प्रतिशोध कथा
उलटी लाशे- कर्नल रंजीत- 1984
लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में कर्नल रंजीत अद्भुत रहस्यमयी कथाओं के लेखक के रूप में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखते हैं। इनकी कहानी और पात्र दोनों ही गहरे होते हैं। अत्यंत उलझाव और ज्यादा पात्रों को एकत्र करना और फिर उन्हीं के मध्य रोचक संघर्ष दिखाने में कर्नल रंजीत अपना एक अलग कौशल रखते हैं। इनकी अधिकांश कहानियों में प्रतिशोध मुख्य बिंदु उभरकर सामने आता है । प्रस्तुत उपन्यास 'उलटी लाशें' भी एक प्रतिशोध से संबंधित के मर्डर मिस्ट्री रचना है। जहां हत्यारा कत्ल करने के पश्चात लाश को उलटा लटका देता है।
वह ऐसा क्यों करता है ?
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| National Highway-911 |
जहरीला धुआं
रात का अन्तिम पहर बीत रहा था।
अभी सूर्योदय होने में लगभग एक घंटा था। सारा बंगला खामोशी की चादर में लिपटा शान्त सोया पड़ा था। अचानक टेलीफोन की घंटी की आवाज बंगले में छाये सन्नाटे चीरकर गूंज उठी ।
सोनिया की नींद उचट गई। उसने लेटे-लेटे ही टेलीफोन पर एक नजर डाली। टेलीफोन की घंटी निरन्तर बजे चली जा रही थी।
उसने उटकर एक लम्बी अंगड़ाई ली और फिर हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठा लिया।
"हैलो ।" उसने नींद से बोझिल आवाज में कहा ।
"तुम कौन बोल रही हो ?" दूसरी ओर से किसी ने बड़ी
अशिष्टता से फटे बांस जैसी आवाज में पूछा ।
सोनिया को उस व्यक्ति के बात करने के ढंग पर गुस्सा आ गया। जी चाहा उसे अच्छी तरह फटकारकर टेलीफोन डिस्कनेक्ट कर दे। लेकिन न जाने क्या सोचकर उसने जल्दी से अपने आपको संयत किया और बड़ी नर्मी से पूछा, "आपने कौन-सा नम्बर डायल किया है ?"
"तुम मेजर बलवंत के बंगले से ही बोल रही हो न ?"- दूसरी ओर से फोन करने वाले ने पूछा ।
"जी हां, आप कौन साहब बोल रहे हैं ?" सोनिया ने फिर पहले की ही तरह नर्मी से पूछा ।
"इससे तुम्हें कोई मतलब नहीं कि मैं कौन बोल रहा हूं और कहां से बोल रहा हूँ। खैर, यह बताओ मेजर बलवंत कहां है ?''(उलटी लाशें- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)
पाठक मित्रो, आपके लिए प्रस्तुत है कर्नल रंजीत की अदभुत लेखनी का एक और रोचक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास 'उलटी लाशे' । एक ऐसे हत्यारे की कहानी जो बहुत ही वीभत्स तरीके से हत्या करता था और जिसने मेजर बलवंत की कोठी पर भी हमला कर दिया था ।
वासना, प्रतिशोध, तस्करी । गैरकानूनी हथियारों का व्यापार आदि ।
कई ऐसे कारण थे जिन्होंने भयानक हत्याकांडों की कहानी खून से लिखी ।
इस सबके लिए जिम्मेदार कौन था ?
वासना, प्रतिशोध, तस्करी । गैरकानूनी हथियारों का व्यापार आदि ।
कई ऐसे कारण थे जिन्होंने भयानक हत्याकांडों की कहानी खून से लिखी ।
इस सबके लिए जिम्मेदार कौन था ?
