Monday, 2 March 2026

711. ट्रेन एक्सीडेंट- कर्नल रंजीत

 कहानी नकली दवाइयों की 
ट्रेन एक्सीडेंट- कर्नल रंजीत- 1983

इन दिनों मैं कर्नल रंजीत के उपन्यास ही पढ रहा हूँ। संगरिया (हनुमानगढ़, राजस्थान) निवासी मित्र श्री रतन चौधरी जी से कर्नल रंजीत के 15 उपन्यास लेकर आया था वर अब उन्हीं को पढने का क्रम जारी है।
 और इस क्रम में मेरा यह छठा उपन्यास है। इस से पूर्व में 'पीले बिच्छू, प्रेतात्मा की डायरी, उलटी लाशें, नकली चेहरे और जापानी पंखा' पढ चुका हूँ। 
अद्भुत कथाओं के लेखक कर्नल रंजीत का एक और रोमांच से भरपूर उपन्यास 'ट्रेन एक्सीडेंट' पढा। यह उपन्यास उनकी विशिष्ट शैली में लिखा गया है। जिसनें रहस्यमयी पात्र और उलझाव से भरपूर कहानी का आनंद मिलेगा । 

हिन्दी जासूसरी उपन्यासों के क्षेत्र में रिकार्ड कायम करने वाले कर्नल रंजीत का एक जबर्दस्त सनसनी खेज उपन्यास - ट्रेन एक्सीडेंट
इस उपन्यास में आप पढ़ेंगे -
- अपनी खुशबू से बेहोशी की नींद सुलाने वाली सुन्दरी के अद्भुत कारनामे
- गेरूए वस्त्र धारण किये साधु- बालकों का हत्याकांड
- कृष्ण की मूर्ति द्वारा जबर्दस्त बम विस्फोट
- मेजर बलवंत के घर में जबर्दस्त अग्निकांड
- वैज्ञानिकों की जीभ का काटा जाना और उनके कानों के पर्दों का फाड़ दिया जाना 
हैरानी से भरे हथकंडों की सस्पेंस भरी रोमांचक कहानी -ट्रेन एक्सीडेंट 
    हम उपन्यास की समीक्षा से पूर्व प्रस्तुत उपन्यास के प्रथम पृष्ठ का अवलोकन करते हैं और फिर इस उपन्यास की समीक्षा करते हैं।
रहस्यमयी युवती
मेजर बलवंत ने अपनी कलाई पर बंधी बड़ी के रेडियम डायल पर एक नजर डाली। रात के ठीक ग्यारह बजे थे ।
उसने एक लम्बी सांस ली और अपने चारों ओर बिखरी ऊबड़-खाबड़ वीरान पहाड़ियों की ओर देखने लगा, जो उस प्राचीन मन्दिर के चारों ओर किसी दुर्ग की दीवारों की तरह खड़ी हुई थीं।
   आकाश पर अचानक घिर आने वाली काली घटाओं ने उस अंधेरी रात के अन्धकार को केवल बढ़ा ही नहीं दिया था, बल्कि उसे भयावह भी बना दिया था। रात के घनघोर अंधेरे और भयानक सन्नाटे की चादर में लिपटे प्राचीन मन्दिर के खंडहर और उसके चारों ओर बिखरी वीरान तथा उजाड़ पहा-ड़ियां बहुत ही डरावनी दिखाई दे रही यीं।
चारों ओर दीवारों की तरह खड़ी पहाड़ियों के साथ-साथ बना मन्दिर का परकोटा स्थान-स्थान से टूट गया था। उस परकोटे में बने प्रवेश-द्वार और उसके साथ-साथ बनी इमारतें भी टूटकर मलबे का ढेर बन गई थीं। मन्दिर के गर्भगृह को छोड़कर उसके चारों ओर बने कक्ष भी टूट गए थे। केवल खड़े रह गए थे काले पत्थर की चट्टानों को तराशकर बनाए गए कलापूर्ण स्तम्भ, जिन पर किसी कलाकार के कुशल हाथों ने छैनी और हथौड़ी की सहायता से देवी-देवताओं की मूर्तियां इतनी कुशलता से उकेरी थीं कि सदियां बीत जाने के बाद भी उनका सौन्दर्य आज भी सजीव था।
