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Wednesday, 31 December 2025

700. रानी साहिबा- राम पुजारी

प्रेम के विभिन्न रंगों का गुलदस्ता
रानी साहिबा- राम पुजारी

उपन्यास लेखक के बाद राम पुजारी जी ने कहानी लेखन में हाथ आज आजमाया है और इसमें वह सफल होते भी नजर आ रहे हैं। एक उपन्यास लेखक के लिए अपनी बात को कम शब्दों में कहना कुछ मुश्किल अवश्य होता होगा लेकिन एक सफल लेखक वही है जो कथ्य को उसी अनुरूप आकार दे जैसी कथा की मांग है।
रानी साहिबा कथा संग्रह राम पुजारी जी की दस कहानियों को समेटे हुए है और सभी कहानियों की पृष्ठभूमि में प्यार की झलक स्पष्ट नजर आती है। सभी कहानियां लेखक के चरित्र की तरह है जिनमें बनावटीपन जरा भी नजर नहीं आता ।
     'रानी साहिबा' का प्रकाशन जनवरी 2024 में हुआ था और फरवरी में यह कथा संग्रह मेरे हाथ आया । इसकी पहली कहानी पढी जो अच्छी लगी । दूसरी कहानी पढने से पहले में अन्यत्र व्यस्त हो गया और कहानी पढने का समय न मिला जबकि राम पुजारी का निरंतर आग्रह था कि आप इसकी समीक्षा करें। पर कभी-कभी चाहकर भी समय नहीं निकल पाता और फिर 'रानी साहिबा' मेरी नजरों से यूं गायब हुये की ढूढे भी न मिले । इधर-उधर सब जगह तलाश किया पर....हाये री किस्मत...किसकी ?
फरवरी 2025 भी आया दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में राम पुजारी जी से मुलाकात भी हुयी, रानी साहिबा पर चर्चा भी चली और मेरा आश्वासन भी चला की शीघ्र ही रानी साहिबा को पढा जायेगा।

Thursday, 20 October 2022

538. काम्बोजनामा- राम पुजारी

लोकप्रिय जासूसी साहित्य के वटवृक्ष- वेदप्रकाश काम्बोज
काम्बोजनामा- राम पुजारी

लोकप्रिय जासूसी उपन्यास साहित्य में वेदप्रकाश काम्बोज जी उस वटवृक्ष की तरह हैं जिसके नीचे असंख्य जीव- पौधे पनपते हैं और उस से वटवृक्ष अनजान होता है। जासूसी लेखन से साहित्यिक गलियारों तक में कलम चलाने वाले, मंजिल को भुला अपने इस सफर के आनंद में डूबे, लेखन पथ पर आवारगी करने वाले वेदप्रकाश काम्बोज एक ऐसे ही व्यक्तित्व हैं, जिनके पात्रों पर बहुसंख्यक लेखकों ने लिखा पर वेदप्रकाश काम्बोज उस से अलग ही रहे। ऐसे सरल स्वभाव के काम्बोज जी को समर्पित, उन्हीं के जीवन‌ पर आधारित रचना है - काम्बोजनामा ।
' काम्बोजनामा' के लेखक राम पुजारी जी के साथ 17.09.2022, मेरठ

 उसी वटवृक्ष के जीवन और लेखन को युवा लेखक राम पुजारी जी ने 'काम्बोजनामा' में समेटने का जो प्रयास किया है वह उपन्यास साहित्य में एक मील पत्थर है। हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के शिष्य ने 'व्योमकेश दरवेश लिखा, कुशवाहा कांत जी के शिष्य ने 'कुशवाहा कांत...' लिखा। ऐसा ही एक प्रयास रामपुजारी जी ने 'काम्बोजनामा' में किया है।

