Saturday, 7 February 2026

706. पीले बिच्छू- कर्नल रंजीत

मेजर बलवंत बांग्लादेश में
पीले बिच्छू- कर्नल रंजीत

राजस्थान के हनुमानगढ जिले के उपखंड संगरिया के मित्र हैं श्री रतन लाल चौधरी । दिसम्बर 2025 में रतन भाई के यहाँ जाना हुआ और उनसे मैं 15 उपन्यास कर्नल रंजीत के लेकर आया । फरवरी 2026 से उन्हीं उपन्यासों को पढा जा रहा है। और समयानुसार उनकी समीक्षा यहाँ प्रस्तुत की जा रही है। 
इन 15 उपन्यासों में से एक उपन्यास है पीले बिच्छू ।
हम समीक्षा की शुरुआत उपन्यास के प्रथम पृष्ठ के दृश्य से करते हैं।

आदेश भी, निवेदन भी
मेजर बलवन्त एक खूबसूरत और खुशबूदार फूल सोनिया के बालों में लगा रहा था। तभी उसने बंगले के अहाते में एक मोटर साइकल की आवाज सुनी । मेजर बलवन्त ने वह फूल जल्दी से सोनिया के बालों में लगा दिया और एक ओर हट गया। मोटर साइकल बरामदे में आकर रुक गई। आफिस के सदर दरवाजे के बाहर फर्श पर भारी बूटों की आवाज पैदा हुई और कुछ पल के बाद एक लम्बे कद का नौजवान, जिसने सुर्ख और खाकी पगड़ी बांध रखी थी, दरवाजे में दिखाई दिया ।
वह दोनों एड़ियां जोड़कर खड़ा हो गया, जिसका अर्थ था कि वह अन्दर आने की अनुमति मांग रहा था ।
मेजर बलवन्त ने उसके विशेष अभिवादन का उत्तर उसीके विशेष अंदाज़ में दिया और सिर के इशारे से अन्दर आने का इशारा किया । वह नौजवान मेजर की मेज़ तक आया। उसने सोनिया को देखकर उसका अभिवादन किया। मेजर यह देखकर बहुत प्रसन्न हुआ कि वह एक शिष्ट नौजवान था। नौजवान ने अपने कंधे पर लटके हुए थैले में से एक लम्बा लिफाफा निकालकर मेज पर रख दिया। उस लिफाफे पर सील-मुहर लगी हुई थी ।
मेजर बलवन्त ने उस लिफाफे पर नजर डाली। उस पर उभरे हुए काले अक्षरों में लिखा था- 'देश-सेवा के लिए' । एक कोने में लाल रोशनाई से तीन शब्द लिखे हुए थे- 'गुप्त तथा गोपनीय' । 
लिफाफे की बाईं ओर एक छपा हुआ पता था :
'देश सेवक मंडल, बम्बई शाखा
शिवाजी पार्क, बम्बई'

