Saturday, 21 March 2026

हत्यारे की पत्नी- कर्नल रंजीत -1974

समान नाम के लोगों की हत्या का रहस्य
हत्यारे की पत्नी- कर्नल रंजीत -1974

यह 29 साल का रहस्य क्या है ? 
प्रत्येक आदमी दो बार कैसे मर रहा है ? 
हत्या करने वाला किस महान शक्ति का दास है ? 
और मरने वाले को कैसे पता चल जाता है कि उसकी मौत का दिन आ पहुंचा है ?
अपराध-जगत् की सबसे सनसनीखेज और आश्चर्यजनक घटना, जिसमें हत्या तो होती है पर हत्यारा कोई नहीं। मेजर बलवन्त के चारों तरफ एक मायाजाल-सा बुन जाता है। उसे अपराधी का नहीं प्रकृति और भाग्य के गूढ़तम रहस्य का पता लगाना है। वह रहस्य क्या है ? और मेजर बलवन्त उसका कैसे पता लगाता है ?
कर्नल रंजीत ने इस नवीनतम उपन्यास में एकदम अछूते विषय को छुआ है। विषय हजारों साल से उलझा हुआ है और उसे मेजर बलवन्त जैसा तीक्ष्णबुद्धि जासूस ही सुलझा सकता था ।

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के संगरिया तहसील के निवासी मित्र रतन चौधरी से प्राप्त कर्नल रंजीत के उपन्यासों का रसास्वादन इन दिनों जारी है।  कर्नल रंजीत अपनी रहस्यमयी कहानियों के लिए जाने जाते हैं । उलझाव वाली कहानियाँ, रहस्यमयी पात्र और विचित्र हत्यारे और छोटे-छोटे तथ्य उनकी उपन्यासों की विशिष्ट पहचान है। इन दिनों कर्नल रंजीत द्वारा लिखित उपन्यास 'हत्यारे की पत्नी' पढा, यह एक अलग स्तर का कथानक है‌ और कर्नल रंजीत के परम्परागत उपन्यासों से कुछ अलग भी है। हालांकि यह एक मर्डर मिस्ट्री रचना है और उपन्यास में हत्याओं की विशेषता है उनतीस वर्ष पश्चाताप एक जैसे नाम वाले व्यक्तियों की हत्या का होना । उनतीस वर्ष पहले जिस नाम के व्यक्ति की हत्या हुयी ठीक उनतीस वर्ष पश्चात उसी नाम के व्यक्ति की हत्या ठीक उसी जगह हुयी । और यह समान नाम की हत्याओं का सिलसिला जब चलता है तो पूरा अमृतसर शहर चकित रह जाता है। आखिर उनतीस वर्ष का यह रहस्य क्या था ?
   
       पुल पर मौत
धर्मवीर बहुत उदास और निराश था। उसके मन और मस्तिष्क पर निराशा, उदासी और अरुचि छाई हुई थी। किसी भी काम में उसका मन नहीं लग रहा था। उसे लग रहा था जैसे वह अपनी जिन्दगी गुजार चुका है और बीती हुई जिन्दगी को दोहरा रहा है या जबर्दस्ती घसीट रहा है। उसके मन में एक आशंका और भी थी कि उसे अधिक दिन जीवित नहीं रहना है। क्यों ? इस प्रश्न का उसके पास कोई उत्तर न था । उसके दिल में अक्सर यह आवाज उठा करती थी: 'तुम्हें अपना काम पूरा करना है, फिर इस दुनिया को छोड़ देना है !'
