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Saturday, 23 May 2026

725. रेत का संगीत- वेदप्रकाश काम्बोज

अंतरराष्ट्रीय अपराधी की डकैती कथा
रेत का संगीत- वेदप्रकाश काम्बोज

वेदप्रकाश काम्बोज जी का एक रोचक उपन्यास 'रेत का संगीत' पढने को मिला है। यह जासूस विजय शृंखला का उपन्यास है। यह एक अंतरराष्ट्रीय अपराधी की डकैती की रोमांच कहानी है। एक ऐसा अपराधी जिसे अमेरिका जैसे देश भी पकड़ने में असफल रहे और जब उस अपराधी की विजय से भिड़ंत हुयी तब जन्मी एक रोमांचक कहानी रेत का संगीत ।

रेत का संगीत - वेदप्रकाश काम्बोज

        भारिया सोनापुर के सबसे खूबसूरत होटल नियाग्रा के कम्पाउन्ड में टैक्सी से उतरी और उसने मीटर देखकर ड्राइवर को पैसे दिये कुछ पैसे अधिक ही दिये गये थे। इसलिये ड्राइवर ने उसे सलाम किया किन्तु उसके सलाम का कोई उत्तर न देकर वह होटल के दरवाजे की ओर बढ़ गई ।

Saturday, 16 May 2026

724. खून‌ की कसम- वेदप्रकाश काम्बोज

चीनी षड्यंत्र और भारतीय जासूस 
खून की कसम - वेदप्रकाश काम्बोज

वेदप्रकाश काम्बोज उपन्यास साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं और उनका एक प्रसिद्ध पात्र है विजय । जासूस सम्राट विजय । विजय को आधार बनाकर काम्बोज जी ने विभिन्न प्रकार के उपन्यास लिखे हैं जिनमें मुख्य हैं अंतर्राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर आधारित उपन्यास । ऐसा ही कहानी है प्रस्तुत उपन्यास की जहां एक पात्र ने विजय को खून की कसम दी थी, क्या थी वह खून‌ की कसम।
  अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र पर आधारित एक रोचक उपन्यास है -खून की कसम
           भारतीय सीक्रेट सर्विस में एक बहुत बड़ा हेर फेर हो गया ।
चीनी खतरे को देखते हुए प्रतिरक्षा मंत्रालय से विजय के पास आदेश आए कि सीक्रेट सर्विस का कुछ विस्तार किया जाए ताकि चीनी कार्यवाहियों को और देश के दुश्मनों की कार्यवाहियों को समय पर रोक कर देश की रक्षा की जाए ।

Saturday, 9 May 2026

723. गुप्त हत्यारा- वेदप्रकाश काम्बोज

एक हत्यारे की तलाश में मित्र
गुप्त हत्यारा- वेदप्रकाश काम्बोज

आदरणीय वेदप्रकाश काम्बोज जी ने बहुत लिखा है और उनकर लेखन में विविधता भी रही है। जहां उन्होंने दीर्घ उपन्यासों से पाठकों का मनोरंजन किया है वहीं अपने लेखक के आरम्भिक दौर में लघु उपन्यासों का भी सृजन किया है। 
उनका प्रस्तुत उपन्यास मात्र एक कहानी नहीं है, यह मात्र यह जानने का प्रयास नहीं है कि 'गुप्त हत्यारा' कौन है । यह मित्रों के विश्वास की कहानी है, उनके ठहाकों का समंदर है, उनके अपनत्व का आसमान है।  
गुप्त हत्यारा- वेदप्रकाश काम्बोज

'ओ गुरुमुख ?'
'हो चन्दर !' इसी स्वर में उत्तर मिला ।
'ओ, यह पत्र क्या कहता होए ?'
'क्या कहता है ?'
'यह कहता है कि इसे मुझे नहीं पढ़ना चाहिए !'
'क्यों ?'
'उस हरामजादे ने पत्र केवल तुझे ही लिखा है !'
'देखू !'
चन्द्रप्रकाश ने, जिसे कि चन्दर कहकर पुकारा जाता था, पत्र, सरदार गुरुमुखसिंह की ओर बढ़ा दिया। गुरुमुख ने अपनी एक ओर की मूंछ को बल देते हुए लिफाफे का पता देखा, ऊपर केवल उसका नाम लिखा हुआ था ।

