऋचा शर्मा की कहानी 'शोक' और रेणु मिश्रा की कहानी 'दो दूनी पांच' भी अच्छी है। 'दो दूनी पांच' कहानी महिला वर्ग पर आधारित एक प्रेरणादायक कहानी है।
पत्रिका का विशेष आकर्षण है नामवर सिंह जी पर आधारित देवेन्द्र का संस्मरण 'फलक पर नामवर'। नामवर सच में नामवर ही थे। स्वयं में एक संस्था थे। उनकी छत्रछाया में अनेक पौधे पलवित हुए। इस संस्मरण में बहुत सी खट्टी-मिट्टी याद शामिल हैं।
'विजयदेव नारायण शाही का एक पत्र इलाचन्द्र जोशी के नाम' भी साहित्य की अमूल्य धरोहर पठनीय है। इसके अतिरिक्त रश्मि रावत का आलेख 'क्या घर एक यूटोपिया है।' शीर्षक से है जो ममता कालिया के लेखन पात्रों पर आधारित है।
प्रस्तुत अंक में अन्य स्थायी स्तम्भ, कविताएं और भी बहुत सी पठनीय सामग्री है।
पत्रिका- कथादेश
अंक- दिसंबर-2019
पृष्ठ- 98
मूल्य- 40₹
Wednesday, 30 January 2019
169. नया ज्ञानोदय- पत्रिका
किसी भी पत्रिका को पढने का सुखद पहलू ये है की आप समाज और साहित्य के विभिन्न पक्षों की जानकारी मिलती है।
इस अंक में भी साहित्य और समाज के विभिन्न रंग देखने को मिलते हैं।
इस अंक में 06 हिन्दी की कहानियाँ है और इसके अतिरिक्त एक-एक जापानी और बांग्ला भाषा की भी कहानी है।
मुझे कहानियों में ज्यादा दिलचस्पी है इस लिए इस अंक की कहानियाँ पहले पढी, जो ठीक ही है लेकिन प्रभाव पैदा करने वाली नहीं है।
इस अंक में मुझे रोचक लगा फणीश सिंह का यात्रा वृतांत 'यूरोप और एशिया के संगम की कहानी-आर्मीनीया'। आर्मीनीया एक छोटा सा देश है। जो रूस और इरान की सीमाओं से संबद्ध है। आर्मीनीया का संबंध भारत से भी रहा है। कोलकाता में सन् 1821 ई. में स्थापित एक आर्मीनियाई काॅलेज भी है।
स्वयं प्रकाश का आलेख 'मेरे थोड़े से फिल्मी दिन' भी रोचक संस्मरण है। एक आलेख 'रजिया सज्जाद जहीर' पर केन्द्रित है जिसके लेखक जाहिद खान है। रजिया जहीर की प्रसिद्ध कहानी 'नमक' जिसने पढी है वह पाठक समझ सकता है इनकी रचनाओं में संवेदना का क्या स्तर था। एक बहुत ही मार्मिक कहानी है नमक।
अशोक ओझा का एक आलेख है जो बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर है। आलेख का शीर्षक है 'सेंटिनल द्वीप के सांस्कृतिक अस्तित्व'। भारतीय आदिवसायों को किसी तरह ईसाई धर्मप्रचारक अपने बहकावे में ले रहे हैं, इस विषय को इंगित करता यह आलेख सार्थक है।
नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला-2019 के दौरान यह पत्रिका ज्ञानपीठ प्रकाशन की स्टाॅल से ली थी।
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पत्रिका- नया ज्ञानोदय
अंक- जनवरी-2019
प्रकाशक- भारती ज्ञानपीठ
Sunday, 30 September 2018
144. हंस- पत्रिका
| हंस पत्रिका- नवसंचार के जनाचार हंस पत्रिका का सितंबर -2018 अंक नवसंचार के जनाचार को समर्पित है। यह हंस का विशेषांक है। इस अंक में वर्तमान सोशल मीडिया संबंधी आलेख पढने को मिलेंगे। संपूर्ण अंक को कई भागों में बांटा गया है। मेमरी ड्राईव- आदिकाल इमाॅटिकाॅन- छवि भाषा डिजिटल डेमाॅक्रैसी- वायरल जनतंत्र हैशटैग- अस्मिता विमर्श बुकमार्क इस प्रकार समस्त आलेख दस भागों में विभक्त हैं। प्रत्येक खण्ड/भाग में शीर्षक संबंधी सामग्री समेटने की कोशिश की गयी। वर्तमान में सोशल मीडिया का किस तरह से