Friday, 20 February 2026

नकली चेहरे - कर्नल रंजीत

175 साल पुरानी प्रतिशोध कथा
नकली चेहरे - कर्नल रंजीत- 1974

मनुष्य जीवन बहुत ही अनोखा है। उसका जीवन किस पद्धति से संचालित होता है यह कहना कभी-कभी बहुत मुश्किल हो जाता है । मनुष्य कभी तो अपना सर्वस्व अपर्ण तक कर देता है और कभी कभी अपने प्रतिशोध में इतना डूब जाता है कि वह सदियों तक प्रतिशोध की अग्नि में जलता रहता है। 

कर्नल रंजीत के उपन्यासों में प्रतिशोध जैसे विषय पर बहुत कुछ लिखा गया है। इ‌नके पात्र वर्षों- सदियों बाद तक प्रतिशोध की अग्नि में जलते रहते हैं और अवसर मिलते ही अपना प्रतिशोध पूरा करते नजर आते हैं। प्रस्तुत उपन्यास भी कुछ ऐसा है जहां एक व्यक्ति लगभग 175 वर्ष पश्चात अपना प्रतिशोध लेता है।
क्या यह संभव था ? 
अगर संभव था तो कैसे ? 
इसी संभव को जानने का प्रयास है कर्नल रंजीत का उपन्यास 'नकली चेहरे' जो सन् 1974 में प्रकाशित हुआ था । यह मूलतः एक मर्डर मिस्ट्री कहानी है।
जनता का थियेटर
सुन्दर और नौजवान गाइड, जिसने भड़कीला लिबास पहन रखा था, एक अत्यन्त रूपवती बत्तीस वर्षीय अंग्रेज़ पर्यटक महिला को भारत के दर्शनीय नगर ग्वालियर की सैर कराता हुआ उसे छोटी-सी झील के किनारे पर स्थित सफेद और काले पत्थरों से बनी एक हवेली में ले आया था ।
       अंग्रेज पर्यटक महिला ग्वालियर से अत्यन्त प्रभावित हुई थी । ग्वालियर के प्रत्येक स्थल से अब भी राजाओं-महाराजाओं का वैभव झलक रहा था। गाइड ने जिन शब्दों में उस नगर का बखान किया था उसने अंग्रेज़ महिला पर जादू-सा कर दिया था और वह अपने-आपको प्राचीन रजवाड़ाशाही के संसार में पा रही थी।
      सुन्दर गाइड ने सफेद और काले पत्थरों की हवेली में पहुंचकर उस अंग्रेज़ महिला को अपनी लच्छेदार भाषा में उस हवेली की कहानी सुनानी शुरू कर दी, "यह हवेली राजा हिम्मतसिंह ने अपनी प्रेमिका की स्मृति में बनवाई थी। उसकी प्रेमिका एक गूजर लड़की थी। उसका नाम रूपा था। उन दिनों राजा का बेटा किसी निर्धन लड़की को अपनी दासी या लौंडी तो बना सकता था लेकिन उससे प्रेम नहीं कर सकता था; इसलिए हिम्मत सिंह और रूपा एक-दूसरे से चोरी-छिपे मिला करते थे। इस झील में एक बड़ा पत्थर हुआ करता था । उस पत्थर में एक बहुत बड़ी दरार थी । हिम्मतसिंह झील के एक किनारे से तैरकर उस पत्थर तक पहुंचता भौर रूपा दूसरे किनारे से तैरकर उस पत्थर तक आती ।‌दोनों पत्थर की उस दरार में एक-दूसरे से प्यार करते।"
"बहुत ही दिलचस्प । कहानी जारी रखो।"- अंग्रेज महिला ने कहा । (नकली चेहरे- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ)
नमस्ते पाठक मित्रो,
   आज आपके लिए प्रस्तुत है कर्नल रंजीत द्वारा लिखित एक और मर्डर मिस्ट्री । यह उपन्यास भी उनके अन्य उपन्यासों की तरह रोमांच और रहस्य से भरपूर है। जहां हत्यारा एक विशेष तरीके से हत्या करता है और मेजर बलवंत के लिए उसे पकड़ना एक चुनौती है।
उस अंग्रेज पर्यटक महिला के ठीक छः महीने बाद उस अंग्रेज़ रूपसी की शंका वास्तविकता में बदल गई। उस हवेली के निकट गूजर लड़की रूपा की तरह स्टेज की प्रसिद्ध अभिनेत्री रोमा चौहान की बड़ी विचित्र स्थिति में निर्मम हत्या कर दी गई । (पृष्ठ-07)
          मेजर ने अपने साथियों के साथ मिस रोमा की हत्या के प्रत्येक पहलू पर विचार-विमर्श किया। अन्त में वे सब इस परिणाम पर पहुंचे कि मिस रोमा की हत्या कोई सामान्य घटना नहीं थी। उसके पीछे कोई गहरा षड्यंत्र था ।(पृष्ठ-24)
    ग्वालियर में जन्मी रोमा को थियेटर और नाटकों में जब असफलता और आलोचकों से उपहास मिला तो वह ग्वालियर से कलकता चली गयी और कलकत्ता में उसे सफलता और साथी मिले। 
       और एक ही वर्ष में वह कलकत्ता की स्टेज पर छा गई । उसे महान अभिनेत्री बनाने में प्रोड्यूसर कमल चौधरी, डायरेक्टर अजय भट्टाचार्य और पत्रकार जितेन्द्र उपाध्याय का हाथ था । कलकत्ता में ग्वालियर के मारवाड़ी सेठ दामोदर कनौरिया ने उन नाटकों के प्रदर्शन में भारी पूंजी लगाई थी, जिनमें रूपा चौहान हीरोइन होती थी ।(पृष्ठ-08) 