एक के पीछे अनेक रहस्यों का जाल बुनने वाली कहानी ।
रोमांच, सस्पेंस और कौतूहल से भरपूर है। हत्यारों ने जासूस मेजर बलवंत को भी छुपा दिया।
जब उसे संदूक में बंद कर लाश का पार्सल भेजा गया ।
पढ़िये कर्नल रंजीत का आश्चर्यजनक घटनाओं से पूर्ण नवीनतम उपन्यास - 'उलटी लाशें' ।
उपन्यास का आरम्भ में ही अपराधी मेजर बलवंत को फोन कर चेतावनी देता है। और बाद में भी उसके घर पर हमला करता है। अब पता नहीं क्यों अपराधी बिना मतलब मेजर बलवंत से उलझने की कोशिश कर रहा है। जबकि हर अपराधी पुलिस-जासूस से दूर भागने की कोशिश करता है और यहाँ इसके विपरीत कार्य हो रहा है।
स्वयं मेजर बलवंत का कथन देखें- "एक बात अभी तक मेरी समझ में नहीं आ रही। इन दिनों मेरे हाथ में कोई केस नहीं है और न मैंने आज तक किसी भी केस से सम्बन्धित किसी अपराधी को ही बख्शा है जो कुछ दिनों बाद मौका पाकर मुझसे बदला लेने की कोशिश करता । फिर ये आक्रमणकारी कौन थे और इन्होंने किसके कहने पर मेरे बंगले पर आक्रमण किया ?" (पृष्ठ-15)
अभी मेजर बलवंत अपने बंगले पर हुये आक्रमण पर का कारण समझ ही नही पाये थे की एक नया केस उनके सामने आ गया ।
"मेजर साहब, मैं सावरकर कालोनी पुलिस स्टेशन का इंचार्ज इस्पेक्टर जोगलेकर बोल रहा हूं।" इंस्पेक्टर जोगलेकर ने बड़ी विनम्रता से कहा, "अममय आपको कष्ट दे रहा हूं।" (पृष्ठ-31)
इंस्पेक्टर जोगलेकर ने असमय फोन ऐसे ही नहीं किया था। उसका कारण था एक वीभत्स हत्या ।
सावरकर कालोनी के सेठ मदन मोहन की लाश उनकी कोठी पर लटकी हुयी मिली थी- सेठजी के बेडरूम की अधखुली खिड़की में से लहू में डूबी वह लाश विभिन्न ढंग से उलटी लटकी हुई थी। उसके एक पांव में रस्सा बंधा हुआ था जो खिड़की के पट के नीचे फंसा हुआ था, दूसरी टांग हवा में टेढ़ी होकर लहरा रही थी और लाश तिरछी हो गई थी। लाश की इस स्थिति ने उसकी भयानकता को और अधिक बढा दिया था ।(पृष्ठ-28)
मेजर बलवंत ने सेठ मदन मोहन के विषय में जो जाना उसके अनुसार सेठ जी के परिवार के सदस्य जामनगर (गुजरात) में रहते हैं।
"क्या सेठजी की पत्नी यशोदा उनके साथ नहीं रहती थीं ?" मेजर बलवंत ने मोरनी की आंखों में झांकते हुए पूछा ।
"मैंने तो जब से होश संभाला है उन्हें यहां कभी आते-जाते देखा नहीं।" मोरनी बोली ।
एक मोरनी और एक नौकर गंगाराम ही सेठ जी के खास थे । यह मेजर बलवंत के लिए अचरज से कम न था । हत्या के पश्चात सेठ जी की स्टील की अलमारी की चाबियां गायब थी ।
"लगता है हत्यारा सेठजी की हत्या करने के बाद चाबियों का गुच्छा उठा ले गया।" मोरनी ने सोच में डूबी आवाज में कहा, "इसका मतलब है कि वह कुछ-न-कुछ स्टील की इन तीनों अलमारियों में से जरूर निकालकर ले गया होगा । वरना उसे चाबियों के गुच्छे को ले जाने की जरूरत ही क्या थी ?"
