नशा के व्यापारी और मर्डर मिस्ट्री
कमरा नम्बर 303 - सुरेन्द्र मोहन पाठक
सुनील सीरीज 105 - मर्डर मिस्ट्री
एक अत्यन्त रोमांचक कथानक जिसका केन्द्र बिन्दु एक ऐसी रहस्यमयी युवती थी जो एक पार्टी में से एकाएक यूं गायब हुई जैसे वो कभी वहां थी ही नहीं, जिसके बारे में उसके मेजबान का दावा था कि वो उसे नहीं जानता था।
एक अत्यन्त रोचक मर्डर मिस्ट्री। आदि से अन्त तक एक ही बैठक में पठनीय । (आवरण पृष्ठ से)
एक अत्यन्त रोचक मर्डर मिस्ट्री। आदि से अन्त तक एक ही बैठक में पठनीय । (आवरण पृष्ठ से)
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कमरा नम्बर 303- सुरेन्द्र मोहन पाठक |
'ब्लास्ट' नामक समाचार पत्र का खोजी रिपोर्टर सुनील चक्रवर्ती अपने सहयोगी अर्जुन और मित्र रमाकांत मल्होत्रा के साथ एक पार्टी में शामिल था ।
वह मुगल बाग के ऐश्वर्यशाली इलाके में स्थित मीनाक्षी एडियो में एक पार्टी थी जिसमें कि रमाकान्त, सुनील और अर्जुन शामिल थे। पार्टी देने वाले शख्स का नाम विशाल सक्सेना था जो कि रमाकान्त का दोस्त था। विशाल सक्सेना 'झूठे का मुंह काला' नामक एक टी०वी० सीरियल का प्रोड्यूसर डायरेक्टर था। सीरियल के पचास एपीसोड मैट्रो पर टेलीकास्ट हो चुके थे जिसके उपलक्ष में वो गोल्डन जुबली पार्टी मीनाक्षी स्टूडियो में विशाल सक्सेना द्वारा आर्गेनाइज़ की गयी थी। सुनील और अर्जुन बतौर पत्रकार वहां मौजूद थे और वहां पहुंचने के बाद ही उनका विशाल सक्सेना से औपचारिक परिचय हुआ था। रमाकान्त क्योंकि दोनों तरफ का साझा दोस्त निकल आया था इसलिये विशाल सक्सेना बहुत गर्मजोशी से सुनील और अर्जुन से मिला था।
पार्टी क्योंकि शो बिजनेस के लोगों से सम्बन्धित थी इसलिये वहां रंगीनी की कोई कमी नहीं थी। शराब और शबाब का बोलबाला था। कई पहले से मकबूल या मकबूलियत की राह पर आगे बढ़ती अभिनेत्रियां वहां मौजूद थीं जिनकी वजह से वहां कुछ खास ही जगमग थी।
पन्द्रह मिनट पहले तक रमाकान्त, सुनील और अर्जुन स्टूडियो के मेन फ्लोर पर चल रही उस पार्टी में कोने की एक ही टेबल पर बैठे विस्की चुसक रहे थे जब कि रमाकान्त एकाएक वहां से उठा था और डांस फ्लोर की तरफ बढ़ चला था जहां कि विलायती बैंड की धुनों पर नौजवान जोड़े एक-दूसरे की बांहों में बाहें डाले थिरक रहे थे। फिर थोड़ी देर बाद रमाकान्त भी उन्हीं जोड़ों में शामिल एक नौजवान लड़की को बांहों में भरे डांस कर रहा था।
"गुरुजी"- अर्जुन बोला- "एक बात तो माननी पड़ेगी।"(कमरा नम्बर 303, सुरेन्द्र मोहन पाठक, प्रथम पृष्ठ)
यहीं एक लड़की डांस के दौरान रमाकांत के संपर्क में आती है और फिर वह अचानक वहां गायब हो जाती है। रमाकांत, सुनील और अर्जुन इसी पर चर्चा करते हैं।
"हद हो गयी, माईयकी।"- रमाकान्त भुनभुनाया।
"क्या हुआ?" सुनील उत्सुक भाव से बोला । "मैनूं की होना ए, प्यारयो। वो लड़की, ओ माईंयवी, जो मेरे साथ डांस कर रही थी, जो हुआ उसे हुआ। अच्छी खासी मेरे साथ डांस कर रही थी, एकाएक पता नहीं सप्प लड़या ओनूं या कोई भूत दिखाई दे गया, तड़प कर मेरी बांहों से निकली और ये जावो जा।"
"थी कौन वो?"
