Friday, 15 March 2019

179. जिप्सी- कंवल शर्मा

एक घुमक्कड़ व्यास की खतरनाक यात्रा
जिप्सी-
         
'जिप्सी' कंवल शर्मा का पांचवां मौलिक उपन्यास है। कंवल शर्मा ने अपने प्रथम उपन्यास 'वन शाॅट' से 'जिप्सी' तक का जो सफर किया है वह वास्तव में प्रशंसनीय है।
           कंवल जी के उपन्यासों में जो रोमांच होता है वह आदि से अंत तक यथावत बना रहता है।
‌‌‌‌         प्रस्तुत उपन्यास 'जिप्सी' एक थ्रिलर रचना है। थ्रिलर भी ऐसा है जो पाठक को अपने साथ बांधे रखता है।
‌ अगर उपन्यास के कथानक की बात करें तो यह एक रिटायर्ड नौसैनिक की कथा। वह रिटायर नौ सैनिक है, इसलिए यह को 'सैन्य-कथा' नहीं है।

        गगनदीप चौधरी नौसेना से रिटायर एक नौसैनिक था, जिसकी ट्रेजडी ये थी कि उसकी तकदीर का उसके साथ एक्स्ट्रा बैर था।

         गगनदीप के साथ तकदीर का बैर तो था ही साथ में उसका जीवन एक जिप्सी का भी था।‌ जिप्सी अर्थात जो एक जगह स्थायी न रहे, घूमता रहे। मैं फितरन एक खानाबदोश बूँद, एक जिप्सी हूँ, जिसका एक जगह टिककर बैठ जाना मुमकिन नहीं। (पृष्ठ-200)

        नौसेना से, ट्रक ड्राइवर और ट्रक ड्राइवर से एक नये सफर की ओर चला पड़ा गगनदीप चौधरी। बस यही नया सफर उसके जीवन में एक खतरनाक मोड़ ले आया। गगनदीप चौधरी की मुलाकात एक बैंड म्यूजिशियन हैरी से होती है। इस नये सफर पर उन्हें एक अनजान लड़की कार में लिफ्ट देती है।
"क्या पणजी जा रही हैं?"
............
"हाँ' लडकी स्वर समान्य था।
" हमें लिफ्ट की तलाश है।" हैरी ने बात आगे बढाई और बोला।

हैरी और गगन को लिप्ट तो मिली लेकिन साथ में एक ऐसी मुसीबत भी मिली जिसका उन्हें कोई अनुमान भी न था।


- अंधेरी रात में अचानक मिली वह लड़की कौन थी?
- क्या उसने झूठ बोला था, वह तीन घण्टे से ड्राईव कर रही है?
- क्या वह सिर्फ गगन से कार चलवाना चाहती थी?
- वह ड्राईव से फ्री होकर कार की पिछली सीट पर सोना चाहती थी या कोई और कारण था?
- क्या वह कार चोरी की थी?
ये सब प्रश्न गगन चौधरी और हैरी को परेशान करते हैं

         कुछ लोगों की जिंदगी ऐसी होती है की वे एक जगह स्थायी रूप से नहीं रह सकते, बस फितरत। ऐसी ही फितरत का मारा है गगनदीप चौधरी। एक नौकरी से मन भरा तो दूसरी, दूसरी से तीसरी। एक जगह से मन ऊब गया तो दूसरी जगह और दूसरी से तीसरी जगह।‌ ऐसे ही गगनदीप चौधरी को एक बैंड म्यूजिशियन हैरी‌ मिल गया और वह उसके साथ पणजी चल दिया। जहाँ मुसीबतें उसका पलक बिछा कर इंतजार कर रही थी। स्वयं गगनदीप चौधरी भी कम न था। ऐसा आदमी जो सब्र नहीं रखता, मुसीबत के आने का इंतजार नहीं करता बल्कि खुद उसे बुलाता है। (पृष्ठ-108)
          'जिप्सी' उपन्यास रोचक और दिलचस्प घटनाओं से भरपूर एक पठनीय उपन्यास है। यह एक थ्रिलर कारनामा है जिसमें घटनाएं महत्व रखती हैं। इन्हीं घटनाओं से मिलकर जो कथानक बना है वह अविस्मरणीय है। घटनाएं भी इतने जबरदस्त तरीके से घटित होती हैं की पाठक हैरान रह जाता है। उपन्यास में कसावट और तेज प्रवाह हथ जो सतत पठनीय है।

उपन्यास में एक दो जगह गगनदीप चौधरी स्वयं कहते हैं- मैं फितरन एक खानाबदोश हूँ। (पृष्ठ-200) और एक जगह इस जिंदगी से परेशान भी दिखते हैं- "मैं अपनी इस दर-दर करती बंजारों सी जिंदगी से आजाद हो सकता हूँ।" (पृष्ठ-110)
देखा जाये तो दोनों कथनों में विरोधाभास है।

       उपन्यास में पृष्ठ संख्या 08-28 तक का एक लंबा लेखकिय है और मजे की बात तो ये है की उस लेखकिय का संबंध उपन्यास से तो बिलकुल भी नहीं है। लेखकिय पर तो 'पूर्व का सफर और पश्चिम का रास्ता' वाली उक्ति चरितार्थ होती है। अगर यह लेखकिय उपन्यास जगत से संबंधित होता तो बहुत अच्छा लगता।


मैं‌ फितरन एक खानाबदोश हूँ, एक जिप्सी हूँ, जिसका एक जगह टिककर बैठ जाना मुमकिन नहीं।
(पृष्ठ-200)
अब आगामी कारनामा क्या होगा यह पढना दिलचस्प होगा।

निष्कर्ष-
कंवल शर्मा का उपन्यास 'जिप्सी' एक जबरदस्त थ्रिलर उपन्यास है। उपन्यास नायक गगनदीप चौधरी के घुमक्कड़ जीवन की एक यादगार गाथा।
उपन्यास की कहानी रोचक और दिलचस्प है।

उपन्यास- जिप्सी
लेखक- कंवल शर्मा
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स
पृष्ठ- 254
मूल्य- 100₹




178.

One

Tuesday, 12 March 2019

177. चौरासी- सत्य व्यास

दर्द से गुजरती एक प्रेम कथा

     सन् 1984 के दंगे कौन भूल सकता है और दंगे चाहे कोई भी हो, सन् 1947, 1984 या मेरठ हो या गोधरा। साम्प्रदायिक की आग जहाँ भी लगी है या लगाई गयी है उसके दाग अमिट हैं। समय- समय पर यही दाग टीसते हैं। बस उस दर्द की अभिव्यक्ति अलग-अलग होती है। दर्द तो दर्द है, वह कभी धर्म या जाति नहीं देखता। इस दर्द को वही अनुभव कर सकता है जो संवेदनशील है, जिसमें इंसानियत बाकी है। ऐसी ही दंगों की कथा 'चौरासी' लेकर उपस्थित हुये है सत्य व्यास।
                 सन् 1984 के 'हिन्दू- सिख' दंगों में उपजी एक प्रेम कथा है 'चौरासी'। कहने को चाहे यह प्रेमकथा है लेकिन इसके पीछे जो कहानी है वह इंसानी रक्त में डूबी हुयी है।
         इंसान चाहे कितना भी सभ्य हो जाये लेकिन समय मिलते है उसमें बैठा शैतान जाग जाता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं 'नाखून क्यों बढते हैं?', क्योंकि वह हमारी आदिम प्रवृति के प्रतीक हैं। यह आदिम‌ प्रवृत्ति समय मिलते ही जाग जाती है, जैसे चौरासी उपन्यास में लोगों की जागी।
            हर बार यही लगता है की हम एक गलती से सबक लेकर अच्छे इंसान बनेंगे लेकिन हर बार अच्छे बनने की बात को कुछ समय बाद भूल जाते हैं और हम पर धर्म, जाति और राजनीति हावी हो जाती है और इंसानियत भूल जाते हैं।

