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Wednesday, 18 October 2023
576. कौन है मेरा कातिल- राकेश पाठक
तलाश अपने ही कातिल की
कोई इन्वेस्टीगेटर कत्ल होने के पश्चात् जब कातिल की तलाश करता है तो उसकी चेष्टा होती है कि वो जल्द-से-जल्द कातिल को पकड़े और अपने काम से छुट्टी पाये। वो अगर कानून का मुहाफिज है तो उसकी खोज के पीछे कर्त्तव्यनिष्ठता होती है, या कानून की सेवा करने के जज्बात। जबकि पेशेवर जासूस को अपनी फीस से सरोकार होता है।
Monday, 13 June 2022
520. सावधान, आगे थाना है - राकेश पाठक
भ्रष्ट पुलिस और राजनीति की कहानी
सावधान आगे थाना है- राकेश पाठक
पुलिस स्टेशन का बोर्ड देखकर माँ रुक गयी और उखड़ी सांसों को दुरुस्त करने लगी।
“भगवान का शुक्र है बेटी कि हम उन गुण्डों से पीछा छुड़ाकर यहां तक पहुंच गयी हैं। अगर हम उनके हत्थे चढ़ गयी होती तो वो हमारा सामान और गहने तो लूटते ही, साथ ही तेरी इज्जत से भी खेलते। ये भी हो सकता था कि कानून के डर से वो हम दोनों को जान से मार कर हमारी लाशों को ठिकाने लगा देते। वो देखो, सामने थाना है। अब डरने की कोई जरूरत नहीं है। अब हम सेफ हैं।" “हम सेफ नहीं हैं, मम्मी !"
पुलिस स्टेशन का बोर्ड देखकर माँ रुक गयी और उखड़ी सांसों को दुरुस्त करने लगी।
“भगवान का शुक्र है बेटी कि हम उन गुण्डों से पीछा छुड़ाकर यहां तक पहुंच गयी हैं। अगर हम उनके हत्थे चढ़ गयी होती तो वो हमारा सामान और गहने तो लूटते ही, साथ ही तेरी इज्जत से भी खेलते। ये भी हो सकता था कि कानून के डर से वो हम दोनों को जान से मार कर हमारी लाशों को ठिकाने लगा देते। वो देखो, सामने थाना है। अब डरने की कोई जरूरत नहीं है। अब हम सेफ हैं।" “हम सेफ नहीं हैं, मम्मी !"
"क्या मतलब?"
"चलो, जल्दी से वापिस चलो।”
"चलो, जल्दी से वापिस चलो।”
“दिमाग खराब हुआ है क्या तेरा ? वापिस गये तो वो गुण्डे मिल जायेंगे।"
“भले ही मिल जायें। लेकिन वो इतने बुरे नहीं होंगे, मगर हम थाने के सामने से गुजरी और पुलिस वालों के हत्थे चढ गयी तो हमारा वो हाल होगा, जो कि गुण्डे भी नहीं करेंगे।"
क्या वर्तमान समय में पुलिस व्यवस्था इतनी भ्रष्ट हो गयी है?
क्या वर्तमान समय में पुलिस व्यवस्था इतनी भ्रष्ट हो गयी है?
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