Thursday, 26 March 2026

खूनी बदला- कर्नल रंजीत -1980

एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास
खूनी बदला- कर्नल रंजीत- 1980

जवानी की दहलीज पर पैर रखते ही रुक्मिणी देवी ऐसी भयंकर भूल कर बैठती है, जो समाज की निगाह में पाप है। वे चाहती हैं कि उनका पाप छिपा रहे और बेटी पर उस पाप की छाया भी न पड़े। जवान होकर बेटी भी वही पाप कर बैठती है। जीवन का यह रहस्य जैसे-जैसे, जिस-जिस पर प्रकट होता जाता है, एक मोटी औरत वैसे ही उन लोगों की हत्या करती जाती है। पाप बदले का रूप धारण कर लेता है।
बदला लेने वाली औरत कौन है, इसके लिए पढ़िए, रहस्य-रोमांच के चितेरे कर्नल रंजीत का नया उपन्यास - खूनी बदला

    आप इन दिनों @svnlibrary पर लगातार पढ रहे हैं कर्नल रंजीत के उपन्यासों की समीक्षा । मित्र रतन चौधरी से प्राप्त कर्नल रंजीत के उपन्यासों को पढा जा रहा है और उन्हीं से प्राप्त उपन्यास 'खूनी बदला' की समीक्षाएं यहां प्रस्तुत है।
  कर्नल रंजीत के उपन्यास मर्डर मिस्ट्री और प्रतिशोध युक्त होते हैं। प्रस्तुत उपन्यास भी इसी आधार पर रचित एक मनोरंजक उपन्यास है।
हत्या और अपहरण
रात आधी से अधिक बीत चुकी थी। दूज का चन्द्रमा अपनी हल्की-सी झलक दिखाकर अस्त हो चुका था। अंधेरा इतना बना था कि आकाश पर फैले हुए तारे उस अंधेरे को भगाने में असमर्थ थे।
    अंधेरे के साथ-साथ चारों ओर छाए सन्नाटे ने उस अंधेरी रात की भयावहता को और अधिक बढ़ाया था। झींगुरों की अनवरत झंकार को बेंधकर कभी-कभी नाइटगाडों के भारी बूटों की आवाज सुनाई दे जाती थी, जो गेट के इस कोने से उस कोने तक चलकर अपने ऊपर छाई हुई सुस्ती को दूर कर लेते थे।
        आहिस्ता से बंगले के ड्राइंगरूम का दरवाजा खुला और सिर से पांव तक काली चादर में एक साया दबे पांव दरवाजेसे निकलकर बंगले के बाहरी बरामदे के खम्भे की आड़ लेकर खड़ा हो गया ।
    उसकी नजरें उन दोनों नाइटगार्डों  पर जर्म गई जो अपनी-अपनी राइफले कन्धे पर रखे, बंगले के गेट के इस छोर से उस छोर तक लेपट-राइड करते हुए राउण्ड लगा रहे थे। स्याङ् पादर में लिपटा साया कुछ देर खम्भे की आड़ में खड़ा सन्तरियों को देखता रहा। फिर दबे पांव बंगले की दोवार की जाड़ लेकर बंगले के पिछवाड़ की ओर बढ़ने लगा।
    पिछवाड़े की ओर बढ़ते-बढ़ते वह एक खुली हुई खिड़की के पास पहुंचकर रुक गया। उपने आहिस्ता से खुली हुई खिड़की की चौखट से कान लगा दिए । अंदर से केवल धीमे-धीमे खर्राटों की आवाज सुनाई दे रही थी ।
(प्रथम पृष्ठ से)
    यह कहानी आरम्भ होती है करुणा नामक एक युवती से जो अपनी सहेली...के पास से दूसरे शहर से अपने शहर लौट रही है। मौसम खराब है और क्षेत्र पहाड़ी । खराब मौसम में करूणा अपनी सहेली के घर से तो चल पड़ती है लेकिन अपने घर नहीं पहुँच पाती । करूणा की माता रूक्मिनी देवी अपनी पुत्री का इंतजार करते-करते पुलिस की शरण लेती है और पुलिस भी अंत में रूक्मिनी देवी को मेजर बलवंत का सुझाव देती है।
