मूर्ति चोरी और ब्लैकमेल की रोचक कथा
उलटी खोपड़ी- कर्नल रंजीत
एक बार फिर SVNLIBRARY पर प्रस्तुत है कर्नल रंजीत द्वारा लिखा गया एक ऐसा रोचक उपन्यास जो आपको सम्मोहित कर लेगा। एक ऐसे व्यक्ति की कहानी जो अपनी मृत्यु के छह महीने बाद एक प्रश्न स्वयं से करता है- मरने के छः महीने बाद क्या वह फिर जीवित हो उठा था ?इनाम
यह बात आज से छः महीने पहले की है । अगस्त का महीना था। स्थानीय समाचारपत्न 'दि क्रानिकल' के फोटोग्राफर कमलकिशोर को, बम्बई में मैक्सिको के राष्ट्राध्यक्ष के आगमन पर खींचे गए फोटो के लिए समाचार-पत्र के मालिक ने पांच सौ रुपये इनाम दिया। उसने इनाम मिलने पर सोचा कि आज तो उसे अपनी पत्नी का उलाहना दूर कर ही देना चाहिए और उसे 'उन्यालो बन्दर' ले जाकर चीनी खाना खिला ही देना चाहिए जो उसे बहुत पसन्द था । उसकी पत्नी ज्योत्स्ना 'परेल' की टैक्सटाइल मिल के अकाउंट्स विभाग में नियुक्त थी। उसका विवाह हुए एक वर्ष हुआ था। यहू प्रेम-विवाह था। पति पत्नी के जीवन में पहले एक और समानता भी थी ज्योत्स्ना भी अकेली थी और कमल किशोर भी। उन दोनों का कोई सम्बन्धी नहीं था। विवाह से एक महीना पहले कमलकिशोर ने 'अन्धेरी' में 'मधुबन' नामक भवन की पहली मंजिल पर चालीस हजार रुपये में एक शानदार फ्लैट खरीदा था ।
कमलकिशोर ने ज्योत्स्ना को फोन किया कि वह आज अपने आफिस से पांच की बजाय चार बजे उठ आए और घर पहुंच जाए । उसने अपनी पत्नी को यह निर्देश इसलिए किया कि ज्योत्स्ना को जब भी बाहर जाना होता था तो बनाव-शृंगार में वह बहुत देर लगा देती थी । ज्योत्स्ना ने वचन दिया कि वह चार बजे आफिस से उठकर पांच बजे घर पहुंच जाएगी ।(उलटी खोपड़ी- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)
नमस्ते पाठक मित्रो, प्रसिद्ध लेखक कर्नल रंजीत के एक और रहस्यमयी विचित्र उपन्यास समीक्षा में आपका हार्दिक स्वागत है। यह उपन्यास उनके अन्य उपन्यासों से कुछ हटकर है, वैसे तो आपको उनकी शैली का पता ही होगा लेकिन प्रस्तुत उपन्यास का आरम्भ इतने रोचक ढंग से होता है की पाठक उसे छोड़ ही नहीं सकता। आपने ऊपर उपन्यास का प्रथम पृष्ठ पढ लिया है और अब हम उस से आगे बढकर उपन्यास समीक्षा की तरफ चलते हैं।
'दी क्रॉनिकल' समाचार पत्र के फोटोग्राफर कमलकिशोर के साथ एक अत्यंत अनोखी घटना घटित होती है। वह जब घर पहुंचता है और उसके बाद जब वह होश में आता है तो स्वयं कमलकिशोर के साथ-साथ पाठक भी चकित रह जाता है कि आखिर यह हो क्या गया।
"....क्या उसे मरे हुए पूरे छः महीने बीत चुके थे ? मरने के छः महीने बीत चुके थे ? मरने के छः महीने बाद क्या वह फिर जीवित हो उठा था ? लेकिन मरने के बाद भी कभी कोई जीवित बचा है ? वह हजरत ईसा तो था नहीं। वह यह सोचने पर विवश हो उठा कि वह कमलकिशोर था या कोई और था ।(पृष्ठ- 14)
आखिर यह रहस्य क्या था ? एक आदमी जो छह महीनों बाद स्वयं से यह प्रश्न करता है की वह जीवित है या मर चुका है। जबकि उसके पास उपलब्ध समाचार पत्र यह प्रमाणित करते हैं कि वह मर चुका है। अगर वह मर चुका है तो अब कहां है? अगर वह जीवित है तो मर कौन चुका है ? और फिर छह महीने का लम्बा समय कहां गायब हो गया ?