"क्या पता कौन थी ! कुछ पूछने की नौबत ही न आई। पहले ही एकाएक यूं खिसक गयी जैसे मैं ही करन्ट मारने लगा था। चार सौ चालीस वोल्ट का। अब सारी रात मुझे यही सपने आते रहेंगे कि कौन थी वो रहस्यमयी रमणी और क्यों वो मेरी बांहों से निकलकर एकाएक यहां से खिसक गयी !"
अभी रिपोर्टर सुनील पार्टी आयोजक विशाल सक्सेना से उस लड़की के संबंध में चर्चा कर ही रहा था कि तभी वहाँ पहुंचे एक 'सब इंस्पेक्टर' ने बताया की स्टूडियो के पीछे वाली गली में गोलीबारी और एक लड़की के अपहरण की कोशिश हुयी है।
इस सारे घटनाक्रम में जो लड़की थी उसका नाम अर्पणा था और पुलिस इंस्पेक्टर प्रभुदयाल के अनुसार गोलीबारी से बाद उस लड़की को हास्पिटल में एडमिट करवा दिया गया था वह लड़की अर्पणा अब हास्पिटल से गायब थी।
कहानी तब एक खतरनाक मोड़ लेती है जब अपर्णा चौधरी के पास से विशालगढ़ की एक पान शॉप की रसीद मिलती है, जिससे एक रिवाल्वर गिरवी रखे होने का पता चलता है। वह रिवाल्वर कोई साधारण हथियार नहीं, बल्कि एक साल पहले मारे गए युवा सब-इन्स्पेक्टर संदीप तिवारी की सर्विस रिवाल्वर निकलती है, जिससे उसका कत्ल हुआ था।
सब इंस्पेक्टर संदीप तिवारी के हत्यारे आज तक पुलिस की पकड़ से बाहर थे लेकिन अर्पणा की कस्टडी में मिले संदीप तिवारी के सर्विस रिवॉल्वर ने कहानी को एक नया मोड़ दे दिया।
कहानी के लगभग पात्र फरार है अर्पणा, विशाल सक्सेना और एक वर्ष पूर्व हुये सब इंस्पेक्टर संदीप तिवारी के हत्यारे और वहीं एक होटल के कमरा नम्बर.... में एक हत्या होती है और सुनील भी वहाँ उपस्थित था।
"अब बोलो क्या किस्सा है? '303' में क्या कर रहे थे?"
