मुम्बई पुलिस का सीरियल किलर
कातिल मेरा नाम- कर्नल रंजीत
नमस्ते पाठक मित्रो,
एक बार हम फिर से उपस्थित है मेजर बलवंत शृंखला का एक रोचक और रहस्यमयी उपन्यास 'कातिल मेरा नाम' लेकर । कर्नल रंजीत की विशेष शैली में लिखा गया यह उपन्यास 'मुम्बई पुलिस का सीरियल किलर' खोज पर आधारित है। एक ऐसे सिरफिरे कातिल की कहानी जो सिर्फ पुलिसवालों का ही कत्ल करता था, आखिर क्यों ?
रात के ग्यारह बज चुके थे। पुलिस इन्स्पेक्टर रामसिंह ड्यूटी खत्म करके घर जाने की तैयारी कर रहा था कि फोन की घंटी बजी। इन्स्पेक्टर ने रिसीवर उठाकर कहा :
"हलो, पुलिस स्टेशन बाईकला।"
जवाब में किसी औरत की आवाज ने कहा, "मैं जिम्मेदार पुलिस अफसर से बात करना चाहती हूं।"
"आप कौन बोल रही हैं ?"
"प्लीज, आप मेरी बात किसी अफसर से करा दीजिए।" औरत ने जवाब दिया।
"मैं स्टेशन इन्चार्ज इन्स्पेक्टर रामसिंह बोल रहा हूं। क्या मैं आपकी कोई सेवा कर सकता हूं ?"
"ओह, इन्स्पेक्टर साहब, थैंक्स गाड, कि आप मिल गये । क्या आप मशहूर डाकू राजन को गिरफ्तार करना' चाहेंगे जो दो महीने पहले जेल से फरार हो गया था और जिसकी गिरफ्तारी पर आपके विभाग ने दस हजार का इनाम रखा है ?"
यह सुनकर इन्स्पेक्टर राम सिंह की नब्ज तेज चलने लगी। राजन बम्बई शहर का एक बड़ा खतरनाक गुण्डा था। कई बैंक लूट चुका था। आखिर पकड़ा गया। उस पर कत्ल के भी इल्जाम थे। यह बात निश्चित थी कि उसे फांसी हो जायेगी लेकिन अभी मुकद्दमा चल ही रहा था ।कि वह जेल तोड़कर भाग गया। सारे शहर की पुलिस कोशिश के बावजूद उसे तलाश करने में असफल रही। आखिर पुलिस कमिश्नर ने अखबारों में घोषणा छपवाई कि जो व्यक्ति राजन डाकू को गिरफ्तार कराने में मदद करेगा उसे दस हजार रुपये नकद इनारा दिया जायेगा। (कातिल मेरा नाम- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)
कर्नल रंजीत के उपन्यासों का आरम्भ हिंद पॉकेट बुक्स से होता है। यह हिंद पॉकेट बुक्स का ही ट्रेड नेम था। लम्बे समय पश्चात हिंद पॉकेट बुक्स की सहयोगी संस्था 'अभिनव पॉकेट बुक्स' से भी कर्नल रंजीत के उपन्यास प्रकाशिक होते रहे । और एक और संस्था थी दिल्ली की 'मनोज पॉकेट बुक्स' उसने कर्नल रंजीत के प्रकाशन अधिकार खरीदे और कर्नल रंजीत ट्रेड नाम को वहां से छापा।
किसी सज्जन पाठक मित्र को जानकारी हो तो बताये की हिंद पॉकेट बुक्स ने वह अधिकार कब और क्यों बेचे तथा अभिनव पॉकेट बुक्स से कर्नल रंजीत को छापना आरम्भ किया।
चलो अब हम चलते हैं अपने प्रस्तुत उपन्यास 'कातिल मेरा नाम' की समीक्षा पर । यह एक प्रतिरोधात्मक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है। इसका आरम्भ जिस दृश्य से होता है वह आप ऊपर पढ चुके हैं। इंस्पेक्टर रामसिंह का अज्ञात अपराधी द्वारा कत्ल कर दिया जाता है।
मेजर बलवंत अपनी पूरी टीम यानी सोनिया, कल्याणी, डोरा, डेजी, सुधीर, संजीव और राजीव के साथ होटल 'नाट आउट' में बैठे डिनर खा रहे थे। यह होटल एक महीने पहले ही शुरू हुआ था। इसका मालिक क्रिकेट का भूतपूर्व खिलाड़ी रह चुका था इसलिए उसने अपने होटल का यह अजीबो-गरीब नाम 'नाट आउट' रखा था।(पृष्ठ-10)
