Saturday, 9 May 2026

723. गुप्त हत्यारा- वेदप्रकाश काम्बोज

एक हत्यारे की तलाश में मित्र
गुप्त हत्यारा- वेदप्रकाश काम्बोज

आदरणीय वेदप्रकाश काम्बोज जी ने बहुत लिखा है और उनकर लेखन में विविधता भी रही है। जहां उन्होंने दीर्घ उपन्यासों से पाठकों का मनोरंजन किया है वहीं अपने लेखक के आरम्भिक दौर में लघु उपन्यासों का भी सृजन किया है। 
उनका प्रस्तुत उपन्यास मात्र एक कहानी नहीं है, यह मात्र यह जानने का प्रयास नहीं है कि 'गुप्त हत्यारा' कौन है । यह मित्रों के विश्वास की कहानी है, उनके ठहाकों का समंदर है, उनके अपनत्व का आसमान है।  
गुप्त हत्यारा- वेदप्रकाश काम्बोज

'ओ गुरुमुख ?'
'हो चन्दर !' इसी स्वर में उत्तर मिला ।
'ओ, यह पत्र क्या कहता होए ?'
'क्या कहता है ?'
'यह कहता है कि इसे मुझे नहीं पढ़ना चाहिए !'
'क्यों ?'
'उस हरामजादे ने पत्र केवल तुझे ही लिखा है !'
'देखू !'
चन्द्रप्रकाश ने, जिसे कि चन्दर कहकर पुकारा जाता था, पत्र, सरदार गुरुमुखसिंह की ओर बढ़ा दिया। गुरुमुख ने अपनी एक ओर की मूंछ को बल देते हुए लिफाफे का पता देखा, ऊपर केवल उसका नाम लिखा हुआ था ।
'देखा ।' चन्दर अपनी जाँघ पर हाथ मारता हुआ बोला-'उसने केवल तुम्हें ही पत्र लिखा है। साला गद्दार हो गया है।'
'ओ, तू कोई यार थोड़े ही है।' गुरुमुख ने इस प्रकार गर्दन हिलाते हुए कहा मानो कह रहा हो कि कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली ।
'अच्छा जी, हम यार ही नहीं हैं।'
'बिल्कुल !' गुरुमुख अपने एक-एक वाक्य पर जोर देता हुआ बोला- 'तुम यार नहीं भटियार हो !'
'भटियार हूं, वह कैसे ?'
'यह तो मुझे भी नहीं मालूम कि कैसे ?'
'फिर कहा क्युं है ?'
'ओ कह दिया । अब चुप भी रह, पत्र पढ़ने दे !'
गुरुमुख ने उसे डांटा और पत्र पढ़ने लग गया, जिसे चन्दर ने पहले ही लिफाफा फाड़कर बाहर निकाल लिया था ।
गुरुमुख ने पढ़ना आरम्भ किया -
प्रिय गुरुमुख !
काफी समय से तुम्हारी ओर से कोई पत्र नहीं मिला, क्या कारण है ? खैर तुम मुझे पत्र लिखो या न लिखो लेकिन मैं तो तुम्हें लिखूंगा। मैं यहाँ आकर काफी समय प्रसन्न रहने के बावजूद भी उदास रहता हूं, क्योंकि तुम लोग मेरे पास नहीं हो !
कभी यहाँ आकर मुझसे मिल जाओ और यहाँ की सैर भी कर जाओ !...........।
'(गुप्त हत्यारा- वेदप्रकाश काम्बोज, प्रथम पृष्ठ से)
    लोकप्रिय कथा साहित्य में वेदप्रकाश काम्बोज ने खूब लिखा है और उनका लिखा जब -जब सामबे आता है वह एक नये रूप में ही आता है। प्रस्तुत उपन्यास भी एक ऐदा ही उपन्यास है। जो किसी बंधी परिपाटी को तोड़ता है और आगे बढता है। उपन्यास मर्डर मिस्ट्री रचना है पर इसमें कोई स्थापित नायक न होकर एक सामान्य आदमी को कथा नेतृत्व दिया गया है और यही बात उपन्यास को अगल बनाती है।
   अब बात करते हैं उपन्यास के कथानक की तो यह कहानी है तीन दोस्तों की । सरदार गुरमुख, चंदर और देव तीनों गहरे मित्र हैं। लेकिन व्यवसाय के सिलसिले में देव अमर नगर में रहने लगता है और वह अपने दोनों मित्रों को मिलने-घूमने के लिए अमर नगर बुलाता है। 
     सरदार गुरमुख और चंदर दोनों हंसमुख स्वभाव के हैं और एक दूसरे को तंग भी करते रहते हैं। गुरमुख अक्सर पंजाबी गीत गुनगुनाता रहता है और चंदर उसे 'सिखा' कहकर संबोधित करता है‌। गुरमुख के पास एक पुरानी कार है जिसे प्यार से चंदर 'सजनी नम्बर ग्यारह' कहता है।
     अब दोनों मित्र अपने तीसरे मित्र का पत्र पढकर उस से मिलने अमर नगर जाते हैं। लेकिन अमर नगर में‌ पहुंचते ही उन्हें अजीब से व्यवहार का सामना करना पड़ता है। 
   वहां के लोग उ‌नके मित्र के नाम से ऐसे सहम उठते हैं जैसे कोई खतरनाक हत्यारा हो। ठहरो...ठहरो...अरे ! मैंने यह क्या लिख दिया । यह कहानी का रहस्य ही खुल गया । अब खुल गया तो खुला ही रहने देते हैं यार । बात कुछ और कर लेते हैं जैसे कहानी छोटी और प्यारी सी है, पर रहस्यात्मक और हत्यारी है। क्या आप एक हत्यारी कहानी पढना चाहेंगे ?
  चलो अब कहानी पर ही चलते हैं। जब चंदर और गुरमुख को यह पता चला की उनके मित्र देव पर हत्या का आरोप है और पुलिस को भी देव की तलाश है तो दोनों हैरान रह जाते हैं क्योंकि उन्हें अपने मित्र पर विश्वास था कि वह किसी की हत्या नहीं कर सकता।
और जब वह अपने मित्र देव से मिले तो उसका भी यही उत्तर था ।
'यह हत्या-वत्या का क्या मामला है ?' 
‘मैं नहीं जानता । लेकिन इतना सच है कि मैंने यह हत्या नहीं की है।'