Wednesday, 15 April 2020

291. देव भक्ति- राम पुजारी

धर्म के नाम पर फैली अंधभक्ति की कथा।
देव भक्ति- राम पुजारी


         सामाजिक उपन्यासकार राम पुजारी जी का तृतीय उपन्यास 'देव भक्ति- आस्था का खेल' किंडल पर पढने को मिला। समाज में व्याप्त धार्मिक भ्रष्टाचार पर लिखा गया यह उपन्यास हमें बहुत कुछ सिखाता है।
      कोरोना वायरस 'COVID-19' के चलते देश में Lockdown चल रहा है। विद्यालय बंद है और हम अपने घर में सुरक्षा की दृष्टि से बंद हैं। इस समय का सदुपयोग करने के लिए किंडल पर किताब पढने का विचार बनाया।
इस क्रम में सबसे पहले राम पुजारी जी का उपन्यास 'देव भक्ति- आस्था का खेल' पढा।

         मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसे समाज में बहुत से नियमों का पालन करना पड़ता है। वे चाहे सामाजिक हो, धार्मिक हो या वैधानिक। मनुष्य को समाज में रहते हुए मान-सम्मान, धर्म, समाजिक संबंध, नातेदारी जैसे विभिन्न घटकों का निर्वाह करना ही पड़ता है। कभी-कभी मनुष्य इस कर्तव्यों का निर्वाह करते-करते बहुत दूर निकल जाता है, जहाँ से लौटना भी मुश्किल हो जाता है। 


         'देव-भक्ति- आस्था का खेल' ऐसे ही युवावर्ग की कहानी है जो समाज के दवाब के चलते अपने सपनों का महल नहीं बना सकते।
         देव और भक्ति दोनों बचपन के साथी थे, साथ-साथ खेलते- पढते हुए बड़े हुए। फिर समाज, पाखण्ड और अतिआदर्शवाद के क्रूर हाथों के चलते ऐसे मजबूर हुये कि दोनों की जान पर बन आई। एक तरफ बचपन का मासूम प्यार था तो दूसरी तरफ झूठी शान, वासना, तिरस्कार, घृणा और अंधभक्ति।

Sunday, 23 February 2020

269. अन्नु और स्वामी विवेकानन्द- राम पुजारी

अन्नु और स्वामी विवेकानन्द- राम पुजारी

भौतिक युग में हम सात्विकता से दूर होते जा रहे हैं। हम उस वृक्ष की तरह होते जा रहे हैं जिसकी धीरे-धीरे मूल काट दी जाये। इंटरनेट युग के बच्चे अपनी संस्कृति और सभ्यता से विलग होते जा रहे हैं, उन्हें फिल्मों, डिजिटल दुनिया की जानकारी तो है लेकिन अपने देश के युग नायकों को भुल रही है।
     स्वामी विवेकानन्द जिन्हेें युवाओं का प्रेरणा पुरूष कहा जाता है। यह छोटी सी किताब विवेकानन्द जी को बहुत ही सहज और सरल तरीके से प्रस्तुत करती है ताकी किशोरावस्था के बच्चे युग नायक स्वामी विवेकानन्द जी को समझ सके। सिर्फ समझ ही नहीं बल्कि उनकी प्रेरणा से आगे भी बढ सके।
इस लघु जीवनी में हालांकि विवेकानन्द जी के संपूर्ण जीवन को समेटना संभव नहीं है लेकिन लेखक महोदय ने जो आवश्यक और उपयोगी प्रसंग इस किताब में प्रस्तुत किये हैं वे सब बच्चों के संस्कार और विवेकानन्द जी को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
     अन्नु एक छोटी सी बच्ची है जो अन्तरिक्ष जगत की जानकारी तो रखती है लेकिन वह विवेकानन्द जी को नहीं जानती, तब उसके चाचा उसे बहुत ही सरल तरीके से उसे विवेकानन्द जी का परिचय देते हैं।
     विवेकानन्द साहित्य मुझे बहुत प्रभावित करता है इसलिए मैं समयानुसार विवेकानन्द जी के साहित्य को पढता रहता हूँ और मेरी इच्छा होती है की छोटे बच्चे भी विवेकानन्द जी को जाने और इस दृष्टि से यह पुस्तक बहुत उपयोगी है।
    लेखक का यह प्रयास बहुत अच्छा है। बच्चों के लिए ऐसी प्रेरणादायक किताबें आनी चाहिए ताकी बच्चें सरलता से भारतीय सभ्यता और संस्कृति का अध्ययन कर भारतीय युुुग पुुुुरुषोंं को जान सके।

