कबाड़ी, मदारी,तातारी का एक और कारनामा
भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज
लोकप्रिय कथाकार श्री वेदप्रकाश काम्बोज जी ने जासूसी साहित्य में जासूसी उपन्यासों में हास्य जासूसी उपन्यासों का भी सृजन किया है। हम इस से पूर्व 'मौत की आवाज' नामक उपन्यास की चर्चा कर चुके हैं और अब प्रस्तुत है इन्हीं की कलम से निकला एक और हास्य जासूसी उपन्यास 'भेदभरी हत्या' ।यह उपन्यास वेदप्रकाश काम्बोज जी के तीन पात्र कुंदन कबाड़ी, गोकुल मदारी और फन्ने खां तातारी सीरीज का एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है।
भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज
विज्ञापनबाजी करने के बावजूद जब के० एफ० जी० प्राइवेट डिटेक्टिव कम्पनी के अन्दर कोई भी केस नहीं आया तो उस कम्पनी के तीनों मालिकनुमा चपरासियों को कारण पर विचार करने के लिए विवश होना पड़ा।
बनाई जैसी कि अन्तिम दृश्य में सोचने के समय कुन्दन कबाड़ी ने ऐसी ही मुद्रा देवदास की भूमिका में दिलीप कुमार ने फिल्म के पारो के घर के सामने बनाई थी। इसके पश्चात मस्तिष्क की खुली सड़क पर विचारों का ताँगा कारण की तलाश में बिना कोचवान के खुला छोड़ दिया गया ।
रैड एण्ड ह्वाईट के दो पैकेट और कोकाकोला की चार बोतलें, एक गिलास और बन्द कमरा । सोचने के लिए यह चीजें चुनीं गोकुल मदारी ने । बाँए हाथ की पहली दो उंगलियों के बीच में सिगरेट दबी हुई थी और उसी हाथ पर चेहरा इस प्रकार टिका हुआ था कि उंगलियों में दबी हुई सिगरेट का एक सिरा उसके माथे के कोने से टकरा रहा था । बाँए हाथ में दबा हुआ था गिलास जिसमें कोका-कोला डालकर उसको रम की तरह पिया जा रहा था। गोकुल मदारी का ख्याल था कि इस ढंग से सोचने पर अक्ल की बात जल्दी ही सूझ जाती है।
सोचने का सर्वाधिक विचित्र तरीका था फन्नेखाँ तातारी का । कारण तलाश करने के लिए उस शेर ने रात में जागना और दिन में सोना आरम्भ कर दिया था। रात जब अपना तारों भरा आंचल फैलाती और फन्नेखाँ तांतारी पलंग पर से उठकर छत पर जा बैठता और तारे गिनना आरम्भ कर देता और फिर जब सुबह के समय रात का तारों भरा आँचल सिमटता तो फन्नेखाँ तातारी छत से उठकर पलंग पर पहुंच जाता। गनीमत यही हुई कि किसी ने भी तातारी को विरही प्रेमी समझने की सुनहरी भूल नहीं की ।(प्रथम पृष्ठ, भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज)
हमने पूर्व उपन्यास 'मौत की आवाज' में पढा था कि कबाड़ी, मदारी और तातारी अपनी 'के० एफ० जी० प्राइवेट डिटेक्टिव कम्पनी' के उद्घाटन के लिए जासूस विजय को आमंत्रित करने जाते हैं और विजय उनके सामने अफ्रीका के जंगलों से काले शेर का शिकार कर लाने का प्रस्ताव रखता है। -मैं चाहता हूं कि मेरे तीनों चेले तीन काले शेरों का शिकार करें और उनकी खाल लाकर दें।'
