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Sunday, 23 April 2023

562. जीरोलैण्ड- परशुराम शर्मा

जानिये रहस्य जीरोलैण्ड का
जीरोलैण्ड- परशुराम शर्मा

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में कुछ ऐसे विषय हैं जिन पर विभिन्न लेखकों ने लिखा है। और यह विषय भी स्वयं इस क्षेत्र के लेखकों द्वारा पैदा किये गये काल्पनिक विषय हैं। या यूं कहें लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में एक काल्पनिक संसार की रचना की गयी और उस संसार पर विभिन्न लेखकों ने अपने-अपने अनुसार लेखन किया। जैसे- जीरोलैण्ड, मर्डरलैण्ड, मैकाबर

    आज यहाँ हम बात कर रहे है परशुराम शर्मा जी द्वारा लिखे गये उपन्यास 'जीरोलैण्ड' की। जीरोलैण्ड एक काल्पनिक कथा संसार है जिसकी रचना इब्ने सफी साहब ने की थी।
'जीरोलैण्ड' उपन्यास का आरम्भ एक रहस्यमयी इमारत से होता है।
जीरोलैण्ड- परशुराम शर्मा

  इमारत का नाम था ‘पागल महल’।
गेट पर जहां ‘पागल महल’ की प्लेट लगी थी उसी के नीचे इमारत के स्वामी का नाम लिखा था।
‘राजेश बिहारी एम. एस. सी. पी. एच. डी. आक्ससन।’
राजाराम दयाल फटी-फटी आंखों से इस इमारत को देख रहा था।

Tuesday, 22 November 2022

544. सुलग उठे अंगारे- परशुराम शर्मा

कहानी वारसिला की राजकुमारी की

सुलग उठे अंगारे- परशुराम शर्मा

'जी.. मैं...मगर आप यहां कब तशरीफ ले आए सर?"
"मैं तुम लोगों को कभी भी अनजाने खतरे में नहीं छोड़ता और यदि मैं लापरवाह होता तो आज तुम अवश्य दूसरे लोक में पहुंच जाते। तुम्हारे डिनर पर मौत का पूरा सामान मौजूद था।"

यह सीक्रेट सर्विस के बास पवन का भर्राया स्वर था। पवन...!

वह इन्सान, जिससे सीक्रेट सर्विस के सभी एजेण्ट कांपते थे। पवन उस फरिश्ते के समान था, जो हर समय साए के समान अपने एजेण्टों को अनजान खतरों से बचाया करता था । मदन अक्सर राजेश पर पवन होने का सन्देह करता था, लेकिन अनेक अवसर ऐसे भी आए जबकि राजेश की मौजूदगी में पवन उसके सामने आ चुका था ।

वास्तव में खुद राजेश ही सीक्रेट सर्विस का चीफ पवन था, किन्तु अवसर आने पर 'फाइव टू' भी पवन का रोल अदा करना था। इस रहस्य को 'फाइव टू' के अलावा और कोई भी नहीं जानता था ।

मदन सोचने लगा-क्या राजेश की मृत्यु की सूचना बाॅस को मिल चुकी होगी ? यदि नहीं मिली तो वह किन शब्दों में सूचना दे। पवन के सामने ऐसी सूचना सुनाना अपने मुँह पर तमाचा मारना था, लेकिन तुरन्त ही उसे अपने विचारों पर हँसी आ गयी। (उपन्यास अंश)

Thursday, 30 December 2021

495. बंगला नम्बर 420 - परशुराम शर्मा

कहानी एक भूतिया बंगले की
बंगला नम्बर-420- परशुराम शर्मा  

    
लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में परशुराम शर्मा एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके पाठकों का एक विस्तृत क्षेत्र है। वर्तमान में विभिन्न प्रकाशको से उनके उपन्यास पुनः प्रकाशित हो रहे हैं।
    प्रस्तुत उपन्यास 'बंगला नम्बर 420' उनके उपन्यास 'कानून की आँख' का द्वितीय और अंतिम भाग है। यह एक जिन्न पर आधारित हाॅरर उपन्यास है। 

