वह कब्र में जिंदा हो उठा
विषैला कत्ल- आरिफ मारहर्वी - दिसम्बर- 1972
इन दिनों आरिफ मारहर्वी साहब के जो जासूसी उपन्यास पढे हैं उनमें से मुझे यह सबसे ज्यादा रोचक लगा है। आरिफ साहब के उपन्यास लगभग 120-30 पृष्ठ के होते थे, और कहानी जासूसी थी।
विषैला कत्ल भी एक जासूसी उपन्यास है जो जासूस कैसर पर आधारित है। कहानी तब रोचक हो उठती है जब एक शख्स एक महीने बाद कब्र में जीवित हो उठता है, और उसके बाद जो हंगामा होता....
अंधेरी रात की निस्तब्धता में कुत्ते के रुदन की आवाज दूर-दूर तक लहराती चली गई थी और वे दोनों इस प्रकार उछल पड़े जैसे कोई प्रेतात्मा उनके आस-पास ही मंडरा रही हो। उन दोनों के शरीर थर-थर काँपने लगे थे तथा कड़ाके की सर्दी होन्हें पर भी दोनों के माथों पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं।कब्रिस्तान में गहन नीरवता फिर व्याप्त हो गई थी। दूर तक बनी हुई छोटी-बड़ी सफेद-सफेद एवं मटियाली कब्र उन्हें ऐसी दिखाई दे रही थीं जैसे कब्रों में सोने वाले मुर्दे स्वयं निकलकर कब्रों के ऊपर लेट गए हों। किसी ओर पत्ता भी खड़कता तो वे दोनों भयभीत होकर उछल पड़ते ।
उनमें से एक लम्बे कद का दुबला-पतला आदमी था । उसने सस्ते से खाकी कपड़े की पेंट और मोटे गर्म कपड़े की जैकट पहिन रखी थी और दूसरा छोटे कद का तनिक मोटा था। उसके शरीर पर काले रंग की पेंट और कसा हुआा गर्म कोट था। दोनों वे अपने चेहरों पर स्कार्फ इस प्रकार बाँध रखे थे जैसे ढाटे बाँधे हों, और वे दोनों कब्रिस्तान की भीतरी दीवार से लगे एक ऐसे कोने में बैठे थे जहाँ गहन अन्धकार का राज्य था ।( विषैला कत्ल- आरिफ मारहर्वी, प्रथम पृष्ठ)
अगसर और सफदर दो बदमाश थे। छोटी-मोटी चोरी से अपना जीवन यापन करते थे लेकिन एक बार उन्हें एक अनोखा काम मिला और वह काम था-
'एक विशेष कब्र में से एक विशेष समय पर एक विशेष मुर्दे की खोपड़ी निकालकर बेगम सरफराज के पास पहुंचा देना ।'