Sunday, 3 May 2026

722. भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज

कबाड़ी, मदारी,तातारी का एक और कारनामा
भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज

लोकप्रिय कथाकार श्री वेदप्रकाश काम्बोज जी ने जासूसी साहित्य में जासूसी उपन्यासों में हास्य जासूसी उपन्यासों का भी सृजन किया है। हम इस से पूर्व 'मौत की आवाज' नामक उपन्यास की चर्चा कर चुके हैं और अब प्रस्तुत है इन्हीं की कलम से निकला एक और हास्य जासूसी उपन्यास 'भेदभरी हत्या' ।
यह उपन्यास वेदप्रकाश काम्बोज जी के तीन पात्र कुंदन कबाड़ी, गोकुल मदारी और फन्ने खां तातारी सीरीज का एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है। 

भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज

विज्ञापनबाजी करने के बावजूद जब के० एफ० जी० प्राइवेट डिटेक्टिव कम्पनी के अन्दर कोई भी केस नहीं आया तो उस कम्पनी के तीनों मालिकनुमा चपरासियों को कारण पर विचार करने के लिए विवश होना पड़ा।
बनाई जैसी कि अन्तिम दृश्य में सोचने के समय कुन्दन कबाड़ी ने ऐसी ही मुद्रा देवदास की भूमिका में दिलीप कुमार ने फिल्म के पारो के घर के सामने बनाई थी। इसके पश्चात मस्तिष्क की खुली सड़क पर विचारों का ताँगा कारण की तलाश में बिना कोचवान के खुला छोड़ दिया गया ।

721. मौत की आवाज- वेदप्रकाश काम्बोज

कबाड़ी, तातारी और मदारी का प्रथम उपन्यास
मौत की आवाज- वेदप्रकाश काम्बोज

विजय ने दरवाजा खोला ।
और गुरुदेव का उच्च नाद करते हुए तीन नमूनों ने उसके पैर पकड़ लिए। चकित सा विजय पहले तो उन तीनों के काले सिरों को देखता रहा जो उसके पैरों के निकट इस तरह एकत्रित हो गए थे जैसे तीन विभिन्न रेखाएं एक बिन्दु पर आकर मिल गई हों।
विजय ने आशीर्वाद की मुद्रा में अपने हाथ फैलाये और फिर गुरू ने गम्भीर मुद्रा में कहा- 'सदा खाओ गुड़ के सेव ।'

'धन्य हैं गुरुदेव आप धन्य हैं।' उन तीनों ने उसके पैर पकड़े हुए समवेत स्वर में कहा। किसी ने भी सिर उठाकर देखने की चेष्टा नहीं की।  

Friday, 9 January 2026

702. विज्ञान के व्यापारी - वेदप्रकाश काम्बोज

कौन ले जायेगा भारतीय वैज्ञानिक को ?
विज्ञान के व्यापारी - वेदप्रकाश काम्बोज
#विजय सीरीज

वेदप्रकाश काम्बोज जी जासूसी उपन्यास साहित्य में एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनकी जासूसी रचनाएं मनोरंजन और एक्शन से भरपूर होती हैं।
  प्रस्तुत उपन्यास 'विज्ञान के व्यापारी' एक वैज्ञानिक के अपहरण की रोचक कहानी है, जिसमें भारतीय जासूस विजय का किरदार उसे मनोरंजक भी बनाता है।