पहला बयान
"और जब मेरी आँख खुली तो न सिर्फ मेरा बेडरूम, मेरा लिबास अजनबी था बल्कि मेरा जिस्म और मेरी शक्ल भी अपनी नहीं थी। मैं अपने बंगले में सोया था पर आँख खुली बंगला नंबर 420 में।
दूसरा बयान
“मैंने खुद अपनी लाश बंगला नंबर 420 में देखी है, इंस्पेक्टर।”
तीसरा बयान
“धुएं का आदमी – हाँ – धुएं का आदमी। वह इंसानों का खून पीता है और जिसका भी खून वो पी लेता है वो उसका गुलाम होकर रह जाता है । बंगला नंबर 420 में उसकी पूजा होती है।”
हॉरर, थ्रिल और सस्पेंस से लबरेज सुप्रसिद्ध लेखक परशुराम शर्मा का महाविशेषांक। 

494. कानून की आँख - परशुराम शर्मा

जाना था जापान, पहुँच गये चीन...
कानून की आँख - परशुराम शर्मा

    आदरणीय परशुराम शर्मा जी का प्रस्तुत उपन्यास किंडल पर को मिला।
  सबसे पहले किंडल पर लिखा गया सारांश देखें 
अगर कोई कत्ल हो जाये और उसका न्याय मांगने वाला पुलिस के समक्ष कोई न हो– तब पुलिस और कानून क्या करेगा....?
अगर किसी अपराधी की इतनी पकड़ हो कि वह अदालत तक गवाही को पहुँचने ही न दे तब न्यायाधीश किस तरह अपराधी को सजा देगा....?
अगर पुलिस किसी निर्दोष पर डकैती दिखाकर उसका एनकाउंटर कर दे तो कानून पुलिस को क्या सजा देगा....?
और अगर समाज के सफेदपोश इज्जतदार, धनवान व्यक्ति जरायम में लिप्त हों– कानून और पुलिस अधिकारी उनके घिनौने जुर्मों में साझेदार हों– उनके विरुद्ध कहीं कोई सबूत ही न हो– उनके बलबूते पर चुनाव जीते जाते हों, ऐसे लोगों से क्या कोई व्यक्ति कानून से इंसाफ मांग सकता है...?
ऐसे सभी पात्रों से मुलाकात करिये, जिनके लिए अरविन्द को अर्जुन बनना पड़ा और कानून से इंसाफ मांगने के लिए जंगल का कानून लागू कर दिया।

Friday, 26 November 2021

475. चाँद पर हंगामा- परशुराम शर्मा

जेम्स बॉण्ड का कारनामा
चाँद पर हंगामा- परशुराम शर्मा
हिंदी जासूसी उपन्यास साहित्य में परशुराम शर्मा जी एक प्रतिष्ठित नाम हैं। परशुराम शर्मा जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। लेखन, संगीत के साथ अभिनय में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुके हैं। परशुराम शर्मा जी के विषय में यह भी कहा जाता है जब अधिकांश उपन्यासकार लेखक अपने स्थापित पात्रों या शृंखला से बाहर ही नहीं निकल पा रहे थे उस समय परशुराम शर्मा जी ने थ्रिलर उपन्यास लिखकर अपनी एक विशिष्ट पहचान स्थापित की थी। 
   लेकिन कभी-कभी स्थापित लेखक को भी वक्त के साथ या प्रकाशक के आग्रह/ दबाव के चलते कुछ ऐसे उपन्यास लिखने पड़ जाते हैं जो उनकी लेखनी से अलग होते हैं। ऐसा ही एक उपन्यास है 'चाँद पर हंगामा'। यह जेम्स बॉण्ड सीरीज का उपन्यास है।

Saturday, 4 April 2020

287. खून बरसेगा- परशुराम शर्मा

मिश्र के पिरामिडों में दफन रहस्य
खून बरसेगा- परशुराम शर्मा, हाॅरर

          हम पहुँच गये हैं परशुराम शर्मा जी द्वारा लिखित हाॅरर उपन्यास के तृतीय भाग पर। यह एक हाॅरर शृंखला है जो 'मरघट' और 'पिशाच' नामक पडाव पार करके मिश्र के पिरामिडो में 'खून बरसेगा' शीर्षक से पहुंची है।
        अगर आप इस कथा का आनंद लेना चाहते हैं तो आपको यह तीन भागों में विभक्त शृंखला पढनी होगी, तभी आप इसका पूरा आनंद के पायेंगे।
        यह कहानी है डार्किकिंग नामक पिशाच की, जो मिश्र के पिरामिडो में दफन मम्मीयों के माध्यम से शक्ति प्राप्त कर सम्पूर्ण संसार पर शासन करना चाहता है।
रिकी, रामीज का आठवां जन्म था, इसलिए पिशाच योनि में आने के बाद उसने अपनी सुरक्षा के लिए रामीज के शरीर में आना उचित समझा।