           इंसान से शैतान बनने की कहानी को सत्य व्यास जी ने अपने उपन्यास 'चौरासी' के माध्यम से जिस ढंग से अभिव्यक्त किया है वह पठनीय है।
         चौरासी कहानी है दो मासूम प्रेमियों की जो अपनी एक मासूम सी जिंदगी जीना चाहते हैं। लेकिन एक रात को उनके जीवन की दिशा बदल जाती है। पंजाब में उठा आतंकवाद और उससे निकली आग में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और इस हत्या से नफरत ने पूरे सिख समुदाय को झुलसा जाती है। इसी नफरत का साक्षी बना झारखंड का शहर बोकारो।
       बोकारो शहर का एक हिन्दू लड़का ऋषि अपने मकान मालिक पजांबी परिवार की लड़की मनु से प्रेम करता है। प्रेम कोई प्रमेय नहीं जो निश्चित साँचे में ही सिद्ध होता है। प्रेम अपरिमेय है। दोनों के कुछ सपने थे। लेखक ने लड़कियों के संदर्भ में बहुत अच्छा लिखा है। लड़की जब अपने सपनों के साथ निकलती है तो सबसे ज़्यादा सुरक्षा अपने सपनों की ही करती है।

          अभी प्रेम परवान चढा भी न था की 'हिन्दू-सिख' दंगे फैल गये। लोग इंसान से शैतान‌ बनने में समय नहीं लगाया। ऐसे समय में उपजी अफवाहें हमेशा जानलेवा साबित होती हैं।
अफवाहों का बाजार गर्म था। अफ़वाह की सबसे विनाशकारी बात यह होती है कि यह नसों में लहू की जगह नफ़रत दौड़ाती है और वह नफरत महज़ दिल तक जाती है। अफ़वाह दिमाग़ तक किसी भी संकेत के जाने के सारे रास्ते बंद कर देती है। घृणा हुजूम का सबसे मारक हथियार है।
इस घृणा ने भारत की एकता, प्रेम, भाईचारे में ऐसी आग लगाई जो दशकों बाद बुझ न पायी।
‌‌
          उपन्यास एक कहानी मात्र नहीं है यह तो हमारे काले इतिहास से परिचित करवाता है। उस काले इतिहास से उपजी नफरत हमेशा हारती रही है और विजयी हमेशा प्रेम होता है, भाई चारा होता है।
प्रेम को लेकर लेखन ने जो पंक्तियाँ रची हैं वे प्रशंसनीय हैं।


- प्रेमी एकाध सदियाँ तो इशारों में ही जी लेते हैं।

- किताबों से किसी को कोई प्रेम नहीं था। किताबों से प्रेम ही होता तो दंगे ही क्यों होते! सो, किताबों को आग का कच्चा माल मानकर उसी तरह उपयोग किया गया।

- प्रेम दरअसल तरह-तरह के आँसुओं का समुच्चय है। ख़ुशी, ग़म, ग़ुस्सा, ख़ला, डर और बिछोह। यह सारी भावनाएँ एक ही गुण को संतुष्ट करती हैं और वही गुण प्रेम है।
- मूर्खताओं की एक परिणति प्रेम और प्रेम की एक परिणति मूर्खता भी है।

        उपन्यास में कुछ एक बातें ऐसी भी हैं जो लेखक स्पष्ट नहीं कर पाये। ऋषि का दंगों के लोगों के साथ या तथाकथित नेता जी का आदेश मानना क्यों आवश्यक था।
एक पंक्ति है- रमाकांत ठाकुर ने आज पहली बार जाना कि सिख, हिंदू नहीं होते। (पृष्ठ-) अब पता नहीं इस पंक्ति का क्या अर्थ है।


निष्कर्ष-
सत्य व्यास द्वारा लिखित उपन्यास 'चौरासी' सन् 1984 ई. के 'हिन्दू-सिख' दंगों के दौरान झारखण्ड के एक शहर 'बोकारो' की घटना को व्यक्त करती है। यह एक प्रेमकथा होने के साथ-साथ सिख समाज पर हुए सामूहिक नरसंहार का मार्मिक चित्रण है।
संवेदनशील पाठक को यह रचना अवश्य पढनी चाहिए।

उपन्यास- चौरासी
लेखक- सत्य व्यास
प्रकाशक- हिन्द युग्म
पृष्ठ- 160
मूल्य- 125₹
उपन्यास लिंक- चौरासी



Friday, 8 March 2019

176. दिल्ली दरबार- सत्य व्यास

एक उच्छृंखल सी प्रेम कथा
दिल्ली दरबार- सत्य व्यास, उपन्यास ।

             सत्य व्यास कम समय में काफी चर्चित लेखक हो गये हैं। इनकी रचनाएँ वर्तमान पाठक वर्ग में खूब चर्चा पा रही हैं। सत्य व्यास जी की जो भाषा शैली है वह सहज ही पाठक को प्रभावित करती है। शब्दों को इतने सहजता से काम में‌ लेते हैं की गंभीर विषय भी सरल हो उठता है।
सत्य व्यास जी की मैंने तीनों उपन्यास 'बनारस टाॅकिज', 'दिल्ली दरबार' और 'चौरासी' पढे हैं। तीनों में एक बात सामान्य है वह है कथा लेखक द्वारा न कही जाकर प्रथम पुरुष में कही गयी है।
      'दिल्ली दरबार' उपन्यास में भी कथा नायक का मित्र मोहित द्वारा कही गयी एक प्रेम कथा है।
       प्यार की सबसे खूबसूरत बात उसके साथ आने वाली परेशानियाँ हैं, अड़ंगे हैं, मुश्किलें, मुसीबतें हैं। सब परेशानियाँ कमोबेश एक होते हुए भी प्रेम कहानियों में अलग-अलग आती हैं और यही किसी भी कहानी को अलहदा अनुभव देती हैं।
             दिल्ली दरबार की इस प्रेम कथा में भी बहुत सी परेशानियां हैं। परिधि की अलग कथा, महिका की एक अलग प्रेम कथा है और दोनों के बीच में है प्रेम को मात्र वासना समझने वाला कथानायक राहुल मिश्रा। इस प्रेम के परिणाम क्या रहे।
          प्रेम के कारण नहीं होते; परिणाम होते हैं पर प्रेम में परिणाम की चिंता तब तक नहीं होती जब तक देर न हो जाए। पंछी घर के छतों, मेट्रो की सीढ़ियों, कॉलेज के खुले मैदानों में या फिर पार्क के पेड़ों के गिर्द अपनी जिंदगी के नीड़ बनाने के सपने में खोए रहते हैं और परिणाम अपनी परिणति की ओर मंद गति से चलता जाता है। यह परिणति सुखद होगी या दुखद या कि फिर दुखद परिणति का सुखद परिणाम या फिर इसका भी उल्टा होगा यह महज इस बात पर निर्भर होता है कि प्रेम का परिमाण कितना है। है भी या नहीं।


           'दिल्ली दरबार' कहानी है दो दोस्तों की, दो दोस्त जो झारखण्ड के एक शहर से दिल्ली में पढने आते हैं। जहाँ एक और पात्र शामिल होता है मकाल मालिक बटुक शर्मा और शर्मा जी की लड़की परिधि भी है।
           यहीं से कहानी में घुमाव आता है। राहुल को परिधि से प्रेम होता है, लेकिन यह मात्र जिस्मानी प्रेम है जैसा की बाद में राहुल को महिका से भी होता है। लेकिन सफल कौनसा होता है यह पठनीय है।
      हाल परिधि का भी सुन लीजिएगा- बाल इतने सीधे मानो इस्त्री किए हों। कपड़े इतने बरहम मानो घर में इस्त्री ही न हो। चेहरा इतना गोल मानो नाक के केंद्र से त्रिज्या ली गई हो। चेहरे पर भाव इतने तिरछे मानो किसी बेशऊर ने कूची पकड़ी हो। होंठ इतने भरे हुए कि थिरकन तक महसूस हो जाए और आँखें इतनी खाली कि सागर समा जाए। (परिधि का वर्णन)

उपन्यास में दो दोस्तों की दोस्ती, प्रेम प्रकरण, नौकरी के लिए संघर्ष, मकान मालिक से बहस जैसे कुछ प्रसंग मिलेंगे।


        कहानी में हल्की श्रेणी का भरपूर हास्य है, यह मात्र हास्य है कोई व्यंग्य नहीं है। हास्य भी वह जो किसी की परिस्थितियों या उसके व्यवहार से उपजा निम्न स्तर का हास्य है।
         
       कुछ रोचक कथन उपन्यास की रोचकता को बढावा देते हैं, जैसे- 
“तुम्हारे जैसी ही औरतें होती हैं जो शादी की बात चलते ही नींबू चाटने लगती हैं।"
"प्रेम के कारण नहीं होते परिणाम होते हैं”
“बांधकर रखना भी तो कोई प्यार नहीं हुआ न”
जिंदगी एयर होस्टेज हो गई है, जिसमें बिना चाहे मुस्कुराना पड़ता है”
"प्रेम, पानी और प्रयास की अपनी ही जिद होती है और अपना ही रास्ता।”


निष्कर्ष- 
           प्रस्तुत उपन्यास 'दिल्ली दरबार' एक फिल्मी कहानी की तरह है। जहां प्रेम, दोस्ती, विश्वास और प्रेम विवाह है।
दो दोस्तों की दोस्ती और प्रेम की यह रोचक कथा पठनीय है। 

उपन्यास- दिल्ली दरबार
लेखक-   सत्य व्यास
प्रकाशक- हिन्द युग्म



Thursday, 28 February 2019

175. महाभोज- मनु भण्डारी

लाश पर राजनीति...