       रोमा के मन में एक कसक थी और वह कसक थी ग्वालियर में थियेटर कर वहां के आलोचकों को अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने की । और एक दिन यह नाट्यमण्डली ग्वालियर पहुँच गयी।
ग्वालियर में मारवाड़ी सेठ कनौरिया की काफी पहुंच थी। उसने राजा हिम्मतसिंह की हवेली में, जिसे जनता का थियेटर बना दिया गया था, प्रसिद्ध नाटक 'कादंबरी' खेलने का प्रबंध करा दिया ।(पृष्ठ-08)
     राजा हिम्मत सिंह की हवेली का विवरण पाठक ऊपर पढ चुके हैं। आज वह हवेली नाटय क्लब में परिवर्तित हो चुकी है। उसी हवेली के पास सेठ कनौरिया का बंगला भी है जहां रोमा भी ठहरी हुयी है।  और एक दिन रोमा की लाश कनौरिया के बंगले के मेहमानखाने में मिलती है।
सामने रोमा मरी पड़ी थी।....मरने पर भी रोमा के सौंदर्य और रंग में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। केवल उसका हलका-फुलका नीला लिबास अस्त-व्यस्त हो रहा था । उसकी जांचें उधड़ी हुई थीं । वह घुटनों के बल झुकी हुई थी । उसके दोनों बाजू फर्श पर फैले हुए थे । चेहरा फर्श से सटा हुआ था । सिर पर खून जम चुका था और फर्श पर भी खून जमा हुआ था ।(पृष्ठ-12)
   सेठ कनौरिया रोमा को बहुत चाहता था यहाँ तक की वह उससे शादी करना चाहता था । रोमा की मौत का उसे गहरा सदमा लगा और इसलिए मारवाड़ी सेठ दामोदर कानौरिया ने अपने मित्र पत्रकार जितेन्द्र उपाध्याय को मुम्बई से प्रसिद्ध जासूस मेजर बलवंत को बुलाने के लिए भेज दिया ताकि वह रोमा हत्याकांड की जांच कर सके।   
    और इस तरह मेजर बलवंत अपनी टीम के साथ पहुँच जाता है ग्वालियर । उपाध्याय शाम के पांच बजे मेजर बलवन्त और उसके साथियों को लिए हुए कनौरिया के बंगले में पहुंच गया । मेजर बलवन्त, सुधीर, सोनिया, डोरा, मालती के अतिरिक्त क्रोकोडायल भी इस नये शहर में आने पर प्रसन्नता का अनुभव कर रहा था ।(पृष्ठ-17)
यहां पहुंचते ही मेजर बलवंत ने रोमा हत्याकांड की जांच की और फिर एक के बाद एक तथ्य ऐसे प्रस्तुत कोयले जैसे वह हत्याकांड मेजर की आंखों के सामने घटित हुआ हो। 
यहां एक सिसकी का जिक्र तो बनता है। मेजर की दृष्टि में वह सिसकी बहुत महत्वपूर्ण थी। ‌।
मेजर समझ रहा था कि उस स्त्री की सिसकियां एक ऐसी कहानी थी जो अपने भीतर गहरा भेद छुपाए हुये थी ।"(पृष्ठ-36)
      मेजर के लिए इस हत्याकांड हल करना रोमांच से कम न था । एक तो यह हत्याकांड रोमा जन्मस्थानसे संबंधित है, इस हत्याकांड से संबंधित व्यक्ति प्रभावशाली हैं और इस से बड़ी बात यह की कुछ लोग इस हत्याकांड को राजा हिम्मत सिंह की प्रेयसी रूपा के हत्याकांड से जोड़कर देख रहे हैं क्योंकि दोनों हत्याओं में समानता बहुत ज्यादा है।
मेजर ने उस कहानी में गहरी दिलचस्पी लेते हुए कहा, "आपका खयाल है, किसीने राजा हिम्मतसिंह और रूपा की कहानी थे, जहां हरे को पृष्ठभूमि बनाकर मिस रोमा की हत्या की है। यानी किसी ऐसे व्यक्ति ने रोमा की हत्या की है जो यह नहीं चाहता था कि आपसे मिस रोमा के सम्बन्ध बढ़ें ।(पृष्ठ-27) 
  क्या यह संभव था जो घटनाक्रम आज से लगभग 175 साल पहले हुआ था उसी को आधार बनाकर रोमा की हत्या की गयी है और फिर किसी ने रोमा की हत्या क्यों की और वह उसे गूजर लड़की रूपा की हत्या का रूप क्यों देना चाहता था। यह प्रश्न बहुत ही उलझा था। मेजर बलवंत की जांच में हर वह व्यक्ति संदिग्ध था जो रोमा से संबंध रखता था । हर वह व्यक्ति संदिग्ध था जो मारवाड़ी सेठ दामोदर कनौरिया के परिवार से संबंध रखता था ।
_यह केस बहुत ही पेचीदा है। हर कोई रोमा का हत्यारा मालूम होता है।"-डोरा ने कहा ।
"मुझे एक और भ्रम हो रहा है।" मेजर ने कहा ।
"वह क्या ?” मालती ने पूछा ।
"शायद कोई पांचवां व्यक्ति भी परसों रात रोमा से मिला ही। इस बात का पता यों लगाया जा सकता है कि हम मालूम करें कि परसों रात इस घर का कुत्ता भूमण्डल कितनी बार चीखा था ! इस समय तक हमें यह बताया गया है कि वह परसों रात तीन बार चीखा । मुधीर, तुम जाओ और घर के नौकरों से भूमण्डल की चीखों की असली गिनती मालूम करो ।”(पृष्ठ-48) 