विजय ने बड़े आराम से पलंग पर पसरते हुए कहा- 'तो मियां झानझरोखे, जिक्र है उस काली रात का जब आकाश में चांद चमक रहा था किन्तु रोशनी नहीं दे रहा था। जब ठण्डी हवायें आग बरसा रही थीं और सुनसान सन्नाटा बड़ी भयंकरता के साथ चारों ओर फैला हुआ था। तो मियां झानझरोखे उस काली और भयावली रात में जान हथेली पर सिर गुड की भेली पर लिये हुए कुछ जासूस एक खतरनाक अपराधी को पकड़ने के लिये जा रहे थे। तुम्हें याद नहीं होगा लेकिन मैं याद दिलाता हूं उन जासूसों में तुम भी थे, मैं भी था, अपना वो तुलाराशि सुपर रघुनाथ भी था अमरीकी जासूस वह साईकिल चेन भी था और रूसी जासूस बागारोफ भी था ।

Friday, 15 November 2024

608. शिकारी का शिकार- वेदप्रकाश काम्बोज

गिलबर्ट सीरीज का प्रथम उपन्यास
शिकारी का शिकार- वेदप्रकाश काम्बोज

ब्लैक ब्वॉय विजय की आवाज पहचान कर बोला-"ओह सर आप, कहिए शिकार का क्या हाल हैं ?"
"शिकार का तो शिकार हो गया चीफ ।" विजय बोलाः- वह भी मैंने नहीं किया बल्कि कोई और कर गया है ।"
"क्या मतलब ?"
और प्रत्युत्तर में विजय ने संक्षेप में उसे रेस्तराँ में हुई पूरी घटना सुना दी ।

    लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के स्तम्भ श्री वेदप्रकाश काम्बोज जी अब इस दुनिया में नहीं रहे, उनका निधन 06.11.2024 को हो गया पर उनके द्वारा रचित साहित्य हमेशा अमर रहेगा। उन्होंने उपन्यास साहित्य को 'विजय-रघुनाथ' जैसे सदाबाहर पात्र दिये हैं, जिनके लिये पाठकवर्ग उनका हमेशा आभार व्यक्त करता रहेगा । वेदप्रकाश काम्बोज द्वारा रचित साहित्य में आनंद और थ्रिलर का अनोखा मिश्रण है।
वेदप्रकाश काम्बोज जी
   इन दिनों मैंने काम्बोज जी का उपन्यास 'शिकारी का शिकार' पढा जो की 'विजय-रघुनाथ और गिलबर्ट सीरीज' का उपन्यास है, या कहे की यह गिलबर्ट का प्रथम उपन्यास है, गिलबर्ट के कारनामों की भूमिका मात्र है।

Sunday, 17 September 2023

573. विकास और चीनी दरिंदे- अशोक तरुण

एक फार्मूले की तलाश में भारतीय जासूस
विकास और चीनी दरिंदे - अशोक तरुण
लेखक अशोक तरुण का ‌नाम भी पहली बार सामने आया है और उनका लिखा उपन्यास भी पहली बार ही पढा है। प्रस्तुत उपन्यास 'विकास और चीनी दरिंदे' विजय-विकास सीरीज का अंतरराष्ट्रीय कथानक पर आधारित है। और इसी कथानक पर एक और उपन्यास भी पढा था।

बादल इतनी जोरों से गर्ज मानो आसमान फट पड़ा हो । बिजली की तीव्र चमक ने सम्पूर्ण आसमान को एकबारगी प्रकाशित किया और फिर बादलों में ही लुप्त हो गई । इसके साथ पड़ने बाली वर्षा की बूंदों की मोटाई कुछ और बढ़ गई ।
     सड़कों पर चारों तरफ पानी इस प्रकार से बह रहा था मानो किसी बांध को तोड़ दिया गया हो । चारों तरफ पानी ही पानी नजर आ रहा था । यह मूसलाधार बारिश शाम से ही आरम्भ हो गई थी फिर ज्यों-ज्यों समय बीतता गया वर्षा में निरन्तर तेजी आती चली गई । इस समय रात के दो बजने जा रहे थे। शाम छः बजे से हो रही इस मूसलाधार बारिश ने जल-थल एक कर दिया था। चारों तरफ गहरी खामोशी व सन्नाटे का साम्राज्य छाया हुआ जिसमें तेजी से पड़ती बूंदों और बादलों की गर्ज ने अत्यधिक भयंकर बना दिया था । (उपन्यास के प्रथम पृष्ठ से)