मुम्बई पुलिस कमिश्नर मिस्टर देशपांडे इस हत्या की जांच के लिए मेजर बलवंत को याद करते हैं जो उस समय होटल 'नाॅट आउट' में अपने सहयोगियों के साथ खाना खा रहे थे।
वहां जाकर मेजर बलवंत को हैरान कर देने वाली सूचनाए कमिश्नर देशपांडे से मिलती हैं।
"इससे पहले चार पुलिस अफसर और कत्ल हो चुके हैं। हर लाश पर यही संदेश लिखा हुआ मिलता रहा। और ये सारे कत्ल पिछले पन्द्रह दिन में हुए हैं।"
"पन्द्रह दिन में।" मेजर बलवन्तं ने घुटी हुई आवाज में कहा, "लेकिन सर, अखबारों में तो……”
कमिश्नर ने उसकी बात काटकर कहा, "हमने जान-बूझकर अखबारों को इस बारे में भनक नहीं लगने दी । खासकर लाशों पर लगे इस संदेश के बारे में। जब हमें पहली त्याश मिली थी और मुझे पता चला था कि लाश के सीने पर एक कागज पिन से लगा मिला है तभी मैं समझ गया था कि यह किसी खतरनाक, गिरोह का षड्यन्त्र है। इसलिए मैंने निर्देश दे दिए थे कि इस कत्ल के बारे में अखबारी रिपोर्टरों को कुछ न बताया जाए । खासकर इस संदेश के बारे में । मेरी छठी इन्द्रीय ने उस वक्त कहा था कि अगर यह कोई बड़ा षड्यन्त्र है तो और भी कत्ल होंगे । मेरा अनुमान ठीक निकला। तीन दिन बाद हमें दूसरी लाश मिली। फिर एक हफ्ते बाद तीसरी । और इस हफ्ते में यह दूसरी लाश है। यानी अब तक पूरे पांच अफसर कत्ल किए जा चुके हैं उनमें से तीन सब-इंस्पेक्टर थे और दो इंस्पेक्टर और उन सबकी लाशें शहर के विभिन्न भागों में मिली हैं ।(21)
अब मुम्बई पुलिस कमिश्नर मेजर बलवंत से निवेदन करते हैं वह उस अपराधी को खोज निकाले जो पुलिसकर्मियों को एक-एक कर मार रहा है ।
मेजर बलवंत अपनी टीम के साथ सक्रिय होता है और धीरे-धीरे कार्यवाही आगे बढती है लेकिन अपराधी भी इतना चालाक है वह मेजर की पकड़ में नहीं आता जबकि एक मेजर स्वयं अपराधी के जाल में फंस जाता है।
हमने इस उपन्यास से पूर्व जितने भी उपन्यास पढें है उनमें यदा-कदा मेजर के साथियों का अपहरण हो अवश्य होता देखा है पर मेजर बलवंत का अपहरण पहली बार हुआ है।
यह तो मेजर की किस्मत कहें की अपराधी ने उसे एक चेतावनी मात्र समझाकर छोड़ दिया। अब मेजर का मस्तिष्क और सहयोगियों का सहयोग ज्यादा तीव्र होता है और एक दिन पुलिसकर्मियों का हत्यारा सामने आ ही जाता है।
वह पुलिसवालों की हत्या क्यों कर रहा था ? यह उपन्यास का एक महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसे हम उपन्यास पढकर ही समझ सकते हैं।
उपन्यास के अन्य तथ्य:-
संवाद-
- इन्सान के अन्दर दो भावनायें ही सबसे ज्यादा शक्तिशाली होती हैं। एक प्रेम की भावना, दूसरी नफरत की। ये दोनों भावनायें इन्सान को अत्यधिक खतरनाक बना सकती हैं।"(पृष्ठ-23)
- “इस दुनिया में कोई किसी का दोस्त नहीं होता । सब एक-दूसरे से स्वार्थ से मिलते हैं। दोस्त की जो परिभाषा दुनिया करती है ऐसे दोस्त सिर्फ नावेलों में मिलते हैं।"(47)
मेजर का अपहरण:-
पहली बार मेजर बलवंत का अपहरण होते देखा है और मेजर चार दिन अपराधियों के कब्जे में रहता है।
और जब मेजर के अपहरण होता है तब मेजर का डर देखने वाला होता है। सच है मौत के सामने सभी को डर लगता है।
मेजर बलवन्त की पकड़ स्टीयरिंग ह्वील पर सख्त हो गई। आतंक की सनसनी उसके सारे शरीर में दौड़ गई थी ।(पृष्ठ...)