"यही बात हो सकती है मोरनी !" मेजर बलवंत ने कहा ।(पृष्ठ-35)
मेजर बलवंत अभी इस केस को हल भी नहीं कर पाया था कि उनके समक्ष इसी केस से मिलता एक और केस आ गया ।
इंस्पेक्टर कुलकर्णी ने जल्दी से उठकर मेजर बलवंत से हाथ मिलाया और फिर मुस्कराते हुए बोला, “मेजर साहब, असल में इंसान बहुत ही स्वार्थी प्राणी है। जब उस पर कोई बहुत बड़ा संकट आ पड़ता है तो वह एकदम आस्तिक बन जाता है और मन्दिर में जाकर भगवान की मूर्ति के आगे रोना गिड़गिड़ाना शुरू कर देता है। इसी तरह जब हम लोगों के सामने कोई उलझा हुआ केस आ जाता है तो हम दौड़े हुए आपके पास बले आते हैं।"(पृष्ठ-39)
इंस्पेक्टर कुलकर्णी के अनुसार सुप्रीम ऑटोमोबाइल के मालिक सेठ अमृतलाल धूपिया की किसी ने बेहरमी से हत्या कर दी ।
“बेरहमी से ?” मेजर बलवंत ने बड़ी उत्सुकता से पूछा ।
"जी हां, हत्यारे ने पहले तो उनके बदन के सारे कपड़े उतारकर उनके नंगे बदन पर इतनी बेरहमी से हंटर बरसाए हैं कि उनके बदन की सारी चमड़ी उधेड़ फेंकी है। सारा बदन मांस का लोथड़ा दिखाई दे रहा था। और हंटरों की मार से फूली हुई लहू में लिथड़ी लाश बहुत ही भयानक दिखाई दे रही थी। हो सकता है हंटरों की मार से ही सेठ अमृतलाल धूपिया की मृत्यु हो गई हो। फिर भी शायद हत्यारे को इत्मीनान नहीं हुआ था। उसने उनके सीने में दिन के ठीक ऊपर सुए जैसे पतले फलवाला छुरा भोंक दिया था जो उनके दिल को चीरता हुआ निकल गया था। और फिर उनकी नंगी लहूलुहान लाश के पैरों में नाइलोन का रस्सा बांधकर सीलिंग फैन से उलटी लटकाई थी और फिर सीलिंग फैन का स्विच ऑन कर दिया था । पंखे की पंखुड़ियों के साथ-साथ उलटी लटकी हुई लाश भी घूमने लगी थी । जिससे उड़ने वाले खून के छींटों से बेडरूम की दीबारें गोलाई में डेढ दो फुट तक रंग गई हैं।" (पृष्ठ-40)
“बिलकुल इसी ढंग से रात मोहन फैब्रिक्स के मालिक सेठ मदन मोहन देसाई की भी हत्या की गई है। हत्यारे ने उनकी लाश पंखे से लटकाने के बजाय खिड़की से बाहर टांग में रस्सा बांधकर लटका दी थी। हंटरों से बुरी तरह पीट-पीट कर उनकी चमड़ी भी उधेड़ दी गई थी। और फिर उनके सीने में भी ठीक दिल के ऊपर सुए जैसी बारीक धार वाला छुरा भोंक दिया गया था ।" मेजर बलवंत ने बताया ।
"इसका मतलब है एक ही रात में एक जैसी दो हत्याएं ।" (पृष्ठ-40)
पाठकगण कहानी यही तक ही नहीं क्योंकि इस उपन्यास के एक अध्याय का नाम है 'तीसरी हत्या' । और जब अध्याय का यह नाम है तो तय है तीसरी हत्या भी होगी और हुयी भी ।
सेठ भीमदेव जोशी की हत्या भी ठीक उसी ढंग से की गई थी जिस ढंग से पिछनी रात सेठ मदनमोहन देसाई और सेठ अमृत धूपिया की हत्या की गई थी ।"(पृष्ठ-52)
मेजर बलवंत ने जाना की तीनों सेठ गरीब से अमीर बने हैं औए इनके पारिवारिक रिश्ते अत्यंत बिखराव वाले रहे हैं । किसी ने शादी नहीं की, किसी का पत्नी से मनमुटाव है,किसी को पत्नी सुख नहीं तो किसी की पत्नी की मृत्यु हो गयी लेकिन फिर भी सभी सेठ अच्छा जीवन जीते थे और शारीरिक आवश्यकताओं को पूर्ण करते थे और उनके घर पर नौकरानियोंकी संख्या भी ज्यादा थी।
वहीं मेजर बलवंत ने जाना की सेठों की स्टील की अलमारियों से कुछ तो गायब है पर वह क्या गायब है यह अभी तक कुछ पता नहीं चला था ।
वहीं मेजर बलवंत पर फिर जानलेवा हमला होता है और अपराधी एक के बाद एक अपराध करता चला जाता है यहां तक मेजर के सामने आये गवाह भी वह खत्म कर देता है और मेजर इस अज्ञात अपराधी की चाल तक समझ नहीं पाता । लेकिन फिर भी मेजर अपने इरादे से पीछे नहीं हटता और अपनी टीम के साथ असली अपराधी को खोज ही निकालता है।