एक अजीब से पहेली है यह घटना जिसे 'दि क्रॉनिकल' कथित मृतक फोटोग्राफर कमलकिशोर नहीं सुलझा सकता था। तो इस पहेली को हल कौन करेगा। उन दिनों ऊटी में मेजर बलवंत अपने साथियों के साथ आया हुआ था जब 'दि क्रोनिकल' के संपादक और फोटोग्राफर कमलकिशोर जासूस मेजर बलवंत से मिले और संपादक महोदय ने मेजर बलवंत को कहा-
जब 'दि क्रानिकल' के मालिक सेठ पुरुषोत्तम नागर मेजर बलवन्त के पास ही सोफे पर बैठ गए तो उन्होंने अपने साथी नौजवान की ओर इशारा करके कहा, "मेजर साहब, यह वही हमारे प्रेस फोटोग्राफर कमलकिशोर हैं, जिनकी छः महीने पहले हत्या कर दी गई थी।"
"क्या ?” मेजर बलवन्त ने आश्चर्य से कहा और कमल-किशोर की ओर फटी-फटी आंखों से देखने लगा ।(पृष्ठ...)
और इस तरह यह केस आता है मेजर बलवंत के पास । हालांकि मेजर बलवंत समाचार पत्रों के माध्यम से पहले ही फोटोग्राफर कमलकिशोर हत्याकांड के विषय में दिलचस्पी ले रहा था लेकिन जब उसके पास यह केस आया तो वह सक्रिय हो उठा।
कहानी सिर्फ यही नहीं है की कमलकिशोर हत्याकांड कैसे और किसने अंजाम दिया इसके साथ एक और पहलू जुड़ा हुआ है और वह पहलू है कमलकिशोर की पत्नी ज्योत्स्ना से । पूरे प्रकरण में ज्योत्स्ना कहीं नहीं है। वह अपने घर से लापता है और किसी को भी नहीं पता की आखिर ज्योत्स्ना कहां गायब हो गयी।
अब मेजर बलवंत को एक तरफ जहां कथित हत्याकांड को हल करना था वहीं उसे ज्योत्स्ना को भी तलाश करना था । लेकिन जैसे जैसे मेजर बलवंत की जांच आगे बढती है उसके राह में आ खड़ा होता है 'ईंट का बादशाह ', जी हां, ईंट का बादशाह ।
चलो पहले आपको इस ईंट के बादशाह से ही मिलवा देते हैं और वह भी पुलिस के माध्यम से।
"रुकिए, मैं आपको दिखाता हूं।" कहकर इन्स्पेक्टर ने अपना बैग खोला। बैग में से उसने एक खंजर निकाला जिसकी नोक पर ताश का एक पत्ता था। वह ईंट का बादशाह था । और खंजर की नोक ईंट के बादशाह के होंठों में से गुजर रही थी। इन्स्पेक्टर ने खंजर की नोक में से ताश का पत्ता निकाला बौर मेजर को दिखाते हुए कहा, "देखिए ! ताश के पत्ते की सफेद जगह पर लिखा हुआ है- 'जो कोई मुंह खोलेगा, खंजर उसके मुंह में घोंप दिया जाएगा।' मेजर साहब, इसका क्या मतलब हो सकता है ?"
