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Sunday, 19 April 2020

297. एक शाम तथा अन्य रचनाएँ

कुछ प्यार की कुछ संसार की...
एक शाम तथा अन्य रचनाएं- विकास नैनवाल

लघुकथाएंँ और काव्य रचनाएँ

     किंडल पर मित्र विकास नैनवाल जी का लघुकथाओं का एक छोटा सा संग्रह पढने को मिला। इस संग्रह की कथाएँ अलग-अलग समय लिखी होने के साथ-साथ अगल-अलग परिवेश को व्यक्त करनी है।

        प्यार, मनुष्य का स्वभाव, ......जैसे अन्य विषयों पर लिखी गयी ये रचनाएँ मन को छू जाती हैं और कहीं-कहीं हमें सोचने को विवश भी करती है। ऐसा ही एक प्रश्न 'फैसला' कथा में लेखक पाठकों से करता है- 'आप शशि हैं। आप ऐसे मौके पर क्या करते? शशि ने वही किया।'
'फैसला' कहानी मनुष्य के स्वार्थी मन की कहानी है जो दूसरे के कर्तव्य को सचेत करना चाहता है लेकिन स्वयं अपना कर्तव्य भूल जाता है। ऐसी ही एक और कहानी है 'चालान'।

Thursday, 9 February 2017

20. जंगली घास- लू शुन

जंगली घास- लू शुन की गद्य कविताएँ

चीन के लेखक लू शुन के इस संग्रह में उनकी उन्नीस लघुकथाओं को स्थान दिया गया है।  लगभग लघुकथाएं प्रतिकात्मक है।
पुस्तक के अंतिम कवर पृष्ठ पर लिखे विचार पढ लीजिएगा-
इन प्रतीकात्मक कविताओं के विविध रंग हैं। इनमें स्वप्न का सृजन है जिनमें दु:स्वप्न भी शामिल है। यहाँ कुत्ते से वार्तालाप है, कीङों की भिनभिनाहट है और इंसानों की नजर से खुद को छिपाने की कोशिश करता आकाश है। समाज के ढोंग-पाखंङ, निष्क्रियता, हताश और ठहराव पर विक्षुब्ध टिप्पणी है जो मुखर नहीं है।
  कहानियाँ, जिन्हें गद्य कविता नाम दिया गया है। ये कहानियाँ प्रतीकात्मक होने के कारण पढनें में थोङी मुश्किल है, और पाठक के समझ से बाहर ही रहती है। पर फिर भी कुछ लघुकथाएं पाठक के मन को छू जाती है।
राहगीर एक ऐसी ही रचना है, जो पाठक को प्रभावित करती है। वहीं एक रचना है चतुर आदमी, मूर्ख और गुलाम जो बताती है की हमारी गुलामी के कारण हम स्वयं हम कैसे चतुर आदमी के शब्दजाल में उलझ कर रह जाते हैं। लू शुन की कुछ रचनाओं के बारे में इस पुस्तक की भूमिका में भी लिखा गया है।
सुंदर नरक जो गायब हो गया- कविता का संदर्भ गणतंत्र के छलावा साबित होने से है
ऐसा योद्धा- इसमें उन विद्वानों का वर्णन है जो बिना हथियार के योद्धा है, जो आतताइयों के भाले के आगे घुटने टेक देते हैं।
पतझङ की रात- यह भविष्य के प्रति आशावान और नये सपनों की वाहक रचना है।
इन प्रतीकात्मक रचनाओं में कुछ पंक्तियाँ बहुत ही सुंदर है जो रचनाओं की क्षमता को आगे बढाने में सक्षम है-
"मेरे घर के पिछवाङे की दीवार से उस पार आपको दो पेङ दिखायी देंगे। एक खजूर का पेङ है और दूसरा भी खजूर का पेङ है।"
"आखिर में वह बूढा हो जाता है और बूढापे के कारण शून्यता के पथ पर मर जाता है। सब के बावजूद वह कोई योद्धा नहीं है और शून्यता ही विजेता है।"
"बच्चा मरेगा, यह तो अवश्यंभावी है, जबकि वह धनवान होगा या अफसर बनेगा, ऐसा कहना झूठ भी हो सकता है। फिर भी झूठ की प्रशंसा की जाती है।"
"मेरा हृदय बहुत ही शांत है- प्रेम और घृणा, खुशी और उदासी, रंग और आवाज से शून्य।"
लू शुन की रचनाओं में व्यंग्य की शक्ति भी जबरदस्त है-
मैंने कुत्ते को डाँटते हुए कहा- "हट! चुपकर! नीच चाटुकार!"
उसने दाँत निपोरते हुए कहा-"अरे नहीं! इस मामले में भला आदमी के आगे मेरी क्या हैसियत है।"
इस संग्रह में शामिल रचनाएँ
1.पतझङ की रात 2.परझाई का अवकाश ग्रहण 3.भिखमंगे 4.बदला 5.आशा 6.बर्फ 7.पतंग 8.अच्छी कहानी 9. राहगीर 10. बुझी हुयी आग 11.कुत्ते ने पलट कर कहा 12.सुंदर नर्क जो गायब हो गया था। 13. राय जाहिर करने के बारे में 14.मौत के बाद 15.ऐसा योद्धा 16. चतुर आदमी, मूर्ख और गुलाम 17.चित्तिदार पत्ती 18. खून के धुंधले धब्बों के बीच 19. जागृति
पुस्तक- जंगली घास- लू शुन की गद्य कविताएँ ।
ISBN 81-87772-25-5
लेखक- लू शुन।
अनुवाद- दिगंबर
प्रकाशक- गार्गी प्रकाशन-दिल्ली ।
पृष्ठ-48.
मूल्य-30₹