      मनु भण्डारी कृत 'महाभोज' उपन्यास भारतीय राजनीति पर आधारित एक यथार्थवादी रचना है। उपन्यास इतना खुरदरा है की उसका कथ्य पाठक को बुरी तरह से उस खुरदरेपन का अहसास करवाता है।

                 हमारी राजनीति किस स्तर तक गिरी हुयी है इसका जीवंत उदाहरण है यह उपन्यास।  

                   अगर आपको जीना है तो आप खामोश जिंदगी जी लीजिएगा, आँख, कान और मुँह बंद करके जी सकते हैं। अगर आँख खामोश जिंदगी नहीं जी सकते तो आपका हश्र भी वही होगा जो बिसू उर्फ बिसेसर का हुआ।

                      बिसू सरोहा गाँव का एक शिक्षित जवान था। वह अन्याय और अत्याचार का विरोधी था और एक दिन....उसकी लाश सड़क के किनारे पुलिस को पड़ी मिली, शायद इसीलिए लावारिस लाश का ख़याल आ गया। वरना उसके तो माँ भी है, बाप भी। ग़रीब भले ही हों, पर हैं तो। विश्वास नहीं होता था कि वह मरा हुआ पड़ा है। लगता था जैसे चलते-चलते थक गया हो और आराम करने के लिए लेट गया हो। मरे आदमी और सोए आदमी में अंतर ही कितना होता है भला! बस, एक साँस की डोरी! वह टूटी और आदमी गया।

                         उपन्यास का आरम्भ यही से होता है। सरोहा गांव से होता हुआ शहर/मुख्यमन्त्री की राजनीति तक पहुंच जाता है।

                           इसी गांव की एक सीट पर उपचुनाव होना था। राजनेताओं को समय मिल गया बिसू की लाश पर राजनीति करने का।

                           उपन्यास में मुख्यतः तो नेता सामने आते हैं‌। दोनों का चरित्र अलग-अलग है। एक जहाँ शांति की बात करता है तो दूसरा उग्र विचारों का है। लेकिन खतरनाक कौन है यह कहना बहुत मुश्किल है। एक तरफ सुकूल बाबू है तो दूसरी तरफ दा साहब हैं। दोनों के राजनैतिक हित हैं जिसकी भेंट गांव वाले चढते हैं।

                           ऐसा नहीं है की सभी लोग गलत हों कुछ अच्छे भी होते हैं लेकिन निकृष्ट राजनेता और नौकरशाही अच्छे लोगों को अच्छा काम करने भी नहीं देती।

                           कभी सिरोहा गांव के लोगों के घर जला दिये गये, लेकिन न्याय न मिला‌। एक बिसू ही था जो न्याय के लिए संघर्ष करता था एक दिन वह भी शैतानवर्ग की भेंट चढ गया। बिसू के लिए उसका दोस्त बिंदा, उसके संघर्ष को आगे बढाने का प्रयास करता है, सक्सेना जैसे अच्छे पुलिस वाले भी हैं जो बिंदा का साथ देते हैं।

      राजनेताओं के लिए गांव का भी तभी तक महत्व है जब तक चुनाव नहीं हो जाते। न तो इससे पहले इंसाफ मिला और न अब न्याय की उम्मीद है। न्याय के लिए संघर्ष करने वाला तो रहा नहीं, अगर कुछ रहा है तो बेबस गांव वालों की सिसकिया और नेताओं के झूठे आश्वासन।

                            उपन्यास में जो घटनाक्रम है वह एक गांव और शहर के अंदर तक सीमित है लेकिन वह सारे भारत के भ्रष्ट शासन को रेखांकित करता नजर आता है। सिर्फ अपनी सत्ता के लिए लोग किसी को जान से मरवाने में भी परहेज नहीं करते, उनके लिए पुलिस और नौकरशाही तो घर की बात है।

                            'महाभोज' उपन्यास पढते वक्त पाठक एक ऐसे घटनाक्रम में चला जाता है जो इतना संवेदनशील, जहाँ पाठक भ्रष्ट प्रशासन और राजनीति को देखकर दहल उठता है। 

                         

निष्कर्ष-

             प्रस्तुत उपन्यास भारतीय राजनीति का वह काला चेहरा दिखाता है जो बहुत भी भयावह है। हमारे राजनेता किस स्तर तक गिर सकते हैं। यह इस उपन्यास में दर्शाया गया है।‌ 

   यह उपन्यास साहित्य की अनमोल धरोहर है। इसे अवश्य पढें ।


उपन्यास-  महाभोज

लेखिका-  मन्नू भण्डारी

प्रकाशक- राधाकृष्ण पैपरबैक्स

                          

Tuesday, 26 February 2019

174. विश्वास की हत्या- सुरेन्द्र मोहन पाठक

 जब हुयी विश्वास की हत्या
 थ्रिलर उपन्यास, लेखक- सुरेन्द्र मोहन पाठक
  वे तीन दोस्त थे, वक्त की मार से तीनो ही बेरोजगार थे। एक दिन उन्होंने एक निर्णय लिया, एक लूट का। यह स्वयं से वादा भी किया की यह लूट उनकी जिंदगी की पहली और आखिर लूट होगी।
यह अपराध भी सब के सामने आ गया। लेकिन यह काम किया किसने। तभी तो सभी एक दूसरे से पूछते हैं। “तुमने कोई ऐसी हरकत तो नहीं की जिसे विश्‍वास की हत्या का दर्जा दिया जा सकता हो?”
           जगदीप कभी अमेरिकन अम्बेसी में ड्राइवर हुआ करता था, वर्तमान में बेरोजगार है। सूरज एक असफल पहलवान था। गुलशन घर से फिल्मी हीरो बनने निकल लेकिन असफल होकर वापस लौट आया। संयोग से तीनों बेरोजगार हैं, आर्थिक मंदी से जूझ रहे हैं।
तीनों एक ऐसे अपराध में फंस जाते हैं, जहां उन्हें लगता की वे कभी पकड़े नहीं जायेंगे। पर अपराध छिपा नहीं रहता। लेकिन अपराधी कानून से दूर भागने की कोशिश करता है। यही कोशिश इस उपन्यास के तीनों पात्र करते हैं, लेकिन होता वहीं है जो 'राम रचि राखा'।
उपन्यास में एक तरफ इन तीनों के पीछे पुलिस है तो दूसरी तरफ कुछ खतरनाक गुण्डे भी इनके पीछे लगे हैं। क्या तीनों दोस्त अपनी जान बचाने में सफल हो पाते हैं? यह पढना दिलचस्प होगा।

             ‌‌यह पाठक जी का एक थ्रिलर उपन्यास है। इस उपन्यास की कहानी की बात करें तो इसका आरम्भ चाहे एक घटना से होता है लेकिन आगे कहानी पूर्ण विस्तार ले लेती है। हम यूं कह सकते हैं एक रास्ता है और उस रास्ते से छोटे-छोटे अनेक रास्ते निकलते हैं। यही इस कहानी में होता है। उपन्यास का आरम्भ एक घटना से होता है और फिर छोटी-छोटी कई घटनाएं मिलकर एक बड़ी कहानी का रूप ले लेती हैं।
प्रत्येक पात्र की स्वयं की एक अलग अलग कहानी है और प्रत्येक कहानी में कोई न कोई 'विश्वास की हत्या' करता नजर आता है।
इस उपन्यास की जो मुझे विशेषता अच्छी लगी वह है उसके पात्रों का स्वतंत्र होना। सभी पात्र स्वतंत्र है, कहीं से भी नहीं लगता की लेखक इन पात्रों को अपने अनुसार चला रहा है।