उपन्यास का आरम्भ प्रसिद्ध वैज्ञानिक अय्यर के सहयोगी मोहन के कत्ल से होता है। मोहन एस.पी. रघुनाथ और जासूस विजय का सहपाठी रहा है।

Sunday, 19 February 2023

555. बदमाशों की बस्ती- वेदप्रकाश काम्बोज

कोटाम्बू के खतरनाक बदमाशों की कथा
बदमाशों की बस्ती- वेदप्रकाश काम्बोज

विजय दबे पांव रघुनाथ के पलंग के पास आया इस समय उसके हाथ में एक बड़ा सा गुब्बारा था जो कि हवा भरी होने के कारण और भी बड़ा हो गया था। वह रघुनाथ के पलंग के सिराहने आया, खड़ा हो गया और कुछ करना ही चाहता था कि तभी रैना ने रसोई घर की ओर वाले द्वार से प्रवेश किया। (उपन्यास प्रथम पृष्ठ से)

    यह दृश्य है वेदप्रकाश काम्बोज द्वारा रचित उपन्यास 'बदमाशों की बस्ती' का। प्रस्तुत उपन्यास एक्शन-रोमांच से परिपूर्ण एक रोचक रचना है।        

बदमाशों की बस्ती- वेदप्रकाश काम्बोज
     बदमाशों की बस्ती ये विजय-रघुनाथ सीरीज का एक मशहूर उपन्यास है। इस उपन्यास को पढ़ते हुए आपको 'वेस्टर्न-क्लासिक्स' की याद बरबस ही आ जाएगी। एक्शन के साथ मजेदार घटनाओं से भरपूर नॉवल। साथ में है आशा, अशरफ और पवन। 'नीलम जासूस कार्यालय' की स्थापना लाला श्री सत्यपाल वार्ष्णेय ने आज से 60 साल पहले की थी। ये 1960 के दशक की एक बहुत मशहूर प्रकाशन संस्था रही है। इस संस्था ने कई दिग्गज उपन्यासकारों और लेखकों के शुरुआती दौर के उपन्यास प्रकाशित किए। इस संस्था से एक ‘नीलम जासूस’और ‘राजेश’ नाम की मासिक पत्रिकाएँ निकलती थीं। नीलम जासूस मुख्यत: श्री वेद प्रकाश काम्बोज के और राजेश में जनप्रिय ओम प्रकाश शर्मा जी के उपन्यास निकलते थे। इसके अलावा श्री सत्यपाल वार्ष्णेय ने एक फिल्मी मैगजीन —‘फिल्म अप्सरा’ भी निकली थी, जोकि बेहद मशहूर हुई। सुनहरे दौर के क्लासिक उपन्यासों को पुनः प्रकशन के उद्देश्य से नीलम जासूस ने दो शृंखलाएँ 'सत्य-वेद'और 'सत्य-ओम’ शुरू की हैं।
(अंतिम आवरण पृष्ठ से)

  

Thursday, 20 October 2022

538. काम्बोजनामा- राम पुजारी

लोकप्रिय जासूसी साहित्य के वटवृक्ष- वेदप्रकाश काम्बोज
काम्बोजनामा- राम पुजारी

लोकप्रिय जासूसी उपन्यास साहित्य में वेदप्रकाश काम्बोज जी उस वटवृक्ष की तरह हैं जिसके नीचे असंख्य जीव- पौधे पनपते हैं और उस से वटवृक्ष अनजान होता है। जासूसी लेखन से साहित्यिक गलियारों तक में कलम चलाने वाले, मंजिल को भुला अपने इस सफर के आनंद में डूबे, लेखन पथ पर आवारगी करने वाले वेदप्रकाश काम्बोज एक ऐसे ही व्यक्तित्व हैं, जिनके पात्रों पर बहुसंख्यक लेखकों ने लिखा पर वेदप्रकाश काम्बोज उस से अलग ही रहे। ऐसे सरल स्वभाव के काम्बोज जी को समर्पित, उन्हीं के जीवन‌ पर आधारित रचना है - काम्बोजनामा ।
' काम्बोजनामा' के लेखक राम पुजारी जी के साथ 17.09.2022, मेरठ