न जाने किसने कब समुद्र के किनारे इन वीरान पहाड़ियों के बीच इस मन्दिर का निर्माण कराया था। मन्दिर में कोई मूति नहीं थी इसलिए यह अनुमान लगाना भी कठिन था कि यह किस देवता का मन्दिर था ।(ट्रेन एक्सीडेंट- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)
      कस्टम विभाग के इंस्पेक्टर सत्यदेव तिवारी के पुत्र का जन्मदिन है और सत्यदेव तिवारी अभी तक घर नहीं पहुंचे। घर सदस्य उनका इंतजार करते -करते थक कर सो जाते हैं। इंस्पेक्टर सत्यदेव तिवारी तो देर रात तक भी नहीं लौटते लेकिन उनकी पत्नी गीता के साथ एक अजीब घटना घटित होती है। अर्धरात्रि को उनके घर पर एक रहस्यमयी स्त्री का आना।
      उसने (गीता) आश्चर्य और उत्सुकता से आंखें फाड़कर देखा । बेडरूम के दरवाजे के बीचोंबीच सफेद चमकीले गाउन में निपटी एक युवती खड़ी थी जिसके सुनहरे बाल उसके कन्धों पर झूल रहे थे। उसके गले में बड़े-बड़े काले मोतियों की माला थी जो उसके सीने के उभारों को छूती हुई उसकी नाभि तक लटकी हुई थी। उसके सुन्दर चेहरे को उनकी मादक और बेहद चमकीली आंखों ने और भी अधिक मोहक और आकर्षक बना दिया था । उसके पतले-पतले गुलाबी होंठो पर बहुत ही प्यारी और मासूम-सी मुसकराहट चिपकी हुई थी। (पृष्ठ-19)
       बिजनेस मैन अशोक ठक्कर जब रात को घर नहीं लौटा तो उसकी बहन सुप्रिया और मीना को भी चिंता हुयी की आखिर अशोक ठक्कर कहां रह गया और उसी रात वह रहस्यमयी स्त्री सुप्रिया को भी मिली।
"आप - आप- कौन हैं ?" सुप्रिया ने उसके सुन्दर चेहरे पर नजरें गड़ाते हुए पूछा ।
"तुम मुझे नहीं जानतीं सुप्रिया ? मैं भाग्य की देवी हूं !"(पृष्ठ-28)
लेकिन उस रात वर्षा की रात को एक सड़क पर एक गाड़ी में अशोक ठक्कर मृत्यु अवस्था में पाया गया और उसकी हत्या निर्दयता से की गयी थी। 
       दिलीप मोदी मेजर बलवंत का घनिष्ठ मित्र था जो एक छोटी बच्ची सीमा को लेकर मेजर के पास आता है। दिलीप के अनुसार एक रहस्यमयी और सफेद वस्त्रों वाली युवती सीमा की माँ और बहन को कहीं ले गयी और आज तक वह दोनों वापस नहीं लौटी और अब वह रहस्यमयी स्त्री सीमा को खोज रही है।
अपने साथियों के साथ मेजर इसी विषय पर चर्चा कर रहा था और चर्चा से ही बात आगे बढती है और बात में से ही बात निकलती है जैसे यहाँ बात आगे बढी-
"कौन-सी बात ?" मेजर बलवंत ने पूछा ।
"वही सफेद चमकीले गाउन और सुनहरे बालों वाली युवती ।"
"हां, इस आधार पर तो यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इन घटनाओं के पीछे किसी एक ही व्यक्ति या एक ही गिरोह का हाथ है। लेकिन यह समझ में नहीं आ रहा कि इन घटनाओं में परस्पर क्या सम्बन्ध है। जहां तक मेरा खयाल है अशोक ठक्कर इस्पेक्टर सत्यदेव तिवारी और सीमा की मां और दीदी एक दूसरे को जानते भी नहीं होंगे।" मेजर बलवंत ने अपना विचार प्रकट किया ।(पृष्ठ-95)