  अब चंदर और गुरमुख जो अपने मित्र पर विश्वास था और उसी विश्वास के चलते उन्होंने देव को हत्या आरोप से मुक्त करने का प्रयत्न किया ।
'अब तुम्हारा क्या इरादा है ?'
'जासूसी करने का ।' गुरमुख ने शान्त स्वर में कहा ।
'क्या मतलब ?'
'मतलब यह कि जासूसी उपन्यासों के पढ़ने में जो इतना मस्तिष्क खर्च किया है, आखिर उसका भी तो कुछ उपयोग होना ही चाहिए ।'
"तो तुम जासूस बनोगे ?'
"इरादा तो है।'
'बड़ा वाहियात इरादा है।' चन्दर बोला- 'कहीं ऐसा न हो कि इसकी जासूसी के चक्कर में हम लोग भी अन्दर पहुंच जायें । फिर हमारे माँ बाप हमारी जासूसी के लिए जासूस तलाश करते फिरें ?'
'अगर ऐसा हो भी गया तो क्या अन्तर पड़ेगा।' गुरमुख ने उत्तर दिया, 'केवल यारों के लिए जान कुर्बान हो जायेगी ।'

यह थी यारों की यारी और यारों का विश्वास । उसी विश्वास के बल पर उन्होंने देव के लिए जासूसी करने का प्रयास किया । हालांकि यह प्रयास इतना सरल न था क्योंकि जैसे ही उन्होंने पुलिस विभाग से मिलकर इस कार्य को आगे बढाया तो कुछ अज्ञात लोग उनकी जान के पीछे पड़ गये।
  पीछे से याद आया एक दृश्य जहां कुछ लोग एक दूसरे का पीछा करते हैं। 
आप भी आनंद लीजिए उस दृश्य का-
     लेकिन न तो गुरमुख इत्यादि को पता था कि उनका पीछा किया जा रहा है और न दादा को ही पता था कि उनका पीछा किया जा रहा है । दादा की टैक्सी और उसके साथियों की टैक्सी के पीछे भी एक मोटर साइकल पर दो व्यक्ति सवार उनका पीछा कर रहे थे । ये सब अपने-अपने वाहनों को काफी फासले पर रखे हुए थे । 
    चलो, यह किस्सा तो जासूसी उपन्यासों में चलता रहता है । अब कहानी की समीक्षा को आगे बढाते हैं ताकि गुप्त हत्यारा सामने आये। 
  उस गुप्त हत्यारे को सामने लाने का प्रयास गुरमुख और चंदर कर रहे थे। दोनों कोई जासूस नहीं थे बस जासूसी उपन्यास पढे थे और उन्हें पुलिस इंस्पेक्टर जागेराम की भी अच्छी मदद मिल रही थी।  
  जब पुलिस का साथ हो तो कुछ अच्छे परिणाम आने की संभावना ज्यादा बन जाती है।  और यहाँ भी अच्छी संभावना बनी और परिणाम भी अच्छे आये। 
यहां गुरमुख का एक कथन पठनीय है- 

एक जासूस के लिए चाहे वह सरकारी हो अथवा प्राइवेट, मनोवैज्ञानिक होना भी आवश्यक है ।

एक अच्छे उपन्यास में हास्य का आनंद भी ले लीजिए-
गुरमुख ने उत्तर दिया, 'केवल यारों के लिए जान कुर्बान हो जायेगी ।'
'इससे तो कोई एतराज नहीं है कि यार के लिए जान कुर्बान हो जाये । लेकिन मुसीबत तो यह है कि अगर मुझे कुछ हो गया तो फिर मेरी रज्जो के साथ लिपट कर कौन सोयेगा ।' 
'इसकी कोई चिन्ता न करो, रज्जो के साथ लिपटकर मैं सो जाऊंगा ।'
'अबे अगर तुम्हें भी कुछ हो गया तो फिर क्या होगा ?' चन्दर के स्वर में भविष्य की चिन्ता थी।
'कोई बात नहीं है फिर उससे कोई और लिपटकर सो जायेगा ।' गुरमुख बोला -'मैं तुम्हें इस बात का विश्वास दिलाता हूं कि रज्जो अकेली नहीं सोने पायेगी ।'

  गुरमुख की यही मनोवैज्ञानिक समझ उसे आगे बढने में सहायता देती है।  इसी समझ के आधार पर वह संदिग्ध लोगों से मिलता है। इसी समझ के आधार पर वह वास्तविक अपराधी को सामने लाता है।
   वेदप्रकाश काम्बोज जी द्वारा लिखा गया 'गुप्त हत्यारा' एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है। छोटी कहानी और अस्थापित पात्रों को आधार बनाकर रचा गया यह उपन्यास पठनीय बना है।

उपन्यास- गुप्त हत्यारा
लेखक-   वेदप्रकाश काम्बोज

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