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Thursday, 27 February 2025

635. भयंकर जाल- ओमप्रकाश शर्मा

 राजेश सीरीज का प्रथम उपन्यास
भयंकर जाल - ओमप्रकाश शर्मा 

केन्द्रीय खुफिया विभाग के कार्यालय में आज भीषण एवं भयपूर्ण खामोशी छाई हुई थी।
चीफ आफ स्टाफ श्री नायडू आज कार्यालय में आये हुये थे।
पूरे खुफिया विभाग के कर्मचारियों में श्री नायडू एक सख्त और हृदयहीन अफसर के रूप में विख्यात हैं। नये और पुराने... सभी कर्मचारी इस श्यामवर्ण बूढ़े, पतले-दुबले आदमी के कारण आज भयभीत-से अपने काम में लगे हुए थे।
- 'मिस्टर राजेश, साहब ने आपको बुलाया है।' चपरासी ने आकर कहा।
राजेश चैंक पड़ा... इर्द-गिर्द बैठे कर्मचारी अज्ञात भय से व्हिवल हो सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि से राजेश को निहारने लगे।
नवयुवक राजेश की नियुक्ति अभी डेढ़ महीने पूर्व ही केन्द्रीय खुफिया विभाग में हुई थी। पढ़ाई समाप्त करके तीन साल उसने इस काम की ट्रेनिंग ली थी, ये सही है कि ट्रेनिंग के बाद की परीक्षा में उसने प्रथम श्रेणी प्राप्त की थी, किन्तु केन्द्रीय खुफिया विभाग में उसे स्थान मिल जायेगा इसकी तो कल्पना भी उसने न की थी।

Wednesday, 26 February 2025

634. बेगम का खजाना- ओमप्रकाश शर्मा- जनप्रिय

आओ जाने खजाने के रहस्य को...
बेगम का खजाना- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा

सदियों पुराना खजाना जब सामने आता है तो उसे हथियाने के लिए लोग किस कदर एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं और कैसे प्रसिद्ध जासूस 'बेगम के खजाने' का रहस्य खोजते हैं और अपराधी को बेनकाब करते है यह पठनीय और रोचक है।
आज प्रस्तुत है एक रोचक उपन्यास की समीक्षा । इस समीक्षा का आरम्भ हम उपन्यास के प्रथम पृष्ठ के दृश्य से करते हैं।

केन्द्रीय खुफिया विभाग के चीफ आफ स्टाफ मिस्टर चक्रवर्ती तेजी से सीनियर जासूस राजेश के कमरे में दाखिल हुए।
- 'राजेश?'
-'हूँ।'
इस समय राजेश लाखों गुना बड़ा दिखाने वाले यंत्र से एक खून में काम आई पिस्तौल का निरीक्षण कर रहे थे। आमतौर से मिस्टर चक्रवर्ती इस प्रकार से किसी व्यक्ति के पास नहीं आया करते हैं... फलस्वरूप अपने काम में लगे राजेश यही समझे कि कोई विभाग का साधारण कर्मचारी होगा। केवल 'हूँ' कह कर वह आँख यंत्र से लगाए रहे।
- 'भई राजेश, मुझे तुमसे कुछ बातें करनी हैं?'
अबकी बार राजेश ने दृष्टि उठा कर चीफ आफ स्टाफ को देखा।

Thursday, 20 February 2025

633. सुनहरे बाल नीली आँखें- ओमप्रकाश शर्मा

कहानी एक गायब हुये बच्चे की
 सुनहरे बाल नीली आँखें- ओमप्रकाश शर्मा


लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के सितारे ओमप्रकाश शर्मा जी के उपन्यास का पुनः प्रकाशन होना एक सराहनीय कार्य है । उनके पाठक के लिए एक अनमोल उपहार है । जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी जासूसी उपन्यास होते हुये भी अपनी जासूसी कहानियों में मानवीय मूल्यों को महत्व देते थे । 
इनका प्रसिद्ध पात्र राजेश अपने मानवीय मूल्यों के कारण ही अन्य जासूसी कथा पात्रिं से एक अलग पहचान स्थापित कर पाया है । प्रस्तुत उपन्यास उन्हीं राजेश महोदय का है ।
यह कहानी एक एक ऐसी युवती की जो अत्यंत सुंदर थी । जिसके बाल सुनहरे और आँखें नीली थी । जिसे देखकर हर कोई उस पर मोहित हो जाता था और यही खूबसूरती उसके जीवन के लिए अभिशाप सिद्ध हुयी और उस पर आरोप था एक बच्चे को चुराने का।