अपराध पर मेजर के विचार:-
वर्तमान में भी देखा जाये तो अधिकांश अपराध किसी मजबूरी के चलते नहीं बल्कि अपनी हवस (तन-धन) आदि को पूरा करने के लिए किये जाते हैं। अपराध कभी खत्म नहीं होगें, पहले भी अपराध होते थे अब भी होते हैं बस समय अनुसार अपराध के कारण बदल गये।
आजकल जुर्म इन्सान के लिए ऐसी आवश्यकता बन गई है कि हर दूसरा इन्सान जुर्म की दलदल में धंसा हुआ है। जुर्म होते रहेंगे और हम अपराधियों को सजा दिलवाते रहेंगे। यह एक ऐसा सिलसिला है जो कभी नहीं टूटेगा । जुर्म करने वाले बदल जायेंगे । पकड़ने वाले बदल जायेंगे। लेकिन अपराध अपनी जगह अडिग है। यह समाप्त नहीं होंगे।”(110)
मेजर की डांट:-
मैने मेजर को कभी अपने साथियों को डांटते नहीं देखा यहां मेजर राजीव को डांटते हैं।
"इसके लिए तुम्हें अब से दो सौ साल पहले के जमान में जाना पड़ेगा राजीव क्योंकि आजकल द्वन्द्वयुद्ध लड़ने का रिवाज नहीं। और प्लीज अपनी मूर्खता-भरी बातों से हमारी बवत बरबाद मत करो।”(29)
मेजर के कुछ साथी इस उपन्यास में बदल गये हैं। इन नये- पुराने साथियों के विषय में आप उपन्यास 'हाॅगकाॅग के हत्यारे' में पढ सकते हैं।
तथ्य:-
इस उपन्यास में अध्याय के शीर्षक नाम नहीं है बल्कि क्रम संख्या है। जबकि अध्याय का शीर्षक कर्नल रंजीत की विशेषता रही है।
निष्कर्ष:-
रात के ग्यारह बज चुके थे। पुलिस इन्स्पेक्टर रामसिंह ड्यूटी खत्म करके घर जाने की तैयारी कर रहा था कि फोन की घंटी बजी। इन्स्पेक्टर ने रिसीवर उठाकर कहा :
"हलो, पुलिस स्टेशन बाईकला।"
जवाब में किसी औरत की आवाज ने कहा, "मैं जिम्मेदार पुलिस अफसर से बात करना चाहती हूं।"
"आप कौन बोल रही हैं ?"
"प्लीज, आप मेरी बात किसी अफसर से करा दीजिए।" औरत ने जवाब दिया।
"मैं स्टेशन इन्चार्ज इन्स्पेक्टर रामसिंह बोल रहा हूं। क्या मैं आपकी कोई सेवा कर सकता हूं ?"
"ओह, इन्स्पेक्टर साहब, थैंक्स गाड, कि आप मिल गये । क्या आप मशहूर डाकू राजन को गिरफ्तार करना' चाहेंगे जो दो महीने पहले जेल से फरार हो गया था और जिसकी गिरफ्तारी पर आपके विभाग ने दस हजार का इनाम रखा है ?"
