Sunday, 3 May 2026

मौत की आवाज- वेदप्रकाश काम्बोज

कबाड़ी, तातारी और मदारी का प्रथम उपन्यास
मौत की आवाज- वेदप्रकाश काम्बोज

विजय ने दरवाजा खोला ।
और गुरुदेव का उच्च नाद करते हुए तीन नमूनों ने उसके पैर पकड़ लिए। चकित सा विजय पहले तो उन तीनों के काले सिरों को देखता रहा जो उसके पैरों के निकट इस तरह एकत्रित हो गए थे जैसे तीन विभिन्न रेखाएं एक बिन्दु पर आकर मिल गई हों।
विजय ने आशीर्वाद की मुद्रा में अपने हाथ फैलाये और फिर गुरू ने गम्भीर मुद्रा में कहा- 'सदा खाओ गुड़ के सेव ।'

'धन्य हैं गुरुदेव आप धन्य हैं।' उन तीनों ने उसके पैर पकड़े हुए समवेत स्वर में कहा। किसी ने भी सिर उठाकर देखने की चेष्टा नहीं की।  
'हम धन्य भये ।' विजय ने कहा, 'लेकिन बच्चो अब तुम उठो । और हमें बताओ कि तुम किस देश से किस काम के लिए हमारी कुटिया में जो कि इस भयानक शोरगुल वाले जंगल राजनगर में अवस्थित है, आए हो। यह भयानक जंगल जिसमें कदम कदम पर तिरछी आँखों और टेढ़ी चालों वाले आदमी निकलेंगे। शोर मचाते हुए लोहे के बड़े-बड़े राक्षस हर वक्त भयानक जंगल में हर वक्त दौड़ते हैं। है मेरे बच्चो तुम इन सबसे बचकर हम तक कैसे आ गए। यह मुझे बताओ ।'
'हे गुरुदेव !' तीनों में से एक बोला, 'भारत में एक शहर है। सुन्दर नगर। हम तीनों वहाँ के वासी हैं।'
'हे मेरे बच्चो ! अब तुम उठो।' विजय ने उनके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, 'और मुझे अपना -अपना परिचय दो ।'
तीनों नमूने उठे ।
(मौत की आवाज- वेदप्रकाश काम्बोज, प्रथम पृष्ठ से)

लोकप्रिय कथा साहित्य में हास्य उपन्यासों की कमी रही है या नाममात्र उपन्यास ही लिखे गये हैं। वेदप्रकाश काम्बोज जी ने अपने तीन पात्रों के माध्यम से हास्य उपन्यास लेखन में भी सराहनीय प्रयास किया है। वेदप्रकाश काम्बोज जी का यह वह समय था जब लोकप्रिय जासूसी साहित्य में एक्शन उपन्यासों का समय था और ऐसे समय में कुछ अलग लिखना भी एक चुनौती रहा होगा।
जैसा की आपने ऊपर पढा तीनों नमूने अर्थात कुंदन कबाड़ी, फन्ने खा तातारी और गोकुल मदारी मिस्टर विजय को जासूसी क्षेत्र में अपना गुरू धारण करने उसके घर गये थे। और जासूस विजय ने उनके सामने एक शर्त रखी की वह अफ्रीका के घने जंगलों में से काले शेर का शिकार कर के लाये-
विजय ने कहा, 'मैं चाहता हूं कि मेरे तीनों चेले तीन काले शेरों का शिकार करें और उनकी खाल लाकर दें।'
'शेर ?' कुन्दन कबाड़ी की जबान लड़खड़ाई । 
'काला ?' फन्ने खाँ तातारी स्वयं लड़खड़ाया ।
'शिकार ?' गोकुल मदारी को अपनी साँस रुकती अनुभव हुई और उसे लगा कि वह लड़खड़ाकर अभी गिर पड़ेगा