    मेजर बलवंत अभी तक इस रहस्य को समझ नहीं पाया था कि आखिर वह रहस्यमयी युवती है कौन और वह क्या चाहती है‌। इसके अतिरिक्त स्वयं मेजर बलवंत के घर पर एक खतरनाक हमला हो चुका था उन्हें मकान की क्षति उठानी पड़ी थी। कुछ और उपन्यासों में भी अपराधियों ने मेजर के घर पर सीधा हमला किया है। यहां भी उनके घर पर विस्फोट हुआ पर कोई जान की हानि नहीं हुयी।
  मेजर बलवंत अभी रहस्यमयी युवती और अन्य घटनाओं में उलझा हुआ था कि मुम्बई के एक रेलवे स्टेशन पर चार रेलगाड़ियों की खतरनाक भिडंत हो गयी । जिसमें मृतकों और घायकों की संख्या बहुत ज्यादा थी लेकिन प्रशासन और स्थानीय जनता के सहयोग से इस भीषण दुर्घटना को अतिशीघ्र संभाल लिया गया। लेकिन कभी-कभी घटनाएं इस ढंग से घटित होती हैं कि हम सोच भी नहीं सकते और ऐसा ही यहां हुआ । एक भीषण दुर्घटना को जितना जल्दी संभाल लिया गया उसकी कल्पना कोई भी नहीं कर सकता था लेकिन घायलों को जिस अस्पताल में ले जाया गया वहाँ लगाये जाने वाली इंजेक्शन घायलों को अतिशीघ्र मृतकों में बदल लिया और ट्रेन एक्सीडेंट के बाद लगा था कि इस दुर्घटना को कितना जल्दी संभाल लिया गया वह जहरीले इंजेक्शनों ने सब खत्म कर दिया।
     वहीं प्रशासन ने भी मेजर बलवंत को इस घटना के पीछे दोषियों को खोजने की जिम्मदारी दे दी।
"आज की घटना जितनी भयंकर और दुखद है, उतनी ही रहस्यपूर्ण भी है।" इंस्पेक्टर रत्नाकर ने कहा, "और इस रहस्यपूर्ण घटना की गुत्थी सुलझाने का काम आपको सौंपा गया है।" इंस्पेक्टर रत्नाकर ने कहा।
“मैं तो आपके कहने से पहले ही यह निश्चय कर चुका था कि उन नर-पिशाचों को खोजकर ही दम लूंगा, जिन्होंने इतने निर्दोष इंसानों के प्राण लिए हैं।" मेजर बलवंत ने कहा।(पृष्ठ-129)
       और फिर पुलिस और अपने सहयोगी सुधीर, सुनील, डोरा, सोनिया और मालती (इस बार क्रोकोडायल का कहीं जिक्र नहीं) के साथ मेजर बलवंत इस केस पर सक्रिय हो जाता है । कहानी विभिन्न पहलुओं से गुजरती है औए बहुत सारी और भी घटनाएं घटित होती हैं जो विशेष भी हैं और कहानी को आगे भी बढाती हैं।
    कर्नल रंजीत के उपन्यासों में कुछ घटनाक्रम अजीब होते हैं।‌ जैसे यहाँ एक रहस्यमयी युवती को दिखाया गया है, उपन्यास 'जापानी पंखा' में भी ऐसे रहस्यमयी पात्र मिलते हैं।
कर्नल रंजीत के उपन्यासों में घटनाएं सामान्यतः साधारण ढंग से कभी घटित नहीं होती बल्कि हर घटना एक अजीब से ढंग से घटित होती और अपराधीवर्ग तो और भी अजीब ढंग से कार्य करता है। 
       इनके उपन्यासों में कहानी के अंत तक आते-आते कोई न कोई विदेशी अपराधी शामिल हो जाता है जिसमें ज्यादातर स्मग्लर होते हैं जो स्थानीय अपराधी के साथ मिलकर काम‌ करते हैं और स्थानीय अपराधी के किसी कृत्य का प्रतिशोध भी लेते हैं या उसमें शामिल होते हैं।
महत्वपूर्ण- उपन्यास में मनुष्य के लालच और प्रतिशोध का अच्‍छा विवरण दिया गया है। मनुष्य लालच और प्रतिशोध के वलते ऐसे कदम उठा लेता है जिसका अंत बहुत भयानक होता है। क्योंक लालच और प्रतिशोध मनुष्य को अंधा कर देते हैं, उसकी सोच को सीमित कर देते हैं।