  कहानी जैसे जैसे आगे बढती है वैसे -वैसे इसमें और पात्र भी शामिल होते जाये हैं। मारवाड़ी सेठ कनौरिया के परिवार के वह सदस्य जो जोधपुर गये थे वह भी आ जाते हैं‌। मां, कनौरिया का भाई प्रमोद और बहने शालिनी और मालिनी भी घर पहुँच चुकी हैं। शालिनी और मालिनी के चरित्र बहुत गहरे हैं जो अपने साथ बहुत सी कहानियाँ लिए घूमते हैं। 
मालिनी तो हिस्टीरिया से ग्रसित एक खतरनाक पात्र है वह कब क्या कर दे कोई भी नहीं समझ पाता। कहानी के साथ-साथ उसकी भूमिका महत्वपूर्ण और गहरी होती चली जाती है।
       मेजर बलवंत अभी तक रोमा के हत्यारे को तलाश नहीं कर पाये थे लेकिन केस से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को वह समझ गये थे। लेकिन बीच में आने वाली कुछ घटनाओं ने मेजर को भ्रमित भी कर दिया था। जैसे अपहरण काण्ड, जैसे नकली आत्महत्या, सेठ श्रीमाली का घटनाक्रम आदि। वहीं कुछ हत्याएं भी ऐसे तरीके से हो रही थी जो किसी एक ही हत्यारे की तरफ संकेत करती थी। 
'हर लाश के पास टूटा हुआ गिलास और उसमें शराब क्यों होती है?"- मालती ने प्रश्न किया । 
   टूटा गिलाश और शराब राजा हिम्मत सिंह की प्रेयसी रूपा के पास भी मिला था। तो क्या हत्यारा आज से 175 साल पहले का है या फिर वह इन हत्याओं को पुराना रूप दे रहा है। आखिर वह ऐसा क्यों करना चाहता है।
       एक के बाद एक रहस्यमयी घटनाओं के इस जाल को मेजर बलवंत आखिर तोड़ देते हैं और रहस्य से बाहर जो व्यक्ति आता है वह वास्तव में चौंकाने वाला था कदम वह आज से 195 साल पुराना आदमी था। क्या यह संभव था ? उसका कारण और घटनाएं भी आपको हैरान कर देगी । 
  ऐसे अदभुत केस सिर्फ मेजर बलवंत ही हल कर कदम है क्योंकि वह सीढी पर पैरों के निशान देखकर घटना का अंदाजा लगा सकता है, वह सिसकी के विषय में सुनकर सिसकी की गहराई बता सकता है। तभी तो मेजर बलवंत के शिष्य ने कहा है-
"ओह, मेजर साहब ! ऐसी बातों का पता केवल आप ही लगा सकते हैं।"- सुधीर ने कहा ।(पृष्ठ-109) 
तो यह है उपन्यास 'नकली चेहरे' का कथानक जो एक हत्या की कहानी पर खत्म होता है। हां यह खत्म यही होता है क्योंकि यह आरम्भ तो बहुत पहले हो गया था -
रोमा चौहान की हत्या आज नहीं हुई, आज से एक सौ बहत्तर साल पहले शुरू हुई थी जब राजकुमार हिम्मतसिंह की प्रेमिका रूपा की इस शहर की झील की एक चट्टान पर हत्या कर दी गई थी।"(पृष्ठ-119)
अब बात करते हैं उपन्यास के कुछ अन्य बिंदुओं पर- 
उपन्यास में कुत्ते को एक महत्वपूर्ण तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है। मेजर बलवंत और अन्य लोग भी कुत्ते के भौंकने को विभिन्न घटनाओं से जोड़कर देखते हैं। कुत्ते का चीखना-रोना आदि इतने महत्वपूर्ण तथ्य बना दिये गये हैं जो पूर्णतः तर्कसंगत नहीं लगते। और फिर कौन आदमी ऐसा होगा जो कुत्ते के चीखने-रोने की गिनती करता है।
- उपाध्याय ने गेट खोलकर बाग में कदम रखा तो उसे एक कुत्ते की घिघियाई चीख सुनाई दी ।(09)
- कुत्ता तीसरी बार चीखा । अंधेरे में उपाध्याय कुत्ते को न देख सका । (पृष्ठ- 09)
- उसने (मेजर) ने पूछा -" क्या तुम बता सकते हो कि परसों रात कुत्ता तीन बार क्यों चीखा था ?''(पृष्ठ-24)
   मेजर बलवंत की जांच भी इसी कुत्ते के चीखने पर आधारित है। घर के नौकरों के द्वारा कुत्ते के रोने- चीखने- घिघियाने की अलग-अलग संख्या के आधार पर मेजर बलवंत अपने अनुमान तैयार करता है और मेजर के अनुमान सत्य होते हैं।
उपन्यास में मेजर सीढी पर निशानों की गहराई नाप लेता है। यह कला सिर्फ मेजर के पास ही है। 
- सीढी पर कदमों के निशान बहुत गहरे हैं।(पृष्ठ-67)
किस्सा सिसकी का-
"क्या आप अच्छी तरह सोचकर बता सकते हैं कि वह सिसकी किसी स्त्री की थी या पुरुष की ?" (पृष्ठ-20)
मेजर समझ रहा था कि उस स्त्री की सिसकियां एक ऐसी कहानी थी जो अपने भीतर गहरा भेद छुपाए हुये थी ।"
शे'र-
मेजर बलवंत समय -समय अपने साथियों को अपने शे'र से लाभान्वित करते रहते हैं। पाठक मित्रो आप भी उन शे'र का आनंद यहाँ ले सकते हैं।
अगले आशिक ख्वाब में मिलते रहे माशूक से,
 आजकल माशूक खुद आशिक से मिलने आए हैं।