अब वही तीनों चेले अपनी 'के० एफ० जी० प्राइवेट डिटेक्टिव कम्पनी' सूंदरनगर में खोल कर बैठे हैं पर उनके पास कोई केस नहीं आता ।
उन्हें अब कारण मालूम हुआ कि उनकी डिटेक्टिव कंपनी जिस कारण से इतने भारी विज्ञापन के बाद भी नहीं चली। कारण मामूली किन्तु उनके दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण था। कारण के जानने पर उन्हें यह मानने पर विवश होना पड़ा कि इसीलिए उनकी प्राइवेट कंपनी में कोई केस नहीं आया ।
आखिर केस आता कहाँ से ? उन्होंने जासूसी उपन्यास के प्राइवेट जासूस की भाँति कोई लेडी सैक्रेटरी नहीं रखी हुई थी जो वि पत्नी के अतिरिक्त प्रत्येक कर्त्तव्य का पालन बड़ी तत्परता के साथ करती है।
उन्होंने बड़ी गम्भीरता के साथ मनन किया और माना वास्तव में जिस डिटेक्टिव कंपनी के पास एक लेडी सैक्रेटरी भी हो वह क्या खाक चलेगी ।
फिर विचार विमर्श के बाद वह एक लड़की को सही सैक्रेटरी रखते हैं जिसका नाम है रजनी । और रजनी कम से कम इन तीनों जासूसों से ज्यादा बुद्धिमान तो है।
'जी मेरा नाम रजनी है और पिताजी का नाम श्री जानकी दास और माताजी का नाम श्रीमती दयावती है। मेरे कोई भाई नहीं है।'
और संयोग देखे की सेक्रेटरी रखने के बाद एक केस उनके पास आ ही गया।
कापी खोलकर मेज पर रखी और पेंसिल हाथ में पकड़कर उस से पूछा- 'आपका नाम ?'
'केदारनाथ ।'
'पता ?'
'रानी बिला, करोलबाग, देहली
यह लिखने के पश्चात रजनी ने पूछा- 'आपकी पत्नी देहली में खोई थीं या यहां सुन्दरनगर में?'
'यहीं सुन्दरनगर में ।'
हां, यह तो रजनी थी जिसने इस केस को संभाल लिया वरना तीनों जासूसों ने तो हमदर्दी का अलग ही राग छेड़ दिया था।
जब केदारनाथ उनके पास आता है तो और उनसे बातचीत करता है यह दृश्य देखें-
'मेरी पत्नी खो गई है।'
फन्नेखाँ तातारी ने केदार के स्वर में छिपे दर्द को अनुभव किया । और सहानुभूति जताते हुए कहा- 'हाय, हाय, हाय कितना बुरा हुआ है ? क्या खुदा की मार पड़ी है? बीवी खो गई, ओए... होए।'
शोक प्रकट करने में वे दोनों भी पीछे नहीं रहे, बोले 'ओ... हो पत्नी खो गई ? भगवान यह दिन किसी को न दिखाए कि उसकी पत्नी खो जाए।'
अभी तक रजनी अपने स्थान पर ही बैठी हुई थी। उसने जब उनकी यह बेतुकी बातें सुनी तो सिर को इस ढंग से हिलाया जैसे मन ही मन कह रही हो कि इन लोगों को अक्ल नहीं आएगी ।
और रजनी के निर्देशानुसार ही तीनों जासूस केदारनाथ की पत्नी को खोजने का काम करते हैं। तीनों जासूस महोदय का अपना कोई विशेष दृष्टिकोण नहीं है वह तो सैक्रेटरी रजनी के आदेश की पालना में एक स्थान से दूसरे स्थान तक, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पूछताछ अवश्य करते हैं और उस में भी मात खा जाते हैं।- तीनों में से जब भी कोई किसी काम पर भेजा जाता है तो उसकी वापसी लगभग पिटे हुए सिपाही की भाँति ही होती है । (पृष्ठ)