         टाॅम विक्टर एक वह शख्स है जो डार्किकिंग को चुनौती देता है। लेकिन डार्ककिंग( रिकी या रामीज) से निपटना इतना आसान नहीं था। डार्ककिंग स्वयं कहता है- मैं कभी इस धरती से नहीं मिट सकता बेवकूफ क्योंकि मैं फिर ओन पिशाच हूँ। फिर ओन रुहों के देवता मेरे साथ हैं। मैं इस धरती पर आठवीं बार जन्मा था। ...."

क्या टाॅम विक्टर इस जंग में रामीज नामक पिशाच (डार्ककिंग) से जीत पाया। जहाँ रामीज के पास काली शक्तियां थी वहीं टाॅम विक्टर के पास उसका वफादार साथी जोजफ था- "मास्टर, हर बड़े आदमी की जंग के साथ उसके किसी न किसी सहयोगी का नाम लिखा जाता है। .....आप की लड़ाई धर्म की होगी और मेरी लड़ाई है, आपकी हिफाजत। आपके रास्ते में क ई आदमी रूकावट डाल सकते हैं, ऐसे आड़े वक्त के लिए मेरे हाथ हैं।"
           मिश्र के पिरामिडों में दफन अथाह दौलत के लिए पिशाच और मनुष्य में चली एक खूनी जंग। -धन का लोभ इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी है। इसके वह लिए वह वहशी बन जाता है, हत्यारा बन जाता है।
         रिकी/ डार्ककिंग/ रामीज/ पिशाच उस अथाह दौलत को प्राप्त करना चाहत था टाॅम विक्टर ( रिकी) जब उसके राह में आया तो टकराव होना ही था।
        जहाँ एक पिशाच था तो वहीं दूसरी तरफ एक पवित्र इंसान था।
जहाँ एक दौलत के लिए खून बहा सकता था वही दूसरा दौलत को परमार्थ में लगाना चाहता था।
      आखिर दोनों की टकर का परिणाम क्या रहा?

Thursday, 2 April 2020

286. पिशाच- परशुराम शर्मा

डार्ककिंग -कहानी खून‌ पीने वाले पिशाच की
पिशाच- परशुराम शर्मा, हाॅरर उपन्यास (द्वितीय भाग)

        हिन्दी लोकप्रिय उपन्यास साहित्य की एक धारा है 'हाॅरर' उपन्यासों की। इसी धारा में एक चर्चित लेखक हुए हैं परशुराम शर्मा। परशुराम शर्मा जी का तीन खण्डों में प्रकाशित हाॅरर उपन्यास के द्वितीय भाग के सम्बन्ध में मेरे विचार यहाँ प्रस्तुत है।
पिशाच उपन्यास परशुराम शर्मा जी के मरघट उपन्यास का द्वितीय भाग है और इस शृंखला का तृतीय और अंतिम भाग 'खून बरसेगा' शीर्षक से है।

"वह कौन था?"
"डार्ककिंग।"
"डार्ककिंग। यह नाम मैंने पहले कभी नहीं सुना।"
"इस नाम को यू समझो वह पिशाचों का बादशाह है।"

      यह कहानी है डार्ककिंग की अर्थात् एक पिशाच की। अगर आपने मरघट उपन्यास पढा है तो आपको पता होगा की कौन, कैसे डार्ककिंग बना।
      इस भाग में डार्ककिंग का सामना होता है टाॅम विक्टर से। और यह उपन्यास डार्ककिंग और टाॅम विक्टर के परस्पर संघर्ष पर आधारित है।
        जब टाॅम विक्टर(विकी) को पता चलता है की डार्ककिंग दौलताबाद में है तो वह भी उस तरफ चल देता है।- विकी अकेला दौलताबाद के लिए रवाना हो गया। उसे विश्वास था कि बहुत जल्दी उसकी मुलाकात डार्ककिंग से होने वाली है। एक पिशाच से निपटने के लिए विकी पूरी तरह से तैयार होकर गया था।
विकी जा पहुंचता है दौलताबाद - दौलताबाद कोई बड़ा शहर नहीं था। साधारण सा मध्यम दर्जे का कस्बा था। इसी दौलताबाद में एक पुरानी हवेली है- चित्रगढी। इस उपन्यास का आगे का घटनाक्रम इसी जगह पर आधारित है।

