Thursday, 27 November 2025

687. विषैला कत्ल- आरिफ मारहर्वी -

वह कब्र में जिंदा हो उठा
विषैला कत्ल- आरिफ मारहर्वी - दिसम्बर- 1972

इन दिनों आरिफ मारहर्वी साहब के जो जासूसी उपन्यास पढे हैं उनमें से मुझे यह सबसे ज्यादा रोचक लगा है।  आरिफ साहब के उपन्यास लगभग 120-30 पृष्ठ के होते थे, और कहानी जासूसी थी। 
   विषैला कत्ल भी एक जासूसी उपन्यास है जो जासूस कैसर पर आधारित है। कहानी तब रोचक हो उठती है जब एक शख्स एक महीने बाद कब्र में जीवित हो उठता है, और उसके बाद जो हंगामा होता....

  
अंधेरी रात की निस्तब्धता में कुत्ते के रुदन की आवाज दूर-दूर तक लहराती चली गई थी और वे दोनों इस प्रकार उछल पड़े जैसे कोई प्रेतात्मा उनके आस-पास ही मंडरा रही हो। उन दोनों के शरीर थर-थर काँपने लगे थे तथा कड़ाके की सर्दी होन्हें पर भी दोनों के माथों पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं।
कब्रिस्तान में गहन नीरवता फिर व्याप्त हो गई थी। दूर तक बनी हुई छोटी-बड़ी सफेद-सफेद एवं मटियाली कब्र उन्हें ऐसी दिखाई दे रही थीं जैसे कब्रों में सोने वाले मुर्दे स्वयं निकलकर कब्रों के ऊपर लेट गए हों। किसी ओर पत्ता भी खड़कता तो वे दोनों भयभीत होकर उछल पड़ते ।
उनमें से एक लम्बे कद का दुबला-पतला आदमी था । उसने सस्ते से खाकी कपड़े की पेंट और मोटे गर्म कपड़े की जैकट पहिन रखी थी और दूसरा छोटे कद का तनिक मोटा था। उसके शरीर पर काले रंग की पेंट और कसा हुआा गर्म कोट था। दोनों वे अपने चेहरों पर स्कार्फ इस प्रकार बाँध रखे थे जैसे ढाटे बाँधे हों, और वे दोनों कब्रिस्तान की भीतरी दीवार से लगे एक ऐसे कोने में बैठे थे जहाँ गहन अन्धकार का राज्य था ।( विषैला कत्ल- आरिफ मारहर्वी, प्रथम पृष्ठ)
         अगसर और सफदर दो बदमाश थे। छोटी-मोटी चोरी से अपना जीवन यापन करते थे लेकिन एक बार उन्हें एक अनोखा काम मिला और वह काम था-
'एक विशेष कब्र में से एक विशेष समय पर एक विशेष मुर्दे की खोपड़ी निकालकर बेगम सरफराज के पास पहुंचा देना ।'
   तो जनाब असगर और सफदर दोनों पहुंच गये कब्रिस्तान । और अब कब्रिस्तान वाले 'गोरकून रशीद' की तरफ, जो जा पहुंचा पुलिस थाने ।
'साहब मैं गोरकुन हूँ संतरी साहब ।'
'गोरकुन.. यह क्या बला होती है?
'गोर यानि कब्र खोदने वाले को कहते हैं।'