प्रस्तुत उपन्यास एक मर्डर मिस्ट्री रचना है इसमें होने वाले मर्डर भी भयानक ढंग से होते है और एक विशेष तरीके से होते हैं । यहीं भयानकता मेजर को सोचने को विवश करती है की कोई मात्र हत्या ही नहीं कर रहा बल्कि वह प्रतिशोध ले रहा है क्योंकि उसके हत्या करने का तरीका बताता है की वह मृतकों से कितनी गहरी नफरत करता है।
जैसे जैसे कार्यवाही आगे बढती है तो कुछ रहस्य स्पष्ट होते चले जाते हैं और यही रहस्य वास्तविक अपराधी तक पहुंचाने में मददगार बनते हैं।
उपन्यास में कुछ त्रासदियां है जो भावुक करती है। जैसे शकूर पहलवान के साथ जो घटित होता है वह बहुत ही मार्मिक है।
रूबी की के विषय में मेजर भी सिहर उठता है।
चमन लाल की मृत्यु भी भावुक करती है।
रोमांच, सस्पेंस और कौतूहल से भरपूर है। हत्यारों ने जासूस मेजर बलवंत को भी छुपा दिया।
जब उसे संदूक में बंद कर लाश का पार्सल भेजा गया ।
पढ़िये कर्नल रंजीत का आश्चर्यजनक घटनाओं से पूर्ण नवीनतम उपन्यास - 'उलटी लाशें' ।
उपन्यास का आरम्भ में ही अपराधी मेजर बलवंत को फोन कर चेतावनी देता है। और बाद में भी उसके घर पर हमला करता है। अब पता नहीं क्यों अपराधी बिना मतलब मेजर बलवंत से उलझने की कोशिश कर रहा है। जबकि हर अपराधी पुलिस-जासूस से दूर भागने की कोशिश करता है और यहाँ इसके विपरीत कार्य हो रहा है।
स्वयं मेजर बलवंत का कथन देखें- "एक बात अभी तक मेरी समझ में नहीं आ रही। इन दिनों मेरे हाथ में कोई केस नहीं है और न मैंने आज तक किसी भी केस से सम्बन्धित किसी अपराधी को ही बख्शा है जो कुछ दिनों बाद मौका पाकर मुझसे बदला लेने की कोशिश करता । फिर ये आक्रमणकारी कौन थे और इन्होंने किसके कहने पर मेरे बंगले पर आक्रमण किया ?" (पृष्ठ-15)
अभी मेजर बलवंत अपने बंगले पर हुये आक्रमण पर का कारण समझ ही नही पाये थे की एक नया केस उनके सामने आ गया ।
"मेजर साहब, मैं सावरकर कालोनी पुलिस स्टेशन का इंचार्ज इस्पेक्टर जोगलेकर बोल रहा हूं।" इंस्पेक्टर जोगलेकर ने बड़ी विनम्रता से कहा, "अममय आपको कष्ट दे रहा हूं।" (पृष्ठ-31)
इंस्पेक्टर जोगलेकर ने असमय फोन ऐसे ही नहीं किया था। उसका कारण था एक वीभत्स हत्या ।
सावरकर कालोनी के सेठ मदन मोहन की लाश उनकी कोठी पर लटकी हुयी मिली थी- सेठजी के बेडरूम की अधखुली खिड़की में से लहू में डूबी वह लाश विभिन्न ढंग से उलटी लटकी हुई थी। उसके एक पांव में रस्सा बंधा हुआ था जो खिड़की के पट के नीचे फंसा हुआ था, दूसरी टांग हवा में टेढ़ी होकर लहरा रही थी और लाश तिरछी हो गई थी। लाश की इस स्थिति ने उसकी भयानकता को और अधिक बढा दिया था ।(पृष्ठ-28)
मेजर बलवंत ने सेठ मदन मोहन के विषय में जो जाना उसके अनुसार सेठ जी के परिवार के सदस्य जामनगर (गुजरात) में रहते हैं।
"क्या सेठजी की पत्नी यशोदा उनके साथ नहीं रहती थीं ?" मेजर बलवंत ने मोरनी की आंखों में झांकते हुए पूछा ।
"मैंने तो जब से होश संभाला है उन्हें यहां कभी आते-जाते देखा नहीं।" मोरनी बोली ।
एक मोरनी और एक नौकर गंगाराम ही सेठ जी के खास थे । यह मेजर बलवंत के लिए अचरज से कम न था । हत्या के पश्चात सेठ जी की स्टील की अलमारी की चाबियां गायब थी ।
"लगता है हत्यारा सेठजी की हत्या करने के बाद चाबियों का गुच्छा उठा ले गया।" मोरनी ने सोच में डूबी आवाज में कहा, "इसका मतलब है कि वह कुछ-न-कुछ स्टील की इन तीनों अलमारियों में से जरूर निकालकर ले गया होगा । वरना उसे चाबियों के गुच्छे को ले जाने की जरूरत ही क्या थी ?"
