Wednesday, 10 June 2026

अछूत - दया पवार

‘अछूत’ : दलित जीवन की पीड़ा, संघर्ष और आत्मसम्मान का दस्तावेज़
अछूत - दया पवार, दलित आत्मकथा

मराठी दलित साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर दया पवार की आत्मकथात्मक कृति ‘अछूत’ भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, गरीबी, अपमान और संघर्ष की ऐसी मार्मिक कथा है, जो केवल एक व्यक्ति की जीवन-गाथा नहीं रह जाती, बल्कि पूरे दलित समाज के सामूहिक अनुभव का दस्तावेज़ बन जाती है। यह रचना पाठक को भावुक ही नहीं करती, बल्कि उसे सामाजिक यथार्थ से सीधा सामना करने के लिए विवश भी करती है।

अछूत - दया पवार- दलित आत्मकथा

   ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की आत्मकथा 'जूठन' बहुत समय पहले पढी थी और उसके बाद दलित साहित्य में दया पवार जी की आत्मकथा 'अछूत' पढने का अकसर मिला है।
        जब कभी भी वह अकेला होता है, उससे अक्सर मेरी मुलाक़ात हो जाती है। जब से मैंने होश सँभाला है, तब से मैं उसे अच्छी तरह पहचानता हूँ। जितना अपनी परछाईं से परिचय हो, उतना परिचित है वह। पर कभी-कभी अँधेरा छा जाने पर या बदली छा जाने पर जैसे स्वयं की परछाई लुप्त हो जाती है, वैसे ही वह भी लुप्त हो जाता है। पिछले कई वर्षों से उसे भीड़ से बड़ा लगाव रहा है। हमेशा किसी के साथ या सभा-सम्मेलनों में दिखाई देता है।(प्रथम पृष्ठ से चंद पंक्तियां)
  


            उपन्यास का नायक अपने बचपन, परिवार, परिवेश और सामाजिक अनुभवों के माध्यम से उस दुनिया का चित्र प्रस्तुत करता है, जहाँ मनुष्य का मूल्य उसके गुणों से नहीं, बल्कि उसकी जाति से आँका जाता है। लेखक ने अपने जीवन के कटु अनुभवों को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत किया है। यही ईमानदारी इस कृति की सबसे बड़ी शक्ति है।

रचना के प्रारम्भ में ही लेखक एक ऐसे व्यक्ति से परिचय कराते हैं जो बाहरी दृष्टि से सफल दिखाई देता है—सरकारी नौकरी, परिवार और सामाजिक प्रतिष्ठा सब कुछ है—किन्तु भीतर गहरे तक असंतोष और पीड़ा से भरा हुआ है। यह पीड़ा केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उस सामाजिक इतिहास की देन है जिसे वह भूलना चाहता है, फिर भी भूल नहीं पाता। यह प्रसंग पाठक को बताता है कि आर्थिक उन्नति होने के बाद भी जातिगत स्मृतियाँ और अपमान मनुष्य का पीछा नहीं छोड़ते।

          उपन्यास का एक अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण नायक के नाम से जुड़ा है। उसका नाम ‘दगडू’ रखा जाता है। वह स्वयं इस नाम से घृणा करता है, क्योंकि यह उस सामाजिक मानसिकता का प्रतीक है जिसमें दलितों को सम्मानजनक पहचान तक नहीं दी जाती। लेखक यहाँ केवल एक नाम की चर्चा नहीं करते, बल्कि उस व्यवस्था पर प्रश्न उठाते हैं जो मनुष्य की गरिमा को जन्म के साथ ही सीमित कर देती है।

           कृति का एक और सशक्त पक्ष है—दलित बस्तियों का यथार्थ चित्रण। लेखक कावाखाना और झुग्गी-बस्तियों के जीवन का वर्णन करते हुए बताते हैं कि वहाँ की स्त्रियाँ किस प्रकार कूड़ा बीनकर, छोटे-मोटे काम करके परिवार चलाती थीं। दूसरी ओर पुरुषों में शराबखोरी और बेरोज़गारी जैसी समस्याएँ थीं। यह चित्रण किसी समाजशास्त्रीय रिपोर्ट की तरह नहीं, बल्कि भीतर से देखे गए जीवन की तरह सामने आता है। पाठक महसूस करता है कि गरीबी केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय का परिणाम भी है।

        "पानी लेने के लिए आते-जाते महार स्त्रियों की छाया हनुमान पर पड़ती। भगवान अपवित्र हो जाता है, इसलिए गाँववालों ने एक बार रास्ता बन्द कर दिया। कुएँ पर यदि दूसरे रास्ते से जाना हो तो तालाब के किनारे-किनारे कीचड़ से लथपथ होकर जाना पड़ता, एक मील तक ।" (रचना अंश)

भारतीय समाज में ईश्वर और पानी एक बड़ी समस्या रहा है। दलित/ अछूत समाज को तो तथाकथित उच्चवर्ण अपने कुएं से पानी तक नहीं पीने देता था और ऐसा ही हाल ईश्वर का है । यहां तो ईश्वर छाया मात्र से ही अपवित्र हो जाते हैं। शायद ऐसे लोगों को देखकर ही प्रेमचंद ने 'ठाकुर का कुआं' कहानी लिखी होगी ।