नमस्ते पाठक मित्रो,
कर्नल रंजीत के उपन्यास 'पीले बिच्छू' की समीक्षा में आपका हार्दिक स्वागत है। 
देश सेवक मण्डल एक संस्था है जो देश हितार्थ कार्यरत है। संस्था के प्रधान मेजर बलवंत से एक विशेष विषय पर मुलाकात करते हैं और अपना उद्देश्य स्पष्ट करते हैं
प्रधान ओबराय ने अब अर्थपूर्ण मुद्रा अपनाते हुए कहा, "हमें सुरक्षा करने और शत्रु के षड्यन्त्रों को नाकाम बनाने का पूरा अधिकार है । पूर्वी शत्रुदेश में हमारे देश के एक घनिष्ठ मित्र और सुप्रसिद्ध राजनीतिक नेता की हत्या कर दी गई है या उसे अपहृत करके किसी गुप्त स्थान में रखा गया है । शत्रुदेश के पूर्वी भाग में क्योंकि हमारा आना-जाना कठिन है, इसलिए हमें आपकी सेवाओं की आवश्यकता है ।"
  'देश सेवक मण्डल' के प्रधान ने मेजर बलवंत को शत्रुदेश में जाकर तीन काम करने की प्रार्थना की थी ।
'अपने देश के घनिष्ठ मित्र के अपहरण या हत्या का पता लगाने के लिए?'
- बागी स्मरना को शत्रुदेश के चंगुल से बचा कर लाना ।
-चटगांव में बागियों को गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग दी जा रही है, उस कैम्प को नष्ट करना है।
"एम०कलदानी ढाका का एक सुप्रसिद्ध व्यापारी था । पटसन का व्यापारी । बंगाली मुसलमान । कलदानी काफी पढ़ा-लिखा था - ऑक्सफोर्ड यूनिसिटी का ग्रेजुएट । उसकी पत्नी अरुन्धती सरकार एक चित्रकार है । उन दोनों ने लन्दन में प्रेम-विवाह था । पति-पत्नी दोनों प्रगतिशील विचारों के थे ।'
  इसी एम. कलदानी को भारत का मित्र माना गया है और जिसका अपहरण उसके देश में हो गया है और अब मेजर बलवंत को इसे आजाद करवाना था । एम. कलदानी की पत्नी अरुंधति की परम सहेली का नाम है जमीला। और जमीला का परिचय भी भयंकर है।
'जमीला, जो शत्रुदेश में 'चिनगारी' के नाम से प्रसिद्ध है और जिसने कलकत्ता में साम्प्रदायिक दंगे कराने की कोशिश की थी ?'(पृष्ठ-12)
  अब कहानी कितनी विकट हो जाती है। एक तरफ एम. कलदानी भारत का मित्र और प्रगतिशील विचारों का समर्थक है। वहीं जमीला भारत की विरोधी है और साम्प्रदायिक विचारों की समर्थक है। और इन दोनों के मध्य है अरुंधति, अरुंधति एम. कलदानी की पत्नी है और जमीला उर्फ चिनगारी की परम सहेली है। 
    मेजर बलवंत अपने सहयोगी अशोक, डोरा, सोनिया और कुत्ते क्रोकोडायल के साथ बांग्लादेश पहुंचता है और वहां जाकर वह किसी और ही काम में उलझ जाता है।
   क्योंकि यहां एम. कलदानी की हत्या के साथ-साथ दो और हत्याएं भी होती है और उनमें से एक है हैदर। अब मेजर बलवंत हैदर की हत्या की पहेली को हल करने का प्रयास करता है और कहानी मर्डर मिस्ट्री बन जाती है। और हैदर की हत्या एक हत्या ही नहीं उसके साथ और भी बहुत से रहस्य जुड़े हुये थे । जैसे वह एक चोर था, जैसे वह एक स्थानीय डाॅन का कर्जदार था, जैसे वह एक नर्स के लिए काम करता था और भी बहुत कुछ । 
हैदर की हत्या की छानबीन करते वक्त मेजर बलवंत के सामने एक नाम आता है सर्बत बेगम का जो की एक ईसाई अस्पताल में कार्यरत है। यहां से मेजर की जांच अस्पताल की ओर घूम जाती है। और वह बीच में मिसेज एम. कलदानी अरुंधति और जमीला उर्फ चिनगारी से भी मिलता रहना है। क्योंकि हैदर की हत्या की पहेली अत्यंत उलझाव और हत्याओं की शृंखला से संबंधित है।
इसी विषय पर मेजर और जमीला का संवाद देखें-
वह शरारत-भरे स्वर में बोली, "आप मौत हैं- मौत !"
"मैं मौत हूं या ज़िन्दगी ?"
"जिन्दगी नहीं, मौत हैं।"
"वह कैसे ?"
"जिस किसीसे भी आप एक बार मिलते हैं, उसीको मार डाला जाता है।"
"अच्छा तो आप सर्बत बेगम की हत्या का समाचार पढ़ चुकी है?"
"जी हां, और तभी से यह सोच रही हं कि अब मेरी बारी है। मेरी हत्या की योजना कहीं बनाई जा रही है।'

