हत्या का अनोखा जापानी ढंग
जापानी पंखा- कर्नल रंजीत 1974
कर्नल रंजीत के इस उपन्यास की समीक्षा से पूर्व हम संक्षिप्त चर्चा कर लेते हैं इनके रहस्यमयी हत्याओं के तरीकों पर, ध्यान दें संक्षिप्त चर्चा है।कर्नल रंजीत के आपने उपन्यास/ समीक्षा पढी है तो आपको पता होगा की इनके हत्यारे पात्र जब भी किसी की हत्या करते हैं तो वह इतने अजीब और रहस्यमयी तरीके इस्तेमाल करते हैं जो सामान्य लेखक तो सोच भी नहीं सकता । प्रस्तुत उपन्यास में तो हत्या का तरीका भी जापानी है। तो चलो आज इसी जापानी तरीके को देखते हैं इस उपन्यास में-
मित्र की परेशानी
मेजर बलवंत दोपहर का खाना खाकर अखबार पढ़ रहा था का आज सुबह वह अखबार नहीं देख सका था कि टेलीफोन घंटी बज उठी। ऑपरेटर गर्ल ने मेजर के रिसीवर उठाने पर कहा, "मेजर साहब ! लांग डिस्टेंट कॉल, वाराणसी से। आधा मिनट इन्तजार कीजिए।" मेजर ने रिसीवर कान से लगाए रखा। वह सोच रहा था कि वाराणसी से उसे कौन फोन कर रहा था कि फोन पर धीमी-सी आवाज़ आई, "मेजर साहब ! मैं मिसेज विनोद बोल रही हूं। क्या आप दो-चार दिन के लिए वाराणसी आ सकते हैं ?" अब मेजर को याद आया कि उसका घनिष्ठ मित्र विनोद, जो कई केस सुलझाने में उसकी सहायता कर चुका था, तब्दील होकर वाराणसी जा चुका था ।
"क्यों अनीता, क्या बात है ? तुम मुझे वाराणसी क्यों बुला रही हो ?"
"मैं बड़ी परेशान हूं।"
"क्यों ?" मेजर ने परेशान होकर पूछा ।
"अभी कुछ नहीं बता सकती ।"
"क्या तुमने विनोद को अपनी परेशानी बताई है?"
"नहीं, मैं उन्हें नहीं बता सकती ।"
"तुम्हारी परेशानी भी अजीब है - चिन्ताजनक तो नहीं ?"
"है भी और नहीं भी।"
"तो फिर क्यों घबराती हो ? विनोद को बता दो। वह जरूर तुम्हारी सहायता करेगा।"
"क्या आप नहीं आ सकेंगे ?" अनीता ने उदास होकर कहा । (जापानी पंखा- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ)
आपने कर्नल रंजीत के आरम्भिक उपन्यास पढे हैं तो आपको याद होगा मेजर बलवंत का एक मित्र था विनोद। जिसके साथ मेजर बलवंत की अक्सर चाय पीते समय चर्चा हुआ करती थी। विनोद वर्तमान में वाराणसी का निवासी है अर्थात् इस उपन्यास का घटनाक्रम भी वाराणसी ही है।
विनोद की पत्नी अनिता के साथ कुछ अजीबोगरीब घटना घटित होती है। और उसी घटना की जांच के लिए मेजर बलवंत अपने साथियों के साथ वाराणसी आता है।
"तुम मुझे सारी बातें खोलकर बताओ, अनीता ! " यह कहकर मेजर ने अनीता का हाथ अपने हाथ में ले लिया ।
अनीता ने बड़े आराम से अपनी कहानी सुनानी शुरू की, "परसों शाम को मैं घाट के एक पत्थर पर बैठी थी। वह काफी वीरान जगह थी । मैं अपने विचारों में डूबी हुई थी। जब शाम का धुंधलका गहरा हो गया तो मैंने दूर रेत पर एक व्यक्ति को एक स्त्री का गला घोंटते हुए देखा।....