      और पाठक मित्रो, आप विजय को तो जानते ही हैं और फिर विजय ने जो कह दिया वह कह दिया और तीनों नमूने चले गये अफ्रीका ।( ध्यान दें तीनों मित्र धनाढ्य परिवार से हैं और उनके पिताओं ने अफ्रीका की सारी व्यवस्था कर दी।)
वे लोग विमान के द्वारा नैरोबी पहुंच गए ।
गोकुल मदारी के पिता ने केबिल भेजकर अपने एकप्रिय को जो कि नैरोबी में एक अच्छा व्यापारी था इन लोगों के लिए शिकार का इन्तजाम करने और इनकी सुख सुविधा का ख्याल रखने के लिए कहा था ।(पृष्ठ- 15)
   और असली कहानी हास्य कहानी यहीं से आरम्भ होती है। क्योंकि शिकार करना उनके दम की बात न थी और तीनों किसी की मदद ले नहीं सकते थे ।
  शेर का शिकार करने निकले तीनों मित्र जा फंसते हैं अफ्रीका के जंगलों में रहने वाले खतरनाक लोगों में । उन लोगों में जिनके लिए मनुष्य की जान लेना खेल जैसा कार्य था। और वहां तातारी को उनके साथ भिड़ना था, कब तक...
उसके हाथ में ढाल और भाला पकड़ाने का मतलब यह था कि अब इसे इन जंगलियों में से ही किसी व्यक्ति से लड़ना था। यह भी केमा जाति का एक रिवाज था कि वह अपने शत्रु को लड़ते हुए ही मारना अधिक पसन्द करते थे। एक से एक समय में एक ही लड़ता था । किन्तु शत्रु के बचने की कोई आशा नहीं थी। क्योंकि शत्रु अगर एक को मार भी लेता था तो उसको छोड़ा नहीं जाता था बल्कि तभी उसे दूसरे से लड़ना पड़ता था । यह सिलसिला तब तक चलता रहता था जब तक कि शत्रु मर न जाए ।(पृष्ठ-37)
       ऐसी और भी कुछ चुनौतिया, परिस्थितियों से सामना करते हुये तीनों अपने लक्ष्य की ओर बढते हैं। और जैसे-जैसे आगे बढते हैं वैसे-वैसे घटनाएं दिलचस्प होती चली जाती हैं। 
   उपन्यास में काफी हास्यजनक दृश्य हैं और मनोरंजक हैं लेकिन उपन्यास में हास्य परिस्थितिजन्य है। उपन्यास में परिस्थितिवश हास्य घटनाएं हैं जो काफी रोचक हैं। क्योंकि तीन मित्र जासूस कम बुद्धि के हैं और बिन सोचे विचार के कदम उठा लेते हैं और यही उठे कदम उनके लिए मुसीबत बन जाते हैं‌ और कभी उसी वजह से वह कठिन परिस्थितियों को मात दे देते हैं।
 अब देखना यह है की तातारी, मदारी और कबाड़ी अपने गुरू विजय के लिए काले शेर का शिकार करते हैं या नहीं ? 
क्या वह अपनी प्राइवेट जासूसी एजेंसी खोल पाते हैं ?
क्या विजय उद्घाटन के लिए आया या नहीं ?
उपन्यास के कुछ और भी रोचक घटनाक्रम हैं जो तीनों पूर्ण करते हैं । 
तथ्यात्मक :-
मेरे विचार से यह कुंदन कबाड़ी, गोलुक मदारी और फन्ने खां तातारी का  प्रथम उपन्यास है। हालांकि उपन्यास में ऐसा कहीं वर्णित नहीं है पर कथा के अनुसार मेरा अनुमान है की यह उनका प्रथम उपन्यास है। बाद के उपन्यास में यह तीनों पात्र विजय के चेले बने नजर आते हैं और वहीं 'भेदभरी हत्या' तीनों का स्वतंत्र उपन्यास है।
यह थी संक्षिप्त समीक्षा वेदप्रकाश काम्बोज जी के रोचक उपन्यास 'मौत की आवाज' की । यह तीन मित्रो की कहानी है जो अपनी अल्प बुद्धि के चलते मुसीबतों से जूझते हैं और विजय भी प्राप्त करते हैं। 
कथानक परम्परागत कहानियों से अलग है इसलिए पढ लेना चाहिए ।

उपन्यास-  मौत की आवाज
लेखक-     वेदप्रकाश काम्बोज
पृष्ठ-          130
प्रकाशक -  दुनिया पब्लिकेशंस, दिल्ली

कबाड़ी- ततारी और मदारी के अन्य उपन्यास
भेदभरी हत्या


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