यह सुनकर इन्स्पेक्टर राम सिंह की नब्ज तेज चलने लगी। राजन बम्बई शहर का एक बड़ा खतरनाक गुण्डा था। कई बैंक लूट चुका था। आखिर पकड़ा गया। उस पर कत्ल के भी इल्जाम थे। यह बात निश्चित थी कि उसे फांसी हो जायेगी लेकिन अभी मुकद्दमा चल ही रहा था ।कि वह जेल तोड़कर भाग गया। सारे शहर की पुलिस कोशिश के बावजूद उसे तलाश करने में असफल रही। आखिर पुलिस कमिश्नर ने अखबारों में घोषणा छपवाई कि जो व्यक्ति राजन डाकू को गिरफ्तार कराने में मदद करेगा उसे दस हजार रुपये नकद इनारा दिया जायेगा। (कातिल मेरा नाम- कर्नल रंजीत, प्रथम पृष्ठ से)
कर्नल रंजीत के उपन्यासों का आरम्भ हिंद पॉकेट बुक्स से होता है। यह हिंद पॉकेट बुक्स का ही ट्रेड नेम था। लम्बे समय पश्चात हिंद पॉकेट बुक्स की सहयोगी संस्था 'अभिनव पॉकेट बुक्स' से भी कर्नल रंजीत के उपन्यास प्रकाशिक होते रहे । और एक और संस्था थी दिल्ली की 'मनोज पॉकेट बुक्स' उसने कर्नल रंजीत के प्रकाशन अधिकार खरीदे और कर्नल रंजीत ट्रेड नाम को वहां से छापा।
किसी सज्जन पाठक मित्र को जानकारी हो तो बताये की हिंद पॉकेट बुक्स ने वह अधिकार कब और क्यों बेचे तथा अभिनव पॉकेट बुक्स से कर्नल रंजीत को छापना आरम्भ किया।
चलो अब हम चलते हैं अपने प्रस्तुत उपन्यास 'कातिल मेरा नाम' की समीक्षा पर । यह एक प्रतिरोधात्मक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास है। इसका आरम्भ जिस दृश्य से होता है वह आप ऊपर पढ चुके हैं। इंस्पेक्टर रामसिंह का अज्ञात अपराधी द्वारा कत्ल कर दिया जाता है।
मेजर बलवंत अपनी पूरी टीम यानी सोनिया, कल्याणी, डोरा, डेजी, सुधीर, संजीव और राजीव के साथ होटल 'नाट आउट' में बैठे डिनर खा रहे थे। यह होटल एक महीने पहले ही शुरू हुआ था। इसका मालिक क्रिकेट का भूतपूर्व खिलाड़ी रह चुका था इसलिए उसने अपने होटल का यह अजीबो-गरीब नाम 'नाट आउट' रखा था।(पृष्ठ-10)
मुम्बई पुलिस कमिश्नर मिस्टर देशपांडे इस हत्या की जांच के लिए मेजर बलवंत को याद करते हैं जो उस समय होटल 'नाॅट आउट' में अपने सहयोगियों के साथ खाना खा रहे थे।
वहां जाकर मेजर बलवंत को हैरान कर देने वाली सूचनाए कमिश्नर देशपांडे से मिलती हैं।
"इससे पहले चार पुलिस अफसर और कत्ल हो चुके हैं। हर लाश पर यही संदेश लिखा हुआ मिलता रहा। और ये सारे कत्ल पिछले पन्द्रह दिन में हुए हैं।"
"पन्द्रह दिन में।" मेजर बलवन्तं ने घुटी हुई आवाज में कहा, "लेकिन सर, अखबारों में तो……”
कमिश्नर ने उसकी बात काटकर कहा, "हमने जान-बूझकर अखबारों को इस बारे में भनक नहीं लगने दी । खासकर लाशों पर लगे इस संदेश के बारे में। जब हमें पहली त्याश मिली थी और मुझे पता चला था कि लाश के सीने पर एक कागज पिन से लगा मिला है तभी मैं समझ गया था कि यह किसी खतरनाक, गिरोह का षड्यन्त्र है। इसलिए मैंने निर्देश दे दिए थे कि इस कत्ल के बारे में अखबारी रिपोर्टरों को कुछ न बताया जाए । खासकर इस संदेश के बारे में । मेरी छठी इन्द्रीय ने उस वक्त कहा था कि अगर यह कोई बड़ा षड्यन्त्र है तो और भी कत्ल होंगे । मेरा अनुमान ठीक निकला। तीन दिन बाद हमें दूसरी लाश मिली। फिर एक हफ्ते बाद तीसरी । और इस हफ्ते में यह दूसरी लाश है। यानी अब तक पूरे पांच अफसर कत्ल किए जा चुके हैं उनमें से तीन सब-इंस्पेक्टर थे और दो इंस्पेक्टर और उन सबकी लाशें शहर के विभिन्न भागों में मिली हैं ।(21)
अब मुम्बई पुलिस कमिश्नर मेजर बलवंत से निवेदन करते हैं वह उस अपराधी को खोज निकाले जो पुलिसकर्मियों को एक-एक कर मार रहा है ।