"यही बात हो सकती है मोरनी !" मेजर बलवंत ने कहा ।(पृष्ठ-35)
मेजर बलवंत अभी इस केस को हल भी नहीं कर पाया था कि उनके समक्ष इसी केस से मिलता एक और केस आ गया ।
इंस्पेक्टर कुलकर्णी ने जल्दी से उठकर मेजर बलवंत से हाथ मिलाया और फिर मुस्कराते हुए बोला, “मेजर साहब, असल में इंसान बहुत ही स्वार्थी प्राणी है। जब उस पर कोई बहुत बड़ा संकट आ पड़ता है तो वह एकदम आस्तिक बन जाता है और मन्दिर में जाकर भगवान की मूर्ति के आगे रोना गिड़गिड़ाना शुरू कर देता है। इसी तरह जब हम लोगों के सामने कोई उलझा हुआ केस आ जाता है तो हम दौड़े हुए आपके पास बले आते हैं।"(पृष्ठ-39)
इंस्पेक्टर कुलकर्णी के अनुसार सुप्रीम ऑटोमोबाइल के मालिक सेठ अमृतलाल धूपिया की किसी ने बेहरमी से हत्या कर दी ।
“बेरहमी से ?” मेजर बलवंत ने बड़ी उत्सुकता से पूछा ।
"जी हां, हत्यारे ने पहले तो उनके बदन के सारे कपड़े उतारकर उनके नंगे बदन पर इतनी बेरहमी से हंटर बरसाए हैं कि उनके बदन की सारी चमड़ी उधेड़ फेंकी है। सारा बदन मांस का लोथड़ा दिखाई दे रहा था। और हंटरों की मार से फूली हुई लहू में लिथड़ी लाश बहुत ही भयानक दिखाई दे रही थी। हो सकता है हंटरों की मार से ही सेठ अमृतलाल धूपिया की मृत्यु हो गई हो। फिर भी शायद हत्यारे को इत्मीनान नहीं हुआ था। उसने उनके सीने में दिन के ठीक ऊपर सुए जैसे पतले फलवाला छुरा भोंक दिया था जो उनके दिल को चीरता हुआ निकल गया था। और फिर उनकी नंगी लहूलुहान लाश के पैरों में नाइलोन का रस्सा बांधकर सीलिंग फैन से उलटी लटकाई थी और फिर सीलिंग फैन का स्विच ऑन कर दिया था । पंखे की पंखुड़ियों के साथ-साथ उलटी लटकी हुई लाश भी घूमने लगी थी । जिससे उड़ने वाले खून के छींटों से बेडरूम की दीबारें गोलाई में डेढ दो फुट तक रंग गई हैं।" (पृष्ठ-40)
“बिलकुल इसी ढंग से रात मोहन फैब्रिक्स के मालिक सेठ मदन मोहन देसाई की भी हत्या की गई है। हत्यारे ने उनकी लाश पंखे से लटकाने के बजाय खिड़की से बाहर टांग में रस्सा बांधकर लटका दी थी। हंटरों से बुरी तरह पीट-पीट कर उनकी चमड़ी भी उधेड़ दी गई थी। और फिर उनके सीने में भी ठीक दिल के ऊपर सुए जैसी बारीक धार वाला छुरा भोंक दिया गया था ।" मेजर बलवंत ने बताया ।
"इसका मतलब है एक ही रात में एक जैसी दो हत्याएं ।" (पृष्ठ-40)
पाठकगण कहानी यही तक ही नहीं क्योंकि इस उपन्यास के एक अध्याय का नाम है 'तीसरी हत्या' । और जब अध्याय का यह नाम है तो तय है तीसरी हत्या भी होगी और हुयी भी ।
सेठ भीमदेव जोशी की हत्या भी ठीक उसी ढंग से की गई थी जिस ढंग से पिछनी रात सेठ मदनमोहन देसाई और सेठ अमृत धूपिया की हत्या की गई थी ।"(पृष्ठ-52)