      डार्ककिंग दस गर्भवती महिलाओं का खून पीना चाहता है। दस गर्भवती महिलाओं का खून पीने के पश्चात उसमें असीम ताकत आ जायेगी। टाॅम विक्टर उसके राह में खड़ा है।
उपन्यास में टाॅम विक्टर का भी आगमन एक रहस्यमयी घटना से होता है।- टाॅम विक्टर उस स्त्री के शव को छोड़कर उठ खड़ा हुआ। वह सचमुच मर चुकी थी। एक निर्दोष मासूम स्त्री, जिसे कि उसने माध्यम बनाया था, उसकी ही गलतियों से न सिर्फ मर चुकी थी, बल्कि पिशाच योनि में जा चुकी थी। 


      डार्ककिंग एक खतरनाक पिशाच है जिसकी प्यास खून से ही बुझती है। - जिस प्रकार एक शेर या चीता इंसानी रक्त चखने के बाद सिर्फ आदमखोर हो जाता है और दूसरे जानवरों का शिकार बंद कर देता है,वहीं स्थिति खून पीने वाले पिशाच की होती है।
       टाॅम विक्टर ये सब क्यों करता है। इसका उत्तर तो पहले भाग में ही पता चल जाता है फिर भी दो पंक्तियाँ प्रस्तुत है।
"जब वह मनुष्य योनि में था तो मेरा अच्छा मित्र था।"- विकी का गला भर आया,-"और मैं उसे इस योनि से मुक्त कराना चाहता हूँ।
तो क्या टाॅम विक्टर अपने दोस्त को पिशाच योनि से मुक्त करवा पाया?

       इस उपन्यास का कथानक दौलताबाद पर आधारित है सारा घटनाक्रम तृतीय पुरुष में चलता है। वहीं पहले उपन्यास का घटनाक्रम प्रथम पुरुष में था और घटनास्थल भी अलग था।
       उपन्यास में घटनाएं एक हद तक सनसनी वाली हैं। लेकिन मुझे उपन्यास की तुलना में कुछ कमतर है।- दीप के साथ जैसे रोशनी जलती है, उसी प्रकार पिशाच की आँखें खुली। वह सुंदर नक्काशी किये ताबूत में सोया था और रात का अन्धेरा फैलते ही जाग गया था। उसके शरीर ने अंगड़ाई ली और वह उठकर खड़ा हो गया। फिर उसने आकाश की तरफ मुँह उठाया। उसकी आँखें एक सुराख को देख रही थी, जिसमें से एक-दो सितारे झिलमिला नजर आ रहे थे।
उसके मुँह से विचित्र स्वर निकले। यह आवाज बड़ी डरावनी थी। आवाज के साथ दलदल से रूहें बाहर निकलने लगी। मृत रूहें तहखानें में मडराने लगी और बड़ी शान के साथ चलता पिशाच एक स्थान‌ पर जाकर खड़ा हुआ।


       उपन्यास में पढते वक्त कुछ प्रश्न थे जो पिछले उपन्यास में अधूरे रह गये थे। उम्मीद थी इस उपन्यास में उनका उत्तर नहीं मिला और तृतीय और अंतिम भाग में भी वे प्रश्न अधूरे ही रह गये।
      कुछ घटनाएं अनावश्यक विस्तार पैदा करती हैं जैसे चित्रगढी के शासकों का जीवन परिचय देना।
मेरे विचार से उपन्यास में बहुत ज्यादा संशोधन की आवश्यकता थी।