वह पुरुष उस स्त्री का गला घोंट रहा था। उस स्त्री का शरीर ढीला पड़ गया और वह पुरुष उसे रेत पर फेंककर सड़क की ओर चला गया ।"
"सड़क की ओर ?” मेजर ने पूछा ।
मैं रातभर बेचैनी से करवटें बदलती रही और सुबह-सवेरे फिर घाट की ओर निकल गई । ताज़ा हवा से मुझे कुछ शान्ति मिली और मैं रेतीले तट पर दूर तक निकल गई और फिर अचा-नक मेरे कदम रुक गए । एक पत्थर पर वही स्त्री बैठी थी जिसकी परसों शाम गला घोंटकर हत्या कर दी गई थी।(पृष्ठ-16,17)
क्या यह संभव था जो स्त्री मर चुकी है और वही स्त्री फिर जीवित दिखाई दे ? पर अनिता का कहना है कि वह मृत्यु स्त्री को जीवित देख चुकी है। और यही घटना अनिता के लिए कष्टदायक बन जाती है। क्योंकि एक दिन वही हत्यारा अनिता के सामने आता है और कहता है-मिसेज अनीता ! तुमने कल जो कुछ देखा था अगर तुमने किसी से उसका जिक्र किया तो तुम्हारे पति की हत्या कर दी जाएगी। तुम्हें इस घटना का ज़िक्र अपने पति से भी नहीं करना होगा।'
अब विवश अनिता क्या करे ? अत: उसे मेजर बलवंत को याद करना पड़ा । लेकिन यह घटनाक्रम यही नहीं रूका बल्की मेजर बलवंत के पहुंचने तक वह हत्यारा एक बेहद अजीब और विचित्र तरीके से अनिता को नदी में भी कूदने के लिए मजबूर कर देता है।( जैसा की हम ऊपर वर्णन कर चुके हैं वैसे ही इस विचित्र तरीके के विषय में हम आगे पढेंगे)
जब मेजर बलवंत को उस मृत औरत, अनिता को धमकी देने वाले प्रकरण की जांच करनी थी । इसी दौरान एक हत्या और हो जाती है। जिसका संबंध अभी मेजर अन्य घटना से जोड़ने का प्रयास करता ही है कि एक और सूचना उसे मिलती है-
“सेठ रमानाथ कौशल के बेटे उमाशंकर कौशल ने अपने-आप को गोली मार ली है। लेकिन रमानाथ कौशल और घर के दूसरे लोगों का खयाल है कि उसने अपने-आपको गोली नहीं मारी बल्कि किसीने उसे गोली मारकर उसकी हत्या की है। जिस आदमी को सेठ ने भेजा है उसका बयान है कि कुछ लोगों की राय में उमाशंकर कौशल ने अपनी पत्नी के गम में आत्महत्या कर ली है। उसकी पत्नी परसों शाम से गुम है।"(पृष्ठ-21)
अब कहानी और मेजर बलवंत की जांच जैसे-जैसे आगे बढती है उसी क्रम में कहानी में उलझने बढती जाती हैं और हत्याओं की संख्या भी लगभग 12 के पास पहुँच जाती है। अब मेजर बलवंत भी हैरान है की यह जघन्य हत्याकांड कर कौन रहा है और उसमें भी यह विचित्र था कि हत्यारा जहां भी हत्या करता है वह उस परिवार को ही धीरे-धीरे खत्म कर देता है। जिसे मेजर बलवंत ने 'संपूर्ण हत्याकांड' नाम दिया था । और कौन और क्यों इस प्रकार के हत्याकांड को अंजाम दे रहा था। और ऐसा नहीं है की मेजर बलवंत किसी सूत्र को पकड़ नहीं सका । वह सूत्र तक पहुंचा भी और सूत्र के कारनामे देख वह चकित रह गया।
दस फुट का वह आदमी एकदम से सोलह फुट का हो गया था और मेजर की गोली उस आदमी की लंबी टांगों में से गुज़र गई थी ।
अब ऐसे विचित्र हत्यारे से मेजर का संघर्ष था वहीं हत्यारा एक और विचित्र ढंग से सम्मोहित कर मारने का काम करता है जैसा उसने अनिता के साथ किया था ।
यह संपूर्ण हत्याकांड तो था ही वहीं हत्यारा हत्या के जापानी तरीके का इस्तेमाल करता है। अब साधारण जासूस भी इस तकनीक को नहीं समझ सकता यह तो भला जो मेजर बलवंत का जिसके पास जापानी तरीकों से हत्या से संबंधित एक पुस्तक थी और उसी पुस्तक को आधार बनाकर मेजर बलवंत ने पहचाना की हत्या के जापानी तरीके का इस्तेमाल किया जा रहा है।
'ओह, आत्महत्या पैक्ट ! यह भी जापानी तरीका है। जापानी पंखे का चिह्न । जापानी आत्महत्या का पैक्ट । सुना है कि जापानी आत्महत्या पैक्ट किसी उच्च उद्देश्य के लिए किया जाता है।'(पृष्ठ-97-98)
'जापानी पंखा' कर्नल रंजीत द्वारा लिखित एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है जिसमें शृंखलाबद्ध क ई हत्याएं होती हैं जिन्हें मेजर बलवंत 'संपूर्ण हत्याकांड' नाम देता है। अब इस संपूर्ण हत्याकांड के पीछे कौन था यह जानना रोचक है।
आखिर कौन था यह विचित्र हत्यारा ?