धर्मवीर बस में बैठा विचारों में खोया हुआ था। वह यह नहीं जानता था कि वह अचानक ही अमृतसर क्यों जा रहा है। कई दिन से कोई अज्ञात शक्ति उसे अमृतसर की ओर धकेलती रही थी। वह शक्ति क्या थी, उसे मालूम न था । वह 29 वर्ष का सुन्दर और स्वस्थ युवक था । उसका लालन-पालन और शिक्षा दिल्ली में ही हुई थी। बीस वर्ष की उम्र हुई थी कि मां भगवान को प्यारी हो गई। कालेज से निकला तो पिता चल बसे । वह अपने मां-बाप का इकलौता बेटा था । रिश्तेदारों से उसके मां-वाप की पहले ही अनबन थी । वह दुनिया में अकेला रह गया । दो वर्ष तो उसने पिता के छोड़े हुए पैसे से बिता लिए । फिर उसे एक प्राइवेट फर्म में क्लर्क की नौकरी मिल गई। कुछ दिनों बाद उसे सरकारी नौकरी मिल गई। और जैसे ही उसे सरकारी नौकरी मिली, रिश्ते आने लगे । 26 वर्ष की उम्र में उसने शादी कर ली । शादी को आज तीन वर्ष हो चुके हैं। उसकी पत्नी मिलनसार, हंसमुख और सुन्दर है, लेकिन सब कुछ होते हुए भी न जाने क्यों धर्मवीर पर मौत का वहम छाया रहता है। वह यह कहकर अपनी पत्नी को भी डराता और रुलाता रहता था कि उसे अधिक दिन नहीं जीना है।
(प्रथम पृष्ठ)
      नमस्ते पाठक मित्रो, 
आज हम फिर कर्नल रंजीत के उपन्‍यास की समीक्षा की राह पर चलते हैं और आज हम जिस उपन्यास की चर्चा यहाँ कर रहे हैं वह मर्डर मिस्ट्री होते हूए भी एक अलग तरह की रचना है जिसे सुलझाना हर किसी के लिए संभव न था, स्वयं मेजर बलवंत भी इस रहस्यमयी केस में उलझ चुके थे।
  यह कहानी है दिल्ली निवासी धर्मवीर की। धर्मवीर शादीशुदा युवा है और उसे एक बैचेनी अमृतसर खींच लाती है। और अमृतसर आना ही उसके जी का जंजाल बन जाता है । अमृतसर पहुंचते ही उसे वहां के दृश्य और लोग परिचित नजर आने लगते हैं। और उस वक्त तो वह हैरान रह जाता है जब एक 29 वर्षीय युवक उससे मिलता है । एक पुल पर दोनों जब मिलते हैं उस युवक की हत्या कर दी जाती है और वह युवक अविनाश वहीं धर्मवीर की बाहों में दम तोड़ देता है।‌ और यहीं धर्मवीर को रहस्यमयी बात पता चलती है की आज से 29 साल पहले भी यहां अविनाश नामक एक युवक ने धर्मवीर नामक युवक की बाहों में दम तोड़ा था । अब धर्मवीर हैरान -परेशान है । यह कैसे संभव था । और जब धर्मवीर मृतक अविनाश की माँ से मिलकर लौटता है तो वह अत्यंत बैचेन हो उठता है।
धर्मवीर की आंखों के आगे तारे नाच उठे । कैसी विचित्र बातें सामने आ रही थीं ? वह अपने मरे हुए मित्र से मिलने आ पहुंचा था । अगर अविनाश 29 साल पहले मर चुका है, तो पुल पर मरने वाला अविनाश कौन है ? अविनाश की मां तो उसे यह भी बता रही है कि धर्मवीर यानी वह स्वयं 29 साल पहले मर चुका है। यह किस्सा क्या है ?(पृष्ठ-15) 
    यह कैसे संभव था कि 29 साल पुराना घटनाक्रम दोबारा दोहराया जा रहा था ।  और यह बात यहीं नहीं ठहरती आगे भी समान नाम के लोगों की हत्या होती है। जलियांवाला बाग में  रंभा नामक युवती की पीठ में छुरा भोंककर हत्या उस समय कर दी जाती है जब वह अजनबी युवती धर्मवीर की बाहों में थी । आज से 29 साल पहले भी रंभा नामक युवती की वहां पर हत्या हो चुकी थी। 