“किसी के बुलावे पर वहां पहुंचा था।"-सुनील बोला ।
"किसके बुलावे पर ? नाम बोलो।"
सुनील ने इनकार में सिर हिलाया।(पृष्ठ-115)
अब खोजी पत्रकार सुनील को हत्या का रहस्य सुलझाना था, अर्पणा को ढूंढना था और एक साल पहले हुये सब इंस्पेक्टर की हत्या के केस को भी हल करना था ।
और अंत में पत्रकार सुनील एक लम्बे संघर्ष, जीवन-मौत से संघर्ष करता हुआ, दुश्मनों से संघर्ष के पश्चात पूरे घटनाक्रम को हल करता है और वास्तविक अपराधी को सामने लाने में सहयोगी बनता है।
उपन्यास मात्र एक मर्डर मिस्ट्री ही नहीं बल्कि हत्या के साथ- साथ अवैध नशे के व्यापार, पुलिस के समर्पण और भ्रष्टाचार को भी उजागर करता है।
कहानी काफी रोचक है लेकिन कुछ घटनाएं उपन्यास को बहुत ज्यादा नीरस बनाती हैं ।
उपन्यास में घटनाएं नाम मात्र की हैं सिर्फ संवाद हैं । एक तरफ से हम इसे संवाद शैली का उपन्यास कह सकते हैं।
उपन्यास में जितनी भी घटनाएं होती है वह हमें किसी न किसी पात्र के संवाद से ही पता चलता है। जैसे पहला पार्टी संवाद 34 पृष्ठ तक चलता है और आगे ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं।
लेखक महोदय को कुछ घटनाएं स्पष्ट लिखनी चाहिए थी ताकि उपन्यास का प्रवाह बना रहे।
उपन्यास में असली अपराधी को गिरफ्तार होने तक का भी पाठक को इंस्पेक्टर प्रभुदयाल और सुनील के संवाद से ही पता चलता है।
मुख्य पात्र :-
सुनील (पत्रकार और मुख्य नायक): 'ब्लास्ट' अखबार का पत्रकार सुनील अपनी तीव्र बुद्धि, पैनी दृष्टि और हाजिरजवाबी के लिए जाना जाता है। वह हर छोटी-सी कड़ी को जोड़कर इस जटिल रहस्य को सुलझाने की कोशिश करता है।
रमाकांत: सुनील का मस्तमौला और हास-परिहास करने वाला दोस्त, जो शराब और मुहावरों के गलत इस्तेमाल को लेकर हास्य का पुट जोड़ता है, साथ ही कहानी की हर गतिविधि में सक्रिय रहता है।
अर्जुन: सुनील का युवा सहकर्मी और कुलीग, जो मामलों की टोह लेने में सुनील की मदद करता है।
इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल: पुलिस विभाग का एक सख्त अधिकारी, जो मामले की तह तक जाने के लिए सुनील के साथ उलझता भी है और सहयोग भी करता है।
हास्य रस :-
उपन्यास में हास्य का भरपूर प्रयोग हुआ है। रमाकांत का हिंदी मुहावरों को तोड़ मरोड़कर बोलना काफी रोचक है। इसके अतिरिक्त भी रमाकांत का हास्यबोध पाठक को पसंद आयेगा।
रिपोर्टर साहब” - सक्सेना शुष्क स्वर में बोला- “तुम अपनी ये खामख्याली छोड़ ही दो तो अच्छा है। मैं न तो उस आदमी को जानता हूं और न उस लड़की को ।”
"हा। हा। हा।"
"मेरी भी।"- रमाकान्त जोश से बोला ।
"क्या तुम्हारी भी?”
"हा हा हा। इसे कहते हैं मित्तर प्यारे की हा में हा मिलाना।"
"हां में हां मिलाना।"
"वही तो मैंने कहा। हा में हा मिलाना। हा हा हा करना।"(पृष्ठ-33)
निष्कर्ष:-
सुरेन्द्र मोहन पाठक का यह उपन्यास 'कमरा नम्बर 303' (सुनील सीरीज) भारतीय पल्प फिक्शन और मर्डर मिस्ट्री विधा का एक बेहतरीन उदाहरण है। एक पार्टी से रहस्यमयी तरीके से गायब होने वाली युवती (अपर्णा) से शुरू होने वाली यह कहानी, आगे चलकर एक वर्ष पुराने पुलिस अधिकारी (सब-इन्स्पेक्टर संदीप तिवारी) के अंधे कत्ल और हथियारों की हेराफेरी तक के गंभीर रहस्यों को परत-दर-परत खोलती है।
रोमांच, पत्रकारिता की तहकीकात, पुलिसिया पेंच और हल्का-फुल्का हास्य सब कुछ इस उपन्यास में उपलब्ध है। लेकिन कथानक घटनाएं कम और संवाद ज्यादा है जो पाठक को नीरसता प्रदान करते हैं।

उपन्यास के प्रति उत्सुकता जगाती टिप्पणी। पढ़ने की कोशिश रहेगी।
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