वहीं एक घटनाक्रम में तो मिस्टर कबाड़ी अपनी प्रशंसा सुन कर ही बौरा जाते हैं और स्वयं को एक महान जासूस मानकर वह काम भी कर लेते हैं जो आज तक नहीं किया था।
कबाडी को बौखलाते देखकर चाँद बोला- 'दुनिया का प्रत्येक महान व्यक्ति पीता है और आप भी तो एक महान जासूस हैं जिसकी समता कोई नहीं कर सकता ।' (49)
अब किस्सा मदारी का भी सुन लीजिए-
- इससे पहले कि वह सम्भल सकता मदारी पूरी तेजी के साथ वहां से भाग लिया । वेटर भी उसके पीछे भागा । किन्तु मदारी और किसी चीज में उस्ताद था या नहीं, यह एक विवादास्पद विषय है किन्तु यह सच है कि वह दौड़ने में उस्ताद था ।
तो यह कहानी है तीन जासूसों की जिनके पास एक गायब स्त्री को खोजने केस आता है और फिर वह अपने कार्य को अंजाम देते हैं। उपन्यास गायब स्त्री से लेकर हत्या की कहानी तक में परिवर्तित हो जाता है। और इसी गायब स्त्री और हत्या के रहस्य को हल करते की जिम्मेदार केदरानाथ से मिल चुकी है तीन जासूस मित्रो को। आप जासूस मित्रो के कारनामे तो जानते ही हैं, जासूस इनके बस का काम नहीं है यह तो भली है इनकी सेक्रेटरी रजनी जिस के बल पर कार्य आगे बढता है।
बात करें कहानी की तो कहानी चाहे सामान्य है पर रोचकता लिये हुये है। कहानी में ट्विस्ट है, एक्शन, रोमांच है और हास्य भी । कथा का कलेवर थोड़ा छोटा है लेकिन उतना ही कसावट लिये हुये है।
उपन्यास में जो कमी है वही हास्य का आधार है और कमी है तीनों जासूसों की अपरिपक्वता ।
निष्कर्ष में हम कस सकते हैं वेदप्रकाश काम्बोज जी का उपन्यास 'भेदभरी हत्या' एक मर्डर मिस्ट्री और एक गायब स्त्री की मध्यम स्तर की कहानी है। कहानी में रोचकता और हास्य है। उपन्यास मनोरंजन की दृष्टि से पठनीय है, विशेषकर उन पाठकों के लिए अच्छा है जो कबाड़ी, मदारी और तातारी के उपन्यास पसंद करते हैं या हास्य कथा पढना चाहते हैं।
उपन्यास- भेदभरी हत्या
बनाई जैसी कि अन्तिम दृश्य में सोचने के समय कुन्दन कबाड़ी ने ऐसी ही मुद्रा देवदास की भूमिका में दिलीप कुमार ने फिल्म के पारो के घर के सामने बनाई थी। इसके पश्चात मस्तिष्क की खुली सड़क पर विचारों का ताँगा कारण की तलाश में बिना कोचवान के खुला छोड़ दिया गया ।
रैड एण्ड ह्वाईट के दो पैकेट और कोकाकोला की चार बोतलें, एक गिलास और बन्द कमरा । सोचने के लिए यह चीजें चुनीं गोकुल मदारी ने । बाँए हाथ की पहली दो उंगलियों के बीच में सिगरेट दबी हुई थी और उसी हाथ पर चेहरा इस प्रकार टिका हुआ था कि उंगलियों में दबी हुई सिगरेट का एक सिरा उसके माथे के कोने से टकरा रहा था । बाँए हाथ में दबा हुआ था गिलास जिसमें कोका-कोला डालकर उसको रम की तरह पिया जा रहा था। गोकुल मदारी का ख्याल था कि इस ढंग से सोचने पर अक्ल की बात जल्दी ही सूझ जाती है।