"आखिर करुणा कहां चली गई?" रुक्मिणी देवी को करुणा के अतिरिक्त कुछ सूझ ही नहीं रहा था।
"रुक्मिणी देवी मुझे भी कुछ सूझ नहीं रहा। मैं आपको एक परामर्श देना चाहता हूं। यह एक ऐसा मामला है जिसे प्रसिद्ध जासूस मेजर बलवंत ही सुलझा सकते हैं। लेकिन मैं यह नहीं कह सकता कि मेजर बलवंत इस मामूली काम को अपने हाथ में लेने के लिए तैयार होंगे या नहीं, सब इंस्पेक्टर बालिगा ने कहा। 
"मैं किसी भी तरह मेजर बलवंत को राजी कर लूंगी," रुक्मिणी ने कहा। उनकी बदहवासी बढ़ती जा रही थी।
(26)
    और रुक्मिणी देवी अपनी पुत्री की खोज के लिए मेजर बलवंत से मिलती है और वह अपने एकमात्र सहारा पुत्री करूणा के गायब होने की व्यथाकथा मेजर बलवंत को सुनाती है।
मेजर रुक्मिणी की ओर देखने लगा तो रुक्मिणी देवी ने कहा, "मेरा नाम रुक्मिणीदेवी है। करनक रोड पर मेरा बंगला है। उसका नम्बर सी २१२ हैं। मेजर साहब, मैं विधवा हूं। मेरी एक ही बेटी है करुणा। वह कल सुबह साढ़े नौ बजे पूना से बम्बई रवाना हुई थी। लेकिन अब तक घर नहीं पहुंची। यथा आप एक मां की ममतामयी भावनाओं का विचार करके मेरी सहायता करेंगे ?" (27)
    और इस तरह मेजर बलवंत का प्रवेश इस कहानी में होता है। मेजर बलवंत के साथ उसके साथी सोनिया, सुनील, मालती, डोरा और सुधीर और प्रशिक्षित कुत्ता क्रोकोडायल भी आता है।   
       वहीं दूसरी तरफ एक और घटना घटित हो गयी और घटना क्या दुर्घटना है और वह भी अत्यंत दुखद। और यह दुखद घटना इंस्पेक्टर बालिगा ने मेजर बलवंत को दी-
"जी हां, हार्नबी रोड पर 'माडर्न कास्मेटिक्स' नाम की एक दुकान में अभी थोड़ी देर पहले चार, व्यक्तियों को गोली मार दी गई है।"(पृष्ठ-33)
  बूढे हरमजजी जी के दुकान 'माॅडर्न काॅस्मेटिक' पर जहां हरमजजी बुरी तरह से घायल हो गये वहीं एक बूढा गुजराती, क्रिश्चियन बुढिया और सैल्समैन युवक और युवती शशि मरने वालों में शामिल थे । और शशि लापता करूणा की सहेली थी। 
  जहां अभी तक मेजर बलवंत करूणा को लापता मान रहे थे वहीं करूणा की सहेली शशि की मृत्यु बाद उन्हें मामला कुछ संदिग्ध लगा। और फिर मेजर बलवंत ने अपने साथियों और पुलिस के सहयोग ने इस खोजबीन को आगे बढाया लेकिन जैसे-जैसे यह खोजबीन आगे बढती गयी तो उसी के साथ हत्याओं का सिलसिला भी बढ जाता है।
     "विचित्र मामला है जिसके न सिर का पता चल रहा है न पैर का । हत्याएं क्यों की जा रही हैं ? और ये हत्याएं कौन कर रहा है ?" मालती बोली ।(173)
हालांकि मालती के इस प्रश्न का उत्तर मेजर बलवंत के पास भी नहीं था और वह भी सोच रहा था यह अजीब हत्याएं क्यों हो रही हैं और यह हत्या भी सामूहिक और वीभत्स हैं।
