अंतरराष्ट्रीय अपराधी की डकैती कथा
रेत का संगीत- वेदप्रकाश काम्बोज
वेदप्रकाश काम्बोज जी का एक रोचक उपन्यास 'रेत का संगीत' पढने को मिला है। यह जासूस विजय शृंखला का उपन्यास है। यह एक अंतरराष्ट्रीय अपराधी की डकैती की रोमांच कहानी है। एक ऐसा अपराधी जिसे अमेरिका जैसे देश भी पकड़ने में असफल रहे और जब उस अपराधी की विजय से भिड़ंत हुयी तब जन्मी एक रोमांचक कहानी रेत का संगीत ।![]() |
रेत का संगीत - वेदप्रकाश काम्बोज |
होटल के दरवाजे से अभी वह कुछ ही दूर थी कि उसने एक व्यक्ति को अन्दर प्रविष्ट होते हुये देखा। जिस समय वह डैस्क पर अपने कमरे की चाबी लेने के लिये गई उस समय वह व्यक्ति फोन पर किसी से कह रहा था- 'जी हां मैं चन्दूलाल बोल रहा हूं । पन्नालाल जौहरी ने मुझे भेजा है। आपने कुछ हीरे देखने के लिये बुलाया था। जी हां मेरे पास हैं। जी बहुत अच्छा मैं आ रहा हूं।'
भारिया ने एक चाबी काउन्टर पर से उठाते हुये एक नजर उस हीरे बेचने वाले पर डाली और फिर लिफ्ट की ओर बढ़ गई।
वह व्यक्ति भी उसके पीछे ही लिफ्ट की ओर बढ़ा ।
उन दोनों के अन्दर प्रविष्ट होने पर लिफ्ट मैन लोहे का जंगला खींचने ही जा रहा था कि तभी एक खूबसूरत सा युवक भी लिफ्ट में प्रविष्ट हो गया ।
लिफ्ट मैन ने लिफ्ट स्टार्ट करने से पहले पूछा 'आप कौन-कौन सी मंजिल पर जायेंगे ?"(रेत का संगीत- वेदप्रकाश काम्बोज, प्रथम पृष्ठ से)
नमस्ते पाठक मित्रो, आपके लिए प्रस्तुत है 'गंगा पॉकेट बुक्स, मेरठ' से प्रकाशित वेदप्रकाश काम्बोज जी के जासूस विजय सीरीज का रोमांचकारी उपन्यास 'रेत का संगीत' की समीक्षा ।
उपन्यास के प्रथम दृश्य को हमने ऊपर पढा है । यहाँ तीन पात्र हमें मिलते हैं, तीनों असंबद्ध हैं। पहली पात्र है विदेशी महिला भारिया, दूसरा पात्र चंदूलाल जो हीरों का एजेंट है और तीसरा पात्र वह है जो इन दोनों के लिए मुसीबत बना है। वह तीसरा पात्र है सोना । सोना एक छोटी मोटी चोरी करने वाला है लेकिन उसका मस्तिष्क बहुत ही तीव्र है। यहां वह हीरों के एजेंट की हत्या कर और फिर भारिया को अपनी ढाल बनाकर बच निकलता है।
लेकिन भारिया और भी तेज -चालाक थी क्योंकि वह तो एक अंतरराष्ट्रीय लुटेरे की साथी थी और वह सोना जैसे लोगों को माध्यम बनाकर ही लूट करते थे ।
स्काॅटलैंड पुलिस से भारतीय पुलिस को सूचना मिलती है कि एक अंतरराष्ट्रीय अपराधी भारत में है जो बड़े स्तर की डकैतियां करता है। S.P. रधुनाथ उस अपराधी को पकड़ने के लिए जासूस विजय की मदद मांगता है।
मजे की बात यह थी कि उस अपराधी का नाम तक स्काटलैण्ड यार्ड को नहीं मालूम था और किसी वितरण की तो बात क्या
और फिर खेल आरम्भ होता है एक अज्ञात अंतरराष्ट्रीय अपराधी को पकड़ने का जिसके विषय में कोई ठोस जानकारी किसी के पास भी नहीं होती ।
अब जासूस विजय उसे कैसे पकड़ता है यही पठनीय है।
उपन्यास कलेवर में लघु है पर कथा स्तर पर रोचक है। कहानी आदि से अंत तक पाठक को बांधकर रखती है।
एक समय था जब उपन्यासों में अपराधी अंतरराष्ट्रीय होते थे और वह उपन्यास शृंखला में चलते थे या वह खल पात्र अन्य उपन्यासों में भी नजर आते थे। लेकिन प्रस्तुत उपन्यास का पात्र चाहे अंतरराष्ट्रीय है पर वह कुख्यात नहीं है। वह तो इसी उपन्यास में आया और उसकी कहानी खत्म हो गयी।
मुझे कोई अफसोस नहीं है ।' उस व्यक्ति ने कहा- 'एक न एक दिन तो यह होना ही था । लेकिन मुझे यह आशा नहीं थी कि इस देश में मैं पकडा जाऊंगा !'
'गीदड़ की जब मौत आती है तो वह शहर की ओर भागता है ।' विजय बोला —‘तुम्हारी मौत आई और तुम भारत की ओर भाग आये । अच्छा दोस्त विदा । सिर्फ तुम्हारा चांद सा चेहरा देखने के लिये गया था ।'
उपन्यास शीर्षक:-
उपन्यास के शीर्षक की बात करें तो इस शीर्षक ने मुझे बहुत प्रभावित किया था। बिलकुल नया शीर्षक है 'रेत का संगीत' । मैं सोचता था की आखिर रेत का संगीत क्या होगा ? लेकिन जब उपन्यास पढा तो सब कल्पनाएँ खत्म हो गयी।
उपन्यास का शीर्षक एक भ्रमित शीर्षक है इसका कथानक से कोई संबंध नहीं है। यह तो अपराधीवर्ग का कोड मात्र है।
चलते-चलते विजय की एक झकझकी-
मेरी आंखों में सुरमा, किसने डाला ।
मुझे ले गया मुरली वाला, मोहन काला ।
भूलने वाले तेरा होगा बुरा,
मेरे दिल में घोंप डाला क्यों छुरा ?
अब तो मेरे पास टूटा जाम है,
जिसमें भर रक्खी है गम की सुरा ।
मैं तो हो गया हूं मतवाला, दो किसने हाला ।
मेरी फसल का हो गया चाला, पड़ गया पाला ।
निष्कर्ष:-
वेदप्रकाश काम्बोज जी द्वारा रचित 'रेत का संगीत' एक रोचक कथानक वाला उपन्यास है। उपन्यास में नयापन या कोई स्मरणीय घटनाक्रम नहीं है, कहानी भी नयी नहीं है। पर प्रस्तुतीकरण अच्छा है। उपन्यास एक बार पढा जा सकता है।

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