कुछ रोचक पंक्तियाँ
- गुरु वो होता है जो हमारे अज्ञान के अंधकार को दूर करता है। हमें सभी मार्ग बताता है। (पृष्ठ-25)
-भय का सामना करने से भय स्वयं खत्म हो जाएगा।
(पृष्ठ-31)
पुस्तक- अन्नु और स्वामी विवेकानन्द
लेखक- राम पुजारी
प्रकाशक- निखिल पब्लिशर्स और डिस्ट्रीब्युटर्स, उत्तर प्रदेश
पृष्ठ- 48

मूल्य- 50₹

माउंट आबू स्थित 'चंपा गुफा' जहां विवेकानन्द जी ने शिकागो धर्म सम्मेलन में जाने से कुछ समय पूर्व ध्यान किया था।

 

Saturday, 30 March 2019

182. अधूरा इंसाफ- राम पुजारी

मैं जीना चाहती हूँ.... माँ
अधूरा इंसाफ.... एक और दामिनी, राम पुजारी, सामाजिक उपन्यास।
लेखक राम पुजारी जी के साथ (दिल्ली)

 भारत एक ऐसा देश है जहाँ नारी शक्ति की पूजा की जाती है, नारी को देवी माना जाता है। इसलिए भारतीय धर्मग्रंथ कहते हैं।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।

     नारी के विभिन्न रूप हैं, वह माँ, बहन, पत्नी आदि विभिन्न रूपों में आदरणीय है, पूज्य है। लेकिन भारतीय संस्कृति अपने जीवन मूल्यों को खो रही है और उसी का दुष्परिणाम है जिस देश में नारी की पूजा की जाती थी वहीं आज स्त्री एक भोग की वस्तु मात्र ही तो बन कर रह गयी। (पृष्ठ-119)
            राम पुजारी जी एक सामाजिक उपन्यासकार हैं। वे समाज को बहुत गहरे से देखते हैं और जो विकृति उन्हें नजर आती वे उसे कहानी का रूप दे देते हैं। वह कहानी मात्र मनोरंजन की दृष्टि से नहीं लिखते बल्कि ‌समाज पर एक व्यंग्य करते हैं, समाज की निकृष्टता को समाने लाते हैं।
राम पुजारी जी का एक सामाजिक उपन्यास है 'अधूरा इंसाफ.....एक और दामिनी'। यह उपन्यास एक वास्तविक घटना पर आधारित है या यूं कह सकते है इस उपन्यास के माध्यम से लेखक महोदय ने दिल्ली में16 दिसंबर 2012 में घटित एक घटना का वर्णन किया है। यह मात्र एक उपन्यास नहीं है बल्कि एक दुर्घटना का जीवंत चित्रण है।
यह कहानी है वैदेही की।‌ दिल्ली निवासी वैदेही एक सामान्य परिवार की लड़की। वैदेही के दो भाई-बहन और भी हैं। माँ- बाप मेहनत-मजदूरि करके अपने बच्चों को शिक्षित करते हैं।- वैदेही प्रतिभाशाली है, और उसकी प्रतिभा को सही दिशा मिल जाये तो वह जिंदगी में बहुत कुछ हासिल कर सकती है। (पृष्ठ-31) लेकिन उसे हासिल क्या हुआ।
         स्त्री आज के आधुनिक युग में भी अपने आपको एक जंगल में पाती है, जहाँ के जानवर थोड़ा पढ-लिख कर सुंदर कपड़े पहनना सीख गये। (पृष्ठ-110)
कुछ आधुनिक युग के शिक्षित जानवरों ने वैदेही के सपने को चकनाचूर कर दिया। स्त्री की यह नियति रही की वह स्त्री है। क्या नारी होना भी एक गुनाह है। हम जिस गर्भ से जन्म लेते हैं उसी गर्भ के प्रति हमारी सोच इतनी निकृष्ट क्यों?

