प्रतिशोध की कथा
दुल्हन की चीख- कर्नल रंजीत 1973
विचित्र प्रतिशोध का रहस्योद्घाटन करने वाला एक सशक्त जासूसी उपन्यास...मेजर बलवन्त सुबह सवेरे फोन पर किसीसे बात कर रहा था। थोड़ी देर पहले टेलीफोन की घंटी बजी थी। मेजर बाथरूम में था। वह तौलिया लपेटकर शयनकक्ष में फोन सुनने आया था । दूसरी ओर से उसने जो आवाज सुनी, वह बड़ी विचित्र थी। कोई अपने होंठों पर टिशू पेपर अर्थात् बारीक कागज लगाकर उससे बात कर रहा था ताकि उसकी आवाज पहचानी न जा सके। मेजर ने इस बात का अनुमान दूसरी ओर से बोलने वाले की पहली बात से ही लगा लिया था। मेजर के कान में जो आवाज पड़ रही थी उसमें थरथरी थी, लेकिन शब्द स्पष्ट थे ।
"मेजर साहब, आप बहुत बड़े जासूस माने जाते हैं। हम आपको एक चैलेंज दे रहे हैं।" थरथराती हुई आवाज आई, "आज शाम को शहर का कोई न कोई बैंक लूट लिया जाएगा - ठीक उस समय जब लोग बैंक में आ-जा रहे होंगे। आप तो जानते ही हैं कि बम्बई के कुछ बैंक शाम के चार बजे से शाम के सात बजे तक पुनः अपना कारोबार करने लगते हैं। आपमें हिम्मत हो तो आज शाम को यह डाका रोककर दिखाइए !"
"क्या मैं पूछ सकता हूं कि मुझे यह चैलेंज क्यों दिया जा रहा है ? बैंक पर डाके की सूचना पुलिस को देनी चाहिए थी, मुझे नहीं। मैं ऐसे चैलेंज स्वीकार नहीं करता। अभी कोई घटना हुई नहीं । किसी ने मुझे उस घटना की खोजबीन करने के लिए कुछ कहा नहीं।(दुल्हन की चीख- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)नमस्ते पाठक मित्रो,
एक बार हम फिर उपस्थिति हैं कर्नल रंजीत के रोचक उपन्यासों की एक शृंखला के साथ और इस शृंखला में हमारे पास हैं कर्नल रंजीत के 15 उपन्यास । हम गत वर्ष 2025 में कर्नल रंजीत के लगभग 20 उपन्यासों की समीक्षा प्रस्तुत की थी और इस बार 2026 में हम फरवरी माह से एक बार फिर उसी शृंखला को आरम्भ कर रहे हैं। इस में हमारे पास हनुमानगढ़ के संगरिया तहसील के निवासी रतन चौधरी साहब से हमें पन्द्रह उपन्यास प्राप्त हुये हैं। इन पन्द्रह की समीक्षा आपको लगातार प्राप्त होती रहेगी। कोशिश रहेगी एक माह में पांच उपन्यासों की समीक्षा की और इसके अतिरिक्त मेरे पास जो कर्नल रंजीत के शेष उपलब्ध उपन्यास हैं उनकी समीक्षा का प्रयास रहेगा।
भाई रतन चौधरी से प्राप्त उपन्यास हैं - दुल्हन की चीख, पीले बिच्छू, प्रेतात्मा की डायरी, उलटी लाशे, नकली चेहरे, ट्रेन एक्सीडेंट, हत्यारे की पत्नी, खूनी बदला,चण्डी मंदिर का रहस्य, उलटी खोपड़ी, जापानी पंखा, कातिल मेरा नाम, मौत की परछाई, मेजर बलवंत बंगलादेश में, विजय दुर्ग का रहस्य, खूनी रिश्ते इत्यादि ।
चलो अब आरम्भ करते हैं उपन्यास 'दुल्हन की चीख' की समीक्षा । सर्वप्रथम तो हम बता दें यह एक प्रतिरोधात्मक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है।