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लेखक परिचय
विश्व साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर लू शुन की गद्य कविताओं का संकलन पहली बार 1928 में वाइल्ड ग्रास नाम से प्रकाशित हुआ था। इनका लेखन काल सितंबर 1924 से अप्रैल 1926 के बीच का है।

Sunday, 15 January 2017

13. बस्तर पाति- पत्रिका

छतीसगढ से प्रकाशित 'बस्तर पाति' पत्रिका का अंक 9-10, जून-नवंबर पढने को मिला।
यह एक संयुक्त अंक है, जो की लघुकथा विशेषांक है।
प्रस्तुत अंक एक से बढकर एक लघुकथाएं हैं, इसके अलावा पत्रिका में कहानी, कविता, साक्षात्कार व नियमित स्तम्भ भी हैं।है।

लघुकथा का आरम्भ पृष्ठ संख्या 06 से नरेश कुमार उदास की दो लघुकथाओं से होता है। एक 'बाढ' व दूसरी 'विचार विमर्श' है। इस प्रकार की लघुकथाएं पाठक न जाने कितनी बार पढ चुके होंगे। वही प्रशासनिक भ्रष्ट्राचार व जातिगत भेदभाव को लेकर लिखी गयी रचनाएँ हैं। वही पुराना प्रस्तुतिकरण।