स्वयं धर्मवीर परेशान था की वह क्यों अजनबी लोगों से मिल रहा है और क्यों उन अजनबी लोगों की हत्या हो रही है‌ । क्यों मरने वाले 29 साल के थे और क्यों उनके नाम 29 साल पहले मर चुके लोगों से मिलते थे ।
         अगले दिन अखबारों में एक ही दिन में रम्भा और अविनाश की रहस्यपूर्ण हत्या की कहानी प्रकाशित हुई तो नगर के विचारक और चिन्तक वर्ग ने यह स्वीकार कर लिया कि हत्या की ये वारदातें बहुत ही रहस्यपूर्ण हैं और मानवीय मस्तिष्क इन वारदातों की गहराई तक नहीं पहुंच सकता ।
        अगले दिन दो अर्थियां आगे-पीछे उठीं। इन दो मौतों ने नगर के समूचे वातावरण को शोकपूर्ण बना दिया ।
(p-38)
     मेजर बलवंत उन दिनों अमृतसर में सेना के जवानों को ट्रेनिंग देने आया हुआ था । वह अपने उच्च अधिकारी कर्नल सरदाना के घर पर अपने साथी मालती, सुधीर, डोरा, सोनिया, क्रोकोडायल के साथ ठहता हुआ था ।  कर्नल सरदाना के एक मात्र पुत्र की जब हत्या हो जाती है तो उसकी जांच का काम मिलता है मेजर बलवंत को । और यह हत्या भी 29 साल की रहस्य से ही संबंध रखती है। मेजर बलवंत और साथियों के लिए 29 साल की पहेली हल हो ही नहीं पा रही थी।
यह केस इतना उलझा हुआ था की मेजर बलवंत को भी कहना पड़ा-
"यह मेरे जीवन का सर्वाधिक रहस्यपूर्ण केस है ।" (पृष्ठ-37)
   इधर मेजर बलवंत अपने साथियों के साथ इस रहस्यमयी केस को हल करने की कोशिश करता है और उधर समान नाम के लोगों की हत्या का यह क्रम आगे बढता जाता है। नौकरानी बसंती और सत्येन्द्र भी ऐसे ही नाम है यहां उनके नाम के लोगों की 29 वर्ष पहले हत्या हो चुकी है। पर घटनाक्रम में एक बात अलग ऊपरी है और वही तथ्य मेजर बलवंत की पकड़ में आता है हालांकि वह हत्याओं के इस सिलसिले को नहीं समझ पाते, हत्यारे को नहीं ढूंढ पाते ।
मेजर बलवन्त कसमसाने लगा कि उसे यह भेद क्यों नहीं मालूम हो रहा था कि एक ही नाम के दो आदमी हुए थे । उनमें से एक उनतीस साल पहले किसी दूसरे ढंग से मारा गया और फिर उनतीस साल के बाद वही आदमी दूसरे ढंग से मार डाला गया । यह रहस्य क्या है ? (पृष्ठ-77-78)
    इसी रहस्य का नाम है -हत्यारे की  पत्नी । और इस रहस्य के बीच में है मेजर बलवंत जो इस घटनाक्रम को हल करना चाहता है। दिल्ली निवासी धर्मवीर पहली बात किसी 'अज्ञात शक्ति' के अधीन होकर जब अमृतसर आता है तो उसे यहाँ सब परिचित सा मालूम होता है। और फिर कुछ अजनबी लोग धर्मवीर से मिलते हैं और कोई 'अज्ञात व्यक्ति' उनकी हत्या कर देता है और पुलिस का संदेह जाता है धर्मवीर पर। फिर तो कभी युवक तो कभी कोई युवती, कभी दुर्गाना मंदिर, कभी जलियांवाला बाग तो कभी किसी घर में मारी जाती है। अब रोचक बात यह है कि मरने वालों की उम्र लगभग 29 वर्ष है, और दूसरा इस घटना से 29 वर्ष पहले भी उसी जगह 29 वर्ष के युवक/युवती कॊ हत्या हो चुकी है। और आज के 29 वर्ष पूर्व के मृतक का नाम समान है। यह सब समान नाम के लोग ठीक 29 वर्ष बाद उसी जगह क्यों मर रहे थे ?