        उपन्यास में मुझे एक दो जगह कुछ कमियां खटकी।
“रिपोर्ट कहती है”—फिर उसने अपने साथियों को बताया—“कि मोहिनी के नाखूनों के नीचे से बरामद खून के सूखे कण तथा दारा का खून एक ही ब्लड ग्रुप का है।”
    यह पता नहीं उपन्यास में कैसे संभव हो गया।
उपन्यास का एक और पात्र है जो अपने सीने पर खरोच के निशान बनाता है और किसी के चेहरे पर खरोच के निशान करता है ताकी वह किसी को फंसा सके, पर यह संभव नहीं है।
ऐसी बड़ी-बड़ी गलतियाँ पता नहीं कैसे रह गयी उपन्यास में।
इन कमियों के अलावा उपन्यास में सब कुछ रोचक है।

निष्कर्ष-
             यह एक रोचक मर्डर मिस्ट्री थ्रिलर है। यह मात्र मर्डर मिस्ट्री ही नहीं है, इसमें जो रोमांच है वह गजब है। कहानी कहां कब कैसे करवट लेती है यह पढना दिलचस्प है। आदि से अंत तक एक रोचक उपन्यास है।


उपन्यास- विश्वास की हत्या
लेखक- सुरेन्द्र मोहन पाठक
प्रकाशक-


173. लम्हें जिंदगी के- अशोक जोरासिया

     कवि अशोक जोरासिया जी का कविता संग्रह पढने को मिला। इस कविता संग्रह में विभिन्न विषयों पर अलग-अलग कविताएँ उपस्थित हैं।
कविता संग्रह 'लम्हें जिंदगी के...' जिंदगी के विभिन्न रंगों से पाठक का परिचय करवाता नजर आता है।


मेरे बचपन के गलियारे में बचपन के बालपन‌ को समेटा गया है।
वहीं गांव की चौपाल में गांव की अनेक विशेषताओं का वर्णन करते हुए लिखते हैं की
मेरे गांव की एक और पहचान
अतिथियों को समझते
अपना भगवान।
(पृष्ठ- 18,19)
       अगर गांव का जिक्र चला है तो 'मजदूर और किसान' का वर्णन भी अवश्य होगा। बिना मजदूर और किसान के गांव भी तो नहीं। मजदूर और किसान वर्ग की पीड़ा का वर्णन भी मिलता है।
बचाना होगा इनका जीवन
बुलंद करना है फिर से
जय जवान, जय किसा‌न
। (पृष्ठ-26)
         मजदूर वर्ग की पीड़ा का वर्णन 'गगनचुंबी इमारत' कविता में भी मिलता है। वह मजदूर जो गगनचुम्बी इमारतों का निर्माण करता है लेकिन स्वयं उसके पास रहने को घर नहीं है।
यह कविता शोणक- शोषित का प्रभावशाली चित्रण करती नजर आती है। जो मजदूर इमारतों का निर्माण करता है लेकिन स्वयं उसे उन जगहों पर आश्रय नहीं मिलता।
मगर जगह नहीं मिलती
रहने को इन‌ मजदूर श्रमिकों को
इन‌ महानगरों की काॅलोनियों में।
(पृष्ठ-28)

कविता 'जीवन एक अग्निपथ' में कवि हौंसले को बुलंद कर मंजिलों को प्राप्त करने का संदेश देता है।
"पथ है, पथिक हो तुम
मंजिल लंबी, राहें है‌ नई,
उमंग जोश है नया,
सवेरा है नया चलना है तुमको
जीवन अग्निपथ....।
(पृष्ठ-24)
यह कविता बहुत अच्छी और प्रेणादायक कविता है।


क्या कविता लिखना सरल है। नहीं यह एक श्रमसाध्य काम है। इस बात को कवि ने महसूस किया और अपने शब्दों में एक कवि के भाव व्यक्त किये हैं।
यूं ही नहीं लिखी
जाती नज्म
शब्दों को बांधना
पड़ता है दिल में
श्रृंगार की तरह
अलंकृत करनी पड़ती है,
अल्फाजों की देह।
(पृष्ठ-29)
तब जाकर कहीं एक कविता का सृजन होता है।

जीवन को परिभाषित करती एक कविता है 'जिंदगी महफिल है'। यह वास्तविकता है की जिंदगी एक महफिल की तरह है बस उसे जिने का ढंग आना चाहिए। यही ढंग इस कविता में दर्शाया गया है।
         ये भी माना हमने
        आसां‌ नहीं जिंदगी जीना
        जीना भी एक कला है
        कलाकार फिर बन जाया करो।
(पृष्ठ-37)

         एक प्रगतिशील कविता है 'पुनर्जागरण' जो परम्परागत रूढियों को तोडकर आगे बढने की प्रेरणा देती है। तो कविता 'युवावस्था' भी हमें एक संदेश देती है कि 'जीतने के लिए संघर्ष करना ही युवावस्था है...।' (पृष्ठ-50)


        प्रकृति से संबंधित कई कविताएँ इस संग्रह में मिल जायेंगी पर इस संग्रह की अंतिम कविता 'पेड़ की व्यथा' एक यथार्थवादी कविता है। जो हमारे पर्यावरण को रेखांकित करती एक सार्थक रचना है।

झेलता रहा हूँ आंधियों को
तूफानों से निपटने के लिए
जड़ों पर खड़ा होकर
टहनियों से आच्छादित
मैं एक दरख्त हूँ।
(पृष्ठ-94)

प्रस्तुत कविता संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यही है की इसमें विषय की विविधता है। जिन‌ विषयों पर लगता है लिखा नहीं जा सकता, या लिखना मुश्किल है ऐसे विषय पर कवि महोदय ने जो लिखा है वह काबिल ए तारीफ है।

नारी है, युवा है प्रकृति है देश है, रोटी है, सावन है रिश्ता है
'1962' का युद्ध है, 'कुली' है, 'साइबर शहरों‌ की दुनिया' तो कहीं 'बैंडिट क्वीन फूलन देवी' पर भी कविता है। कवि की दृष्टि से कोई विषय अछूता नहीं रहा।

इस कविता संग्रह में जो मुझे कमी महसूस हुयी वह है कविता में लय का न होना, इस वजह से अधिकांश कविताएँ पद्य की बजाय गद्य के ज्यादा नजदीक हो गयी हैं।
एक अच्छे कविता संग्रह के लिए कवि महोदय को धन्यवाद।

कविता संग्रह- लम्हें जिंदगी के
कवि- अशोक जोरासिया
प्रकाशक- प्रभात पोस्ट पब्लिशर्स
पृष्ठ- 94
मूल्य- 150₹

Saturday, 23 February 2019

172. जेल डायरी - शेर सिंह राणा

 एक शेर की साहसिक यात्रा।

जेल डायरी- शेरसिंह राणा

             शेर सिंह राणा का नाम सुनते ही दो तस्वीरें सामने आती हैं।   क्या आपने शेर सिंह राणा का नाम सुना है, अगर सुना है तो आपके दिमाग में एक सकारात्मक  तस्वीर उभरी होगी और साथ ही एक नकारात्मक तस्वीर भी। एक सिक्के के दो पक्ष की तरह शेर सिंह राणा का जीवन। जहां एक पक्ष पर सारे देश को गर्व है तो द्वितीय पक्ष पर रोष भी।
     लेकिन शेर सिंह राणा के बारे में एक बात तय है वह है आदमी बहादुर है। ऐसा बहादुर जो शेर की गुफा में जाकर शेर के दाँत तोड़ने की क्षमता रखता है।

      ‌पहली बार जब यह पता लगा की शेर सिंह राणा ने अपनी आत्मकथा लिखी है तब से मेरे मन में इस किताब को पढने की अदम्य इच्छा बलवती हो उठी। आत्मकथा का शीर्षक और शेर सिंह राणा को कारनामा ही इस किताब को पढने के लिए प्रेरित करता है।