Tuesday, 18 February 2025

632. मुरझाये फूल फिर खिले- ओमप्रकाश शर्मा

अंधविश्वास से टकराते एक युवक की कहानी
मुरझाये फूल फिर खिले- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा

नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला- 2025 और यहाँ से खरीदी गयी किताबों में से दो किताबें जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी की हैं। एक 'पी कहां' और दूसरी 'मुरझाये फूल फिर खिले' । दोनों ही सामाजिक उपन्यास हैं, भावना प्रधान ।
'पी कहां' पढने के बाद 'मुरझाये फूल फिर खिले' पढना आरम्भ किया । यह उपन्यास अपने नाम को सार्थक करता हुआ एक भाव प्रधान उपन्यास है, जिसे पढते-पढते आँखें नम हो ही जाती हैं । समाज फैले अंधविश्वास को बहुत अच्छे से रेखांकित किया गया और उसका सामना भी जिस ढंग से किया गया है वह प्रशंसनीय है।

Monday, 17 February 2025

631. पी कहां- ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय

एक प्रेम कथा
पी कहां- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा 

पुस्तक प्रेमियों के महाकुंभ 'नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला- 2025' में दो दिवस का भ्रमण हम चार साथियों ने किया और काफी संख्या में पुस्तकें भी लेकर आये । जहाँ मेरा यह तृतीय पुस्तक मेला था वहीं अन्य तीन साथी पहली बार ही आये थे, हालांकि इनमे से एक पुस्तक प्रेमी भी न था ।
गुरप्रीत सिंह, अंकित , सुनील भादू, राजेन्द्र कुमार, ओम सिहाग

पुस्तक समीक्षा से पहले थोड़ी सी बात पुस्तक मेले की । मैं गुरप्रीत सिंह अपने साथी ओम सिहाग (अध्यापक) अंकित (बैंककर्मी) और राजेन्द्र सहारण के साथ दो दिवस तक मेले में रहा । ओम सिहाग को साहित्य पढने में काफी रूचि है, वहीं अंकित को अंग्रेजी प्रेरणादायी पुस्तकें अच्छी लगती हैं और राजेन्द्र को बस साथ घूमना था, और घूमा भी । जहाँ राजेन्द्र और ओम मेरे ही गांव से हैं वहीं अंकित हरियाणा (ऐलनाबाद ) से है। हम चार साथियों के अतिरिक्त मेले में सुनील भादू (हरियाणा) और संदीप जुयाल (दिल्ली) का भी अच्छा साथ रहा ।

  राजस्थान से एक बुर्जग पाठक हैं, उनकी इच्छा पर जनप्रिय ओमप्रकाश शर्मा जी के दो उपन्यास 'पी कहां' और ' मुरझाये फूल फिर खिले' तथा एक उपन्यास कमलेश्वर का 'काली आंधी' लिया था। हालांकि बुजुर्ग महोदय दत्त भारती के अच्छे प्रशंसक हैं लेकिन दत्त भारती जी के इच्छित उपन्यास मेले में नहीं मिले ।

अब बात करते हैं प्रस्तुत उपन्यास 'पी कहां' की ।
कौन जाने पावस ऋतु में 'पी कहां' पुकारने वाले पपीहे की व्यथा क्या होती है।
कौन जाने... और कैसे जाने !
सागर वह जो अपनी गहराई सदा छुपाये रखे। दीपक वह जो जले... तिल तिल जलने पर भी जिसके उर अन्तर में अंधेरा रहे।
अपना अपना भाग्य ही तो है।
पपीहा वह जो पावस में, तब जबकि सूर्य के प्रकाश को दल बादल उमड़-घुमड़ कर अंधकार में बदल दे... पुकारे... 'पी कहां'।