जब ऐसी धमकी दी जा रही हो तो कौन अपना मुँह खोलना पसंद करेगा और कौन अपनी जान का दुश्मन बनेगा। क्या पता कब ईंट का बादशाह उसकी जान ले ले ।
वहीं कहानी में एक और घटनाक्रम भी साथ- साथ में चलता है। क्योंकि कहानी सिर्फ फोटोग्राफर कमलकिशोर या उसकी पत्नी तक सीमित नहीं है कहानी में और भी बहुत से छोटे- बड़े ट्विस्ट साथ-साथ में चलते हैं और वहीं ट्विस्ट कहानी को रोचक और पठनीय भी बनाते हैं। जैसे की मूर्ति चोरी,भगवान बुद्ध का चमकदार पैर आदि।
"मेजर साहब, मूर्तियों के बिना यह मन्दिर उजाड़ और वीरान दिखाई देने लगा है। भगवान शिव ही जानें कि उनकी इच्छा क्या है। फिर भी मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप उन मूर्तियों का किसी तरह पता लगाइए । वे मूर्तियां इस मन्दिर की ही नहीं बल्कि हमारे समूचे देश की धार्मिक, ऐतिहासिक और कलात्मक धरोहर हैं। मन्दिर के पास धन की कमी नहीं है। आपको मुंह मांगा पारिश्रमिक दूंगा मेजर साहब !" आचार्य विठ्ठल पन्त ने अनुरोध-भरे स्वर में कहा ।(73)
अब कहानी कमलकिशोर और ज्योत्स्ना से आगे बढकर मूर्ति चोरी तक आ गयी है। क्योंकि उपन्यास में एक ऐसा गिरोह भी सक्रिय है जो ऐतिहासिक मूर्तियाँ की चोरी करता है । और अब एक पहलू और रह गया और वह है 'लाल साहब और मैम' का । यह उपन्यास के दो महत्वपूर्ण पात्र हैं। बाकी आपको पता ही कर्नल रंजीत के उपन्यास मर्डर मिस्ट्री होते हैं।
तो अब एक तरफ कमलकिशोर की कथित हत्या, लापता ज्योत्स्ना, मूर्ति चोरी, लाल साहब- मैम, ईंट का बादशाह और हत्या । इन सब को अब एक माला में पिरो कर एक शानदार, रहस्य-रोमांच से भरपूर उपन्यास बनती है 'उलटी खोपड़ी' ।
विशेषता:-
कर्नल रंजीत के उपन्यासों की कुछ विशेषताओं का हम वर्णन करते आये हैं । इनकी एक विशेषता है पात्र का नख शिख वर्णन । यहाँ भी एक आठ साल पहले के पात्र का वर्णन इतना स्टीक है जैसे अभी की बात हो।
"कैसा व्यक्ति था ?” मेजर ने पूछा ।
"उस व्यक्ति की आंखें नीले शोलों की तरह थीं और बड़ी-बड़ी थीं। आंखों पर पलकें नहीं थीं। सांप या पक्षी की तरह वह आंखें नहीं झपकता था। सिर से बह पूरी तरह गंजा था। सिर बहुत अधिक बड़ा था। उसका माथा चौड़ी तख्ती की तरह था । कान उसके लम्बे थे और कानों की लवें बहुत नुकीली थीं । उसकी नाक मोटी थी और कुछ मुड़ी हुई थी। देखने में वह प्राचीन मूर्ति-सा लगता था।
अब देखिये आठ साल पहले के आदमी का कितना गजब वर्णन किया गया है। और ऐसा वर्णन इनके बहुत से उपन्यासों में मिलता है।
लाल साहब:-
उपन्यास में लाल साहब और मैम का विशेष वर्णन हैपर लाल साहब का दोहरीकरण समझ से बाहर है। लाल साहब दो क्यों थे ?