यह उपन्यास भी प्रथम भाग की तरह ही रोचक और डरावना है पर बहुत से वे प्रश्न जो प्रथम भाग में उठे थे इस भाग में उनका उत्तर नहीं मिलता। कहानी मूल कथ्य से अतिरिक्त कहीं और ही चलने लगती है, हालांकि कहानी में रोचकता यथावत है पर पाठक जिन प्रश्नों के उत्तर यहाँ ढूंढना चाहता है वे उसे नहीं मिलते। हां, कुछ नये प्रश्न अवश्य पैदा होते है लेकिन उनके उत्तर भी उपन्यास में कहीं नजर नहीं आते और उपन्यास अपने तृतीय भाग कि तरफ बढता है। पर याद रहे, द्वितीय भाग में पहले और दूसरे भाग की कहानी खत्म हो जाती है, ऐसा प्रतीत होता है। पर कहानी अभी बाकी है मेरे दोस्त....
        तो फिर उपन्यास के तृतीय भाग में कहानी किस ओर बढती है? यह तो खैर तृतीय भाग पढने पर ही पता चलेगा।
तो आओ चले तृतीय भाग 'खून बरसेगा' की ओर।

उपन्यास- पिशाच
लेखक- परशुराम शर्मा

प्रकाशक- सूरज पॉकेट बुक्स 
 प्रथम भाग मरघट का लिंक- मरघट- परशुराम शर्मा

Wednesday, 1 April 2020

285. मरघट- परशुराम शर्मा

एक प्रेतात्मा की डरावनी कथा
मरघट- परशुराम शर्मा, हाॅरर उपन्यास

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में परशुराम शर्मा जी का नाम एक सितारे की तरह है। इनकी उपन्यास साहित्य को प्रदान अनमोल कृतिया हमेशा याद रहेगी। जहाँ परशुराम शर्मा जी ने सीरीज वाले उपन्यास लिखे, वहीं थ्रिलर और हाॅरर में भी प्रसिद्धि प्राप्त की।
       हाॅरर के क्षेत्र में 'अगिया बेताल' जैसे चर्चित कृति प्रदान करने वाले परशुराम शर्मा जी का एक और हाॅरर शृंखला का उपन्यास पढने को मिला। 'मरघट', 'पिशाच' और 'खून बरसेगा'। यह तीन भागों में लिखा गया एक बेहद चर्चित और डरावना उपन्यास है।
        उपन्यास की कहानी एक युवक पर आधारित है जो मृत्यु को प्राप्त हो चुका है लेकिन उसे स्वयं इस बात का पता नहीं है। - दुनिया का कौन सा डाक्टर मुझे मृत प्रमाणित कर सकता है? नही! मैं मरा नहीं, जीवित हूँ। ।
         कुछ परिस्थितियों के चलते वह युवक एक खतरनाक दुरात्मा के संपर्क में आता है और वहीं से वह नरभक्षी बन जाता है लेकिन उसे स्वयं भी इस बात का पता नहीं चलता।
खून अब मेरे मुँह में जा रहा था।
उफ! वह मृत शव था। यह मैं क्या कर रहा हूँ। मैं उसका खून पी रहा हूँ। वह छटपटा रहा है। फिर मैंने वही हथियार जिस्म के अन्य भागों पर भी लगाया। छाती से खून का फवारा सा निकला, जिसके कुछ छिंटे सामने की दीवार पर भी जा पड़े। फिर मेरा मुँह उस जगह पर टिक गया। दो- तीन वारों में ही मैंने उसका सारा गर्म रक्त निचोड़ लिया।

       राकेश अपनी प्रेयसी मालती के साथ मिश्र में अपने दोस्त के टाॅम विक्टर के पास जाना चाहता है। टाॅम विक्टर पारलौकिक शक्तियों का अच्छा ज्ञाता है। टाॅम विक्टर (विकी) और राकेश (रिकी) मिश्र के पिरामिडों से कुछ खोजना चाहते हैं।
उपन्यास में एक सेठ है जिसे लोग ब्लैक करना चाहते हैं।
साला सेठ पैसे देने से मना कर रहा था।"
"मैंने पहले ही कहा था कि उसे ब्लैकमेल करना आसान काम नहीं। कहीं वह उल्टा हमारा ही इन्तजाम‌ न करवा दे। पैसे में बड़ी ताकत होती है बाबा। अब तो चुपचाप किनारा कर लो।"
"चंदा किनारा नहीं करता बल्कि दूसरों को किनारे लगा देता है।"- चंदा हंसा।