Tuesday, 11 April 2023

559. रहस्य की एक रात- ओमप्रकाश शर्मा

ठग जगत पहुंचा पाकिस्तान
रहस्य की एक रात- ओमप्रकाश शर्मा

  'क्लब में हत्या' के बाद क्रमशः यह द्वितीय उपन्यास है जो मैंने जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का इन दिनों पढा है। जहाँ 'क्लब में हत्या' 'राजेश- जयंत' श्रृंखला का मर्डर मिस्ट्री उपन्यास था वहीं 'रहस्य की एक रात' 'जगत- राजेश' श्रृंखला का एक रोमांचक उपन्यास है।
   अब प्रथम प्रश्न तो यही हो सकता है की आखिर जगत पाकिस्तान क्यों गया? और जब प्रसिद्ध ठग जगत पाकिस्तान पहुंच गया तो उसने वहाँ 'रहस्य की एक रात' में क्या कारनामे किये?
   खैर, इन प्रश्नों के उत्तर तो प्रस्तुत उपन्यास पढकर ही जाने जा सकते हैं। और अब हम बात करते हैं उपन्यास के विभिन्न पक्षों पर।
  जनप्रिय ओमप्रकाश शर्मा जी का लेखन का एक अलग तरीका है। कथा चाहे धीमी चलती हो पर वह वास्तविकता के अत्यंत करीब प्रतीत होती है।
    जगत प्रसिद्ध ठग जगत जब राजेश से मिलने पहुंचा।
जगत अम्बाद्वीप से नई दिल्ली पहुंचा, परन्तु नई दिल्ली से सारी यार- पार्टी गायब थी।

Sunday, 9 April 2023

558. क्लब में हत्या- ओमप्रकाश शर्मा

किस्सा तीन हत्याओं का
क्लब में हत्या- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा

           उपन्यास साहित्य में जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। जितना सम्मान पाठक ओमप्रकाश शर्मा का करते हैं उतने ही सम्मानजनक इनके पात्र होते हैं। शर्मा जी का एक विशेष पात्र है राजेश।  प्रस्तुत उपन्यास 'क्लब में हत्या' राजेश -जयंत शृंखला का है। जो की एक मर्डर मिस्ट्री कथा है।
राजेश और जयन्त संयोगवश इस मामले में सम्बन्धित हुये । वह दोनों झाँसी से लौट रहे थे और घटना रात के ग्यारह बजे की है जब उनकी कार दिल्ली की सीमा में प्रविष्ट होकर मथुरा रोड पर दौड़ रही थी। जयन्त कार चला रहा था और राजेश पिछली सीट पर बैठे एक उपन्यास पढ़ने में तल्लीन थे ।
   रास्ते में एक एक्सीडेंट देखकर दोनों को रुकना पड़ा था। जयंत ने राजेश को भी वहाँ बुला लिया।
" राजेश, जरा आओ तो ।”
- "क्या बात है ?"
-"एक्सीडेंट है एक, बिल्कुल अजीब-सा एक्सीडेंट ।” राजेश उठे। उनकी कार के आगे लगभग दस कारें खड़ी थीं । उसके बाद...... उसके बाद था एक ट्रक और ट्रक के पिछले पहियों में दबा हुआ था एक नवयुवक।
   वहाँ उपस्थित सब इंस्पेक्टर चतरसेन का मानना था की यह एक दुर्घटना है। लेकिन परिस्थितियों का विश्लेषण करने के पश्चात राजेश ने घोषणा की कि यह महज एक दुर्घटना नहीं बल्कि सोच- समझकर किया गया कत्ल है।
   चतुर चतुरसेन ने राजेश से अनुरोध न किया की वह इस मामले में उसकी मदद करे। वहीं बाद में केन्द्रीय खूफिया विभाग ने भी राजेश को इस केस पर नियुक्त कर दिया था।
    मृतक का नाम प्रमोद कुमार था और वह 'विश्राम लोक क्लब, नई दिल्ली' में असिस्टेंट मैनेजर था। राजेश- जयंत और सब इंस्पेक्टर की जाँच का केन्द्र अब विश्राम क्लब था। क्लब प्रमोद कुमार की शोक सभा में ही जब राजेश ने यह घोषणा की कि कातिल इस क्लब में ही उपस्थित है तो एक बार वहां सन्नाटा छा गया।
    क्लब के अवैतनिक मैनेजर रंगबिहारी लाल और मालकिन मोहिनी देवी नहीं चाहते थे की क्लब की बदनामी हो। लेकिन उनके चाहने न चाहने से कुछ नहीं होने वाला था।
   राजेश की जाँच अभी चल ही रही थी कि क्लब में हत्या हो गयी। इस बार हत्यारे ने क्लब के सदस्य को क्लब में ही मार दिया, हंगामा तो होना ही था।
और राजेश ने यह प्रण किया की वह शीघ्र असली अपराधी तक पहुंच जायेगा।
राजेश तनिक मुस्कराए— “ आप बिल्कुल बजा फरमाते हैं. मिर्जा साहब, सवाल सिर्फ हत्यारे की खोज का नहीं है। सवाल यह है कि शमा ने खुद जलकर कितने परवाने जला दिए ? मुझे इसका हिसाब जानना है और यकीन कीजिए मिर्जा साहब ! हिसाब जानकर ही रहूंगा।
     और एक हंगामें के चलते राजेश भी अपराधियों की गिरफ्त में आ गया। और यही अपराधियों के लिए खतरनाक साबित हुआ।
    उपन्यास मर्डर मिस्ट्री कथा पर आधारित है। उपन्यास में‌ कुल तीन हत्याएं होती हैं।
उपन्यास का जो सशक्त पक्ष है वह है जासूस राजेश। शर्मा जी द्वारा रचित पात्रों में राजेश सबसे अलग है। अन्य जासूस साथी भी राजेश का अत्यंत सम्मान करते हैं।
राजेश का नैतिक पक्ष अत्यंत मजबूत है। वह अपराधी के साथ भी क्रूरता नहीं करता।
   राजेश का प्रमोद की पत्नी को बहन कहकर संबोधित करना, उस के साथ यह वायदा करना की प्रमोद से संबंधित कोई भी अनुचित बात जनता नहीं पहुंचेगी।
   राजेश एक जासूस है और जासूस अपने बुद्धिबल से कार्य करता है। राजेश की जो कार्यशैली वह इसलिए भी प्रभावित करती है की वह एक संदिग्ध व्यक्ति को पकड़कर शेष अपराधियों तक अपने चातुर्य और बुद्धि से पहुंचता है।
   उपन्यास के अंत में राजेश और प्रमोद की पत्नी रत्ना का संवाद अत्यंत प्रभावशाली है।‌ (पृष्ठ संख्या 105)
विशेष कथन-
धरती का आकर्षण, जो भी आवारा घुमक्कड़ तारा धरती की आकर्षण परीक्षा में आ जाता है, बिना जले रहता नहीं । जलता है और फिर राख होकर धरती के अंक में समा जाता है ।
- कौन जान सकता है, पुरुष के भाग्य को और स्त्री के चरित्र को ?
    जनप्रिय ओमप्रकाश शर्मा जी द्वारा लिखित 'क्लब में हत्या' एक मर्डर मिस्ट्री रचना होने के साथ-साथ एक सामाजिक संदेश भी है। हत्या क्यों होती है? इसका कारण जो प्रत्यक्ष होता है, आवश्यक नहीं की वही हो, अप्रत्यक्ष कारण भी बहुत होते हैं।
एक पठनीय मार्मिक मर्डर मिस्ट्री है।