जैसा की ऊपर आप पढ चुके हैं कि एक बैंक में डाका पड़ने की सूचना मेजर बलवंत को मिलती है। वहां सिर्फ डाका ही नहीं पड़ता बल्कि कुछ और भी घटित होता है। और वह आप स्वयं एक पात्र से सुन लीजिए-
"खुलकर बैठिए ।” मेजर ने स्नेहपूर्वक मुस्कराकर कहा ।
उस नौजवान का साहस बढ़ा । बोला, "मैं अमृतलाल हूं। चार दिन पहले लुधियाने से तबदील होकर यहां आया हूं। मेरे एक मित्र ने अंधेरी में मेरे लिए एक फ्लैट ले रखा है। कल रात से मेरी पत्नी सरोज लापता है ।" (पृष्ठ-13)
और अब इसी सरोज को खोजने का काम मेजर बलवंत को मिलता है। और एक संदेह यह भी उभरता है की बैंक डकैती करने वाले लोग अमृतलाल की पत्नी सरोज का अपहरण कर के ले गये।
अब मेजर को बैंक डकैत के साथ -साथ सरोज को भी खोजना था ।
तीन घंटे की दौड़-धूप के बाद मेजर बलवन्त अपने साथियों के साथ आफिस में वापस आ गया। उन्होंने जितनी जानकारी प्राप्त की थी, वह डाकुओं का पता लगाने के लिए पर्याप्त नहीं थी। वह जानकारी समाचार पत्रों में प्रकाशित होने वाली खबर से अधिक महत्त्व की नहीं थी । केवल दो नई बातों का पता चला था कि उस कोआपरेटिव बैंक के पीछे एक बंगले के माली ने डाकुओं की कार देखी थी और एक डाकू के कंधे पर एक लड़की देखी थी, जिसके बाजू में लाल चूड़ा था। माली कार का नम्बर नहीं पढ़ सका था, क्योंकि नम्बर प्लेट पर बहुत-सा कीचड़ पड़ा हुआ था ।
मेजर बलवन्त अंधेरी से वापस आने के बाद बेहद घबराया हुआ था। वह जानता था कि जितनी देर होगी, उतनी ही सरोज के जीवित रहने की संभावना कम हो जाएगी।(पृष्ठ-27)
कहानी में एक नया मोड़ तब आता है जब एक औरत श्रीमती रमा अपने पति के नींद मे कहे गये शब्द -''न मारो, न मारो, फूल सी चीज है, न मारो।''(पृष्ठ-19) का रहस्य जानने के लिए मेजर बलवंत से मिलती है और अपनी व्यथा कथा बताती है।
"मैं मिसेज़ गोरवारे हूं। रमा गोरवारे ! मेरे पति का नाम श्रीकान्त गोरवारे है। मुझे आपकी सहायता की आवश्यकता है।"
उस स्त्री के अनुसार उसके पति-
"आपको इतनी भी खबर नहीं ! कल रात कोआपरेटिव बैंक, अंधेरी में डाका पड़ा। डाकू डेढ़-दो लाख का माल ले गए। उस बैंक के लाकर में शायद मेरे पति ने मुझसे छिपाकर कोई कीमती चीज़ रखी हुई थी। बैंक के डाके की खबर चारों तरफ फैल चुकी थी, जब मेरे पति बाहर से घबराए हुए आए और विचित्र प्रकार की हरकतें करते रहे। माथे पर हाथ मारते रहे। उंगलियां मरोड़ते रहे। बालों को नोचते रहे। मैं उनसे कुछ पूछती तो मुझे बावले कुत्ते की तरह काटने को दौड़ते रहे।"
वहीं स्त्री तीन बातें स्पष्ट करती है। उसके पति की बैंक लाॅकर में कोई महत्वपूर्ण वस्तु थी। वह रात को अजीब शब्द बड़बड़ा रहे थे और तीसरा वह अपनी पत्नी रमा पर यह आरोप लगा रहे थे की वह अपनी फैक्ट्री के रहस्य पुराने मित्र और प्रतिद्वंद्वी मिस्टर सोभराज सोलकर को बताती है।