प्रयोग हो रहा है इस विषय को गंभीरता से उठाया गया है। सोशल मीडिया ने चाहे अभिव्यक्ति को स्वतंत्रता दे दी लेकिन इसके गंभीर खतरे भी हैं। संपादकीय में बहुत अच्छी बात लिखी है- लेखन का अर्थ सत्ता की चाकरी, कुर्सी और पद बचाने के लिए किसी भी हद तक गिर जाना नहीं बल्कि रीढ और साख को सही सलामत रखना है। (पृष्ठ-10) रवि रतलामी का आलेख 'धड़ल्ले से कैसे लिखें देवनागरी में?' देवनागरी लेखन को प्रेरित और लेखन में आयी समस्या-समाधान को समर्पित है। इंटरनेट पर पहले हिंदी लेखन एक समस्या थी, फाॅट की समस्या बहुत ज्यादा थी लेकिन वर्तमान में यह समस्या बहेहद तक सुलझ गयी। फाॅट को लेकर उत्पन्न समस्या पर आधारित है डाॅ. प्रकाश हिंदुस्तानी का आलेख 'इंटरनेट पर हिंदी का आना। हिंदी फाॅट की समस्या एक समय बहुत ज्यादा थी , जिसका सामना उस समय के कम्प्यूटर प्रयोक्ता को करना पड़ता था। अनूप शुक्ल का आलेख चाहे ब्लॉगिंग से संबंधित है, पर फाॅट समस्या उनको भी झेलनी पड़ी। इनके आलेख 'ब्लाॅगिंग: आदिम डिजिटल विधा' में ब्लॉग सबंधित काफी अच्छी जानकारी दी गयी है। एक समय था तक ब्लॉग सोशल मीडिया में खूब प्रचलन में था। "अभिव्यक्ति की बेचैनी ब्लॉगिंग का प्राण तत्त्व है।" बालेन्दु शर्मा दधीज ने 'रचना के फिसलते मौके' में सोशल मीडिया के बारे में बहुत अच्छी बात कही है। वो लिखते हैं- "....आखिर क्यों हम अपने समाज, साहित्य, कला और देश के लिए सकारात्मक ढंग से इस्तेमाल क्यों नहीं कर रहे?" (पृष्ठ-36) आज हमारे पास सोशल मिडिया जैसा सार्वजनिक मंच है जहां हम अपनी बात स्वतंत्रता के साथ कह सकते हैं लेकिन क्या हम इस मंच का सार्थक उपयोग कर पा रहें हैं। अगर हम सोशल मीडिया जैसे मंच का सार्थक उपयोग कर पाये तो यह हमारी उपलब्धि होगी। सुशील जी 'छवियों का कुरुक्षेत्र' में लिखते है की हम बिना सोचे- समझे किसी भी तस्वीर को शेयर कर देते हैं। हम उस तस्वीर की सच्चाई जानने की कोशिश भी नहीं करते। हमारी एक छोटी सी भूल किसी के जीवन के लिए खतरा भी हो सकती है। हम जाने -अनजाने में किसी असत्य बात का प्रचार कर देते हैं। इसलिए आवश्यक है की किसी भी चित्र को सोशल मिडिया पर शेयर करने से पूर्व उसकी सत्यता परख लें यह अंक हंस का अन्य अंको से अलग है। उस अंक में कथा-कहानी या कविता को स्थान न देकर मात्र नवसंचार के जनाचार को ही स्थान दिया गया है। अगर वर्तमान सोशल मीडिया को समझना है तो यह अंक काफी उपयोगी होगा। ----- पत्रिका- हंस अंक- सितंबर -2018(पूर्णांक-383, वर्ष-33, अंक-2) संपादक- संजय सहाय www.hanshindimagazine.in |
| हंस का सितंबर अंक |
Saturday, 14 July 2018
128. बस्तर पाति- पत्रिका,मई 2018
यह पत्रिका किसी न किसी एक साहित्यकार पर केन्द्रित होती है और इसका प्रस्तुत अंक साहित्यकार हरिहर वैष्णव पर केन्द्रित है। इसके साथ-साथ यह अंक संपादकों की रचनाओं पर केन्द्रित अंक है।
Thursday, 28 December 2017
85. साहित्य समर्था- पत्रिका
साहित्य समर्था- एक साहित्यिक पत्रिका
प्रथम अंक, अगस्त-सितंबर-2017
जयपुर से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका साहित्य समर्था का प्रथम अंक प्राप्त हुआ।