....और लड़की का इसमें कोई कसूर नहीं, सिवाय इसके कि वह लड़की है।(पृष्ठ-53)। बलात्कार एक एक ऐसा कृत्य है जो पीड़ित की आत्मा तक को खत्म कर देता है- रेप,बलात्कार कहने को एक अपराध है, जिसमें शारीरिक घाव तो सभी को दिखाई दे जाते हैं, आंतरिक चोट का अंदाजा उसे ही होता है, जिसने इसे सहा है।(पृष्ठ-110) यह दर्द सहती है वैदेही।
            वैदेही अमानवीय कृत्य को सह न सकी और इस दुनियां को अलविदा कह गयी लेकिन अपने पीछे असंख्य प्रश्न छोड़ गयी। उन प्रश्नों का जवाब हमें तलाशना है, सिर्फ जवाब ही नहीं बल्कि ऐसे कुकृत्य फिर न हो यह कोशिश भी करनी है।

            नारी की दर्द को दर्शाती राम पुजारी जी की यह रचना वर्तमान समाज का यथार्थ दर्शाती है। एक तरफ हम शिक्षा का स्तर बढा रहे हैं वहीं हमारे सामाजिक और नैतिक मूल्यों का तेजी क्षय हो रहा है। हम मात्र भौतिकवादी बन कर रह गये। यह भौतिकता एक दिन हमें कहां लेकर जायेगी यह विचारणीय प्रश्न है।
उपन्यास में वैदेही के घटनाक्रम के साथ-साथ उस समय दिल्ली में हुये प्रदर्शन का भी चित्रण है।
              मानवीय संवदेना को झकझोरता यह उपन्यास हमारे समाज के समक्ष एक दर्पण है जो हमें हमारी वास्तविक से परिचित करवाता है।

          उपन्यास मात्र एक बलात्कार पीड़ित स्त्री की हि कहानी नहीं बल्कि यह समाज और प्रशासन की कई कमियां को भी दर्शाया है।
              नारी के प्रति भारतीय समाज का दृष्टिकोण तो इस उपन्यास में बहुत जगह नजर आता है। जहाँ तक की कुछ लोग तो पीडिता को ही दोषी मानते हैं। ये विचार सामान्य जनता के ही नहीं कुछ धार्मिक बाबा और नेताओं के भी हैं।-आज भी ये पुरुष प्रधान समाज ही है, जहाँ प्रत्येक बात के लिए औरत को ही दोषी माना जाता है। (पृष्ठ-85)

         मानव और वैदेही को पुलिस ने घायल अवस्था होने पर भी नजरअंदाज किया। वहीं पुलिस के व्यवहार पर लेखक ने बहुत अच्छा लिखा है।- दरअसल, आम भारतवासी पुलिस स्टेशन जाने से डरता है। और जो डरता नहीं.... उसका विश्वास उस दिन चकनाचूर हो जाता है, जिस दिन उसे दुर्भाग्यवश पुलिस स्टेशन जाना पड़ता है....।(पृष्ठ-20)
              वर्तमान भौतिक युग में हमारे रिश्ते भी खत्म होते जा रहे हैं। कभी स्वयं के मौहल्ले की ही नहीं बल्कि पूरे गाँव की लड़की बहन होती थी और अब सिनेमा-टीवी ने भाई-बहन के रिश्ते भी खत्म कर दिये। इसी दर्द को लेखक ने लिखा है- अधिकतर लड़कियां सिर्फ बाॅयफ्रेण्ड बनाती हैं और लड़के गर्लफ्रेंड । भाई-बहन का ख्याल तो दोनों में किसी के सपने में भी नहीं आता। (पृष्ठ-190)
        ऐसे अनेक प्रश्न उपन्यास में उठते हैं जो हमें सोचने को विवश करते हैं की आखिर हम जा किस राह रहे हैं।