"मेरा ऐसा अनुमान है कि सामूहिक रूप से होने वाली  ये घटनाएं किसी सुनियोजित षड्यंत्र का परिणाम हैं। क्योंकि जिन स्त्रियों का अपहरण किया जाता है वे जिन्दा नहीं मिलती बल्कि उनकी लाशें मिलती है। जिन लड़कियों या स्त्रियों के साथ बलात्कार किया जाता है वे भी अपने ऊपर किए गए अत्याचार की कहानी सुनाने के लिए जिन्दा नहीं रहतीं। मुझे लगता है कि अपहरण, बलात्कार और हत्याओं का यह एक ऐसा क्रम है, जो परस्पर जुड़ा हुआ है। मैं अपनी ओर से पूरी-पूरी कोशिश कर रहा है।"- मेजर बलवंत ने गंभीर स्वर में कहा ।(76)
        अपनी भागदौड़ के बाद वह इतना तो जान पाया कि इन हत्याओं का कहीं न कहीं संबंध 'गज्जर क्लब' से अवश्य है क्योंकि मरने वाले किसी न किसी रूप से उस क्लब से संबंध रखते हैं।
और यह गज्जर क्लब क्या है?
       किदवई रोड पर गज्जर क्लब बिल्डिग किसी राजभवन की तरह दिखाई दे रही थी। बिल्डिग के चारों ओर बड़े-बड़े लॉन थे। आउटडोर गेम्स के लिए शानदार फोर्ट बने हुए थे । बिल्डिंग के पीछे बहुत ही खूबसूरत स्विमिंग पूल था जिसमें किनारों पर कई छोटे-छोटे केबिन बने हुए थे, जिन्हें तैरने बाले कपड़े बदलने और वाराम करने के लिए इस्तेमाल कर सकते थे। हर केबिन में सीमेन्ट और कांक्रीट का बना हुआ। 6 फुट लम्बा और तीन फुट चौड़ा चबूतरा बना हुआ था। इन केबिनों को सबसे बड़ी विशेषता फेबिन के बारों ओर बनी शीशे की दीवारें थीं, जिनके कारण अन्दर बैठा व्यक्ति तो बाहर की हर भोज को बिल्कुल साफ-साफ देख सकता था लेकिन बाहर दीवार में आंख लगाकर देखने पर भी अंदर का कुछ नहीं दिखाई देता था ।(पृष्ठ- 15)
  यह तो है गज्जर क्लब का बाहरी रूप और अंदरूनी रूप इसका अत्यंत वीभत्स है। यह क्लब रंगीन लोगों की अय्याशी का केन्द्र है। और इसी क्लब का ध्यान में रखकर जब मेजर बलवंत आगे बढता है तो उसका सामना एक मोटी औरत से होता है। क्योंकि कुछ लोगों के शब्दों में उसका वर्णन आता है। और फिर मेजर बलवंत, उसके साथी और पुलिस मिलकर आखिर इस रहस्य को हल कर ही लेते हैं और जब वास्तविक अपराधी सामने आता है तो पाठक भी चकित रह जाता है कि आखिर कर्नल रंजीत ने 'टोपी में से खरगोश' कैसे निकाला ।
   पाठक मित्रो, उपन्यास का अंत बिलकुल भी उचित नहीं लगता। अब और तो क्या कहें, कहना का अर्थ होगा कहानी का 'रहस्य' खोलना । इसलिए आप स्वयं ही पढ लीजिए, और न भी पढेंगे तो काम चलेगा। दर असल कर्नल रंजीत के उपन्यासों का कथानक जितना अच्छे और रहस्यमयी ढंग से होता है, जितने विचित्र पात्र और कथानक आगे बढता है उतने अच्छे ढंग से समापन नहीं होता । इसका एक कारण तो यह है कर्नल रंजीत साहब कहानी को बहुत ज्यादा उलझाव और पात्रों से भर देते हैं फिर उनको व्यवस्थित करने के चक्कर में समापन का आनंद खत्म कर देते हैं।
गज्जर क्लब के संस्थापक और उनके विषय में जो कुछ भी है वह तर्कसंगत नहीं है। फिर वही बात ज्यादा कहना कथानक का आनंद खत्म करने जैसा है। 
और- मेजर के होंठ गोल हो गये और वह सीटी बजाने लगा ।
   