सोचने का सर्वाधिक विचित्र तरीका था फन्नेखाँ तातारी का । कारण तलाश करने के लिए उस शेर ने रात में जागना और दिन में सोना आरम्भ कर दिया था। रात जब अपना तारों भरा आंचल फैलाती और फन्नेखाँ तांतारी पलंग पर से उठकर छत पर जा बैठता और तारे गिनना आरम्भ कर देता और फिर जब सुबह के समय रात का तारों भरा आँचल सिमटता तो फन्नेखाँ तातारी छत से उठकर पलंग पर पहुंच जाता। गनीमत यही हुई कि किसी ने भी तातारी को विरही प्रेमी समझने की सुनहरी भूल नहीं की ।(प्रथम पृष्ठ, भेदभरी हत्या- वेदप्रकाश काम्बोज)
हमने पूर्व उपन्यास 'मौत की आवाज' में पढा था कि कबाड़ी, मदारी और तातारी अपनी 'के० एफ० जी० प्राइवेट डिटेक्टिव कम्पनी' के उद्घाटन के लिए जासूस विजय को आमंत्रित करने जाते हैं और विजय उनके सामने अफ्रीका के जंगलों से काले शेर का शिकार कर लाने का प्रस्ताव रखता है। -मैं चाहता हूं कि मेरे तीनों चेले तीन काले शेरों का शिकार करें और उनकी खाल लाकर दें।'
अब वही तीनों चेले अपनी 'के० एफ० जी० प्राइवेट डिटेक्टिव कम्पनी' सूंदरनगर में खोल कर बैठे हैं पर उनके पास कोई केस नहीं आता ।
उन्हें अब कारण मालूम हुआ कि उनकी डिटेक्टिव कंपनी जिस कारण से इतने भारी विज्ञापन के बाद भी नहीं चली। कारण मामूली किन्तु उनके दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण था। कारण के जानने पर उन्हें यह मानने पर विवश होना पड़ा कि इसीलिए उनकी प्राइवेट कंपनी में कोई केस नहीं आया ।
आखिर केस आता कहाँ से ? उन्होंने जासूसी उपन्यास के प्राइवेट जासूस की भाँति कोई लेडी सैक्रेटरी नहीं रखी हुई थी जो वि पत्नी के अतिरिक्त प्रत्येक कर्त्तव्य का पालन बड़ी तत्परता के साथ करती है।
उन्होंने बड़ी गम्भीरता के साथ मनन किया और माना वास्तव में जिस डिटेक्टिव कंपनी के पास एक लेडी सैक्रेटरी भी हो वह क्या खाक चलेगी ।
फिर विचार विमर्श के बाद वह एक लड़की को सही सैक्रेटरी रखते हैं जिसका नाम है रजनी । और रजनी कम से कम इन तीनों जासूसों से ज्यादा बुद्धिमान तो है।
'जी मेरा नाम रजनी है और पिताजी का नाम श्री जानकी दास और माताजी का नाम श्रीमती दयावती है। मेरे कोई भाई नहीं है।'
और संयोग देखे की सेक्रेटरी रखने के बाद एक केस उनके पास आ ही गया।
कापी खोलकर मेज पर रखी और पेंसिल हाथ में पकड़कर उस से पूछा- 'आपका नाम ?'
'केदारनाथ ।'
'पता ?'
'रानी बिला, करोलबाग, देहली
यह लिखने के पश्चात रजनी ने पूछा- 'आपकी पत्नी देहली में खोई थीं या यहां सुन्दरनगर में?'