अपराध का कारण- 
               संसार में जितने भी अपराध अब तक हुये हैं, हो रहे हैं, या जो भविष्य में होंगे उनमें से 75 प्रतिशत अपराध के तीन ही मूल कारण हैं। जर यानी धन, जमीन यानी अचल संपत्ति और जोरू यानी औरत ।(पृष्ठ-179)
चरित्र-चित्रण
           उपन्यास में वैसे तो बहुत पात्र हैं‌ लेकिन जो एक विशेष पात्र है वह है एक रहस्यमयी युवती हो उपन्यास के आरम्भ से अंत तक छायी रहती है। उसका का चित्रण यहाँ प्रस्तुत है-
सफेद चमकीले गाउन वाली युवती के बाल सुनहरे थे जो हृवा के धीमे-धीमे झोंकों के साथ उसके सेब जैसे सुर्ख गालों और चौड़े माथे से खेल रहे थे। उसकी गर्दन में काले और बड़े-बड़े मोतियों की लम्बी-सी माला थी जो उसकी छातियों के उभारों को चूमती हुई उसकी नाभि तक लटकी हुई थी। उसकी आंखें बड़ी-बड़ी और बहुत ही नशीली तथा चमकीली थीं। लगता था जैसे उसने ढेर सारा काजल डाल रखा हो । उसके पतले-पलले गुलाबी होठों पर बहुत ही मादक मुसकराहट थिरक रही थी।(पृष्ठ-27)
संवाद-
कभी-कभी इंसान को ऐसी चीजों पर भी विश्वास करना पड़ जाता है जिनके अस्तित्व को न तो उसका मन स्वीकार करता है न मस्तिष्क ।(पृष्ठ-37)
- असन्तुलन, भेदभाव और ऊंच-नीच ही संसार के तमाम अपराधों को जन्म देते हैं। मनुष्यस्वभाव से कभी अपराधी नहीं होता लेकिन यह सामाजिक, आर्थिक और आज के राजनीति प्रधान युद्ध का राजनैतिक असन्तुलन ही उसे अपराधी बनने पर विवश कर देता है।"(66)
क्या यह संभव है ?
कार के अंदर कुछ उंगलियों के निशान मिले हैं। ये निशान एक स्त्री और एक पुरुष की उंगलियों के निशान हैं । (50) 
        क्या फिंगरप्रिंट से स्त्री- पुरुष की पहचान हो सकती है ?
शीर्षक- अगर बात करें उपन्यास के शीर्षक 'ट्रेन एक्सीडेंट' की तो यह एक भ्रामक शीर्षक है।‌ उपन्यास में ट्रेन एक्सीडेंट की घटना अवश्य घटित होती है लेकिन उस घटना का इस कथा से कोई संबंध नहीं है। हां, जो घायल व्यक्ति हास्पिटल जाते हैं और उनके साथ जो घटित होता है वह अवश्य उपन्यास का महत्वपूर्ण अंश है।‌ लेकिन ट्रेन एक्सीडेंट का कोई और किसी प्रकार का कहानी से संबंध स्थापित नहीं होता, इसलिए यह एक भ्रामक शीर्षक है।
  कर्नल रंजीत द्वारा लिखित 'ट्रेन एक्सीडेंट' एक थ्रिलर- मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है। जहां आरम्भ में मेजर बलवंत कुछ हत्याओं की खोजबीन करता है वहीं ट्रेन एक्सीडेंट के बाद उन लोगों को तलाश करता है जो नकली दवाइयों का कारोबार करते हैं। 
उपन्यास पूर्णतः कर्नल रंजीत शैली का है जिसमें ज्यादा पात्र, उलझाव वाली कहानी, तहखाने, रहस्यमयी पात्र आदि शामिल हैं। 

उपन्यास-  ट्रेन एक्सीडेंट
लेखक-     कर्नल रंजीत
पृष्ठ-         210
सन् -       1983
प्रकाशक- हिंद पॉकेट बुक्स, दिल्ली

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