          भारत के महान राजा पृथ्वी राज चौहान और मोहम्मद शहाबुद्दीन गौरी के मध्य हुये तराईन के युद्ध (सन् 1191 और 1192 ई.) को सभी ने पढा ही होगा। प्रथम युद्ध में हारने के बाद गौरी ने द्वितीय युद्ध में कुटिल नीति से युद्ध जीता और पृथ्वी राज चौहान को बंदी बना कर अपने देश गजनी ले गया।  पृथ्वी राज चौहान के एक परममित्र और कवि चंदबरदाई थे। चंदबरदाई ने  'पृथ्वी राज रासो' नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की है। यह वीर रस का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है।
                        गौरी ने गजनी ले जाकर पृथ्वी राज चौहान को बंदी बना लिया और चौहान की आँखे खत्म कर दी। पृथ्वी राज चौहान की एक विशेषता थी 'शब्दभेदी' बाण चलाने की। इसी विशेषता के चलते एक 'पद्य' के माध्यम से चंदबराई ने पृथ्वी राज चौहान को गजनी की स्थिति बता दी।
     चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण
       ता उपर सुल्तान है,मत चूको चौहान।।
                        चंदबराई के इस संकेत से पृथ्वी राज चौहान ने शब्द भेदी बाण से गौरी को खत्म कर दिया। दोनों मित्रों ने वहीं पर अपनी जीवन लीला भी समाप्त कर ली।
                        गजनी में इन‌ तीनों की समाधी है। गजनी में पृथ्वी राज चौहान‌ की समाधी को अपमानित किया जाता है। बस यही बात शेर सिंह राणा के मन में थी की इस समाधी को भारत लाना है और इस बहादुर व्यक्तित्व ने इस महान कार्य के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी।
                        एक केस के सिलसिले में शेर सिंह राणा को तिहाड़ जेल जाना पड़ा। लेकिन दिल में एक आग सुलग रही थी। वह आग थी पृथ्वी राज चौहान की अस्थियों को भारत लाने की।
                         यह आत्मकथा तिहाड़ से ही आरम्भ होती है।  तिहाड़ से होते हुए बांग्लादेश और वहाँ से काबुल, कांधार तक घूमती है।
             

                      जेल डायरी राणा के अपने शब्दों में कही गयी उनकी अपनी कहानी है। इसकी शुरुआत तिहाड़ में फ़रारी के दिन से होती है और फिर राणा के बचपन से होती हुई उनके जीवन की बेहद दिलचस्प और रोमांचक दास्तान बयान करती है। (डायरी के अंतिम पृष्ठ से उद्धृत)
     
         इस आत्मकथात्मक डायरी को पढना रोचक है। कुछ दृश्य तो ऐसे हैं जहाँ साँस तक अटक जाती है। पल पल रोमांच से भरे खतरनाक सफर का जो इस रचना में वर्णन है वह पठनीय है। सिर्फ पठनीय ही नहीं नमन करने योग्य भी है।
              एक व्यक्ति अफगानिस्तान और वह भी तालिबानी आतंकवादियों के क्षेत्र में जाकर ऐसा कार्य करता है जिससे उसकी जान जा सकती है।
             

       तालिबनियों के गढ़ में अपने देश के प्रिय पूर्वज सम्राट पृथ्वीराज चौहान की समाधि को वापस अफ़ग़ानिस्तान से भारत लाने के लिए जा रहा हूँ और आप जानते हैं कि मैं वहाँ से ज़िन्दा वापस आऊँगा इसकी कोई गारण्टी नहीं है।

         क्या उसके कार्य को लोग समझे पायेंगे....इसीलिए शेर सिंह राणा ने सबूत के तौर पर विडियो रिकार्डिंग भी की।
               अगले दिन मैंने और शाहीन भाई ने ढाका की एक दुकान से ही सोनी का हैण्डीकैम, विडियो कैमरा ख़रीदा, जिसकी ज़रूरत अफ़ग़ानिस्तान में मुझे समाधि को खोदते समय उसकी रिकॉर्डिग के लिए चाहिये थी, क्योंकि मैं जानता था कि हमारे देश में ज़्यादा जनसंख्या ऐसी है जो ख़ुद तो देश और समाज के लिए कुछ कर नहीं सकते लेकिन दूसरों के द्वारा किए गये देश भक्ति के कार्यों में कमियाँ ज़रूर निकाल देते हैं। अगर मैं समाधि खोदते समय वहाँ की रिकार्डिग कैमरे से न करूँ तो कोई भी यक़ीन नहीं करता कि मैं अफ़ग़ानिस्तान गया और वहाँ से समाधि लाया।

          शेरसिंह का अफगानिस्तान में पृथ्वी राज चौहान की समाधि ढूंढना भी कोई सरल काम न था। वे निरंतर एक जगह से दूसरी जगह भटकते रहे स्वयं को एक मुस्लिन व्यक्ति के रूप में पेश करते रहे। बहुत सी जगह लोगों को उन पर जासूस का शक  भी होता रहा और कई जगह जान जोखिम में भी डाल दी लेकिन बहादुर आदमी हर जगह, हर मुसीबत से टक्कर लेकर सुरक्षित निकला।

         समाधि ढूढते कई और समाधियाँ तो मिल गयी लेकिन जिसकी खोज थी वह न मिली। स्वयं शेरसिंह भी निराश हो गये। लेकिन जब समाधि मिली तो वह बहुत दुर्गम जगह पर मिली।
       
         लेकिन आप देयक गाँव में नहीं जा सकते हैं, क्योंकि वह तालिबानियों का गाँव है और जिस जगह पर यह गाँव है वो पूरा इलाक़ा तालिबानियों का गढ़ है।
      लेकिन बहादुर आदमी वहाँ भी जा घुसा। इस डायरी का यहाँ से जो अत्यंत रोचक और रोंगटे खड़े करने वाला सफर आरम्भ होता है वह शेरसिंह के कद को और भी बड़ा कर देता है।
       एक जगह तो तालिबानी आतंकवादी शेरसिंह राणा को घेर लेते हैं और नमाज सुनाने को बोलते हैं ताकी तय कर सके यह व्यक्ति मुस्लिम है।
          मैं जब यह अध्याय पढ रहा था तो मेरा सांस रुकने के स्तर पर था। जहाँ तय था एक छोटी सी चूक जान ले सकती है।
          इस रचना में इस यात्रा वृतांत के अलावा भी छोटी छोटी और बहुत सी रोचक बाते हैं जो पठनीय है।
  
    कश्मीर के विषय पर शेरसिंह राणा ने बहुत अच्छा लिखा है।
         कश्मीर का मसला यह है कि वहाँ के महाराज हरिसिंह ने अपने आपको दूसरे राजा-महाराजाओं और सुलतानों-नवाबों की तरह भारत में मिलाया था, इसलिए वह भारतीय हिस्सा है। अगर कश्मीर के लिए भी कोई बोलता है कि वहाँ पर मुसलमान नहीं चाहते कि वे भारत में रहें तो मेरा कहना है कि एक हज़ार साल पहले यहाँ के हिन्दू भी नहीं चाहते थे कि मुहम्मद ग़ोरी भारत पर राज करे।

       ‌‌गाजी कौन होता है और शहीद कौन होता है। मुस्लिम संस्कृति में इसके क्या अर्थ हैं। यह जिज्ञासा शेर सिंह राणा को भी थी और उसका उत्तर भी मिला।
           वह (गौरी)  ग़ाज़ी और शहीद है और उसके जन्म और मरने की तारीख़ भी लिखी थी। मैंने उनसे जब यह पूछा कि ये ग़ाज़ी और शहीद क्यों कहलाये तो उन्होंने मुझे बताया कि ये गाज़ी इसलिए हैं, क्योंकि इन्होंने कई लाख क़ाफिरों को मौत के घाट उतारा था और जो भी क़ाफिरों को मारता है, वह ग़ाज़ी ही कहलाता है। शहीद इसलिए है, क्योंकि इसकी हत्या एक क़ाफिर के हाथों ही हुई थी।