कराया अपने बेटे का तआरुफ फन से उसने मैं चकराया, 
वो बेटा कम था और बेटी ज़्यादा था ।

सूक्तियां - आप सिर्फ शे'र का ही नहीं बल्कि उपन्यास में आने वाली उन पंक्तियों का भी आनंद लीजिए जो आपको अच्छा शिक्षा देती हैं।
-प्रेम मनुष्य को प्रतिशोध के लिए भी शक्ति प्रदान करता है।
- धर्म मनुष्य के जीवन का उसूल, नियम और आदर्श होता है।

कर्नल रंजीत द्वारा लिखित मर्डर मिस्ट्री उपन्यास 'नकली चेहरे' एक रोचक रचना है‌ । एक हत्या से आरम्भ यह कहानी पाठक को 175 वर्ष पीछे तक ले जाती है‌। लेखक महोदय ने बहुत ही खूबसूरत से 175 वर्ष पूर्व के घटनाक्रम को वर्तमान से जोड़ा है। 
उपन्यास में कुछ घटनाक्रम अनिश्चितता लगते हैं लेकिन यह एक थ्रिलर-मर्डर मिस्ट्री काल्पनिक उपन्यास है तो हम अविश्वसनीय घटनाओं को एक तरफ कर के कहानी का आनन्द ले सकते हैं। वैसे यह कहानी कर्नल रंजीत के सामान्य उपन्यासों जैसी है, कुछ अलग नहीं है सिर्फ इसमें घटना को 175 साल पीछे की घटना से जोड़ने का प्रयास किया गया है और ऐसा कर्नल रंजीत के और भी उपन्यास में दृष्टिगत होता है। 

उपन्यास-   नकली चेहरे
लेखक-     कर्नल रंजीत
सन्-         1975
पृष्ठ-          126
प्रकाशक- हिंद पॉकेट बुक्स, दिल्ली


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