उपन्यास की भाषा शैली सहज और सरल है कहीं भी कोई क्लिष्ट शब्दावली प्रयुक्त नहीं हुयी कुछ कथन स्मरणीय है।- ये जीवन एक संघर्ष है। यदि किसी काम में सफलता न मिले तो अपनी कोशिशों को सौ गुणा बढा देना चाहिए।(पृष्ठ-33)

       उपन्यास में एक दो जगह शाब्दिक गलतियाँ को छोड़ दे तो कुछ कमी नहीं, हाँ, कहीं-कहीं अनावश्यक विस्तार अवश्य खटकता है। लेखक को प्रत्येक घटना का विस्तार से वर्णन की जगह कुछ बाते संकेत में बता देनी चाहिए।

निष्कर्ष-
'अधूरा इंसाफ....एक और दामिनी' वर्तमान पुरूष प्रधान समाज में नारी के प्रति सोच को प्रर्दशित करता एक सार्थक उपन्यास है। आज चाहे हम कितने भी शिक्षित हो गये लेकिन स्त्री के प्रति विचार नकारात्मक ज्यादा रहे।
वास्तविक का चित्रण करता यह उपन्यास मात्र पठनीय ही नहीं बल्कि विचारणीय भी है।


उपन्यास- अधूरा इंसाफ....एक और दामिनी
लेखक- राम पुजारी
प्रकाशक- GullyBaba
www.gullybaba.com
पृष्ठ-_ 198
मूल्य- 160
लव जिहाद- राम पुजारी
उपन्यास विमोचन- YouTube video