एक डाक्टर जिसने एक युवक को मृत घोषित कर दिया पर वह युवक जीवित हो उठा।
"डाक्टर रविन घोष...उनका दावा था कि मरीज मर चुका है......अब आप ही बताईये; जो मरीज अब हंस बोल रहा है, उसे घोष ने मृत्य कैसे कह दिया....।"
     अपने समय का खतरनाक डाकू जो मरने के बाद भी स्त्री और धन के लिए लालायित रहता था। इसके लिए उसे जरूरत थी एक शरीर की।
"मेरा नाम शमशेर है। मैं‌ इसी दुनिया में जब जिंदा था तो भयंकर डाकू था। मैंने न जाने कितने लोगों को मौत के घाट उता दिया।....क्या तुझे मारकर तेरा छाया शरीर ले लू।"
      धीरे-धीरे उक्त सभी घटनाक्रम एक श्रेणी से जुड़ते चले जाते हैं और उपन्यास अपनी रफ्तार से आगे बढता है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढती है वैसे-वैसे डरावनी घटनाएं सामने आती चली जाती हैं।
उपन्यास की कुछ घटनाएं वास्तव में बहुत डरावनी महसूस होती है।

       यह हाॅरर श्रेणी का बहुत अच्छा उपन्यास है।‌ अगर कुछ है तो यही की उपन्यास प्रथम पुरूष में‌ लिखा गया है, इसलिए सारी घटनाओं की जानकारी हमें नायक के माध्यम से ही पता चलती है।
इस उपन्यास के तीन पार्ट है। इसलिए तीनों पार्ट पढने से पहले कहानी के विषय में ज्यादा कुछ कहना उचित नहीं है।

उपन्यास- मरघट (प्रथम भाग)
लेखक- परशुराम शर्मा
प्रकाशन- सूरज पॉकेट बुक्स


1. मरघट
2. पिशाच- परशुराम शर्मा
3. खून बरसेगा

Wednesday, 9 October 2019

230. सुंदरी को मरने दो- परशुराम शर्मा

द्वितीय विश्वयुद्ध पर आधारित उपन्यास।
सुंदरी को मरने दो- परशुराम शर्मा

परशु राम जी का एक उपन्यास 'सुंदरी को मरने दो' काफी समय से मेरे पास था। बस इस उपन्यास को पढने का समय ही नहीं मिल पाया। अब समय मिला तो इसे पढने बैठा दो दिन में पढकर समाप्त किया।
मुझे इस उपन्यास के शीर्षक ने बहुत आकृष्ट किया। 'सुंदरी को मरने दो' कितना रोचक शीर्षक है। बस यही शीर्षक इस उपन्यास का सबसे बड़ा आकर्षण है। यही आकर्षक मुझे उपन्यास पढने के लिए मजबूर कर गया।
"तुम्हारा नाम?"
"मैनुअल।"
"यह तुम्हारा ही नाम है?"
"नहीं... दुनियां में इस नाम के हजारों लाखों लोग होंगे...मैं इस नाम पर अपना दावा क्यों जाहिर करूं...।"
(पृष्ठ-5)

सुंदरी को मरने दो- परशुराम शर्मा
यह उपन्यास मैनुअल नामक एक व्यक्ति पर आधारित है। जिसके बहुत से रूप उस उपन्यास में उभरते हैं। वास्‍तव में यह उपन्यास न होकर मैनुअल के जीवन की कहानी मात्र है। उसके जीवन के विभिन्न रूप इस उपन्यास में पढने को मिलते हैं। और यह मैंनुअल कौन है?
"कभी मैं क्रांतिकारी था...कभी मैं आप्रेशन वेलिस पर था, तो कभी मैं सिसली के माफिया गुण्ड़ों का सफाया करने निकला और कभी मैंने पोम्पई के खण्डहरों में अपना छापा मार दल बनाया।"