मेजर बलवंत ने जाना की तीनों सेठ गरीब से अमीर बने हैं औए इनके पारिवारिक रिश्ते अत्यंत बिखराव वाले रहे हैं । किसी ने शादी नहीं की, किसी का पत्नी से मनमुटाव है,किसी को पत्नी सुख नहीं तो किसी की पत्नी की मृत्यु हो गयी लेकिन फिर भी सभी सेठ अच्छा जीवन जीते थे और शारीरिक आवश्यकताओं को पूर्ण करते थे और उनके घर पर नौकरानियोंकी संख्या भी ज्यादा थी।
वहीं मेजर बलवंत ने जाना की सेठों की स्टील की अलमारियों से कुछ तो गायब है पर वह क्या गायब है यह अभी तक कुछ पता नहीं चला था ।
वहीं मेजर बलवंत पर फिर जानलेवा हमला होता है और अपराधी एक के बाद एक अपराध करता चला जाता है यहां तक मेजर के सामने आये गवाह भी वह खत्म कर देता है और मेजर इस अज्ञात अपराधी की चाल तक समझ नहीं पाता । लेकिन फिर भी मेजर अपने इरादे से पीछे नहीं हटता और अपनी टीम के साथ असली अपराधी को खोज ही निकालता है।
प्रस्तुत उपन्यास एक मर्डर मिस्ट्री रचना है इसमें होने वाले मर्डर भी भयानक ढंग से होते है और एक विशेष तरीके से होते हैं । यहीं भयानकता मेजर को सोचने को विवश करती है की कोई मात्र हत्या ही नहीं कर रहा बल्कि वह प्रतिशोध ले रहा है क्योंकि उसके हत्या करने का तरीका बताता है की वह मृतकों से कितनी गहरी नफरत करता है।
जैसे जैसे कार्यवाही आगे बढती है तो कुछ रहस्य स्पष्ट होते चले जाते हैं और यही रहस्य वास्तविक अपराधी तक पहुंचाने में मददगार बनते हैं।
उपन्यास में कुछ त्रासदियां है जो भावुक करती है। जैसे शकूर पहलवान के साथ जो घटित होता है वह बहुत ही मार्मिक है।
रूबी की के विषय में मेजर भी सिहर उठता है।
चमन लाल की मृत्यु भी भावुक करती है।
उपन्यास का एक किरदार है मोरनी । मोरनी की कहानी पाठक के मन को छू लेने वाली है और वहीं ऐसे लोगों के चरित्र को उजागर करती है जिनकी कथनी और करनी में दिन रात का अंतर है।
यह कहानी है उन पांच नौजवानों की जो मुम्बई की धरा पर अपने सपने को पूर्ण करने के लिए आते हैं। मुम्बई सपनों की नगरी है लेकिन सभी के सपने तो यहां भी पूरे नहीं होते । बस कुछ लोग अपने सपनों को पूरा करने के लिए गलत रास्ता अपना लेते हैं। ऐसा ही कुछ गलत राह इन मित्रों ने पकड़ा और एक के बाद एक अपराध करते चले गये और अपराध से, गलत राह से अपने सपने पूर्ण करते गये लेकिन कहते है भगवान के घर देर है अंधेर नहीं ।
यहां भी देर ही थी अंधेर नहीं था। क्योंकि पच्चीस साल बाद वह देर पूरी हुयी, अंधेर दूर हुआ और पापों का कर्म सामने आने लगा । वहीं उपन्यास को थोड़ा पेचीदा और घुमावदार बनाने के लिए इसमें अंतरराष्ट्रीय समग्लर अलबर्ट को शामिल कर लिया गया है ताकि उपन्यास में मर्डर मिस्ट्री के अतिरिक्त रोचकता बनी रहे।
तथ्यात्मक-