   और गोरकून रशीद ने पुलिस को जो बताया वह पूर्णतः अविश्वसनीय था, उस पर किसी भी स्थिति में यकीन नहीं किया जा सकता था ।
जो रशीद ने पुलिस को बताया वह आप भी सु‌न लीजिए- 
'हाँ साहब, मैं तो गोरकुन हूंँ, कब्रिस्तान का हूँ। कोई नया-नया मुर्दा आया है, वह शायद घबराकर कब्र से निकल भागने की कोशिश कर रहा है।'
   अब पुलिस वाले भी हैरान है, क्या ऐसा हो सकता है। और तो और जब पुलिस कब्रिस्तान पहुंची तो रशीद की पत्नी रजिया ने भी ऐसा ही हैरत जनक घटनाक्रम पुलिस को बताया ।
रजिया ने चौंककर रशीद की ओर देखा, फिर दारोगा से बोली- 'यह ठीक कह रहा था हजुर !'
'क्या तुमने अपने कानों से सुनी थी वह आवाज ?'
'हाँ सरकार, मैंने बहुत अच्छी तरह सुनी थी ।'
'कैसी आवाज ?'
'ऐसी ही थी जैसे कोई कराह-कराहकर कह रहा हो। बाहर निकालो । खुदा के लिए मुझे बाहर निकालो ।'
  हां तो पाठक मित्रो, क्या यह संभव है कोई कब्र का मुर्दा स्वयं को बाहर निकालने की आवाज लगाये । पुलिस स्वयं हैरान है की ऐसा कैसे हो सकता है और फिर यह घटना तो कुछ दिन पुरानी भी है जो आप फिर दोहरायी गयी थी, आज भी मुर्दे की आवाज सुनाई दी गयी थी ‌। कोई कुछ भी कहे, मुर्दे पर विश्वास करे या न करे पर 'गोरकून रशीद' ऐसी अतिकाल्पनिक बातों पर यकीन करने वाला आदमी नहीं था। उसने तो पुलिस वालों को भी स्पष्ट कह दिया था- "और क्या साहब ! अब आप खुद ही सोचिए कोई मुर्दा आज तक बोलते सुना गया है ? फिर कब्र में लेटने के बाद किसका जी चाहेगा बाहर आने को ? साला बिस्तर पर लेटने के बाद तो हाथ हिलाने तक को जी नहीं चाहता, वह कहती है कि मुर्दा कब्र से बाहर आना चाहता है।' (पृष्ठ-24)
    अब हम चलते हैं उपन्यास के महत्वपूर्ण पात्र कैसर हयात की तरफ । कैसर हयात के मित्र का नाम है इफ्तखार जो की मरहूम नवाब सरफराज साहब का इकलौता पुत्र था । इफ्तखार की मृत्यु को एक महीना हो गया था । और उसी इफ्तखार से मिलने जब जासूस कैसर हयात उससे मिलने आया तो उसकी मुलाकात SP से हुयी ।
कैसर ने जेब से बटवा निकाला । उसमें से एक परिचय कार्ड निकालकर एस० पी० की ओर बढ़ा दिया । एस० पी० ने कार्ड लेकर ऊँचे स्वर में पढ़ा-
'कैसर हयात....सब-इन्स्पेक्टर आफ सेन्ट्रल इन्टेलीजेंस ब्यूरो ।'
(पृष्ठ-10)
यहां कैसर को एक नये तमाशे का पता चला और वह तमाशा था एक माह पूर्व मर गये इफ्तखार साहब की कब्र में से रहस्यमयी आवाज का आना- मुझे कब्र से बाहर निकालो ।  
    प्रस्तुत उपन्यास एक मर्डर मिस्ट्री रचना है। नबाव सरफराज साहब ने वृद्ध अवस्था में एक जवान लड़की से शादी की थी और उस समय उनका पुत्र इफ्तखार बाहर कहीं पढता था । नबाव सरफराज की मृत्यु के बाद जब इफ्तखार ने शासन व्यवस्था संभाली तो उसे हालात बहुत बदले हुये मिले थे और एक दिन संदिग्ध अवस्था में इफ्तखार साहब भी मृत पाये गये। और कहानी आरम्भ होती है इफ्तखार साहब की मृत्यु के एक महीने बाद जब दो बदमाश उनकी कब्र खोदने पहुंचते हैं। उन्हें भी वहां से रहस्यमयी आवाजें सुनाई देती हैं। ऐसे समय में जासूस कैसर हयात भी वहां पहुंच जाता और वह इस रहस्यमयी घटनाक्रम को सुलझाता है।
   उपन्यास की कहानी बहुत रोचक और हास्यजनक है। एक रहस्यमयी आवाज से आरम्भ होकर यह कहानी मर्डर को अपने में समेटे हुये और एक स्त्री के दर्द को व्यक्त करती है । मनुष्य जब धन दौलत के नशे में कभी कभी ऐसे कदम भी उठा लेता है जिसका परिणाम बाद में अन्य लोगों को भुगतना पड़ता है। उपन्यास की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। हां आप अनुमान न लगाये क्योंकि कहानी इतनी भी सीधी नहीं जैसा आप सोच रहे हैं।
    
भाषाशैली- उपन्यास में उर्दू शब्दावली का प्रयोग बहुत ज्यादा है जो अखरता है। 
कुछ शब्द देखें- शजर-ए-नसब, नियाज-नज्र(दान दक्षिणा), मीलाद-शरीफ, मुफस्सल (विस्तारपूर्वक), मश्कूक, तजहीज, तकफीन, खलिश, 
उदाहरण देखें- फिर मैंने सोचा कि यह आवाज मेरे ही परागदाँ और मुन्तशर जहन व दिमाग की इख्तरा होगी । लिहाजा मैंने फिर करवट बदल कर सोने की कोशिश की और जब नीमगनूदगी के आलम में पहुँची तो फिर वही आवाज मेरे कानों में गूंजी ।
संवाद- उपन्यास में कुछ संवाद हैं जो उपन्यास के पात्रों के स्वभाव को व्यक्त करते हैं और अच्छी सुक्ति भी साबित होते हैं।
- पाप और पुण्य, यह सब ढकोसले हैं। खुदा ने जिन्दगी जीने के लिए दी है और जीने के लिए पेट भरना जरूरी है और पेट भरने के लिए आदमी क्या नहीं करता ? अपने आप तक को बेच डालता है ।
- औरत खतरनाक होती नहीं बल्कि पुरुष उसे खतरनाक बनने पर बाध्य कर देता है ।'
हास्य- हिंदी जासूसी उपन्यासों में हास्य की बहुत कमी महसूस होती है लेकिन प्रस्तुत उपन्यास में लेखक महोदय ने हास्य का अच्छा इस्तेमाल किया है । रशीद की भूमिका इस विषय में अच्छी है। आरिफ मारहर्वी साहब के उपन्यास 'आग का खेल' में एक उपन्यासकार पात्र भी ऐसा हास्यजनक पात्र था ।
यहां कुछ उदाहरण देखें- 
मैंने ध्यान से सुना तो पता चला कि वह आवाज एक कब्र से आ रही थी । मेरे तो हाथों के तोते ही उड़ गए ।'
'झूठ बोलती है साहब ।' रशीद बोला- 'इस साली के पास तोते थे ही नहीं ।'