क्यों इसने पूरे के पूरे परिवारों की निर्मम हत्याएं कर डालीं ?
हत्या के साथ जापानी पंखे का चिह्न क्यों छोड़ा जाता था ?
बंद कमरों में लाशों का रहस्य क्या था ?
हिन्दी के एकमात्र मौलिक जासूसी उपन्यासकार कर्नल रंजीत का नवीनतम उपन्यास जो एक ऐसी नई तथा सनसनीपूर्ण अपराधवृत्ति का रहस्योद्घाटन करता है जिसे आप अपराध मानने से ही इन्कार कर देंगे, मगर कानून इसे क्षमा नहीं कर सकता ।(अंदरुनी पृष्ठ से)
स्वयं मेजर बलवंत भी एक बात हत्यारे के विषय में कहता है जो उक्त पंक्ति का समर्थन करती है। आप मेजर बलवंत की वह पंक्ति भी पढ लीजिए-
मेरे दिमाग में इस हत्याकाण्ड की बहुत ही अनोखी कहानी बन रही है और मैं सोच रहा हूं कि जब भी हत्यारे को गिरफ्तार किया जाएगा तो क्या मैं उसे हत्यारा सिद्ध कर सकूंगा ?"
पाठक मित्रो 'जापानी पंखा' एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है । उपन्यास में लगभग 12 हत्याएं होती हैं और उन हत्याओं का कारण और कर्ता मेजर बलवंत, अपनी टीम और पुलिस के सहयोग से ढूंढता है। उपन्यास मनोरंजन और रोचकता से भरपूर है। उपन्यास के विषय में एक बात जो विशेष रूप से कहना चाहता हूँ वह है कि इसमें कर्नल रंजीत की लेखन शैली का उच्चतम रूप देखा जा सकता है। कर्नल रंजीत के समस्त ढंग इस उपन्यास में शामिल हैं जैसे विचित्र हत्यारा, हत्या का जापानी ढंग, मेजर की सीटी, ज्यादा पात्र, शृंखलाबद्ध हत्याएं, पात्रों का बड़बड़ाना आदि।
अगर आप कर्नल रंजीत के उपन्यासों को समझना चाहते हैं तो यह उपन्यास आप स्वयं पढें । हालांकि कुछ कमियां रह जाना स्वाभाविक है लेकिन वह आपने मनोरंजन और कर्नल रंजीत की शैली को प्रभावित नहीं करती ।
अब उपन्यास के कुछ और किस्से देख लेते हैं:-
विशेषताएँ:-
ज्यादा पात्र:-
कर्नल रंजीत के उपन्यासों में पात्रों की संख्या हमेशा ज्यादा ही रही है। लेकिन यहाँ तो उन्होंने एक ऐसा परिवार दिखा दिया जो उपन्यास पात्रों से भी बड़ा है-
अरबपती व्यापारी रमानाथ कौशल का परिवार बहुत बड़ा मालूम होता था, क्योंकि उनके लम्बे-चौड़े मकान के कम से कम अस्सी कमरे उनके परिवार के लोगों से आबाद थे और वे सब कोई न कोई बड़ा व्यापार कर रहे थे।(पृष्ठ-22)
शब्दों की बड़बडाहट-
कर्नल रंजीत के बहुत से उपन्यासों में पात्र इस प्रकार बड़बड़ाते रहते हैं।
- मत मारो, मत मारो फूल सी चीज है मत मारो।(दुल्हन की चीख)
- गंदी आत्मा- गंदी आत्मा (हत्यारे की पत्नी)
-वह हमारे बच्चों के आगे आएगा और शायद हमें भी उसका परिणाम भुगतना पड़े ।(जापानी पंखा)
नये शब्द:-
कर्नल रंजीत के उपन्यासों में कुछ ऐसे शब्द भी इस्तेमाल किये जाते थे जो समय अनुसार लुप्त हो गये।
जैसे- मुहरनी । (बार-बार एक ही वाक्य/ शब्द को दोहराना)
मेजर बार-बार कह रहा था, "एक नहीं, दो।"
"यह एक-दो का क्या चक्कर है?" सोनिया ने पूछा ।
लकड़ी का चित्रण:-
इनके उपन्यासों में अकसर अखरोट, बादाम या अन्य कीमती लकड़ी का वर्णन मिलता है।
- अनिता ने दीवार पर नीरा का चित्र अखरोट के सुंदर फ्रेम में लटका देखा था ।(पृष्ठ-23)
हत्या के अजीब तरीके:-