अब कहानी में बैंक डकैती, लापता सरोज के अतिरिक्त श्रीकांत गोरवारे और सोभराज सोलकर का किस्सा भी जुड़ जाता है और मेजर बलवंत को यह हल करना है । और मेजर बलवंत जैसे -जैसे आगे बढता है वैसे-वैसे उपन्यास में हत्याओं का सिलसिला भी आगे बढता है और रोमांच भी ।
अगर आप कर्नल रंजीत के उपन्यास पढते रहे हैं और आप इनके पात्र मेजर बलवंत को जानते हैं तो आपको पता ही होगा इनके उपन्यास एक विशेष शैली के होते हैं। इनके उपन्यासों में पात्र कुछ अजीब से होते हैं और कहानी काफी घुमावदार और उलझन वाली होती हैं । घटनाक्रम कुछ इस ढंग से घटित होता की पाठक चकित रह जाता है। इनके उपन्यास मात्र मर्डर मिस्ट्री नहीं बल्कि मर्डर की शृंखला होते हैं। जिन्हे मेजर बलवंत अपनी टीम के साथ हल करता नजर आता है।
मेजर बलवंत कभी होंठ गोलकर रह जाता है तो कभी होंठ गोल कर सीटी बाजाता है जिसका अर्थ है उसने कोई महत्वपूर्ण बात का पता लगा लिया है। वहीं उनका प्रशिक्षित कुत्ता क्रोकोडायल भी उनका सहयोग करता है।
प्रस्तुत उपन्यास काफी रोचक, मनोरंजन और घुमावदार है। पाठक को लेखक महोदय काफी उलझन में डालते हैं और अंत में अपराधियों को सबके सामने प्रस्तुत करते हैं।
शे'र-
मेजर बलवंत अपने साथियों की इच्छा पर उनको अकसर शे'र सुनाते हैं, आप भी शे'र का आनंद लीजिए-
जब क़हत ही इस साल न भगवान पड़ेगा,
बनिये के यहां गल्ला तो बेकार सड़ेगा !"(113)
पात्र विशेष वर्णन-
जब क़हत ही इस साल न भगवान पड़ेगा,
बनिये के यहां गल्ला तो बेकार सड़ेगा !"(113)
पात्र विशेष वर्णन-
कर्नल रंजीत के उपन्यासों में कुछ पात्र सामान्य से कुछ अलग होते हैं। ऐसा ही एक पात्र यहाँ उपस्थित है।
"आप उन्हें नहीं जानते। मैं आपसे मिलकर आया तो मेरे इस फ्लैट के बाहर एक व्यक्ति टहल रहा था। उसका कद छः फुट तीन इंच से कम नहीं होगा। उसकी छाती चक्की के पाट जितनी चौड़ी थी। बाजू बहुत लम्बे थे। हाथों की उंगलियां बहुत मोटी थीं । उसने आंखों पर चौड़े शीशों का गहरे रंग का चश्मा लगा रखा था। उसकी मूंछों के भीतर उसके होंठ छिपे हुए थे और कोट की भीतरी जेब से पिस्तौल का एक सिरा बाहर निकला हुआ था। मेरी नजर उसके कोट की भीतरी जेब पर पड़ी तो मैं समझ गया कि पिस्तौल पर साइलेंसर लगा हुआ था। उसे देखकर मेरी सिट्टी गुम हो गई।"(34)
कर्नल रंजीत उपन्यास साहित्य में विचित्र कथानक और मर्डर मिस्ट्री के लिए जाने जाते हैं । प्रस्तुत उपन्यास भी मर्डर और रहस्यवादी हत्याओं से परिपूर्ण है।
उपन्यास का कथानक बहुत से ट्विस्ट लिये हुये है। और पाठक पृष्ठ दर पृष्ठ कहानी से बंधा रहता है। मेजर बलवंत को बैंक डकैती के चैलेंज से आरम्भ यह कथानक जिस राह पर चल निकलता है उसका अंदाज पाठक नहीं लगा सकता ।