एक और उदाहरण देखें- 
'कैसा भूत, अबे साली तूने आज तक अपनी आँखों से कोई भूत देखा है ?'
'मगर वह वह...।
'वह भूत नहीं ताजा मुर्दा है किसी का ।'
'मुर्दा मगर वह तो कब्र से इत्ता बाहर है ।'
'ताजा-ताजा मुर्दा है । घबरा गया होगा कब्र के अन्धेरे से । साला
निकल भागने की फिक्र में है. जाने दे अपना क्या जाता है ?'
नकारात्मक पक्ष- 
- उपन्यास में उर्दू शब्दावली का ज्यादा होना।
- एक माह बाद इफ्तखार की कब्र में से आवाज आना, यह तार्किक नहीं लगता ।
- रजिया की कानों में आवाज का गूंजना। वहीं एक पात्र कहता है यह आवाज मैंने उसके कानों में पैदा की थी। यह तर्क बहुत अजीब सा लगता है‌।
बाकी रजिया की बात पढ लीजिए- 
लिहाजा मैंने फिर करवट बदल कर सोने की कोशिश की और जब नीम गनूदगी के आलम में पहुँची तो फिर वही आवाज मेरे कानों में गूंजी ।
- 125 पृष्ठ के उपन्यास में अगर अंतिम 25 पृष्ठ छोड़ दे तो शेष को हम तीन भागों में बांट सकते हैं।
- आरम्भ में असगर- सफदर संवाद।
- पुलिस- रशीद- रजिया संवाद 
- फकीर- रजिया संवाद (पृष्ठ-51-74 तक)
   लेखक महोदय ने अनावश्यक लम्बे वार्तालाप से कहानी को विस्तार दिया जो काफी अखरता है इसकी जगह अगर जासूस कैसर या पुकिस की कार्यवाही दर्शायी जाती तो  उचित लगता । 
  माननीय जनाब आरिफ‌ मारहर्वी साहब जो उत्तर प्रदेश के अलीगढ के निवासी थे । उनका उपन्यास 'विषैला कत्ल' जासूस कैसर हयात पर आधारित एक मर्डर मिस्ट्री (?) उपन्यास है।  कहानी कब्र में आने वाली रहस्यमयी आवाजों से आरम्भ होती है और फिर रोमांच के साथ आगे बढती है। कहानी की पृष्ठभूमि का लेखक ने अच्छा चयन किया है जो प्रभावित करती है। उपन्यास में जो संपूर्ण घटनाक्रम है वह वर्तमान उपन्यास साहित्य की दृष्टि से एक छोटा सा ट्विस्ट है। क्योंकि पहले उपन्यास पत्रिका रूप में प्रकाशित होते थे इसलिए कम पृष्ठों में कहानी को समेटना पड़ता था आजकल पृष्ठ कथा अनुसार होते है तो इसलिए ऐसी छोटी कहानियाँ वृहत उपन्यासों का एक घटनाक्रम सा प्रतीत होता है।
   उपन्यास में लेखक महोदय ने जहां लम्बे संवादों के कारण ठहराव और नीसरता बढायी है वहीं हास्य के कारण पठनीय भी है।
   मेरे विचार से पाठकों को यह उपन्यास पढना चाहिए।

उपन्यास- विषैला कत्ल
लेखक-   आरिफ मारहर्वी
सन्-       दिसम्बर 1972
पृष्ठ-        125
पत्रिका-  जासूसी पंजा सीरीज
प्रकाशक- पंजाबी पुस्तक भण्डार- दिल्ली

आरिफ मारहर्वी साहब के अन्य उपन्यासों की समीक्षा
आग का खेलबंद कमरे में खूनभयानक भिखारी ।। किताब के खूनी भेड़िये की तस्वीर ।। मौत के साये में ।।

3 comments:

  1. Kitaab se acha toh aapka review hota hai har baar padhkar maja aata hai

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  2. आप द्वारा नियमित रूप से हमारी समीक्षाएं पढने के लिए धन्यवाद ।। आपका साथ बना रहे।।

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  3. धन्यवाद सर।

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