 उसी वटवृक्ष के जीवन और लेखन को युवा लेखक राम पुजारी जी ने 'काम्बोजनामा' में समेटने का जो प्रयास किया है वह उपन्यास साहित्य में एक मील पत्थर है। हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के शिष्य ने 'व्योमकेश दरवेश लिखा, कुशवाहा कांत जी के शिष्य ने 'कुशवाहा कांत...' लिखा। ऐसा ही एक प्रयास रामपुजारी जी ने 'काम्बोजनामा' में किया है।

Thursday, 22 April 2021

433. चीनी सुंदरी - वेदप्रकाश काम्बोज

भारतीय वैज्ञानिक की अपहरण कथा
चीनी सुंदरी - वेदप्रकाश काम्बोज

इस पहाड़ी इलाके से फूचिन और पोंग अच्छी तरह परिचित थे। किन्तु इसके साथ ही रात में दिखाई देना भी आवश्यक था। मगर वे लोग जीप की हैडलाइट्स नहीं जला सकते थे। क्योंकि इस प्रकार वे स्वयं ही दुश्मन को अपनी स्थिति का पता दे देते ।
         अनुमानानुसार फूचिन पूरी तेजी के साथ जीप को ड्राईव करता रहा। पीछे से उन पर गोलियां छोड़ी जाने लगी । एक दो हैण्डबम भी फेंके गये । उनसे तो वे बच गये किन्तु उस गड्ढे से न बच सके जो कि जमीन में था और जिसमें जीप का पहिया फस जाने के कारण जीप लुढ़क गई ।
         एक बारगी तो उनकी जान सूख गई। किन्तु जब ढलान पर दो तीन पटखनियां खाने के बाद जीप रुक गई तो उन में जान आई। उन चारों को ही मामूली चोट लगी थीं।  किन्तु उन चोटों की किसी ने भी परवाह नहीं की। बड़ी तेजी के साथ वे उल्टी हुई जीप में से बाहर निकले। माईक अपने कंधे को दबाये हुये था। शायद उसके कंधे में अधिक चोट लगी थी ।
और वे गोलियों की बौछारों में ही पहाड़ियों की ओर भागे।  फूचिन और पोंग उनका पथ-प्रदर्शन कर रहे थे। 
फिर वे भागते रहे ।
मार्ग में कई जगह ठोकर खाकर गिरे भी। किन्तु फिर भी वे भागते ही रहे । फायरों की आवाज अब बहुत दूर से आ रही थी।
चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। सबसे पहले पोंग ने ही हथियार डाले । वह भागते-भागते लड़खड़ाया और फिर जमीन पर गिर पड़ा।

  प्रस्तुत उपन्यास अंश वेदप्रकाश काम्बोज जी द्वारा लिखित 'चीनी सुंदरी' का एक अंश है। यह विजय श्रृंखला का अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर आधारित एक एक्शन-रोमांच उपन्यास है। जो चीन- भारत के संबंधों और उनके पीछे छिपी चीनी की कुटिलता का चित्रण करता है।

Sunday, 21 March 2021

425. चीते की आँख- वेदप्रकाश कांबोज

अलफांसे की जीवनी
चीते की आँख- वेदप्रकाश काम्बोज

लोकप्रिय जासूसी उपन्यास साहित्य में कुछ पात्रों ने अपनी विशेष पहचान स्थापित की है। और उन पर बहुसंख्यक लेखकों ने कलम चलाई है और उन्हें अपने-अपने अंदाज में प्रस्तुत कर नया रूप भी प्रदान किया है।
जैसे भूतनाथ, जेम्स बाॅण्ड, विनोद-हमीद, विजय-रघुनाथ, रीमा भारती इत्यादि।
   आज हम एक ऐसे पात्र की चर्चा करने जा रहे हैं जिसका नाम है- अलफांसे। 
चीते की आँख- वेदप्रकाश कांबोज

