कबाड़ी, मदारी,तातारी का एक और कारनामा
भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज
लोकप्रिय कथाकार श्री वेदप्रकाश काम्बोज जी ने जासूसी साहित्य में जासूसी उपन्यासों में हास्य जासूसी उपन्यासों का भी सृजन किया है। हम इस से पूर्व 'मौत की आवाज' नामक उपन्यास की चर्चा कर चुके हैं और अब प्रस्तुत है इन्हीं की कलम से निकला एक और हास्य जासूसी उपन्यास 'भेदभरी हत्या' ।
यह उपन्यास वेदप्रकाश काम्बोज जी के तीन पात्र कुंदन कबाड़ी, गोकुल मदारी और फन्ने खां तातारी सीरीज का एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है। भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज
विज्ञापनबाजी करने के बावजूद जब के० एफ० जी० प्राइवेट डिटेक्टिव कम्पनी के अन्दर कोई भी केस नहीं आया तो उस कम्पनी के तीनों मालिकनुमा चपरासियों को कारण पर विचार करने के लिए विवश होना पड़ा।
बनाई जैसी कि अन्तिम दृश्य में सोचने के समय कुन्दन कबाड़ी ने ऐसी ही मुद्रा देवदास की भूमिका में दिलीप कुमार ने फिल्म के पारो के घर के सामने बनाई थी। इसके पश्चात मस्तिष्क की खुली सड़क पर विचारों का ताँगा कारण की तलाश में बिना कोचवान के खुला छोड़ दिया गया ।