जैसा हम ऊपर चर्चा कर चुके है कर्नल रंजीत के उपन्यासों में हत्या के तरीके बहुत ही अजीब होते हैं। पाठक चकित रह जाता है। प्रस्तुत उपन्यास में भी हत्या के दो तरीके इस्तेमाल होते हैं जो अजीब हैं।
एक तो जापानी तरीका जो आप ऊपर पढ चुके हैं और दूसरा तरीका है एक अजीब ढंग से सम्मोहित करने का ।
दिल बहुत घबराया तो मैं बोटिंग करने चली गई। अचानक मुझे अपनी आंखों के सामने झिलमिला-हट-सी महसूस हुई। मैंने गंगा के दूसरे किनारे पर उसी स्त्री को देखा । वह अपनी सफेद साड़ी उतारकर उससे कुछ सिगनल कर रही थी। उसके पीछे कोई व्यक्ति खड़ा था। उससे बहुत ही ऊंचा । उसने वकीलों जैसा काला नहीं सफेद चोगा पहन रखा था। उस चोगे के दो हिस्से थे और वे दोनों हिस्से सफेद बाज पक्षी के परों की तरह फड़फड़ा रहे थे; जैसे वह अपने चोगे से सिगनल कर रहा हो। साड़ी और चोगे की फड़फड़ाहट से विचित्र प्रकार की झिल-मिलाहट पैदा हो रही थी। मेरी आंखें चुंधिया गई। मेरा सिर चकराने लगा और फिर न जाने मुझे क्या हुआ कि मैं अपनी साड़ी उतारकर गंगा में कूद गई।
मेजर बलवंत के शे'र-
"शे'र ! हां, शे'र इस समय टॉनिक सिद्ध होगा। लो; शे'र हाज़िर है :
नकली हर एक चीज है, हर शै बनावटी,
बच्चे भी अब घरों में मिलेंगे बनावटी ।"
"आप अपने शे'रों से पत्थरों को भी हंसा सकते हैं।" इस बार सुधीर ने दाद दी और हंसने लगा ।(पृष्ठ-29)
कुछ असंभव सा-
मैं यह भी जानता था कि इतने लम्बे समय के बाद आदमी की उंगलियों के निशान बदल सकते हैं(पृष्ठ-57)
क्या यह सही बात है ? क्या सच में उंगलियोंके निशान बदल जाते हैं या फिर लेखक महोदय ने अपनी सरलता के लिए ऐसा तर्क प्रस्तुत कर दिया ।
एक और असंभव सा प्रकरण देखें-
सोलह फुट का व्यक्ति मिसेज़ डुडले के मकान में रोशनदान में खड़ा होकर मिसेज़ हुडले के पलंग तक पहुंचा था। उसने गला घोंटकर मिसेज डुडले की हत्या कर दी और बन्द कमरे में से मिसेज डुडले की लाश उठा ले गया।(पृष्ठ-125)
एक और दृश्य देखें-
दस फुट का वह आदमी एकदम से सोलह फुट का हो गया था और मेजर की गोली उस आदमी की लंबी टांगों में से गुज़र गई थी ।
आदमी का कद छोटा- बड़ा होने का प्रयोग वेदप्रकाश काम्बोज जी के उपन्यास.... में भी देखने को मिला था । वह वहां भी अतार्किक था और यहाँ भी ।
असमंजस:-
एक यही प्रकरण मेरी समझ में नहीं आया। कौनसी स्त्री कब क्या बन जाती है और क्यों बन जाती है। अब एक ही स्त्री स्वयं के अतिरिक्त दो- दो और रूप शारण कर रही है जबकि उन्हीं के रूप वाली वास्तविक स्त्रियाँ भी उपस्थित हैं।
पत्थर पर बैठी हुई स्त्री ने दो स्त्रियों के मेकअप बनाए । मृत स्त्री और उस इलाके में घूमने वाली स्त्री का मेकअप । खैर, उस स्त्री को ढूंढ़ने की कोशिश की जाएगी जो इस इलाके में तुम्हें अकसर घूमती हुई मिली।" मेजर ने कहा (16)
समकालीन समस्या चित्रण :-