चीते की आँख- वेदप्रकाश कांबोज

वैसे तो अलफांसे को लेकर बहुत से लेखकों ने बहुत कुछ लिखा है लेकिन यहाँ हम बात कर रहे हैं आदरणीय वेदप्रकाश काम्बोज द्वारा लिखित उपन्यास 'चीते की आँख' की, जो वेदप्रकाश काम्बोज जी द्वारा अलफांसे सीरीज का प्रथम उपन्यास है।
   अलफांसे मूलतः इब्ने सफी जी द्वारा निर्मित पात्र है। इब्ने सफी जी ने अलफांसे को लेकर चार उपन्यास लिखे थे। बाद में कांबोज जी ने अपने हिसाब से इस पात्र को एक अलग रूप प्रदान किया।
     मेरी जिज्ञासा थी अलफांसे का इतिहास जानने की जो की मुझे 'चीते की आँख' नामक उपन्यास से मिला। 

Saturday, 26 September 2020

382. भगोड़ा अपराधी- वेदप्रकाश कांबोज

 मुजरिम फरार है...
भगोड़ा अपराधी- वेदप्रकाश कांबोज
विजय सीरीज, थ्रिलर उपन्यास

        अपराधी हमेशा कानून की पकड़ से दूर भागने की कोशिश करता है। वह जितनी संभव कोशिश होती है, अपने अपराध को छुपाने और फिर कानून की गिरफ्त से दूर होने की कोशिश में रहता है। लेकिन कानून के पहरेदार भी इस कोशिश में रहते हैं‌ की अपराधी पकड़ा जाये और उसे अपराध की सजा मिले।
    अपराध, अपराधी और कानून का यह खेल सतत चलता रहता है। अपराध होते रहते हैं और कानून मुजरिमों‌ को पकड़ता रहता है। 'भगोड़ा अपराधी' भी इसी तरह का उपन्यास है। यह एक फरार मुजरिम की कहानी है जिसे कानून के रक्षक पकड़ने के लिए सघर्षरत हैं।  
















भगोड़ा अपराधी- वेदप्रकाश कांबोज
    वेदप्रकाश कांबोज जी लोकप्रिय साहित्य के वह ज्वलंत सितारे हैं जिनका प्रकाश अमिट है। इनकी कलम से निकले अमूल्य मोती लोकप्रिय जासूसी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।
   वेदप्रकाश कांबोज जी द्वारा रचित उपन्यास 'भगोड़ा अपराधी' पढा, यह एक थ्रिलर उपन्यास है। यह जेल से फरार मुजरिम की कहानी है जिसे पकड़ने के लिए विजय-रघुनाथ दिन-रात एक कर देते हैं।
   सितंबर 2020 में मैंने वेदप्रकाश कांबोज जी के सतत दस उपन्यास पढे हैं। जिनके क्रमश नाम हैं- मुँहतोड़ जवाब, मैडम मौत, सात सितारे मौत के, गद्दार, मुकदर मुजरिम‌ का, आखरी मुजरिम, आसमानी आफत, शहर बनेगा कब्रिस्तान, फाॅरेस्ट आफिसर, भगोड़ा अपराधी।
    इनमें से कुछ थ्रिलर- एक्शन, मर्डर मिस्ट्री हैं तो कुछ विजय सीरीज के हैं।
  अब चर्चा करते हैं प्रस्तुत उपन्यास 'भगोड़ा अपराधी' की। यह विजय सीरीज का एक रोमांच श्रेणी का उपन्यास है। कहानी है फ्रेजर नामक एक खतरनाक अपराधी की।
  फ्रेजर एक अंतरराष्‍ट्रीय तस्कर था। मुख्य रूप से वह भारत में सोने की तस्करी करता था। विभिन्न देशों में विभिन्न नामों से उसकी कई फर्में थी। कई छद्म नाम थे उसके। (पृष्ठ-10)

Thursday, 24 September 2020

381. फाॅरेस्ट ऑफिसर- वेदप्रकाश कांबोज

जंगल के रक्षक की कहानी
फाॅरेस्ट ऑफिसर- वेदप्रकाश कांबोज, थ्रिलर उपन्यास

एक कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति को अपने जीवन में अपने कर्तव्य के निर्वाह पर बहुत से संकटों का सामना करना पड़ता है‌। उसके पास दो ही रास्ते होते हैं या तो वह अपने कर्तव्य पथ से हट जाये या फिर भ्रष्ट व्यक्तियों से टकरा जाये।