इसी रहस्य में उलझ चुका था मेजर बलवंत-
"यह उनतीस वर्ष का चक्कर हमारे लिए चक्रव्यूह बनता जा रहा है, जिसे कोई अभिमन्यु ही तोड़ सकता है।" सोनिया बोली और मुस्कराकर मेजर की ओर देखने लगी ।
"उनतीस साल के इस चक्कर ने मुझे बहुत परेशान कर रखा है।" मेजर ने कहा
।(59)
शे'र-
   कर्नल रंजीत के उपन्यासों में मेजर बलवंत अपने साथियों की इच्छा पर शे'र अवश्य सुनाता है।  शे'र आप भी देख लीजिए-
“मास्टर से मार वह खाई कि चिड़ियाघर बने, 
हम कभी मुर्गा, कभी मोर और कभी बंदर बने ।"

मालती उछल-उछलकर दाद देने लगी। उसके दाद देने का अंदाज ऐसा था जैसे उसने शे'र न सुना हो बल्कि उसके दिल पर छुरी चल गई हो ।(39)
     मुझे नहीं लगता कि यह शे'र इतने विशेष होते हैं जितनी की प्रशंसा मेजर बलवंत के साथी करते हैं। 
एक और शे'र देखें।
"उठाया, बिठाया, लिटाया, कभी चुटकियों से जगाया, 
शबे वस्ल उसने हमें अच्छा जोकर बनाया ।"(91)
संवाद-
   उपन्यास में संवाद इतने महत्वपूर्ण नहीं है जिन्हें याद रखा जा सके। फिर भी एक सूक्ति मुझे बहुत अच्छी लगी।
"मौत सब कुछ समाप्त कर देती है- घृणा भी, द्वेष भी, ईर्ष्या भी । (पृष्ठ-72) 
मेजर बलवंत का एक और लम्बा संवाद देखें जो कहानी के अतिरिक्त मेजर बलवंत की विचारधारा को भी स्पष्ट करता है क्योंकि मेजर अंधविश्वास और भूतप्रेत को नहीं मानते । (हालांकि उपन्यास 'प्रेतात्मा की डायरी' में अलौकिक शक्ति का स्पष्ट वर्णन मिलता है)
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मेजर ने अपनी कहानी आरम्भ की, 'मैं अन्धविश्वासों और चमत्कारों को नहीं मानता और न स्वर्ग-नरक में विश्वास करता हूं। मृत्यु के बाद मरने वाले के साथ क्या गुजरती है, इस सम्बन्ध में विभिन्न धार्मिक पुस्तकों में भिन्न-भिन्न ढंग से, लेकिन लगभग एक जैसे ही विचार लिखे हुए हैं। मनुष्य के जन्म लेने के सम्बन्ध में भी विभिन्न धर्माचार्यों ने अपने-अपने अलग-अलग मत प्रकट किए हैं। लेकिन इन तमाम धार्मिक ग्रन्थों में जन्म और मृत्यु के सम्बन्ध में जो भी कुछ लिखा है उनमें वास्तविकता कम है और कल्पना की उड़ान अधिक है, इसीलिए इन बातों पर कोई भी बुद्धिजीवी विश्वास नहीं कर पाता। विश्व के लगभग सभी बड़े-बड़े ग्रन्थों का अच्छी तरह अध्ययन और उन पर मनन करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि जिस प्रकार मृत्यु निश्चित है उसी प्रकार जन्म भी निश्चित है। यह तो सच है कि शरीर नश्वर है और आत्मा अमर है। इसीलिए मृत्यु के बाद जन्म मृतक शरीर का नहीं आत्मा का होता है। क्योंकि शरीर तो मृत्यु के बाद ही नष्ट हो जाता है इसलिए उस शरीर का पुनर्जन्म सम्भव नहीं है, लेकिन आत्मा का पुनर्जन्म निश्चित रूप से होता है ऐसी मेरी निश्चित धारणा है।
"(पृष्ठ-124)
समापन:- इतनी उलझाव वाली कहानी का अंत हर कोई जानना चाहेगा। मुझे भी जानना था और मेजर बलवंत को भी। कुछ बातें एक पात्र को पता थी और वह अमृतसर से निकल चुका था । अब कहानी मेजर को ही सुनानी थी और उसने सुनाई भी। 