        अफगानिस्तान जो कभी एक हिन्दू क्षेत्र था। अफगानिस्तान में आज भी हिन्दू और सिख धार्मिक स्थल मिल जायेंगे। शेरसिंह राणा जी लिखते हैं। पुराने ग़ज़नी शहर में पहुँच गया जहाँ दान शहीद मन्दिर और तीरथ नाथ जी का मन्दिर था।
           वहाँ मुझे एक हिन्दू परिवार मिला जो उन मन्दिरों की सेवादारी के लिए वहाँ रहता था। इस सेवादार का नाम मिलापचन्द था, जो अपने परिवार के साथ यहाँ रहता था और बहुत ही सज्जन आदमी था। मैंने मन्दिरों में दर्शन किये तो उसने मुझे यह भी बताया ऊपर पहाड़ों पर भैरोनाथ जी का मन्दिर भी है, लेकिन 15 साल से वहाँ जाना बन्द है। इसके बाद मिलापचन्द मुझे पास में ही एक गुरुद्वारे में भी ले गये। मुझे वहाँ दो लोग मिले, जो वहाँ सेवादारी के लिए थे। इनके नाम सरदार गुरुइन्द्रसिंह तथा सरदार कुलदीप सिंह थे। मैंने गुरुद्वारे में भी मत्था टेका और उन दोनों सेवादारों से काफ़ी देर बात की और दोनों ही जगह प्रसाद भी खाया। इन सभी जगहों की वीडियो रिकॉर्डिग भी मैंने अपनी याद के लिए कर ली।

      शेरसिंह राणा ने सभी जगह से कुछ न कुछ सामग्री एकत्र की ताकी पहचान के तौर भारत में दिखा सकें।
     मुहम्मद शहाबुद्दीन ग़ोरी और उसके बड़े भाई गयासुद्दीन ग़ोरी के वालिद मुहम्मद बहाउद्दीन सोम की मज़ार थी।
      मैं वहाँ से 1-1 निशानी यह दिखाने के लिए ले कर आया कि जब हम यह निशानियाँ उन मज़ारों से उठा सकते हैं तो ऐसे ही चुपचाप अगर चाहें तो उन मज़ारों को तोड़ भी सकते हैं, लेकिन मेरी भारतीय सभ्यता ऐसी नहीं है कि हम किसी की मज़ार को तोड़ें या उन्हें किसी तरह का नुक़सान पहुँचायें। ये निशानियाँ तो उन लोगों को लिए चेतावनी है जो लोग हमारे महान सम्राट पृथ्वीराज चौहान की समाधि पर जूते-चप्पल मार कर हमारे हिन्दुस्तान की बेइज़्ज़ती करना चाहते हैं।

      शेर सिंह राणा ने यह सब क्यों किया? यह प्रश्न सभी पाठकों के मन में उठता है इसका उत्तर शेर सिंह राणा ने दिया है। वे सिर्फ भारतीय सम्राट पृथ्वी राज चौहान की अस्थियाँ ही लाते हैं। अन्य किसी भी समाधि/मजार को क्षतिग्रस्त नहीं करते, उनका एक साथी ऐसी कोशिश करता है तो वे उसे मना कर देते हैं।
            हमारा मक़सद सिर्फ अपने भारतीय पूर्वज की क़ब्र को खोद कर वहाँ से उनकी अस्थियाँ निकालना है। मैंने कहा कि वैसे भी किसी मरे हुए की क़ब्र को तोड़ कर उसका अपमान करना हमारी भारतीय सभ्यता नहीं है।

        ‌‌‌शेरसिंह राणा जिस‌ने अपने नाम को सार्थक किया। यह सब उसके अच्छे संस्कारों का परिणाम है। शेरसिंह ने हमेशा अपने नाम के अनुसार जीवन जिया है, क्योंकि वह बहादुर है।

    बहादुर आदमी की बस यही पहचान है कि वह अपने सामने किसी पर ज़ुल्म नहीं होने देता और जब आपने मेरा नाम ही शेर सिंह रखा है तो मुझे तो बहादुरी दिखानी ही पड़ेगी, वरना सब लोग मेरा मज़ाक उड़ायेंगे।
      और शेरसिंह ने ऐसी बहादुरी दिखाई की देश दंग रह गया।
         शेर सिंह राणा की यह आत्मकथात्मक डायरी एक शेर दिल व्यक्ति की कहानी है। जिसने देश के स्वाभिमान के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी। साहित्यिक दृष्टि से हो सकता है डायरी अच्छी न हो लेकिन एक सामान्य पाठक को रुचिकर लगेगी।
       इस रचना में कहीं-कहीं अतिशय वर्णन है जो कथा के प्रवाह को धीमा करता है। संशोधन की बहुत ज्यादा आवश्यकता है।‌ हार्पर जैसे उच्च कोटि के प्रकाशन ने भी कहीं इसमें संशोधन की आवश्यकता पता नहीं क्यों महसूस नहीं की। यां इसे इस दृष्टि से देख सकते हैं जैसा शेर सिंह राणा ने लिखा वैसा का वैसा ही प्रकाशित किया है।
        पठनीय रचना है, अवश्य पढें।

आत्मकथा- जेल डायरी (तिहाड़ से काबुल कंधार तक)
लेखक-       शेर सिंह राणा
प्रकाशक-   हार्पर काॅलिंस
पृष्ठ- ‌  ‌‌‌‌        308 

निम्न लिंक से आप डायरी अंश पढ सकते हैं।

जेल डायरी- तिहाड़ से काबुल कंधार 

       

Thursday, 14 February 2019

171. क्रिस्टल लाॅज- सुरेन्द्र मोहन पाठक




 एक कोर्ट रूम कहानी
क्रिस्टल लाॅज- सुरेन्द्र मोहन पाठक, उपन्यास, मर्डर मिस्ट्री, कोर्ट रूम ड्रामा।

               मुकेश माथुर एक एक वकील था जो 'आनन्द आनन्द आनन्द एण्ड एसोसियेट्स' नामक एक लाॅ फर्म में काम करता था, जहाँ उसकी हैसियत नाममात्र की थी। परिस्थितिवश वह अपनी फर्म के खिलाफ काम कर बैठा, जो की वकील की दृष्टि में उचित था लेकिम फर्म की दृष्टि में नहीं। मुकेश माथुर उस फर्म से बाहर हो गया।


सत्य का साथी मुकेश माथुर एक बात का पक्ष धर है।-
सूर्य छिपे अदरी बदरी अरु चन्द्र छिपे जो अमावस आये,
पानि की बून्द पतंग छिपे अरु मीन छिपे इच्छाजल पाये;
भोर भये तब चोर छिपे अरु मोर छिपे ऋतु सावन आये,
कोटि प्रयास करे किन कोय कि सत्य का दीप बुझे न बुझाये।


                   राजपुरिया एस्टेट के मालिक अभय सिंह राजपुरिया एक बड़ा, खानदानी आदमी था। उधर इलाके में बड़ी इज्जत, बड़ा रौब, बड़ा दबदबा बताया जाता था उसका। काफी उम्रदराज...68 साल का था। एक दिन अपने घर में, बैडरूम में...जीटाफ्लैक्स नामक दवाई के ओवरडाॅज से मरे पाये गये।

‘‘कैसे मर गया, मालूम?’’
‘‘कहते हैं दिल की अलामत की कोई दवा रेगुलर खाता था, उसके ओवरडोज से मरा।’’
‘‘ठीक कहते हैं। दवा का नाम जीटाप्लैक्स है, पिछले दस साल से खा रहा था। ओवरडोज कैसे हो गया?’’
इन्स्पेक्टर ने कुछ क्षण उस बात पर विचार किया फिर इन्कार में सिर हिलाया।
‘‘तो?’’ — एसीपी बोला।
‘‘तो...खुदकुशी, सर!’’
‘‘यानी जिस दवा की एक गोली खानी थी, उसकी ढेर खा लीं!’’
‘‘ज-जी ... जी हां।’’
‘‘प्लान करके सुइसाइड की!’’
‘‘सर, आप कहते हैं तो...’’
‘‘मैं नहीं कहता। मैं पूछता हूं। तुम क्या कहते हो?’’
‘‘सर, हो तो सकता है!’’
‘‘पीछे कोई सुइसाइड नोट क्यों न छोड़ा?’’
‘‘नहीं छोड़ा!’’
‘‘मौकायवारदात से कोई सुइसाइड नोट बरामद नहीं हुआ था।’’
‘‘ओह!’’