Friday, 23 November 2018

153. लव जिहाद-राम पुजारी

   जिहाद से लव की ओर...
लव जिहाद...एक चिड़िया- राम पुजारी,सामाजिक उपन्यास, रोचक, पठनीय।
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लव जिहाद...एक चिड़िया उपन्यास मूलत एक प्रेम कथा है,वह प्रेम कथा जो समाज, धर्म, राजनीति के कई पहलुओं को उजागर करती है।
           उपन्यास प्रेम को आधार बना कर लिखा गया है। एक हिंदू लड़की और एक मुस्लिम लड़के की प्रेम कथा है। दोनों काॅलेज में मिलते हैं, साहिल का काॅलेज में यह अंतिम साल था और सोनिया का ये पहला साल था। (पृष्ठ-03) फिर धीरे-धीरे दोनों में प्रेम प‌नपता है।  बहरहाल दोनों- साहिल और सोनिया, एक ही कश्ती में सवार थे- प्रेम की कश्ती। (पृष्ठ-35)
        कवि बोधा ने कहा है। -"यह प्रेम को पंथ कराल महां, तरवारि की धार पर धावनो है।"
        यह प्रेम का रास्ता बहुत विकट है, यह तो तलवार की धार पर चलने जैसा है और प्रेमी फिर भी चलते हैं। साहिल और सोनिया भी इस राह पर चलते हैं।
   दोनों ही आने वाले भविष्य से बेखबर, ख्वाबों की दुनियां में प्रेम की उड़ान भर रहे थे। (पृष्ठ-35)। लेकिन यह उड़ान सोनिया के परिवार को रास नहीं आयी।  सोनिया के परिवार को रास नहीं आयी लेकि‌न साहिल का तो किस्सा ही कुछ और था।
- एक तरफ जहां, सोनिया पर पाबंदियाँ लगाई जाने लगी और ये रोक-टोक दिन प्रतिदिन बढने लगी। (पृष्ठ-49)। वहीं साहिल के सिर पर एक खतरनाक तलवार लटक रही थी। हमसे गद्दारी की सजा सिर्फ मौत है-सिर्फ मौत। (पृष्ठ-259)
-       जो प्रेम की राह पर चलते हैं, उन्हें पता है यह राह बहुत कठिन है। लेकिन वो फिर भी चलते हैं। इसी राह पर सोनिया चली, घर और समाज की बंदिश तोड़ कर चली। लेकिन क्या साहिल इस राह पर चल पाया। यही प्रश्न  सोनिया ने साहिल से पूछा-मैंने तुम्हें अपना दिल दिया बस और बदले में तुम्हारा प्यार चाहती हूँ । बोलो क्या तुम मेरा साथ दोगे। -(पृष्ठ-196)
- क्या साहिल सोनिया का साथ दे पाया?
     इस प्रेम कथा के साथ एक और कथा है, वह है धार्मिक -साम्प्रदायिक। यह समाज में व्याप्त राजनीति के घिनौने रूप को पाठक के समक्ष लाती है। 
...पिछले कुछ दिनों से उत्तम प्रदेश के एक इलाके सलामतगंज की स्थिति कुछ असामान्य सी थी। दो धार्मिक गुटों में किसी बात को लेकर विवाद हो गया था। (पृष्ठ-52)
          उपन्यास एक प्रेम कथा होने के साथ-साथ समाज में व्याप्त और भी बहुत सी बुराईयों का वर्णन करता है।
          समाज में औरत का क्या स्थान है और हम उसे कौनसा स्थान देते हैं। क्या हम औरत की इज्जत करते हैं। इस उपन्यास के संदर्भ में प्रकाशन ने भी लिखा है।- क्या हमारी बेटियों की ईज्जत का पैमाना इस बात पर निर्भर होगा कि वह लड़की किस जाति, धर्म और सम्प्रदाय की है। (प्रकाशक कथन)। औरत होने की पीड़ा रज्जो तो भुगत रही है पर वह चाहती है की उसकी बेटी सोनिया न भुगते।
- औरत होने की सजा रज्जो, इस घर में भुगत रही थी और सोनिया को ये सजा कभी भी भुगतनी पड़ सकती थी। (पृष्ठ--88)।
औरत होने की सजा नेहा और रोशनी को आखिर भुगतनी पड़ती है। आखिर कसूर क्या था दोनों का, प्रेम करना।
   उपन्यास में अंकुर का भी दोहरा व्यक्तिगत सामने आता है। वह स्वयं प्रेम करता है लेकिन अपनी बहन के प्रति सख्त है।- अपनी बहन को यूँ किसी लड़के के साथ हँसी-मजाक करना, अंकुर को रास न आया। (पृष्ठ-82)
     उपन्यास का मुख्य विषय 'लव जिहाद' है। क्या यह वास्तविक है, या काल्पनिक। क्या सच में कुछ ऐसा चल रहा है कि हमारी लड़कियों को 'दूसरे लोग' अपने प्यार में फंसा कर शादी करते हैं और इसके एवज में उन्हें रुपया-पैसा दिया जाता है। (पृष्ठ-203)।
            आखिर कौन है ये लोग?
            क्या है इनका मकसद?
            कौन फंसा लव जिहाद?
            क्या रहा परिणाम?
  इन प्रश्नों के उत्तर तो 'लव जिहाद...एक चिड़िया' उपन्यास पढकर ही मिल सकते हैं।
      भोपाल के पाठक मित्र बलविन्द्र सिंह ने इस उपन्यास पर टिप्पणी करते हुए कहा है की "जिसे पढते वक्त आपके भाव कुछ और होंगे, समाप्त करने के बाद कुछ और।"
          जैसे -जैसे कहानी आगे बढती है वैसे ही कहानी में रोचकता बढती जाती है। पाठक की जिस सोच के साथ उपन्यास आरम्भ होता है वह सोच पृष्ठ दर पृष्ठ बदलती रहती है। कभी सोच सकारात्मक होती है तो कभी नकारात्मक। एक अच्छे लेखक की यह खूबी है की वह कहानी में‌ निरंतर सस्पेंश बना कर रखे, उसमें रोचकता बना कर रखे। इस उपन्यास को पढते वक्त रोचकता और सस्पेंश बना रहता है।
कहानी का विस्तार  'जुलाई 2013, दिल्ली' से लेकर 'मई 2014 कश्मीर' से उत्तम प्रदेश(उत्तर प्रदेश) होते हुए बैंगलोर तक फैला है।
संवाद
         किसी भी कहानी के संवाद उसके महत्व को बढाने में सहायक होते हैं। संवाद पात्र और परिस्थितियों का वर्णन करने में सक्षम होते हैं।
     इस उपन्यास के संवाद भी बहुत अच्छे हैं।
- लड़की के किशोरावस्था से युवा होने तक का समय हर माता-पिता के लिए चिंता का विषय होता है।(पृष्ठ-49)
- जब ये दंगा होता है न। तो ये गाँव, इलाका‌ नहीं देखता- बस भड़कता जाता है और ऐसे में मारे जाते हैं-गरीब, बूढे, बच्चे और औरतें। (पृष्ठ-53)
- लड़कियों‌ का भी अजीब ही मसला है, खूबसूरत हो तो समाज में बैठे 'शिकारियों' का डर और खूबसूरत न हो तो लड़के वालों से शादी के इंकार का डर। (पृष्ठ-81)
नारी की इज्जत, किसी भी धर्म, सम्प्रदाय, जाति और वर्ण से ऊपर होती है। (पृष्ठ-175)
ये समाज की ऊँच-नीच, धर्म और राजनीति के ठेकेदार,...क्या उन्हें प्रेम के मायने भी मालूम हैं। (पृष्ठ-196)
- शादी के बाद लड़कियां अपनी किस्मत से समझौता करने की जिंदगी में आगे बढ जाती हैं। (पृष्ठ-204)
आजकल अपराधी तो रोशनी में ही ऐसे-ऐसे अपराध करके चुपचाप निकल जाते हैं जिनके बारे में पहले कभी शैतान सोच भी नहीं पाता था। (पृष्ठ-217)
- बसी हुयी दुनियां को उजाड़ने में एक पल नहीं लगता, मगर लाख कोशिशों के बाद भी उजड़ी हुई दुनियां अपने पहले वाले रुप में नहीं लौट पाती। (पृष्ठ-273)
उपन्यास में कमियाँ-
किसी रचना में कमियाँ रह जाना स्वाभाविक है। कुछ कमियाँ सामान्य हैं जिससे कहानी पर कोई असर नहीं पड़ता।
     - उपन्यास की सबसे बड़ी कमी‌ मेरी दृष्टि में उपन्यास का अतिविस्तार है। अगर लेखक इसमें कुछ कोशिश करता तो इस विस्तार को कम करके उपन्यास को कसावट दी जा सकती थी।
     