हां, अंत में एक बात एक पुलिस अधिकारी के शब्दों में- "यह एक धूर्त हत्यारे की ऐसी दास्तान है जो अपराध के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त करेगी।"
उपन्यास- दुल्हन की चीख
"आप उन्हें नहीं जानते। मैं आपसे मिलकर आया तो मेरे इस फ्लैट के बाहर एक व्यक्ति टहल रहा था। उसका कद छः फुट तीन इंच से कम नहीं होगा। उसकी छाती चक्की के पाट जितनी चौड़ी थी। बाजू बहुत लम्बे थे। हाथों की उंगलियां बहुत मोटी थीं । उसने आंखों पर चौड़े शीशों का गहरे रंग का चश्मा लगा रखा था। उसकी मूंछों के भीतर उसके होंठ छिपे हुए थे और कोट की भीतरी जेब से पिस्तौल का एक सिरा बाहर निकला हुआ था। मेरी नजर उसके कोट की भीतरी जेब पर पड़ी तो मैं समझ गया कि पिस्तौल पर साइलेंसर लगा हुआ था। उसे देखकर मेरी सिट्टी गुम हो गई।"(34)
कर्नल रंजीत उपन्यास साहित्य में विचित्र कथानक और मर्डर मिस्ट्री के लिए जाने जाते हैं । प्रस्तुत उपन्यास भी मर्डर और रहस्यवादी हत्याओं से परिपूर्ण है।
उपन्यास का कथानक बहुत से ट्विस्ट लिये हुये है। और पाठक पृष्ठ दर पृष्ठ कहानी से बंधा रहता है। मेजर बलवंत को बैंक डकैती के चैलेंज से आरम्भ यह कथानक जिस राह पर चल निकलता है उसका अंदाज पाठक नहीं लगा सकता ।
हां, अंत में एक बात एक पुलिस अधिकारी के शब्दों में- "यह एक धूर्त हत्यारे की ऐसी दास्तान है जो अपराध के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त करेगी।"
उपन्यास- दुल्हन की चीख
लेखक- कर्नल रंजीत
संस्करण- 1973
पृष्ठ- 137
प्रकाशक- हिंद पॉकेट बुक्स, दिल्ली
कर्नल रंजीत के अन्य उपन्यासों की समीक्षा
नकली चेहरे ।। उलटी लाशें ।। प्रेतात्मा की डायरी ।।
पीले बिच्छू ।। आग का समंदर ।। रात के अंधेरे में ।।
भयानक बौने ।। देख लिया तेरा कानून ।। टेडा मकान ।। हत्यारा पुल ।। रेत की दीवार ।। जानी दुश्मन ।। चीखती चट्टानें ।। खून के छींटें ।। सिरकटी लाशें ।। सफेद खून ।। चांदी की मछली ।। काला चश्मा ।। बोलते सिक्के ।। 11 बजकर 12 मिनट ।। हांगकांग के हत्यारे ।। लहू और मिट्टी
।। मृत्यु भक्त ।। वह कौन था ।। सांप की बेटी ।। खामोश ! मौत आती है ।। काली आंधी ।। हत्या का रहस्य ।। अधूरी औरत ।। ट्रेन एक्सीडेंट ।। हत्यारे की पत्नी ।। खूनी बद
नकली चेहरे ।। उलटी लाशें ।। प्रेतात्मा की डायरी ।।
पीले बिच्छू ।। आग का समंदर ।। रात के अंधेरे में ।।
भयानक बौने ।। देख लिया तेरा कानून ।। टेडा मकान ।। हत्यारा पुल ।। रेत की दीवार ।। जानी दुश्मन ।। चीखती चट्टानें ।। खून के छींटें ।। सिरकटी लाशें ।। सफेद खून ।। चांदी की मछली ।। काला चश्मा ।। बोलते सिक्के ।। 11 बजकर 12 मिनट ।। हांगकांग के हत्यारे ।। लहू और मिट्टी
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