इसी केस को लेकर मुकेश माथुर और 'आनंद एसोसिएट' आमने -सामने आ जाती हैं।

- अभय सिंह राजपुरिया की मौत क्या स्वाभाविक थी?
- क्या अभयसिंह ने आत्महत्या की?
- क्या अभय सिंह को किसी ने मारा?
- मुकेश माथुर और आनंद एसोसिएट का संघर्ष क्या रंग लाया?

           यह उपन्यास पूर्णतः कोर्ट और वकील वर्ग की बहस पर आधारित है। मुख्य किरदार मुकेश माथुर है जो अभी नये वकील है। दूसरी तरफ एक बड़ी संस्थान है। दोनों के बीच मुकाबला पठनीय है।
हालांकि उपन्यास में ज्यादा घुमाव नहीं है। उपन्यास एक मर्डर पर आधारित है। उपन्यास का अंत अवश्य कुछ टविस्ट लाता नहीं तो बाकी उपन्यास में अदालत के ही दृश्य हैं।


सुरेन्द्र मोहन पाठक अपने विशेष संवाद के लिए जाने जाते हैं। इस उपन्यास में भी कुछ पठनीय संवाद हैं।

- झूठ बोलना आसान होता है, झूठ पर कायम रहना बहुत मुश्किल है।
- मुहिम जंग का हो या जिन्दगी का, जीतना है तो हौसला जरूरी है।


                     - उपन्यास के कथानक में कुछ आवश्यक बातों को नजरअंदाज किया गया है। अगर कुछ प्रश्नों में आरम्भ में ही गौर की जाती (उपन्यास के अंत में चर्चा होती है) तो शायद कहानी इतनी लंबी न होती।
जैसे पार्टी प्रचारक गोविंद सुर्वे द्वारा क्रिस्टल लाॅज के गेट पर डाली गयी प्रचार सामग्री को घर के अंदर कौन लेकर आया। उस पर फिंगरप्रिंट की जांच का कहीं ज़िक्र तक नहीं।
              उपन्यास में प्रयुक्त भाषा शैली जो की पाठक साहब की एक विशेषता है वह कहीं कहीं अति नजर आती है। क्योंकि सभी पात्र एक जैसी उर्दू मिश्रित भाषा ही बोलते हैं। कुछ शब्द तो ऐसे हैं मेरे विचार से प्रयोग में ही कम है पर इस उपन्यास के पात्र बोलते हैं।


‘‘कौन फटकता! मैं उस चाल में नया था। मेरी वहां किसी से कोई वाकफियत नहीं थी।"

'वाकफियत' जैसे दीर्घ शब्द अब प्रचलन में नहीं इसकी जगह पहचान शब्द ही चलता है।
यह उपन्यास अदालत पर आधारित है तो स्वाभाविक है इसमें अंग्रेजी शब्दावली भरपूर मात्रा में होगी। जैसे-


‘‘आई स्ट्रांगली ऑब्जेक्ट, योर ऑनर। ये सब डिफेंस की गैरजरूरी ड्रामेबाजी है। दिस इज अज्यूमिंग दि फैक्ट्स नाट इन ईवीडेंस। दिस इज इररैलेवैंट, इनकम्पीटेंट एण्ड इममैटीरियल।’’

‘‘दि ऑब्जेक्शन इज सस्टेंड।’’ — मैजिस्ट्रेट बोला — ‘‘कोर्ट को भी ऐसा ही जान पड़ रहा है कि डिफेंस अटर्नी अननैसेसरी थियेट्रिकल्स का सहारा ले रहे हैं।’’

‘‘ऑब्जेक्टिड, योर ऑनर!’’ — मुकेश पुरजोर लहजे से बोला — ‘‘दिस काल्स फार दि कनक्लूजन आफ दिस विटनेस। आई डोंट थिंक दिस विटनेस इस क्वालीफाइड टु मेक सच कनक्लूजंस। प्रासीक्यूशन को गवाह को अपनी पसन्दीदा जुबान देने की कोशिश नहीं करनी चाहिये।’’
       
                 उपन्यास में सभी पात्र संस्था 'आनन्द आनन्द आनन्द एण्ड एसोसियेट्स' का पूरा नाम लेते हैं। यह संभव नहीं की किसी संस्था का इतना लंबा नाम बार बार लें। स्वय आनंद साहब तो इसे अप‌नी संस्था कह सकते थे और बाकी पात्र भी मात्र 'आनंद एसोसियट' कह कर काम चला सकते थे।

               उपन्यास में कुल दो ही तरह के दृश्य हैं एक कोर्ट के दूसरे वकील महोदय के कोर्ट के बाहर कुछ लोगों से चर्चा/ केस के विषय में जानकारी के।
उपन्यास एक मर्डर मिस्ट्री है जो की कोर्ट / वकील के माध्यम से हल होती है।

निष्कर्ष-
             यह उपन्यास पूर्णतः कोर्ट रूम ड्रामा है। अगर पाठक कोर्ट और कानून को समझने में सक्षम है तो उपन्यास अच्छा है, अगर पाठक इन बातों में दिलचस्पी नहीं रखता तो यह उपन्यास उसके काम‌ का नहीं है।
कहा‌नी में ज्यादा ट्विस्ट नहीं है।


उपन्यास- क्रिस्टल लाॅज
लेखक- सुरेन्द्र मोहन पाठक
प्रकाशक- हार्परकाॅलिंस पब्लिकेशन

Wednesday, 30 January 2019

170. विवेकानंद की आत्मकथा

सत्य मेरा ईश्वर है, समग्र जगत् मेरा देश है।- स्वामी विवेकानंद

             12 जनवरी स्वामी विवेकानंद जी का जन्म दिवस है जिसे युवा दिवस के रूप में‌ मनाते हैं। मेरी यह इच्छा रहती है की विवेकानन्द जी साहित्य यथासंभव पढा जाये। इसी क्रम में एक रचना हाथ लगी 'विवेकानंद की आत्मकथा' शीर्षक से।
         इस रचना में विवेकानंद जी के जीवन को सहजता से समझना जा सकता है। युवा वर्ग के प्रेरणा पुरुष विवेकानंद जी ने अपने जीवन में जो परेशानियां देखी, जो संघर्ष किया और जिस सफलता के मुकाम पर वे पहुंचे वे सब तथ्य इस आत्मकथा में उपलब्ध हैं।
          विवेकानन्द जी के बचपन से लेकर उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस से होते हुये यह आत्मकथा शिकागो धर्म सम्मेलन और पुन: भारत यात्रा का लंबा वर्णन है।

              विवेकानंद जी पर लिखना तो संभव नहीं है, हाँ, उनकी आत्मकथा की कुछ बाते यहाँ सांझा की जा सकती है जिससे उनके जीवन या उनकी रचना 'विवेकानंद की आत्मकथा' को समझा जा सके।

           धर्म के विषय पर इस रचना में जो पंक्तियाँ मिलती है वे वास्तव में धर्म और धर्म के नाम पर अंधविश्वास को रेखांकित करती हैं।
"तरह जब तक तुम्हारा धर्म तुम्हें ईश्वर की उपलब्धि न कराए, तब तक वह व्यर्थ है! जो लोग धर्म के नाम पर सिर्फ ग्रंथ-पाठ करते हैं, उनकी हालत उस गधे जैसी है, जिसकी पीठ पर चीनी का बोझा लदा हुआ है, लेकिन वह उसकी मिठास की खबर नहीं रखता।’’

        "धर्म सत्य है, इसकी अनुभूति की जा सकती है। हम सब जैसे यह जगत् प्रत्यक्ष कर सकते हैं, उससे ईश्वर के अनंत गुणों को स्पष्ट रूप से प्रत्यक्ष किया जा सकता है।’’


सच ही, ईश्वर में दृढ़ विश्वास और उन्हें पाने के लिए अनुरूप आग्रह को ही ‘श्रद्धा’ कहते हैं।

जीवन की कठिन परिस्थितियों से निकल कर वे एक दिन संन्यासी मार्ग पर चल दिये। संन्यासी किसे कहते हैं? -