'यहीं सुन्दरनगर में ।'
हां, यह तो रजनी थी जिसने इस केस को संभाल लिया वरना तीनों जासूसों ने तो हमदर्दी का अलग ही राग छेड़ दिया था।
जब केदारनाथ उनके पास आता है तो और उनसे बातचीत करता है यह दृश्य देखें-
'मेरी पत्नी खो गई है।'
फन्नेखाँ तातारी ने केदार के स्वर में छिपे दर्द को अनुभव किया । और सहानुभूति जताते हुए कहा- 'हाय, हाय, हाय कितना बुरा हुआ है ? क्या खुदा की मार पड़ी है? बीवी खो गई, ओए... होए।'
शोक प्रकट करने में वे दोनों भी पीछे नहीं रहे, बोले 'ओ... हो पत्नी खो गई ? भगवान यह दिन किसी को न दिखाए कि उसकी पत्नी खो जाए।'
अभी तक रजनी अपने स्थान पर ही बैठी हुई थी। उसने जब उनकी यह बेतुकी बातें सुनी तो सिर को इस ढंग से हिलाया जैसे मन ही मन कह रही हो कि इन लोगों को अक्ल नहीं आएगी ।
और रजनी के निर्देशानुसार ही तीनों जासूस केदारनाथ की पत्नी को खोजने का काम करते हैं। तीनों जासूस महोदय का अपना कोई विशेष दृष्टिकोण नहीं है वह तो सैक्रेटरी रजनी के आदेश की पालना में एक स्थान से दूसरे स्थान तक, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पूछताछ अवश्य करते हैं और उस में भी मात खा जाते हैं।- तीनों में से जब भी कोई किसी काम पर भेजा जाता है तो उसकी वापसी लगभग पिटे हुए सिपाही की भाँति ही होती है । (पृष्ठ)
वहीं एक घटनाक्रम में तो मिस्टर कबाड़ी अपनी प्रशंसा सुन कर ही बौरा जाते हैं और स्वयं को एक महान जासूस मानकर वह काम भी कर लेते हैं जो आज तक नहीं किया था।
कबाडी को बौखलाते देखकर चाँद बोला- 'दुनिया का प्रत्येक महान व्यक्ति पीता है और आप भी तो एक महान जासूस हैं जिसकी समता कोई नहीं कर सकता ।' (49)
अब किस्सा मदारी का भी सुन लीजिए-
- इससे पहले कि वह सम्भल सकता मदारी पूरी तेजी के साथ वहां से भाग लिया । वेटर भी उसके पीछे भागा । किन्तु मदारी और किसी चीज में उस्ताद था या नहीं, यह एक विवादास्पद विषय है किन्तु यह सच है कि वह दौड़ने में उस्ताद था ।
तो यह कहानी है तीन जासूसों की जिनके पास एक गायब स्त्री को खोजने केस आता है और फिर वह अपने कार्य को अंजाम देते हैं। उपन्यास गायब स्त्री से लेकर हत्या की कहानी तक में परिवर्तित हो जाता है। और इसी गायब स्त्री और हत्या के रहस्य को हल करते की जिम्मेदार केदरानाथ से मिल चुकी है तीन जासूस मित्रो को। आप जासूस मित्रो के कारनामे तो जानते ही हैं, जासूस इनके बस का काम नहीं है यह तो भली है इनकी सेक्रेटरी रजनी जिस के बल पर कार्य आगे बढता है।
बात करें कहानी की तो कहानी चाहे सामान्य है पर रोचकता लिये हुये है। कहानी में ट्विस्ट है, एक्शन, रोमांच है और हास्य भी । कथा का कलेवर थोड़ा छोटा है लेकिन उतना ही कसावट लिये हुये है।
उपन्यास में जो कमी है वही हास्य का आधार है और कमी है तीनों जासूसों की अपरिपक्वता ।
निष्कर्ष में हम कस सकते हैं वेदप्रकाश काम्बोज जी का उपन्यास 'भेदभरी हत्या' एक मर्डर मिस्ट्री और एक गायब स्त्री की मध्यम स्तर की कहानी है। कहानी में रोचकता और हास्य है। उपन्यास मनोरंजन की दृष्टि से पठनीय है, विशेषकर उन पाठकों के लिए अच्छा है जो कबाड़ी, मदारी और तातारी के उपन्यास पसंद करते हैं या हास्य कथा पढना चाहते हैं।

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