मेजर ने वह खबर पढ़कर जोर से मेज पर मुक्का मारा और न जाने क्यों वह भाषण देने लगा, "भारतवासी भाईचारे और मानव-प्रेम के लिए सारे संसार में प्रसिद्ध हैं, लेकिन इस सदी में इस जाति का आचरण बिगड़ चुका है। मुनाफाखोरी ही सबसे बड़ा धर्म बन गया है। भारतीय जाति जो सांपों पर भी दया करती थी, जो पांव तले च्यूटी तक को कुचलने से डरती थी, आज थोड़े-से लाभ या मुनाफे के लिए चीज़ों में मिलावट करके अपने देशवासियों को मौत के घाट उतारने से भी नहीं हिचकिचाती। इन मिलावट करने वालों को इस बात की कोई चिन्ता नहीं कि मनुष्य जीता है या मरता है। इनको चन्द टके चाहिए। इतने लोग महायुद्धों में नहीं मरते जितने इस मिलावट से। समाज के ये शत्रु देश को कमजोर और बीमार बना रहे हैं। ये लोग आम किस्म के हत्यारों से भी अधिक जालिम और भयानक हत्यारे हैं। ऐसे लोगों को गढों में डालकर कुत्तों से नुचवाना चाहिए। इनकी आत्मा मर चुकी है और इन्हें भगवान तक का भय नहीं। हम अपनी महान संस्कृति की इस प्रकार धज्जियां उड़ा रहे हैं कि हमें शर्म से डूब मरना चाहिए। मेरा बस चले तो मैं ऐसे लोगों को उनके घिनौने ठिकानों से निकाल-निकालकर चौराहे पर गोली मार दूं। हमारी सरकार ऐसे लोगों को कड़ा दण्ड देने की घोषणा तो करती है, लेकिन आज तक किसी-को वैसा दण्ड नहीं दिया गया। इन मुनाफाखोर मिलावट करने वालों ने देश के कोने-कोने में भ्रष्टाचार की दुर्गन्ध फैला रखी है..."
आदमी का कद छोटा- बड़ा होने का प्रयोग वेदप्रकाश काम्बोज जी के उपन्यास.... में भी देखने को मिला था । वह वहां भी अतार्किक था और यहाँ भी ।
असमंजस:-
एक यही प्रकरण मेरी समझ में नहीं आया। कौनसी स्त्री कब क्या बन जाती है और क्यों बन जाती है। अब एक ही स्त्री स्वयं के अतिरिक्त दो- दो और रूप शारण कर रही है जबकि उन्हीं के रूप वाली वास्तविक स्त्रियाँ भी उपस्थित हैं।
पत्थर पर बैठी हुई स्त्री ने दो स्त्रियों के मेकअप बनाए । मृत स्त्री और उस इलाके में घूमने वाली स्त्री का मेकअप । खैर, उस स्त्री को ढूंढ़ने की कोशिश की जाएगी जो इस इलाके में तुम्हें अकसर घूमती हुई मिली।" मेजर ने कहा (16)
समकालीन समस्या चित्रण :-
मेजर ने वह खबर पढ़कर जोर से मेज पर मुक्का मारा और न जाने क्यों वह भाषण देने लगा, "भारतवासी भाईचारे और मानव-प्रेम के लिए सारे संसार में प्रसिद्ध हैं, लेकिन इस सदी में इस जाति का आचरण बिगड़ चुका है। मुनाफाखोरी ही सबसे बड़ा धर्म बन गया है। भारतीय जाति जो सांपों पर भी दया करती थी, जो पांव तले च्यूटी तक को कुचलने से डरती थी, आज थोड़े-से लाभ या मुनाफे के लिए चीज़ों में मिलावट करके अपने देशवासियों को मौत के घाट उतारने से भी नहीं हिचकिचाती। इन मिलावट करने वालों को इस बात की कोई चिन्ता नहीं कि मनुष्य जीता है या मरता है। इनको चन्द टके चाहिए। इतने लोग महायुद्धों में नहीं मरते जितने इस मिलावट से। समाज के ये शत्रु देश को कमजोर और बीमार बना रहे हैं। ये लोग आम किस्म के हत्यारों से भी अधिक जालिम और भयानक हत्यारे हैं। ऐसे लोगों को गढों में डालकर कुत्तों से नुचवाना चाहिए। इनकी आत्मा मर चुकी है और इन्हें भगवान तक का भय नहीं। हम अपनी महान संस्कृति की इस प्रकार धज्जियां उड़ा रहे हैं कि हमें शर्म से डूब मरना चाहिए। मेरा बस चले तो मैं ऐसे लोगों को उनके घिनौने ठिकानों से निकाल-निकालकर चौराहे पर गोली मार दूं। हमारी सरकार ऐसे लोगों को कड़ा दण्ड देने की घोषणा तो करती है, लेकिन आज तक किसी-को वैसा दण्ड नहीं दिया गया। इन मुनाफाखोर मिलावट करने वालों ने देश के कोने-कोने में भ्रष्टाचार की दुर्गन्ध फैला रखी है..."