"आपको पता नहीं डॉक्टर साहब, मेजर साहब ने इस साल जून से पहले ही ईगतपुरी के पास सौ एकड़ का फार्म खरीदा था । जहां हमारे फिल्म स्टारों के फार्म हैं।" सोनिया ने। बताया, “फार्म में एक छोटा-सा दो मंजिला फार्म-हाउस भी बनवा लिया है। हम लोग जब भी बम्बई में रहते-रहते ऊब जाते हैं या किसी केस में काफी दिन उलझे रहने पर थक जाते हैं तो ईगतपुरी चले जाते हैं ।(पृष्ठ-13)
कर्नल रंजीत द्वारा लिखित 'उलटी लाशे' उपन्यास एक प्रतिशोध से भरा हुआ कथानक है जो एक वीभत्स हत्या से आरम्भ होता है और आगे भी वीभत्स हत्याओं का क्रम जारी रहता है। मेजर बलवंत की तीक्ष्ण दृष्टि से बुद्धि कौशल से अपराधी आखिर में कड़ा जाता है।
उपन्यास- उलटी लाशें
यह कहानी है उन पांच नौजवानों की जो मुम्बई की धरा पर अपने सपने को पूर्ण करने के लिए आते हैं। मुम्बई सपनों की नगरी है लेकिन सभी के सपने तो यहां भी पूरे नहीं होते । बस कुछ लोग अपने सपनों को पूरा करने के लिए गलत रास्ता अपना लेते हैं। ऐसा ही कुछ गलत राह इन मित्रों ने पकड़ा और एक के बाद एक अपराध करते चले गये और अपराध से, गलत राह से अपने सपने पूर्ण करते गये लेकिन कहते है भगवान के घर देर है अंधेर नहीं ।
यहां भी देर ही थी अंधेर नहीं था। क्योंकि पच्चीस साल बाद वह देर पूरी हुयी, अंधेर दूर हुआ और पापों का कर्म सामने आने लगा । वहीं उपन्यास को थोड़ा पेचीदा और घुमावदार बनाने के लिए इसमें अंतरराष्ट्रीय समग्लर अलबर्ट को शामिल कर लिया गया है ताकि उपन्यास में मर्डर मिस्ट्री के अतिरिक्त रोचकता बनी रहे।
तथ्यात्मक-
"आपको पता नहीं डॉक्टर साहब, मेजर साहब ने इस साल जून से पहले ही ईगतपुरी के पास सौ एकड़ का फार्म खरीदा था । जहां हमारे फिल्म स्टारों के फार्म हैं।" सोनिया ने। बताया, “फार्म में एक छोटा-सा दो मंजिला फार्म-हाउस भी बनवा लिया है। हम लोग जब भी बम्बई में रहते-रहते ऊब जाते हैं या किसी केस में काफी दिन उलझे रहने पर थक जाते हैं तो ईगतपुरी चले जाते हैं ।(पृष्ठ-13)
कर्नल रंजीत द्वारा लिखित 'उलटी लाशे' उपन्यास एक प्रतिशोध से भरा हुआ कथानक है जो एक वीभत्स हत्या से आरम्भ होता है और आगे भी वीभत्स हत्याओं का क्रम जारी रहता है। मेजर बलवंत की तीक्ष्ण दृष्टि से बुद्धि कौशल से अपराधी आखिर में कड़ा जाता है।
उपन्यास- उलटी लाशें
लेखक- कर्नल रंजीत
पृष्ठ- 109
प्रकाशक- हिंद पॉकेट बुक्स, दिल्ली
कर्नल रंजीत के अन्य उपन्यासों की समीक्षा
पीले बिच्छू ।। भयानक बौने ।। देख लिया तेरा कानून ।। सांप की बेटी ।। काली आंधी ।। हत्या का रहस्य ।। सांप की बेटी ।। काला चश्मा ।। अधूरी औरत ।। सिरकटी लाशें ।। हत्यारा पुल ।। टेडा मकान ।। आग का समंदर ।। प्रेतात्मा की डायरी ।।

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