डाॅ. सतीशराज पुष्करणा की लघुकथा गलतफहमी' दो भाईयों के बीच पनपी गलतफहमी पर आधारित कथा है और ऐसी परिस्थितियाँ घरों में अक्सर देखने को मिल जाती हैं। कथा का समापन सकारात्मक है।
ऐसी ही एक रचना है उषा अग्रवाल की 'मिस काॅल' जो पाठक के मन को अंदर तक छू जायेगी। रेल यात्रा के दौरान मित्र बनी एक सहयात्री के मिलन व वियोग की मार्मिक कथा है। श्रीमती बकुला पारेख की 'सुहागन' भी एक पारिवारिक सकारात्मक कथा है।
   ऐसी ही एक अन्य मार्मिक कथा लिखी है, उमेश शिवलिंग ने - 'हे! भगवान'।
एक मासूम बहन की कहानी। दूसरी कक्षा में पढने वाली एक लङकी की बहन की मृत्यु हो जाती है, लेकिन वह लङकी मृत्य बहन को अपने साथ महसूस करती है। ऐसी हृदय को छूने वाली कहानी लिखने वाले लेखक को धन्यवाद ।
'वसंत' व 'रिमझिम' पत्रिका के संपादक राज हरिमन द्वारा रचित पाँच लघुकथाएं इस पत्रिका का पूरा एक पृष्ठ ले गयी। इनकी लघुकथा आधा 'नोट' व 'प्रेशर कूकर' दोनों एक ही विषय पर लिखी गयी ऐसी दो निकृष्ट लघुकथाएं हैं जो लघुकथाओं का स्तर गिराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अगर लेखक को कोई उदाहरण प्रस्तुत करना था तो कम से कम ऐसा तो होता जो संभव होता।
जहां लघुकथा आधा नोट' में नेता जनता को वोटों से पूर्व आधा नोट देता है पर चुनाव जीतने के बाद शेष आधा नोट नहीं देता, यही किस्सा प्रेशरकूकर कथा में है।
आप स्वयं पढ लीजिए- "चुनावी अभियान के दौरान हजार-हजार रुपयों के नोट आधा-आधा फाङ कर एजेंट आठ लाख वोटरों में बांट चुके थे और बाकी का आधा, चुनाव जीतने के बाद देना तय हुआ था।"
लेखक की अन्य तीन लघुकथाएं भी कोई अच्छी नहीं हैं, लगता है 'बस्तर पाति' के संपादक महोदय ने मित्र धर्म निभाया है।
लेखक मधुदीप की दोनों रचनाएँ अच्छी हैं। जहाँ लघुकथा 'जागृति' वर्तमान नेताओं के झूठे वायदों की पोल खोलती है, वहीं 'मजहब' मानवता धर्म को श्रेष्ठ धर्म बताती है।
हालांकि इस प्रकार की बहुत लघुकथाएं लिखी गयी हैं, पर यहाँ लेखक का प्रस्तुतिकरण अच्छा है।
   अगर देखा जाये तो हिंदी लघुकथा लेखक कुछ चुनिंदा विषयों से आगे बढ ही नहीं पाये। हर दूसरे-तीसरे लेखक की रचनाएँ समान होती हैं और उसमें भी लेखक की हर दूसरी-तीसरी लघुकथा समान होती है।  इस समानता में कुछ अलग होता है तो वह है लेखक का प्रस्तुतिकरण।
  आखिर पाठक भी एक जैसी बात को कहां तक पढे।
  रउफ परवेज की 'वसीयत नामा' एक हास्य कथा के ज्यादा नजदीक है। एक ऐसे अमीर आदमी की कथा जो उधार न चुकाने के नये -नये बहाने प्रस्तुत करता है। अधिकतर लघुकथा लेखक पता नहीं क्यों नकारात्मक कहानियाँ लिखते हैं, इन नकारात्मक कहानियों में एक हास्य कथा अच्छी है।
   नेताओं की कथनी करनी को रेखांकित करती एक लघुकथा है, डाॅ. गजेन्द्र नामदेव की 'आईना' और वहीं  पवन तनय अग्रहरि अद्वितीय की 'दिये तले अँधेरा' जातिगत भेदभाव को रेखांकित करती है।

  अशफाक अहमद की 'राशन कार्ङ' एक बेबस माँ की कहानी है
   माँ को केन्द्र में रखकर लिखी गयी कहानी 'परिवर्तन' लेखिका हैं- डाॅ. शैलचन्द्रा। स्वयं लेखिका महोदय ने भी इस प्रकार की असंख्य लघुकथाएं पढ ली होंगी फिर भी अपना योगदान दिया है। लेकिन इनकी द्वितीय लघुकथा 'भाषाएँ' एक अच्छी लघुकथा है, जिसका निष्कर्ष है-"दुनिया की हर भाषा में दुख की भाषा एक होती है।"
ये इनकी सराहनीय लघुकथा है।
  मोहम्मद जिलानी की लघुकथा 'जल्लाद' व्यवसाय आधारित कथा है तो 'परिणाम' शराब के दुर्गुणों को दर्शाती है। कहानी में थोङा अनावश्यक विस्तार है। संपादक महोदय ने संपादकीय में कहा भी है कि अनावश्यक विस्तार कथा के प्रवाह को धीमा करता है।
ऐसा ही अनावश्यक विस्तार आपको संतोष श्रीवास्तव की 'एक समझौता' और पूर्णिमा विश्वकर्मा 'दु:खवा मैं कासे कहूँ'(आचार्य चतुरसेन शास्त्री की एक कहानी का  शीर्षक भी यही है) में भी मिलेगा।
प्रवेश सोनी की लघुकथा ' सीढियाँ' (पृष्ठ-45) में भी बहुत ज्यादा विस्तार है, क्योंकि यह लघुकथा मात्र इतनी है की एक गरीब परिवार का बेटा मेहनत कर सफल हो जाता है। पर इस कहानी में खास बात है वह है कुछ विशेष पंक्तियाँ जो लघुकथाकार कभी भी प्रयुक्त नहीं करते। आप भी पढ लीजिएगा-
"गरीब की गरीबी इतनी वफादार होती है की स्वप्न में भी उसका साथ नहीं छोङती।"
"उन्हें यह चिंता बाढ चढी नदी की तरह डरा रही थी।"