प्रस्तुत अंक कथाकार डाॅ. बानो सरताज को समर्पित है। इसलिए इस अंक में अधिकांश रचनाएँ बानो सरताज की ही हैं और आवरण पृष्ठ का चित्र भी बानो सरताज का है। यह एक अच्छा व सराहनीय प्रयास है। इस अंक में बानो सरताज की कहानी, कविता, लेखन यात्रा, व्यंग्य- हास्य, आलेख आदि पाठक को पढने को मिलेंगे।
संपादिका महोदया लिखती हैं। "समर्था का प्रस्तुत अंक वरिष्ठ साहित्य डाॅ. बानो सरताज काजी को समर्पित है। बहुआयामी लेखन की धनी डाॅ. बानो सरताज का समृद्ध लेखन संसार एवं समाजसेवी व्यक्तित्व प्रशंसनीय है।" (पृष्ठ- 03)
इसके अलावा भी अन्य बहुत से रचनाकरों को स्थान दिया गया है।
बानो सरताज की कहानी 'दस्तक' में कई रंग देखने को मिलेंगे। कहानी में रोचकता और रहस्य भी है और अंत पूर्णतः मार्मिक। इनकी अन्य कहानियाँ भी रोचक हैं लेकिन इनके व्यंग्य भी दिये गये हैं वह मुझे न तो व्यंग्य लगे न ही हास्य।
मालती जोशी की कहानी 'मन धुआं-धुआं' पढना भी बहुत अच्छा अनुभव कराती है। मुकुट सक्सेना की 'अस्तित्व-बोध', डाॅ. पूनम गुजराती की 'मेहंदी' , चन्द्रकांता की 'एक लङकी शिल्पी'
लघुकथा में नरेन्द्र कुमार गौङ की लघुकथा 'भ्रष्टाचार' यह दर्शाने में सफल रही है की हम स्वयं भ्रष्ट होकर अपना दोष न देखकर दूसरों को दोष देते हैं।
लघुकथा में किशन लाल शर्मा की 'हक', पूर्णिमा मित्रा की ' आस के दिये' भी अच्छी हैं।
सबसे अलग हटकर प्रस्तुति है जर्मनी की युट्टा आॅस्टिन का साक्षात्कार। यह साक्षात्कार लिया है आभा सिंह ने।
युट्टा आॅस्टिन जर्मन महिला है। विवाह पश्चात अपने पति के देश इंग्लैंड में कोल चैस्टर नामक स्थान पर रहती है। वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय कोल चैस्टर में यूरोपीय भाषाओं की व्याख्याता है, साथ ही साथ हिंदी की विदूषी है और अध्यापन भी करती है। (पृष्ठ -58)
हिंदी भाषा के प्रति प्रेम विषय पर वे कहती है- "हिंदी इतनी सुंदर और बढिया भाषा लगी कि उसे सीखने लगी और भारत के बारे में पढने लगी।" (पृष्ठ- 58)
इस अंक की काव्य रचनाएँ भी बहुत सराहनीय है।
डाॅ. नरेन्द्र शर्मा 'कुसुम' राष्ट्र ध्वज क लिए लिखते हैं।
- तू हमारे देश की पहचान है,
कोटि कंठों से उमङता गान है,
तीन रंगों में फहराता व्योम में
एकता की तू सुरीली तान है। (पृष्ठ-33)
स्त्री वर्ग को लेकर लिखी गयी रचनाएँ भी अच्छी हैं। डाॅ. अंजु दुआ 'जैमिनी' की कविता ' स्त्री, मात्र देह' में स्त्री की स्वतंत्रता का वर्णन करती है।
स्त्री चारदीवारी से निकल
बढी खुली हवा में
कुछ पाना है- सब कुछ पाना है। (पृष्ठ- 37)
डाॅ. पद्मजा शर्मा की रचना 'लङकी' भी स्त्री वर्ग की बात करती है।
जितना सरल है कह देना लङकी
हकीकत में उतना ही कठिन है होना लङकी
जितने पल जीती है उससे कहीं ज्यादा पल मरती है लङकी। (पृष्ठ- 37)
संगीता गुप्ता की कविता 'माँ', मीरा सलभ की 'गम ही फलते रहे', डाॅ अमिता दुबे की 'ऐसा मन करता है', डाॅ संगीता सक्सेना की ' राखी', आदि काव्य रचनाएँ भी पठनीय है। शिवानी शर्मा की 'स्त्री', सत्यदेव संतिवेन्द्र की 'प्रश्न सहेजे चेहरे, सुकीर्ति भटनागर की कविता 'बस एक पल' भी सराहनीय रचनाएँ हैं।
मधु प्रमोद अपनी कविता 'हम सी ना बेटियाँ होती' में कहती हैं- ये हवाएं हैं
एक जगह रह नहीं सकती
ये ऋचाएं हैं
कभी खुलकर नहीं कहती। (पृष्ठ-46)
इनके अतिरिक्त इस अंक में साहित्यिक चर्चा और पुस्तक समीक्षा भी दी गयी है।