शे'र-
चलते- चलते मेजर बलवंत का एक शे'र हो जाये-
दूध है पानी यहां और इसका पानी जहर है।
एक कब्रिस्तान है, यारो, कि अपना शहर है।"(148)
निष्कर्ष में कर्नल रंजीत द्वारा लिखे गये 'उलटी खोपड़ी' उपन्यास को एक रोचक और पठान उपन्यास कह सकते हैं। एक विचित्र और रोचक घटनाक्रम से आरम्भ होकर मूर्ति चोरी, ब्लैकमेल और हत्या जैसे घटनाओं से गुजरता हुआ यह उपन्यास पाठक का मनोरंजन करने में सक्षम है।
उपन्यास- उलटी खोपड़ी
कहानी सिर्फ यही नहीं है की कमलकिशोर हत्याकांड कैसे और किसने अंजाम दिया इसके साथ एक और पहलू जुड़ा हुआ है और वह पहलू है कमलकिशोर की पत्नी ज्योत्स्ना से । पूरे प्रकरण में ज्योत्स्ना कहीं नहीं है। वह अपने घर से लापता है और किसी को भी नहीं पता की आखिर ज्योत्स्ना कहां गायब हो गयी।
अब मेजर बलवंत को एक तरफ जहां कथित हत्याकांड को हल करना था वहीं उसे ज्योत्स्ना को भी तलाश करना था । लेकिन जैसे जैसे मेजर बलवंत की जांच आगे बढती है उसके राह में आ खड़ा होता है 'ईंट का बादशाह ', जी हां, ईंट का बादशाह ।
चलो पहले आपको इस ईंट के बादशाह से ही मिलवा देते हैं और वह भी पुलिस के माध्यम से।
"रुकिए, मैं आपको दिखाता हूं।" कहकर इन्स्पेक्टर ने अपना बैग खोला। बैग में से उसने एक खंजर निकाला जिसकी नोक पर ताश का एक पत्ता था। वह ईंट का बादशाह था । और खंजर की नोक ईंट के बादशाह के होंठों में से गुजर रही थी। इन्स्पेक्टर ने खंजर की नोक में से ताश का पत्ता निकाला बौर मेजर को दिखाते हुए कहा, "देखिए ! ताश के पत्ते की सफेद जगह पर लिखा हुआ है- 'जो कोई मुंह खोलेगा, खंजर उसके मुंह में घोंप दिया जाएगा।' मेजर साहब, इसका क्या मतलब हो सकता है ?"
जब ऐसी धमकी दी जा रही हो तो कौन अपना मुँह खोलना पसंद करेगा और कौन अपनी जान का दुश्मन बनेगा। क्या पता कब ईंट का बादशाह उसकी जान ले ले ।
वहीं कहानी में एक और घटनाक्रम भी साथ- साथ में चलता है। क्योंकि कहानी सिर्फ फोटोग्राफर कमलकिशोर या उसकी पत्नी तक सीमित नहीं है कहानी में और भी बहुत से छोटे- बड़े ट्विस्ट साथ-साथ में चलते हैं और वहीं ट्विस्ट कहानी को रोचक और पठनीय भी बनाते हैं। जैसे की मूर्ति चोरी,भगवान बुद्ध का चमकदार पैर आदि।
"मेजर साहब, मूर्तियों के बिना यह मन्दिर उजाड़ और वीरान दिखाई देने लगा है। भगवान शिव ही जानें कि उनकी इच्छा क्या है। फिर भी मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप उन मूर्तियों का किसी तरह पता लगाइए । वे मूर्तियां इस मन्दिर की ही नहीं बल्कि हमारे समूचे देश की धार्मिक, ऐतिहासिक और कलात्मक धरोहर हैं। मन्दिर के पास धन की कमी नहीं है। आपको मुंह मांगा पारिश्रमिक दूंगा मेजर साहब !" आचार्य विठ्ठल पन्त ने अनुरोध-भरे स्वर में कहा ।(73)