    वेदप्रकाश काम्बोज जी का प्रस्तुत उपन्यास 'फॉरेस्ट ऑफिसर' भी एक कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी के कर्तव्य, सत्य और दृढता की कहानी है। उसे अपने जीवन में अपने दायित्व का उचित ढंग से निर्वाह करने के दौरान अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा। 
       कहानी आरम्भ होती है केसरी से जो से जो नया फॉरेस्ट ऑफिसर बन कर ऐसी जगह पहुंचता है जहाँ कालिया नामक एक अपराधी जंगल से तस्करी करता है। यहाँ के पूर्व फॉरेस्ट ऑफिसर की हत्या कर दी जाती है। 

Tuesday, 22 September 2020

380. शहर बनेगा कब्रिस्तान- वेदप्रकाश कांबोज

जब मुंबई शहर पर छाये संकट के बादल
शहर बनेगा कब्रिस्तान- वेदप्रकाश काम्बोज


बम्बई के मुख्यमंत्री को सूचित किया जाता है कि इस शहर में हमने एक खतरनाक एटम बम रखा हुआ है, जो अब से छत्तीस घण्टे बाद यानि शनिवार रात के दस बजे फट जायेगा और दुनिया के नक्शे से इस खूबसूरत शहर को नेस्तानाबूद करके एक विशाल कब्रिस्तान में बदल देगा। (उपन्यास अंश)
           वे खतरनाक मुजरिम थे जो सन् 1993 के मुंबई सिरियल बम ब्लास्ट की तरह एक बार फिर मुंबई को दहला देना चाहते थे वे मुंबई को कब्रिस्तान बनाने की जिद्द पर थे।  उनकी खतरनाक साजिश के आगे सी.बी.आई. भी बेबस थी। उनका कोई सुराग न था और बम ब्लास्ट होने के 36 घण्टे पहले उन्होंने अपनी मांग मुख्यमंत्री के समक्ष रखी।
- वह खतरनाक मुजरिम कौन थे?
- आखिर उनकी योजना क्या थी?
- उस योजना के पीछे कौन था?
- क्या CBI उस योजना को नाकाम कर पायी? 
   वेदप्रकाश काम्बोज जी द्वारा लिखा गया 'शहर बनेगा कब्रिस्तान' एक थ्रिलर उपन्यास है।

Friday, 18 September 2020

379. आसमानी आफत- वेदप्रकाश कांबोज

अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र की कहानी
आसमानी आफत- वेदप्रकाश काम्बोज

विजय सीरीज

वह काठमांडू घूमने गया था लेकिन वहाँ वह एक ऐसे खतरनाक आदमी से टकरा बैठा और फिर उसके लिए खतरा पैदा हो गया और उसे लगा वह की वह आसमानी आफत मोल ले बैठा।
   जब वह इस आसमानी आफत से बचने की कोशिश करने लगा तो उस पर और भी ज्यादा खतरा मंडराने लगा और अनंत: उसने ने उस आसमानी आफत से टकराने की ठान ली।
काठमांडू की धरती पर खेला गया एक खतरनाक खूनी खेल है- आसमानी आफत।  
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378. आखरी मुजरिम- वेदप्रकाश कांबोज

पांच मुजरिमों की लूटकथा
आखरी मुजरिम- वेदप्रकाश कबोज


कहते हैं चोर चोरी करना छोड  सकता है लेकिन हेराफेरी नहीं। और जब चोर आर्थिक मुसीबत में हो तो वह कितनी भी कसमें खा ले अनंत वह अपने पुराने रास्ते पर लौट ही आता है।
वह उसकी मजबूरी हो सकती है या फिर आदत...