    "मैं जिस संप्रदाय में शामिल हूँ, उसे कहते हैं—संन्यासी संप्रदाय। संन्यासी शब्द का अर्थ है—‘जिस व्यक्ति ने सम्यक॒रूप से त्याग किया हो।’ यह अति प्राचीन संप्रदाय है। ईसा के जन्म से 560 वर्ष पहले महात्मा बुद्ध भी इसी संप्रदाय में शामिल थे। वे अपने संप्रदाय के अन्यतम संस्कारक भर थे। पृथ्वी के प्राचीनतम ग्रंथ ‘वेद’ में भी आप लोगों को संन्यासी का उल्लेख मिलेगा।

गुरु किसे कहते हैं? इस रचना में 'गुरु' शब्द की जो परिभाषा दी गयी है वह पठनीय और अनुकरणीय भी है।

      भारत में ‘गुरु’ का हम क्या अर्थ लेते हैं, हमें यह भी याद रखना होगा। शिक्षक का अर्थ सिर्फ ग्रंथकीट नहीं होता। गुरु वे ही हैं, जिन्होंने प्रत्यक्ष की उपलब्धि की हो, जिन्होंने सत्य को साक्षात् जाना हो, किसी दूसरे से सुनकर नहीं।




       "मैं एक ऐसे इंसान को जानता था, लोग जिसे पागल कहते थे, वे उत्तर देते थे, ‘‘बंधुगण, समस्त जगत् ही तो एक पागलखाना है। कोई सांसारिक प्रेम में उन्मत्त है, कोई नाम के लिए पगलाया हुआ है, कोई यश के लिए, कोई धन-दौलत के लिए और कोई स्वर्ग-लाभ के लिए पागल है। इस विराट् पागलखाने में मैं भी एक पागल हूँ। मैं भगवान् के लिए पागल हूँ। तुम अगर रुपए-पैसों के लिए पागल हो, मैं ईश्वर के लिए पागल हूँ। तुम भी पागल, मैं भी पागल! मुझे लगता है कि अंत में मेरा पागलपन ही सबसे ज्यादा खरा है।’’

       'विवेकानंद की आत्मकथा' में बहुत से रोचक प्रसंग हैं‌‌। उन्हीं में से एक प्रसंग यहाँ उपलब्ध है।

        -एक बार मैं काशी की किसी सड़क से होकर जा रहा था। उस सड़क के एक तरफ विशाल जलाशय था और दूसरी तरफ ऊँची दीवार! जमीन पर ढेरों बंदर थे। काशी के बंदर दीर्घकाय और बहुत बार अशिष्ट होते हैं। बंदरों के दिमाग में अचानक झख चढ़ी कि वे मुझे उस राह से नहीं जाने देंगे। वे सब भयंकर चीखने-चिल्लाने लगे और मेरे पास आकर मेरे पैरों को जकड़ लिया। सभी मेरे और नजदीक आने लगे। मैंने दौड़ लगा दी। लेकिन जितना-जितना मैं दौड़ता गया, उतना ही वे सब मेरे और करीब आकर मुझे काटने-बकोटने लगे। बंदरों के पंजों से बचना असंभव हो गया। ऐसे में अचानक किसी अपरिचित ने मुझे आवाज देकर कहा, ‘‘बंदरों का मु़काबला करो।’’
     मैंने पलटकर जैसे ही उन बंदरों को घूरकर देखा, वे सब पीछे हट गए और भाग खड़े हुए। समस्त जीवन हमें यह शिक्षा ग्रहण करनी होगी—जो कुछ भी भयानक है, उसका मु़काबला करना है, साहस के साथ उसे रोकना है। दुःख-कष्ट से डरकर भागने के बजाय उसका मु़काबला करना है। बंदरों की तरह वे सब भी पीछे हट जाएँगे।



         हिंदू धर्म तो यह सिखाता है कि जगत् में जितने भी प्राणी हैं, सब तुम्हारी ही आत्मा के बहुरूप मात्र हैं। 

         जब मैंने ‘अमेरिकावासी बहनो और भाइयो’ कहकर सभा को संबोधित किया तो दो मिनट तक ऐसी तालियाँ बजीं कि कान बहरे हो आए। उसके बाद मैंने बोलना शुरू किया। जब मेरा बोलना खत्म हुआ तो हृदय के आवेग के मारे अवश होकर मैं एकदम से बैठ गया।


शिकागो, सितंबर 1894
      इन दिनों मैं इस देश में सर्वत्र घूमता फिर रहा हूँ और सबकुछ देख रहा हूँ और इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि समग्र पृथ्वी में एकमात्र एक ही देश है, जहाँ लोग समझते हैं कि धर्म क्या चीज है! वह देश है—भारतवर्ष! हिंदुओं में तमाम दोष-त्रुटियाँ हों, इसके बावजूद नैतिक चरित्र और आध्यात्मिकता में अन्य जाति से भी काफी ऊर्ध्व हैं। 




         "लंदन में जब मैं व्याख्यान देता था, तब एक सुपंडित मेधावी मित्र अकसर ही मुझसे बहस किया करते थे। उनके तरकश में जितने भी तीर थे, सब-के-सब मुझ पर निक्षेप करने के बाद एक दिन अचानक तार-स्वर में बोल उठे, ‘‘तो फिर आप लोगों के ऋषि-मुनि हमें इंग्लैंड में शिक्षा देने क्यों नहीं आए?’’ जवाब में मैंने कहा, ‘‘क्योंकि उस जमाने में इंग्लैंड नामक कोई जगह थी ही नहीं, जहाँ वे आते। वे क्या अरण्य में पेड़-पौधों में प्रचार करते?’’





शीर्षक- विवेकानंद की आत्मकथा
विधा- आत्मकथा
लेखक- स्वामी विवेकानंद
प्रकाशक- प्रभात पैपरबैक्स


169. नया ज्ञानोदय- पत्रिका

'नया ज्ञानोदय' का जनवरी-2019 अंक हस्तगत हुआ। यह पत्रिका साहित्य, समाज, संस्कृति और कलाओएपर केन्द्रित एक सार्थक पत्रिका है।
किसी भी पत्रिका को पढने का सुखद पहलू ये है की आप समाज और साहित्य के विभिन्न पक्षों की जानकारी मिलती है।
इस अंक में भी साहित्य और समाज के विभिन्न रंग देखने को मिलते हैं।
इस अंक में 06 हिन्दी की कहानियाँ है और इसके अतिरिक्त एक-एक जापानी और बांग्ला भाषा की भी कहानी है।
मुझे कहानियों में ज्यादा दिलचस्पी है इस लिए इस अंक की कहानियाँ पहले पढी, जो ठीक ही है लेकिन प्रभाव पैदा करने वाली नहीं है।



इस अंक में मुझे रोचक लगा फणीश सिंह का यात्रा वृतांत 'यूरोप और एशिया के संगम की कहानी-आर्मीनीया'। आर्मीनीया एक छोटा सा देश है। जो रूस और इरान की सीमाओं से संबद्ध है। आर्मीनीया का संबंध भारत से भी रहा है। कोलकाता में सन् 1821 ई. में स्थापित एक आर्मीनियाई काॅलेज भी है।
स्वयं प्रकाश का आलेख 'मेरे थोड़े से फिल्मी दिन' भी रोचक संस्मरण है। एक आलेख 'रजिया सज्जाद जहीर' पर केन्द्रित है जिसके लेखक जाहिद खान है। रजिया जहीर की प्रसिद्ध कहानी 'नमक' जिसने पढी है वह पाठक समझ सकता है इनकी रचनाओं में संवेदना का क्या स्तर था। एक बहुत ही मार्मिक कहानी है नमक।
अशोक ओझा का एक आलेख है जो बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर है। आलेख का शीर्षक है 'सेंटिनल द्वीप के सांस्कृतिक अस्तित्व'। भारतीय आदिवसायों को किसी तरह ईसाई धर्मप्रचारक अपने बहकावे में ले रहे हैं, इस विषय को इंगित करता यह आलेख सार्थक है।


नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला-2019 के दौरान यह पत्रिका ज्ञानपीठ प्रकाशन की स्टाॅल से ली थी।
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पत्रिका- नया ज्ञानोदय
अंक- जनवरी-2019
प्रकाशक- भारती ज्ञानपीठ

179. जिप्सी- कंवल शर्मा

एक घुमक्कड़ व्यास की खतरनाक यात्रा जिप्सी-           'जिप्सी' कंवल शर्मा का पांचवां मौलिक उपन्यास है। कंवल शर्मा ने अपने प्रथम उपन्य...