(जमीला - मेजर संवाद)
मेजर बलवंत जैसे -जैसे हैदर की हत्या की कड़ियों को सुलझाता है वैसे -वैसे केस उलझता चला जाता है। वहीं अशोक, डोरा और सोनिया भी स्मरना खोज और चीन द्वारा संचालित कैम्प को नष्ट करने के किए प्रयासरत हैं।     
रूप बदलता मेजर बलवंत- उपन्यास में मेजर बलवंत शत्रुदेश में है तो वह अपने वास्तविक रूप में तो नहीं होगा। वह अक्सर रूप बदलता रहता है । जैसे - सूदखोर पठान, पुलिस अधिकारी, 
उपन्यास शीर्षक:-
    उपन्यास का नाम 'पीले बिच्छू' है। यह यह शीर्षक कहीं स्पष्ट नहीं होता । हां उपन्यास के नेपथ्य में चीनी लोग अवश्य हैं शायद उनके लिए यह शब्द प्रयुक्त हुआ हो। फिर भी यह शीर्षक तार्किक कम ही लगता है।
तकिया:
मेरे गांव बगीचा में 'भारती संन्यास आश्रम' है(यह नाम हमारे द्वारा ही दिया गया है।) जिसे सभी लोग 'तकिया' नाम से संबोधित करते हैं। तकिया शब्द का अर्थ यहाँ किसी को भी मालूम नहीं । मैंने बहुत कोशिश की तो कहीं एक रचना में तकिया शब्द का संक्षिप्त अर्थ मिला और प्रस्तुत उपन्यास में एक अध्याय का नाम 'तकिया' है। तकिया शब्द का वर्तमान अर्थ आश्रम, डेरा या साधुओं का स्थान से लिया जाता है।
विशेष
- इस उपन्यास में मेजर बलवंत का विशेष सहयोगी अशोक कैम्प नष्ट करने के दौरान शहीद हो जाता है।
- इसी उपन्यास में मेजर बलवंत की मुलाकात मालती बनर्जी से होती है जो आगे चलकर मेजर की सहयोगी बनती है। 
कर्नल  रंजीत के उपन्यास की विशेषताओं मे एक विशेषता यह भी है कि उनके द्वारा पात्रों की वेशभूषा और परिचय देना।
यहां एक ज्वैलर्स (जिसे उपन्यास में 'खोजा' कहा गया है। 'खोजा' का एक ही दृश्य है।) तीन साल पूर्व दुकान पर आये ग्राहक के साथ वाली स्त्री का वर्णन ऐसे करता है जैसे कल की बात हो।
वह चौकन्ना होकर बैठ गया और बोला, "उस स्त्री की उम्र छत्तीस या अड़तीस वर्ष की थी। उसकी आंखें मोटी और गिलाफी थीं। सीना बहुत अधिक उभरा हुआ था। उसकी कमर उसके बदन के अनु-पात से पतली थी। कूल्हे बहुत ही मोहक थे ।" (तीन साल पुराना चेहरा)
अंत में .....
क्या एम० कलदानी भारत का मित्र था ? 
क्या सर्बत बेगम एक नर्स-भर थी ? 
क्या जमीला एक जासूस-मात्र थी ?
इन प्रश्नों को जितना जानने की कोशिश की गई, मामला उतना ही पेचीदा होता गया...
...एक के बाद एक रहस्यमय हत्या के सिलसिले से सभी चकाचौंध रह गए !・・・ एक पहेली सुलझ न पाती थी कि दूसरी सामने आ जाती थी। पर मेजर बलवंत थे कि सारी घटनाओं पर अपनी पैनी नजर रखे हुए थे । वे ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते गए, उनके सामने एक-एक करके रहस्य के पर्दे खुलते गए..एक सनसनीखेज़ उपन्यास, जिसका नया संशोधित संस्करण आपके हाथों में है।
(आवरण पृष्ठ से )
कर्नल रंजीत द्वारा लिखित 'पीले बिच्छू' यहाँ आरम्भ में देशभक्ति उपन्यास नजर आता है वहीं यह शीघ्र ही मर्डर मिस्ट्री में बदल जाता है। मेजर बलवंत बांग्लादेश में एक हत्या के रहस्य को हल करते नजर आते हैं। कहानी तेज रफ्तार और रोचकता से भरपूर है। कदम कदम पर नये रहस्य काफी प्रभावित करते हैं।
वहीं उपन्यास जो बात खटकी वह थी जिस काम के लिए मेजर बलवंत 'देश सेवा मण्डल' के लिए इतनी भागदौड़ करते हैं वह कुछ और ही निकलता है। हां, होने को ऐसा भी हो सकता है। जो नजर आता है वह सत्य हो ऐसा जरूरी तो नहीं ।
  उपन्यास रोचक और मनोरंजन से भरपूर है।

उपन्यास-   पीले बिच्छू
लेखक-      कर्नल रंजीत
सन् -         1971
पृष्ठ-          138
प्रकाशक-   हिंद पॉकेट बुक्स, दिल्ली

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