शे'र-
अब मेजर बलवंत के कुछ शे'र पढकर आनंद लीजिए।
- अब न वह पहले से दिन हैं और न वो पहली सी रात,
आज महंगाई ने महंगे कर दिए मर्ग-ओ-हयात'

(मौत और जिंदगी)
- झूठ बोला साथ उसके आंख दिखलाने,
लगे झूठ की भद उड गई तो फिर वो हकलाने लगे
। (89)

- ये भाड़े का युग ऊधम और स्यापा करा लो,
     दिखा नोट अपनी जगह रोने वाले बुला लो
। 
तथ्यात्मक :-
कर्नल रंजीत अपने उपन्यासों में कुछ पात्रों का परिचय समुदाय / जाति आदि आधार पर तय करते थे। विशेषकर उन पात्रों का परिचय जिनकी भूमिका नगण्य होती थी।
प्रस्तुत उपन्यास में भी 'क्रिश्चिन औरत' और 'बूढा गुजराती' शब्द प्रयोग में लिये गये हैं।
अगली सुबह नाश्ते के बाद मेजर ने मालती और डोरा से और कहा, "तुम दोनों हरमजजी की दुकान में जाओ। और हरमज जी से पूछो कि उनकी दुकान में काम करने वाला देवकान्त, बूढ़ा गुजराती और वह क्रिश्चियन औरत कहां रहते थे ? बहुत सम्भव है कि वह बूढ़ा गुजराती और वह क्रिश्चियन औरत हरमजजी के स्थाई ग्राहक हों, उन तीनों वे पते मालूम करके आओ ।"(55)
           नशीली दवाओं का धंधा, गज्जर क्लब में विलासिता का नंगा नाच, स्वीमिंग पूल में तैरती लाशें, मां के हाथों प्यारी बेटी की हत्या- ये कुछ घटनाएं इतनी सनसनीखेज और हैरत में डालते वाली हैं कि आप कहानी का एक छोर पकड़ते है तो दूसरा छोर हाथ से छूट जाता है।
      एक ही औरत के इर्द-गिर्द हैरतभरे कारनामों से भरपूर कर्नल रंजीत का नया जासूसी उपन्यास-खूनी बदला
(अंतिम आवरण पृष्ठ से)
कर्नल रंजीत द्वारा लिखा गया 'खूनी बदला' एक प्रतिशोध मर्डर मिस्ट्री रचना है। उपन्यास का कथानक जितने अच्छे ढंग से आरम्भ होता है लेकिन उतने अच्छे ढंग से खत्म नहीं होता।  उपन्यास का शीर्षक 'खूनी बदला' है लेकिन बदले का तरीका और बदला किस से लिया जा रहा है यह अजीब सा लगता है। वैसे आदमी जब जवानी के जोश में होता है तो वह बहुत सी गलतियाँ जाने-अनजाने कर बैठता है और वहीं गलतियाँ कभी-कभी उसकी जिंदगी का नासूर बन जाती हैं।
खूनी बदला एक मर्डर मिस्ट्री है जिसमें खून और खून होते हैं और अंत असली अपराधी के पकड़े जाने पर होता है।

उपन्यास-  खूनी बदला
लेखक-     कर्नल रंजीत
संस्करण-  1980
पृष्ठ-          220
प्रकाशक-  हिंद पॉकेट बुक्स, दिल्ली 

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1 comment:

  1. अपराध कथा का समापन ढंग से करना बड़ा मुश्किल काम है। कम ही लोग ऐसा ढंग से कर पाते हैं। शुरुआत तो फिर भी हो जाती है पर उसे उसके सही समापन तक ले जाने में परेशानी आ जाती है। फिर उस समय तो शायद हर महीने एक उपन्यास लाने का प्रेशर भी रहता रहा होगा। खैर, अभी तक कर्नल रंजीत के उपन्यास पढ़ने का मौका नहीं मिला है। मिलेगा तो कुछ को तो अवश्य ही पढ़ने की कोशिश रहेगी।

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