मेजर कहीं भी कोई तथ्य स्पष्ट नहीं कर पाये। सबसे बड़ा रहस्य तो यही था कि 29 वर्ष बाद ही क्यों घटित हुआ और हुआ तो क्यों हुआ। कहीं कुछ स्पष्ट नहीं है और इस उपन्यास की सबसे बड़ी कमी इसका समापन है। 
किसी और लेखक महोदय को आगे आकर इसका समापन अच्छे ढंग से करने का प्रयास करना चाहिए।
तथ्यात्मक-
कर्नल रंजीत के उपन्यासों में कुछ छोटी-छोटी बातों पर भी विशेष ध्यान दिया जाता । यह कभी-कभी रोचक और कभी -कभी हास्यास्पद भी जान पड़ता था।
प्रस्तुत उपन्यास में 'लाहौरी ईंटों का मकान' की चर्चा भी कुछ ऐसी ही है। अब हर कोई कैसे समझेगा यह लाहौरी ईंटों का मकान है। 
वहीं मेजर बलवंत कुछ बातें ऐसी कह देते हैं जो असंभव सी प्रतीत होती है। पहले आप पढ ही लीजिए- 
- मैं समझता हूं कि कल अविनाश की हत्या के समय जो स्त्री हाथ में मूलियों से भरी टोकरी लेकर पुल पर जा रही थी उसने अविनाश की हत्या नहीं की। हत्यारा उसके पीछे था । संभव है वह स्त्री रोजाना तीसरे पहर सब्जी खरीदकर पुल पर से गुजरती हो। तुम दोनों उस स्त्री की तलाश करो । हो सकता है वह स्त्री तुम्हें मिल जाए। अगर वह मिल जाए तो यह जानने की कोशिश करना कि वह स्त्री कैसी है। अगर भली हो तो उससे पूछना कि कल उसके पीछे कौन था और उसका हुलिया कैसा था ?"(p-40)
   और हैरानी तब होती है वह स्त्री मिल भी जाती है और वह कहती है वह तो 29-30 साल से नियमित रूप से यहां से सब्जी लेकर निकलती हूँ। ।
   उसका कहना है कि जब वह कुंवारी थी उस समय भी वह नियमित रूप से इसी समय सब्ज़ी लेकर पुल पर से गुजरा करती थी। उसे याद है कि आज से उनतीस वर्ष पहले, जब वह उन्नीस वर्ष की थी, उसने ऐसी ही दुर्घटना देखी थी । 
ऐसे पात्र सिर्फ कर्नल रंजीत के उपन्यासों में ही देखे जा सकते हैं। वहीं कर्नल रंजीत को जिस ढंग से तथ्य(सबूत, गवाह) एकत्र करने होते हैं वह उसी ढंग से उन्हें सृजित कर देते हैं। 
वहीं रम्भा के पिताजी द्वारा 'गंदी आत्मा- गंदी आत्मा' कहना भी कर्नल रंजीत के खास ढंग में से एक है।
नये शब्द- 
कर्नल रंजीत के उपन्यासों में कुछ ऐसे शब्द भी आपको मिल जायेंगे जो वर्तमान में बहुत कम प्रयुक्त होते हैं।
जैसे - सरसाम (अर्द्धबेहोशी की अवस्था में बड़बड़ाना)
उपन्यास शीर्षक:- उपन्यास का शीर्षक उपन्यास के अनुरूप नहीं है । उपन्यास का शीर्षक है 'हत्यारे की पत्नी' और यहां किस हत्यारे की कौनसी पत्नी है यह कहीं कुछ भी स्पष्ट नहीं है। और स्पष्ट भी हो जाये तब भी शीर्षक कथा अनुरूप नहीं है।
  कर्नल रंजीत द्वारा लिखित 'हत्यारे की पत्नी' उपन्यास का आरम्भ और कथानक बहुत रोचक है। पाठक अंत तक इन घटनाओं को सोचता रह जाता है की आखिर यह सब क्यों घटित हो रहा है। ऐसा कथानक इस से पहले मैंने नाम मात्र ही पढा है । उपन्यास का समापन कथा अनुरूप न हो सका।

उपन्यास-  हत्यारे की पत्नी
लेखक -   कर्नल रंजीत
संस्करण- 1974
पृष्ठ-         132
प्रकाशक- हिंद पॉकेट बुक्स, दिल्ली

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नकली चेहरे ।।  उलटी लाशें ।। प्रेतात्मा की डायरी ।। 
पीले बिच्छू ।। आग का समंदर ।। रात के अंधेरे में ।।
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