साहित्य समर्था का प्रस्तुत अंक वास्तव में बहुत अच्छा है। संपादिका नीलिमा टिक्कू जी धन्यवाद की पात्रा है जिन्होंने इस कठिन कार्य को अंजाम दिया है।
इस पत्रिका की एक और विशेषता है वह है इसका मजबूत संपादन पक्ष तथा उच्च स्तर के कागज पर मुद्रण। यह दोनों विशेषताएँ पत्रिका को और ज्यादा मजबूती प्रदान करती है।
पूर्णतः सफेद पृष्ठों पर अंकित काले -काले अक्षर मन मोह लेते हैं।
पत्रिका का प्रथम अंक पठनीय है।
पुनश्च: उन सभी रचनाकारों और संपादन मण्डल का धन्यवाद जिनके अथक प्रयास से साहित्य समर्था का प्रथम अंक साहित्य जगत में आया।
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पत्रिका- साहित्य समर्था (त्रैमासिक)
संपादिका- नीलिमा टिक्कू
अंक- जुलाई- सितंबर, 2017 ( वर्ष-1, अंक-01)
पृष्ठ-
मूल्य- एक अंक- 50₹, वार्षिक- 200₹
संपर्क-
ई-311, लालकोठी स्कीम, जयपुर- 302015
दूरभाष- 0141-2741803, 2742027
Email- sahityasamartha@gmail.com
- neelima.tikku16@gmail.com
Sunday, 5 November 2017
77. बस्तर पाति- पत्रिका
लोक संस्कृति और आधुनिक साहित्य को समर्पित एक पत्रिका।
बस्तर पाति, त्रैमासिक पत्रिका, दिसंबर-अगस्त-2017
Bछत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र से निकालने वाली एक लघु पत्रिका है बस्तर पाति। यह पत्रिका नाम से ही लघु है लेकिन इसका रचना क्षेत्र बहुत विशाल।
प्रस्तुत अंक खुदेजा खान जी पर केन्द्रित है। जिसमें खुदेजा खान जी की कहानियाँ, कविता के अतिरिक्त भी अन्य बहुत से लेखकों को स्थान दिया गया है।
पत्रिका का संपादकीय बहुत अच्छा है लेकिन अंत में वह लघु पत्रिका के प्रकाशन पर आकर मूल विषय से भटक गया प्रतीत होता है।
वहीं एक काॅलम बहस (पृष्ठ-07) में काल्पनिक और भोगे हुए यथार्थ पर अच्छा लिखा गया है।
एक साक्षात्कार में खुदेजा खान ने कहा है।
" स्त्री अपना भोगा हुआ यथार्थ ही लिखती है, लेकिन उसे पुरुष प्रधान समाज में पुरुष द्वारा बताया गया या निर्धारित किये गये मानदण्डों के अनुरूप मान लिया जाता है। यही तो विडम्बना है।" (पृष्ठ-15)
करमजीत कौर की कहानी सेतु एक भावुक रचना है जि किसी भी पाठक के मन को छू जाती है।
ऐसी ही एक और कहानी है USA की लेखिका डाॅ. सुदर्शन प्रियदर्शिनी की भीड़। हम भीङ में भी कितने अकेले हैं, इसका दर्द वही समझ सकता है जिसने इस यथार्थ को भोगा है।
नरेश कुमार उदास की कहानी माँ सबकी एक समान होती है (पृष्ठ- 27) एक अच्छी रचना है, पर यह कहानी पाठक बहुत बार बहुत से रूप में पढ चुके हैं। कहानी में कोई नयापन नहीं।
हमारी राजनीति और हमारे व्यवहार में आये दोहरेपन को बहुत ही अच्छे तरीके से व्यक्त करती है रीना मिश्रा की कहानी फर्क ।
यह कहानी इस अंक की मेरी दृष्टि में एक अच्छी कहानी है।
इस अंक में काफी लघुकथाए भी हैं जो अच्छी हैं। कम शब्दों में गंभीर बात कहने में लघुकथा सक्षम है।
पत्रिका में काव्य रचना भी बहुत अच्छी हैं। पत्रिका नये लेखकों को भी खूब अवसर दे रही है।
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पत्रिका - बस्तर पाति
अंक- 11,12,13- दिसंबर-अगस्त-2017
(यह संयुक्त अंक है)
प्रकाशक- सनत कुमार जैन
पृष्ठ-70
मूल्य-25₹
Email- paati.bastar@gmail.com
www.paati.bastar.com