   'अछूत' में समस्या मात्र ईश्वर की नहीं, पानी की भी है। जहां महार जाति को कुएं से पानी नहीं लेने दिया जाता लेकिन काॅर्ट का निर्णय महार जाति को पानी पर हक देता है वहां लेखक‌ महोदय ने बहुत अच्छा लिखा है। दोनों जातियों की घिर्नी अलग-अलग थी पर कुएं में जाकर पानी के बर्तन आपस में मिल जाते थे‌।

    लेखक के पिता का चरित्र भी उल्लेखनीय है। वे प्रतिभाशाली होने के बावजूद परिस्थितियों और शराब की लत के कारण अपने जीवन को सँवार नहीं पाते। इससे यह स्पष्ट होता है कि सामाजिक शोषण केवल आर्थिक अवसरों को ही नहीं छीनता, बल्कि मनुष्य की रचनात्मकता और आत्मविश्वास को भी नष्ट कर देता है। मांँ और दादी का सामिप्य एक नयी हिम्मत देता है वहीं चाचा-चाची का व्यवहार लेखक को अलग-अलग परिस्थितियों का अहसास करवाता है। चाचा के लिए जहां अपनत्व था वहीं चाची का व्यवहार हमेशा लड़ाई झगड़े वाला ही रहा।

          ‘अछूत’ की भाषा सरल, आत्मीय और प्रभावशाली है। इसमें साहित्यिक अलंकरणों की अपेक्षा अनुभवों की सच्चाई अधिक महत्वपूर्ण है। लेखक जहाँ आवश्यक होता है, वहाँ व्यंग्य का प्रयोग करते हैं और जहाँ पीड़ा व्यक्त करनी होती है, वहाँ भाषा स्वतः करुण हो उठती है। यही कारण है कि पाठक को यह रचना किसी उपन्यास से अधिक आत्मस्वीकृति और सामाजिक दस्तावेज़ जैसी लगती है।

         यह कृति केवल दलित जीवन का चित्रण भर नहीं करती, बल्कि भारतीय समाज की उन विसंगतियों को भी उजागर करती है जो आधुनिकता और लोकतंत्र के दावों के बावजूद आज भी मौजूद हैं। लेखक बार-बार यह संकेत देते हैं कि जाति केवल गाँवों की समस्या नहीं, बल्कि शहरों और शिक्षित वर्गों में भी अलग-अलग रूपों में जीवित है।
    लेखन‌ महोदय स्वयं को अत्यंत कमजोर दर्शाया है।‌हर आदमी की‌ परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं पर अपनी पत्नी 'सई' के विषय में लेखक महोदय की कमजोर पूर्णतः गलत थी। मनुष्य जीवन में अच्छा बुरा समय आता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं की हम अपने परिवार का त्याग कर दें ।‌ अगर यहाँ जितनी गलती 'सई' की है उतनी ही दया पवार की भी है।
         हालाँकि कुछ स्थानों पर आत्मकथात्मक विवरण इतने विस्तार से आते हैं कि कथा की गति धीमी पड़ती प्रतीत होती है, फिर भी यह कमजोरी नहीं कही जा सकती, क्योंकि यही विवरण उस जीवन-यात्रा की प्रामाणिकता को मजबूत बनाते हैं।
सुक्तियां:-
आत्मकथा की कुछ पंक्तियां जो मुझे विशेष लगी-

- आक्रोश और विद्रोह की कविताएँ लिखना आसान है। स्वयं पर बीतने पर असली दुख मालूम होता है।(पृष्ठ-81)
- आदमी के साथ जाति कैसे गोचड़ी' (जोंक)की तरह चिपकी होती है! आप कितना भी भटक्रिए, पूरा खून चुस जाने तक वह सरक ही नहीं सकती।

          अंततः, ‘अछूत’ केवल पढ़ी जाने वाली पुस्तक नहीं, बल्कि महसूस की जाने वाली कृति है। यह पाठक को संवेदनशील बनाती है, उसे सामाजिक न्याय के प्रश्नों पर सोचने के लिए प्रेरित करती है और यह समझाती है कि समानता का सपना केवल कानून बनाने से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के परिवर्तन से पूरा होगा।
इस आत्मकथा के विषय में एक बात निर्विवाद कही जा सकती है और वह है लेखक महोदय का सत्य लेखन । कोई व्यक्ति इतनी हिम्मत से सत्य लिख सकता है, दूसरे के विषय में चाहे कोई कैसा भी लिख दे लेकिन स्वयं के विषय में इतना बेबाक लिखना दता पवार जी का हिम्मत का काम है।

    यह आत्मकथा मूलतः मराठी में 'बलुंत' शीर्षक से सन् 1980 में प्रकाशित हुयी थी। मेरे द्वारा उसका हिंदी अनुवाद पढा गया है।

निष्कर्षतः, दया पवार की ‘अछूत’ दलित साहित्य की एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कृति है। इसमें वर्णित पीड़ा, संघर्ष, अपमान और आत्मसम्मान की यात्रा पाठक के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। सामाजिक यथार्थ को समझने वाले प्रत्येक गंभीर पाठक के लिए यह पुस्तक अनिवार्य रूप से पठनीय है।

पुस्तक-  अछूत (आत्मकथा)
लेखक-  दया पवार
अनुवाद- दामोदर खडसे
प्रथम संस्करण- 1980
पृष्ठ-      196
मूल्य-    195₹
प्रकाशक- राधाकृष्ण पेपरबैक्स


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