मेजर बलवंत अपनी टीम के साथ सक्रिय होता है और धीरे-धीरे कार्यवाही आगे बढती है लेकिन अपराधी भी इतना चालाक है वह मेजर की पकड़ में नहीं आता जबकि एक मेजर स्वयं अपराधी के जाल में फंस जाता है।
हमने इस उपन्यास से पूर्व जितने भी उपन्यास पढें है उनमें यदा-कदा मेजर के साथियों का अपहरण हो अवश्य होता देखा है पर मेजर बलवंत का अपहरण पहली बार हुआ है।
यह तो मेजर की किस्मत कहें की अपराधी ने उसे एक चेतावनी मात्र समझाकर छोड़ दिया। अब मेजर का मस्तिष्क और सहयोगियों का सहयोग ज्यादा तीव्र होता है और एक दिन पुलिसकर्मियों का हत्यारा सामने आ ही जाता है।
वह पुलिसवालों की हत्या क्यों कर रहा था ? यह उपन्यास का एक महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसे हम उपन्यास पढकर ही समझ सकते हैं।
उपन्यास के अन्य तथ्य:-
संवाद-
- इन्सान के अन्दर दो भावनायें ही सबसे ज्यादा शक्तिशाली होती हैं। एक प्रेम की भावना, दूसरी नफरत की। ये दोनों भावनायें इन्सान को अत्यधिक खतरनाक बना सकती हैं।"(पृष्ठ-23)
- “इस दुनिया में कोई किसी का दोस्त नहीं होता । सब एक-दूसरे से स्वार्थ से मिलते हैं। दोस्त की जो परिभाषा दुनिया करती है ऐसे दोस्त सिर्फ नावेलों में मिलते हैं।"(47)
मेजर का अपहरण:-
पहली बार मेजर बलवंत का अपहरण होते देखा है और मेजर चार दिन अपराधियों के कब्जे में रहता है।
और जब मेजर के अपहरण होता है तब मेजर का डर देखने वाला होता है। सच है मौत के सामने सभी को डर लगता है।
मेजर बलवन्त की पकड़ स्टीयरिंग ह्वील पर सख्त हो गई। आतंक की सनसनी उसके सारे शरीर में दौड़ गई थी ।(पृष्ठ...)
अपराध पर मेजर के विचार:-
वर्तमान में भी देखा जाये तो अधिकांश अपराध किसी मजबूरी के चलते नहीं बल्कि अपनी हवस (तन-धन) आदि को पूरा करने के लिए किये जाते हैं। अपराध कभी खत्म नहीं होगें, पहले भी अपराध होते थे अब भी होते हैं बस समय अनुसार अपराध के कारण बदल गये।
आजकल जुर्म इन्सान के लिए ऐसी आवश्यकता बन गई है कि हर दूसरा इन्सान जुर्म की दलदल में धंसा हुआ है। जुर्म होते रहेंगे और हम अपराधियों को सजा दिलवाते रहेंगे। यह एक ऐसा सिलसिला है जो कभी नहीं टूटेगा । जुर्म करने वाले बदल जायेंगे । पकड़ने वाले बदल जायेंगे। लेकिन अपराध अपनी जगह अडिग है। यह समाप्त नहीं होंगे।”(110)
मेजर की डांट:-
मैने मेजर को कभी अपने साथियों को डांटते नहीं देखा यहां मेजर राजीव को डांटते हैं।
"इसके लिए तुम्हें अब से दो सौ साल पहले के जमान में जाना पड़ेगा राजीव क्योंकि आजकल द्वन्द्वयुद्ध लड़ने का रिवाज नहीं। और प्लीज अपनी मूर्खता-भरी बातों से हमारी बवत बरबाद मत करो।”(29)
मेजर के कुछ साथी इस उपन्यास में बदल गये हैं। इन नये- पुराने साथियों के विषय में आप उपन्यास 'हाॅगकाॅग के हत्यारे' में पढ सकते हैं।
तथ्य:-
इस उपन्यास में अध्याय के शीर्षक नाम नहीं है बल्कि क्रम संख्या है। जबकि अध्याय का शीर्षक कर्नल रंजीत की विशेषता रही है।
निष्कर्ष:-
कर्नल रंजीत द्वारा लिखित 'कातिल मेरा नाम' एक प्रतिशोध मर्डर मिस्ट्री है। एक अपराधी समूह पुलिसवालों की हत्या करता है और उसके सीने पर कागज की एक 'चिट' छोड़ देता है।
मुम्बई पुलिस के आग्रह पर मेजर बलवंत इस रहस्य को हल करता है और असली अपराधी को सामने लाता है।
उपन्यास- कातिल मेरा नाम
मुम्बई पुलिस के आग्रह पर मेजर बलवंत इस रहस्य को हल करता है और असली अपराधी को सामने लाता है।

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