Sunday, 21 April 2019

186. अगिया बेताल- परशुराम शर्मा

 प्रतिशोध की भयानक कथा

       अगिया बेताल एक हाॅरर श्रेणी का उपन्यास है। यह एक ऐसे युवक की कहानी है जो अपने बाप की मौत का बदला लेने के लिए स्वयं निकृष्ट कोटि का इंसान बन जाता है और वह भी उस बाप का बदला जिससे वह युवक जरा सा भी प्रेम नहीं करता था। लेकिन प्रतिशोध मनुष्य को मनुष्य भी नहीं रहने देता।
           परशुराम शर्मा हिन्दी लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के एक वह स्तंभ हैं जिन्होंने अपनी लेखनी से उपन्यास साहित्य पर अपना गहरा प्रभाव कायम रहा है। जासूसी उपन्यासों के अतिरिक्त परशुराम शर्मा जी ने 'हारर' श्रेणी के भी उपन्यास लिखे हैं।
अगिया बेतान परशुराम शर्मा जी का एक हाॅरर उपन्यास है, जो अगिया बेताल नामक एक प्रेत पर आधारित है। शर्मा जी ने अपने एक साक्षात्कार में बताया था की उन्होंने एक अगिया बेताल जैसी घटना स्वयं देखी थी।

          उपन्यास का नायक रोहताश एक डाॅक्टर है। वह बचपन से ही अपने चाचा के पास रहता है, क्योंकि उसे अपने पिता के कार्य से घृणा है। रोहताश का पिता 'साधु नाथ' एक तांत्रिक है। साधु नाथ तंत्र-मंत्र द्वारा सिद्धियाँ प्राप्त करना चाहता है। अपने पिता की मृत्यु पर वह कहता है- एक बुराई का अंत हो चुका था। सवेरे मेरे पिता की चिता शमशान घाट पर लग गई।
           रोहताश को जब अपने पिता के मरने की खबर मिलती है तो वह अपने पिता का अंतिम संस्कार करने गाँव जाता है। रास्ते में उसे अगिया बेताल जैसी घटना के दर्शन होते हैं। गाँव में रोहताश से भी कम उम्र की उसकी सौतेली माँ होती है। लेकिन गाँव में उसके कुछ दुश्मन पहले से ही तैयार बैठे हैं। वहीं रोहतास को पता चलता है की उसकी पिता की मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी।- मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे पिता की मृत्यु स्वाभाविक मौत नहीं है, उसके पीछे कोई न कोई भेद अवश्य है। न जाने कौन सी बात मस्तिष्क में खटक रही थी।

- रोहताश अपने पिता से इतनी दूरी क्यों बना कर रखता है?
- साधु नाथ की हत्या किसने की?
- क्या था अगिया बेताल?
- रोहताश की सौतेली माँ कौन थी?
- आखिर कैसे डाक्टर रोहताश इन शैतानी ताकतों से टकरा पाया?

              एक तरफ डाॅक्टर रोहताश है जो भूत-प्रेत पर विश्वास नहीं करता तो दूसरी तरफ उसका पिता इन तांत्रिक सिद्धियों के कारण ही जाना जाता था।
एक तरफ डॉक्टर रोहताश है तो दूसरी तरफ गढी (एक जगह, गढ या किला) के लोग है जो तांत्रिक सिद्धियों से गढी की रक्षा करने में यकीन रखते हैं। लेकिन बदली परिस्थितियों में स्वयं रोहताश भी तांत्रिक सिद्धियों का ज्ञाता बन जाता है और वह प्रतिशोध के रास्ते पर निकल पड़ता है। उसकी मददगार बनती है उसकी सौतेली माँ।
रोहताश का एक ही दुश्मन है- ठाकुर प्रताप जिसकी मैंने शक्ल भी नहीं देखी, क्या वह इतनी बड़ी ताकत है कि जिसकी चाहे जिंदगी उजाड़ दे।
मेरे सीने में बगावत थी।
मैं इसका बदला लूंगा।
बदला...।


यही से रोहताश का प्रतिशोध आरम्भ होता है। स्वयं रोहताश भी कहता है।
मेरा प्रतिशोध शुरू हो गया था। अब मैं कातिल था... क़ानून की निगाह में मुजरिम... पर समय कभी लौट कर नहीं आता। मेरे भीतर का मनुष्य तो कभी का मिट चुका था, अब मैं सिर्फ दरिंदा था, जिसके दिल में दया नाम की कोई वस्तु नहीं होती।

              यह उपन्यास प्रथम‌ पुरुष में है। कथानायक रोहताश स्वयं अपनी कहानी बताता है। इसलिए यह सहज ही पता चल जाता है की कथानायक को कुछ नहीं होगा।
प्रथम पुरुष में कथा होने के कारण कुछ प्रसंग जो की रोचक हो सकते थे लेकिन बन नहीं पाये क्योंकि स्वयं नायक चंद शब्दों में बात को समाप्त कर देता है।