    वेदप्रकाश कांबोज जी का उपन्यास 'आखिरी मुजरिम' पढा। यह पांच ऐसे लोगों की कहानी है जो किसी न किसी रूप से अपराध से संबंध रखते हैं।

रामानंद-  विभिन्न अपराधों के सिलसिलें में दस साल की सजा काट कर जेल से छूटा था। लेकिन अब उसे अपनी बेटी की शादी के लिए रुपयों की बहुत आवश्यकता थी। दस साल की सजा और अपराधी का लेबल होने के कारण उसे कहीं से काम और रूपये मिलने की उम्मीद न थी। बस एक दोस्त था अब्बास जिससे कुछ उम्मीद की जा सकती थी।

     रामानंद और अब्बास आगे अजीम और दर्शन से मिले और एक प्लानिंग बनी -"नववर्ष की शुभकामनाएँ तो कल सुबह हम देंगे चन्द्रन ज्वैलर्स वालों को"

Tuesday, 15 September 2020

377. मुकद्दर मुजरिम का- वेदप्रकाश कांबोज

 जब अपराधी की किस्मत बदलती है

मुकद्दर मुजरिम का- वेदप्रकाश कांबोज

  मनुष्य की किस्मत कब, कैसा खेल खेल जाये कुछ कहा नहीं जा सकता। कभी अर्श से फर्श और कभी फर्श से अर्श पर ले जाती है।
      ऐसा ही खेल खेला था किस्मत ने एक मुजरिम के साथ। इस खेल ने चाहे उस अपराधी को फर्श से अर्श पर बैठा दिया लेकिन उस सफलता के  पीछे का सच क्या था...
    इन दिनों में वेदप्रकाश कांबोज जी के उपन्यास पढ रहा हूँ। 2020 के सितंबर माह में कांबोज का मैंने यह पांचवां उपन्यास पढा है। मुझे यह उपन्यास रोचक लगा। 
     कहानी आरम्भ होती है महानगर शहर से। पत्रकार आलोक के पास बंगाली आर्टिस्ट की पत्नी आकर कहती है- "...मैं तुमसे हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि तुम उनकी खोज खबर लगाकर पता करो कि वे ठीकठाक तो हैं ना।"
         निताई घोष...गजब का कार्टूनिस्ट और चित्रकार था। किसी की भी लिखाई की नकल करने में तो ऐसा सिद्धहस्त था कि देखने वाले आश्चर्यचकित रह जाते थे।

   पर नित्यानंद घोष/ निताई बाबू शराब के अतिरिक्त और कुछ पसंद न करते थे। घर से निकले तो एक-दो माह तक वापस न आते थे। लेकिन इस बार उनकी पत्नी को आशंका हुयी।  इसलिए क्राइम रिपोर्टर आलोक निताई बाबू का पता लगाने निकल लिए शक्तिपुर। 

Saturday, 12 September 2020

376. गद्दार- वेदप्रकाश कांबोज

आखिर कौन था गद्दार
गद्दार- वेदप्रकाश कांबोज

विजय-अलफांसे सीरीज


सूरीमा हिन्द महासागर में एक छोटा सा देश है, जिसमें कुछ छोटे-बड़े टापू शामिल थे। सिंगापुर की तरह देश का नाम भी सूरीमा था और उसकी राजधानी का नाम भी सूरीमा था।  देश में राजतंत्र था और उसके शासक का नाम सुलेमान था। देश की आबादी मुसलमान थी। थोड़े बहुत हिंदू थे और थोड़े से क्रिश्चन भी थे। 

  सूरीमा में राजतत्र है और यहाँ के शासक हैं शाह सुलेमान। सुलेमान को लगता है की उसका कोई साथी गद्दार है जो उसकी जान का दुश्मन है। और अपनी सुरक्षा के लिए सुलेमान भारत से जासूस विजय जो अपनी सुरक्षा के लिए बुलाता है।
- वह गद्दार कौन था?
- शाह सुलेमान की जान क्यों लेना चाहता था?
- क्या विजय इस अभियान में सफल रहा?

   अगर आप वेदप्रकाश काम्बोज जी के 'विजय-अलफांसे' सीरीज के उपन्यास पसंद करते हैं तो यह उपन्यास पढें और जाने एक गद्दार की सत्यता को।