निष्कर्ष:- कर्नल रंजीत द्वारा लिखित 'जापानी पंखा' एक मर्डर मिस्ट्री रचना है। वाराणसी शहर में हो रहे शृंखलाबद्ध हत्याओं की जांच मेजर बलवंत द्वारा होती है। उपन्यास में हत्याओं के अतिरिक्त बहुत सी रहस्यमयी और विचित्र घटनाएं उपन्यास में आती जो पाठक का भरपूर मनोरंजन के करती हैं।
चलते- चलते मेजर के विषय में दो शब्द-
मेजर की ख्याति अब इतनी फैल चुकी थी कि भारत का हर पुलिस कर्मचारी उसके नाम से परिचित हो चुका था।(31)
उपन्यास- जापानी पंखा
लेखक- कर्नल रंजीत
संस्करण- 1974
पृष्ठ - 128
प्रकाशक- हिंद पॉकेट बुक्स, दिल्ली
कर्नल रंजीत के अन्य उपन्यासों की समीक्षा
विजय दुर्ग का रहस्य ।। मेजर बलवंत बांगलादेश में ।। नकली चेहरे ।। उलटी लाशें ।। प्रेतात्मा की डायरी ।। पीले बिच्छू ।। आग का समंदर ।। रात के अंधेरे में ।। भयानक बौने ।। देख लिया तेरा कानून ।। टेडा मकान ।। हत्यारा पुल ।। रेत की दीवार ।। जानी दुश्मन ।। चीखती चट्टानें ।। खून के छींटें ।। सिरकटी लाशें ।। सफेद खून ।। चांदी की मछली ।। काला चश्मा ।। बोलते सिक्के ।। 11 बजकर 12 मिनट ।। हांगकांग के हत्यारे ।। लहू और मिट्टी ।। मृत्यु भक्त ।। वह कौन था ।। सांप की बेटी ।। खामोश ! मौत आती है ।। काली आंधी ।। हत्या का रहस्य ।। अधूरी औरत ।। ट्रेन एक्सीडेंट ।। हत्यारे की पत्नी ।। खूनी बदला ।।
विजय दुर्ग का रहस्य ।। मेजर बलवंत बांगलादेश में ।। नकली चेहरे ।। उलटी लाशें ।। प्रेतात्मा की डायरी ।। पीले बिच्छू ।। आग का समंदर ।। रात के अंधेरे में ।। भयानक बौने ।। देख लिया तेरा कानून ।। टेडा मकान ।। हत्यारा पुल ।। रेत की दीवार ।। जानी दुश्मन ।। चीखती चट्टानें ।। खून के छींटें ।। सिरकटी लाशें ।। सफेद खून ।। चांदी की मछली ।। काला चश्मा ।। बोलते सिक्के ।। 11 बजकर 12 मिनट ।। हांगकांग के हत्यारे ।। लहू और मिट्टी ।। मृत्यु भक्त ।। वह कौन था ।। सांप की बेटी ।। खामोश ! मौत आती है ।। काली आंधी ।। हत्या का रहस्य ।। अधूरी औरत ।। ट्रेन एक्सीडेंट ।। हत्यारे की पत्नी ।। खूनी बदला ।।

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