‘अछूत’ : दलित जीवन की पीड़ा, संघर्ष और आत्मसम्मान का दस्तावेज़
अछूत - दया पवार, दलित आत्मकथा
मराठी दलित साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर दया पवार की आत्मकथात्मक कृति ‘अछूत’ भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, गरीबी, अपमान और संघर्ष की ऐसी मार्मिक कथा है, जो केवल एक व्यक्ति की जीवन-गाथा नहीं रह जाती, बल्कि पूरे दलित समाज के सामूहिक अनुभव का दस्तावेज़ बन जाती है। यह रचना पाठक को भावुक ही नहीं करती, बल्कि उसे सामाजिक यथार्थ से सीधा सामना करने के लिए विवश भी करती है।
ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की आत्मकथा 'जूठन' बहुत समय पहले पढी थी और उसके बाद दलित साहित्य में दया पवार जी की आत्मकथा 'अछूत' पढने का अकसर मिला है। 
अछूत - दया पवार- दलित आत्मकथा
जब कभी भी वह अकेला होता है, उससे अक्सर मेरी मुलाक़ात हो जाती है। जब से मैंने होश सँभाला है, तब से मैं उसे अच्छी तरह पहचानता हूँ। जितना अपनी परछाईं से परिचय हो, उतना परिचित है वह। पर कभी-कभी अँधेरा छा जाने पर या बदली छा जाने पर जैसे स्वयं की परछाई लुप्त हो जाती है, वैसे ही वह भी लुप्त हो जाता है। पिछले कई वर्षों से उसे भीड़ से बड़ा लगाव रहा है। हमेशा किसी के साथ या सभा-सम्मेलनों में दिखाई देता है।(प्रथम पृष्ठ से चंद पंक्तियां)