  वर्तमान सौदेबाजी को लेकर लिखी गयी कहानी है महेश राजा की 'खरगोश फिर हार गया'
हर बार की तरह इस बार भी खरगोश हारा है पर इस बार हारने का कारण है कछुए की 'फिक्सिंग'।
इसी प्रकार परम्परागत कहानी को आधार बनाकर लिखी गयी है दिनेश कुमार छाजेङ की 'चतुर कौआ'।
   शिवेन्द्र कुमार यादव की लघुकथा 'कार्यभार' को छोङ कर अन्य लघुकथाएं लघु तो हैं पर उनमें से कथा गायब है।
  शायद आजकल दौर चल पङा है की लघुकथा लिखी जाये और लेखक लिखता है। उसे शायद कथा तत्व से कुछ लेना देना नहीं है, बस लिखना है।
  और संपादक का कार्य है छापना, बस छापना। भारत में प्रतिमाह बहुत सी लघु पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं, जिनमें असंख्य लघुकथाएं छपती हैं, अगर इस क्रम को साल भर के नजरीये से देखा जाये तो प्रतिवर्ष प्रकाशित होने वाली लघुकथाओं की आप गिनती नहीं कर सकते। पर एक बात सब में समान मिलेगी वह है लघुकथा लेखक। वही लेखक हैं जो प्रत्येक जगह हैं छपते हैं और उनका कथानक भी वही होता है।
  अब पता नहीं लेखक महोदय सब एक जैसा ही क्यों लिख देते हैं।
प्रतिवर्ष प्रकाशित होने वाली लघुकथाओं में आप अच्छी लघुकथाएं चंद ही चुन पाओगे।
जब किसी लेखक से पूछा जाये की भारतीय फिल्मों के प्रति आपकी क्या राय है? तब उसका उत्तर होता है, फिल्में तो बहुत बन रही हैं पर सार्थक फिल्में नहीं बनती ।
यही बात वर्तमान लघुकथा पर लागू होती है।
अरविंद अवस्थी की 'फर्क' कथा बताती है कि एक बहूँ भी एक अच्छी बेटी साबित हो सकती है। भरत गंगादित्य की 'उच्च शिक्षित' भी ऐसी ही कथा है।
राजस्थान के गोविन्द शर्मा अच्छे लेखक हैं। इनकी ' आचरण' लघुकथा परम्परागत विषयों से हटकर है। वर्तमान विज्ञापन युग में हम जाने-अनजाने गलत बातों का समर्थन करते हैं, इसी बात को लेखक ने उठाया है। धन्यवाद लेखक जी।
   वर्तमान मीडिया जगत में फैली चाटुकारिता को एक नेता के माध्यम से डाॅ. मोहम्मद साजिद खान ने 'मिडिया के लोग' लघुकथा के माध्यम से दिखाया है तो दूसरी लघुकथा नए संस्कार' में खोये सामाजिक मूल्यों का चित्रण है की कैसे हम अमूल्यों को जीवन के मूल्य समझ बैठे हैं।
  कृष्णधर शर्मा की लघुकथा ' बासी खाने का पुण्य' के अलावा अन्य दोनों लघुकथाएं 'लघु लेख' दृष्टिगत होती हैं।
  के.पी. सक्सेना दूसरे की लघुकथा ' होली मुबारक' एक बहुत ही अच्छी रचना है(पृष्ठ-46)।
मनुष्य अपनी खुशी के लिए दूसरे जीव की हत्या कर देता है। यह कैसी खुशी जो एक जीव को मृत्यु दे।
मुझे याद है एक बार मेरे एक  मित्र ने बकरा ईद पर मुझे बधाई दी। मैंने कहा भाई यह न तो तेरा त्योहार है न ही मेरा, दूसरा किसी जीव की हत्या जैसे निर्दय कार्य पर कैसी शुभकामनाएं।
  वीनु जमुआर अपनी लघुकथा 'स्वयंसिद्धा' के माध्यम से संतान के प्रति मोह, उत्तरदायित्व-बोध और दृढ निश्चय को तो रेखांकित करती है साथ-साथ उन युवावर्ग को भी शिक्षा देती है जो घर से भागकर शादी करते हैं। ऐसी ही एक लघुकथा श्रीमती अलका पाण्डे की 'पहल' है।(पृष्ठ-53)