           मूलतः देखे तो यह उपन्यास रोहताश पर आधारित है न की अगिया बेताल पर। अगिया बेताल तो रोहताश का सहायक मात्र है और कई कगह पर तो वह स्वयं भी निष्क्रिय है।
उपन्यास की कहानी चाहे बदला प्रधान है लेकिन बदला पूर्ण होने पर भी कथा आगे जारी रहती है। अगर उपन्यास रोहताश के प्रतिशोध तक रहती तो ज्यादा अच्छा रहता क्योंकि बाद में उपन्यास का अंदाज बदल जाता है और वह मात्र रोहताश के जीवन पर आधारित हो जाती है।

उपन्यास के कुछ अंश उपन्यास को वीभत्स बना देते हैं। जैसे रोहताश का अपनी सौतेली माँ के प्रति व्यवहार।

निष्कर्ष-
परशुराम शर्मा जी द्वारा लिखा गया 'अगिया बेताल' नामक उपन्यास एक डरावनी कथा है। यह एक बदला प्रधान कहानी है, कैसे एक युवक तांत्रिक विधियों का जानकार होकर अपने दुश्मनों से प्रतिशोध लेता है।
यह दिलचस्प और पठनीय रचना है जो कहीं भी पाठक को निराश नहीं करेगी।

उपन्यास-  अगिया बेताल
लेखक-     परशुराम शर्मा
प्रकाशक- सूरज पॉकेट बुक्स- मुंबई
मूल्य-
अमेजन लिंक-    अगिया बेताल
परशुराम शर्मा जी का साक्षात्कार-   youtube link interview
परशुराम जी के अन्य उपन्यास - चिनगारियों का नाच
अगिया बेताल- परशुराम शर्मा

।“जब आदमी का उद्देश्य एक ही रह जाता है और उसका जिन्दगी से कोई मोह नहीं रह जाता तो वह खुली किताब की तरह पढ़ा जा सकता
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Saturday, 4 November 2017

76. चिनगारियों का नाच- परशुराम शर्मा

कैप्टन विनोद और विनोद का कारनामा।
चिंगारियों का नाच, जासूसी उपन्यास, अपठनीय।
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    लोकप्रिय उपन्यास जगत के महान लेखक परशुराम शर्मा का उपन्यास चिनगारियों का नाच इनके प्रसिद्ध पात्र हमीद, विनोद और कासिम पर आधारित है और इसमें खलनायक है जीराल्ड शास्त्री।
     जीराल्ड शास्त्री  विश्व विजेता बनने का ख्वाब देखता है और हर बार की तरह हमीद और विनोद उसके ख्वाब को पूर्ण होने से पहले ही खत्म कर देते हैं।
  प्रस्तुत उपन्यास में मात्र यही एक छोटी सी कहानी है। इसमें न तो कोई सस्पेंश है और न ही कोई रोमांच। ऐसा लगता है जैसे लेखक ने अपने प्रसिद्ध पात्रों के नाम का फायदा उठाया हो।
  
   एक दो जगह लगता है की उपन्यास में कुछ रोमांच बनेगा लेकिन बन नहीं पाता।
असली- नकली विनोद का किस्सा भी ज्यादा नहीं चला। उपन्यास के अंत में और वह भी बिलकुल अंत में पाठक को चौंकाने के लिए एक छोटा सा प्रयोग उपस्थित है वह अवश्य उपन्यास में कुछ जान डालता है बाकी उपन्यास किसी भी दृष्टि से पठनीय नहीं है।
    हालांकि किसी भी महान लेखक की प्रत्येक कृति महान नहीं होती यह भी परशुराम शर्मा की एक ऐसी ही कृति है।
     उपन्यास की कहानी कोई विशेष नहीं है। इस उपन्यास को कम पृष्ठ और परशुराम शर्मा का उपन्यास होने के रूप में एक बार पढा जा सकता है।
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उपन्यास- चिनगारियों का नाच
लेखक- परशुराम शर्मा
प्रकाशक- किरण प्रकाशन, प्रेम पुरी, मेरठ।
पत्रिका- जासूसी तहलका।
संपादक- विजय कुमार जैन।
पृष्ठ- 97
मूल्य-