तभी बाहर से किसी ने झाँककर दरवाजे पर दस्तक दी।(पृष्ठ-)
    यहाँ 'झाँककर' गलत है, हालांकि यह टंकण में गलती हो कसती है।
- अंकुर उर्फ 'भैया जी' ऊँचे तबकों वालों के गाँव के स्थानीय नेता मलखान सिंह का बेटा था। (पृष्ठ-80)
सोनिया ग्राम सभा के मुखिया की बेटी थी। (पृष्ठ-175)
मलखान सिंह को कभी 'ग्राम मुखिया', कभी...ग्रामों का सरपंच और एक जगह MLA दिखाया गया है।
   ये सामान्य गलतियाँ है जो कथा को प्रभावित ‌नहीं करती।
निष्कर्ष-
           हमारे समाज में पनप रहे जातिवाद, धर्मगत भेदभाव आदि प्रासंगिक विषयों को आधार बना कर लिखा गया यह उपन्यास एक अच्छी रचना है। उपन्यास में वर्तमान में पनप रही बुराइयों का भी चित्रण है।  उपन्यास का अतिविस्तार कहानी को बहुत धीमा बना देता है, जो पाठक को नीरस बना देता है।
              उपन्यास एक बार पढा जा सकता है। मन को छू लेने वाली कथा।
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उपन्यास- लव जिहाल...एक चिड़िया
ISBN- 978-93-86276-55-1
लेखक- राम पुजारी
प्रकाशक- गुल्ली बाबा
पृष्ठ- 280
मूल्य- 180
उपन्यास लिंक- Amazon link
समाचार पत्र में प्रकाशित समीक्षा- लव जिहाद उपन्यास