अब कहानी कमलकिशोर और ज्योत्स्ना से आगे बढकर मूर्ति चोरी तक आ गयी है। क्योंकि उपन्यास में एक ऐसा गिरोह भी सक्रिय है जो ऐतिहासिक मूर्तियाँ की चोरी करता है । और अब एक पहलू और रह गया और वह है 'लाल साहब और मैम' का । यह उपन्यास के दो महत्वपूर्ण पात्र हैं। बाकी आपको पता ही कर्नल रंजीत के उपन्यास मर्डर मिस्ट्री होते हैं।
तो अब एक तरफ कमलकिशोर की कथित हत्या, लापता ज्योत्स्ना, मूर्ति चोरी, लाल साहब- मैम, ईंट का बादशाह और हत्या । इन सब को अब एक माला में पिरो कर एक शानदार, रहस्य-रोमांच से भरपूर उपन्यास बनती है 'उलटी खोपड़ी' ।
विशेषता:-
कर्नल रंजीत के उपन्यासों की कुछ विशेषताओं का हम वर्णन करते आये हैं । इनकी एक विशेषता है पात्र का नख शिख वर्णन । यहाँ भी एक आठ साल पहले के पात्र का वर्णन इतना स्टीक है जैसे अभी की बात हो।
"कैसा व्यक्ति था ?” मेजर ने पूछा ।
"उस व्यक्ति की आंखें नीले शोलों की तरह थीं और बड़ी-बड़ी थीं। आंखों पर पलकें नहीं थीं। सांप या पक्षी की तरह वह आंखें नहीं झपकता था। सिर से बह पूरी तरह गंजा था। सिर बहुत अधिक बड़ा था। उसका माथा चौड़ी तख्ती की तरह था । कान उसके लम्बे थे और कानों की लवें बहुत नुकीली थीं । उसकी नाक मोटी थी और कुछ मुड़ी हुई थी। देखने में वह प्राचीन मूर्ति-सा लगता था।
अब देखिये आठ साल पहले के आदमी का कितना गजब वर्णन किया गया है। और ऐसा वर्णन इनके बहुत से उपन्यासों में मिलता है।
लाल साहब:-
उपन्यास में लाल साहब और मैम का विशेष वर्णन हैपर लाल साहब का दोहरीकरण समझ से बाहर है। लाल साहब दो क्यों थे ?
शे'र-
चलते- चलते मेजर बलवंत का एक शे'र हो जाये-
दूध है पानी यहां और इसका पानी जहर है।
एक कब्रिस्तान है, यारो, कि अपना शहर है।"(148)
निष्कर्ष में कर्नल रंजीत द्वारा लिखे गये 'उलटी खोपड़ी' उपन्यास को एक रोचक और पठान उपन्यास कह सकते हैं। एक विचित्र और रोचक घटनाक्रम से आरम्भ होकर मूर्ति चोरी, ब्लैकमेल और हत्या जैसे घटनाओं से गुजरता हुआ यह उपन्यास पाठक का मनोरंजन करने में सक्षम है।
उपन्यास- उलटी खोपड़ी
लेखक- कर्नल रंजीत
संस्करण- 1980
पृष्ठ - 183
प्रकाशक- हिंद पॉकेट बुक्स, दिल्ली
कर्नल रंजीत के अन्य उपन्यासों की समीक्षा
विजय दुर्ग का रहस्य ।। मेजर बलवंत बांगलादेश में ।। नकली चेहरे ।। उलटी लाशें ।। प्रेतात्मा की डायरी ।। पीले बिच्छू ।। आग का समंदर ।। रात के अंधेरे में ।। भयानक बौने ।। देख लिया तेरा कानून ।। टेडा मकान ।। हत्यारा पुल ।। रेत की दीवार ।। जानी दुश्मन ।। चीखती चट्टानें ।। खून के छींटें ।। सिरकटी लाशें ।। सफेद खून ।। चांदी की मछली ।। काला चश्मा ।। बोलते सिक्के ।। 11 बजकर 12 मिनट ।। हांगकांग के हत्यारे ।। लहू और मिट्टी ।। मृत्यु भक्त ।। वह कौन था ।। सांप की बेटी ।। खामोश ! मौत आती है ।। काली आंधी ।। हत्या का रहस्य ।। अधूरी औरत ।। ट्रेन एक्सीडेंट ।। हत्यारे की पत्नी ।। खूनी बदला ।।
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