  अगर बात करें सकारात्मक रचना की तो वह है प्रहलाद श्रीमाली की 'हजार आँखों वाला विश्वास'।
"यह अंधविश्वास की नहीं विश्वास की बात है।...पानी और बिजली की किल्लत के जमाने में इस जमाने में इस मान्यता के दम पर यदि थोङी बहुत बचत हो जाती है और वह जरूरतमंदों के काम आ जाती है तो यह अंधविश्वास नहीं बल्कि हजार आंखों वाला विश्वास है।"
जीवन को विषम परिस्थियों में जीना सीखाती है माधुरी राऊलकर की ' अपनी मंजिल' लघुकथा।
     हमारे जीवन पर दूरदर्शन के प्रभाव को ' दादाजी की आत्मा' लघुकथा के माध्यम से कमलेश चौरसिया ने दर्शाया है। वहीं इनकी दूसरी लघुकथा 'फैसला' में थोङा अजीब सा लगा किसी नाम को प्रयोग करना।
मिहिर ने कहा-"यह ले माँ! मेरे जीवन की प्रथम कमाई।"
लता गदगद हो गयी।
यहाँ 'लता' शब्द की जगह 'माँ' शब्द ज्यादा उपयुक्त था, लेकिन आजकल लेखकों में नाम देने का फैशन चल पङा।  जब डाॅक्टर को डाॅक्टर कहने से काम चलता है तब क्या जरूरत है, डाॅक्टर शर्मा, वर्मा, माथुर कहने की।
ऐसी ही गलती सुषमा झा 'गलती क्या' लघुकथा में भी करती हैं।
"आपकी टोका-टाकी से मीना भी परेशान हैं।"
अब पाठक भी परेशान है ये मीना कौन है?
  ये तो लेखिका या संपादक महोदय जाने की मीना कौन है।
  मृत्युभोज पर कटाक्ष किया है करमजीत कौर की लघुकथा 'अंतिम विदाई ने तो हेमंत बघेल ने 'परिधान' व 'भ्रष्ट्राचार की जङ' भी व्यंग्य के अच्छे उदाहरण हैं।
   हमारी मरती मानवता पर श्रीमती अलका पाण्डे ने 'नि: शब्द' में अच्छा लिखा है, मनुष्य अपनी वासनापूर्ति के लिए किस स्तर तक गिरता जा रहा है।
  श्रीमति रीना जैन की लघुकथा 'भगवान' दर्शाती है की भगवान तो हृदय में है। इस अंक की अंतिम लघुकथा 'पुरुस्कार' (पृष्ठ-58) रजनी साहू द्वारा लिखित अच्छी कथा है।
इस प्रस्तुत लघुकथा अंक में आपको कहानीकार कृष्ण शुक्ल का साक्षात्कार (पृष्ठ-09) व उनकी तीन कहानियां पढने को मिलेंगी।
  'कोई एक घर' कहानी स्त्री के जीवन की कठिनाईयों को दर्शाती है जो अपने पूर्व जीवन के कठिन दौर के चलते अपने भविष्य के प्रति शंकित हो उठती है।
      'डरा हुआ महानगर' में नायक का सामना एक ऐसी महत्वाकांक्षी लङकी से है जो खुद के जीवन को अपनी तरह से जीना चाहती है।
  'एक लङकी की हत्या' कृष्ण शुक्ल की एक बेहतरीन कहानी है जो नौकरी प्राप्त करने वाली एक लङकी की। कहानी है। वह लङकी नौकरी प्राप्ति हेतु अपना सर्वस्व समर्पण कर देती है‌।
  यह कहानी पाठक को अंदर तक झकझोर देगी।
'बस्तर पाति' का प्रस्तुत लघुकथा अंक एक‌अच्छा अंक है जिसमें पाठक को विभिन्न विषयों पर लघुकथाएं पढने को मिलेंगी।
संपादक मण्डली को धन्यवाद ।
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पत्रिका- बस्तर पाति।
अंक- 09-10, जून-नवंबर-2016(संयुक्त अंक)
प्रकाशन स्थल- जगदलपुर, बस्तर, छतीसगढ।
संपादक- सनत कुमार जैन।
सह संपादक- श्रीमति उषा अग्रवाल
     महेन्द्र कुमार जैन
     शंशाक श्रीधर
मूल्य-25₹- प्रस्तुत अंक।
पृष्ठ-70.
Email-paati.bastar@gmail.com
Site - www.paati.bastar.com