उपन्यास-  क्लब में हत्या
लेखक-    ओमप्रकाश शर्मा- जनप्रिय लेखक
प्रकाशक-   मारुति प्रकाशन, मेरठ
पृष्ठ-         110
क्लब में हत्या - ओमप्रकाश शर्मा novel

Monday, 12 October 2020

390. भूतनाथ की संसार यात्रा- ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय

भूतनाथ प्रेमिका की तलाश में...
भूतनाथ की संसार यात्रा- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा
आप भूतनाथ को जानते है?
  वही भूतनाथ जिसने उपन्यास साहित्य में अप्रतिम प्रसिद्धि प्राप्त की है। प्रसिद्ध उपन्यासकार देवकीनंदन खत्री जी का एक पात्र है-भूतनाथ। जिसके कारनामें 'चन्द्रकांता संतति' और 'भूतनाथ' जैसे चर्चित उपन्यासों में मिलते हैं। भूतनाथ एक ऐयार(जासूस) है। यह सब तो देवकीनंदन खत्री जी के उपन्यासों में है। हम यहाँ चर्चा कर रहे हैं जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी के पात्र भूतनाथ की।
    ध्यान रहे यह पात्र देवकीनंदन खत्री जी का ही है जिसे आगे जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी ने अपने विशेष ढंग से आगे बढाया है। खत्री जी के उपन्यासों में जहाँ भूतनाथ एक ऐयार है वहीं ओमप्रकाश शर्मा जी के उपन्यासों में भूतनाथ एक भूत है।
      यह ओमप्रकाश शर्मा जी की प्रतिभा है की उन्होंने कोई हाॅरर पात्र न बना कर भी मृत्यु भूतनाथ को एक हास्य व्यंग्य के रूप में 'भूतनाथ की संसार यात्रा' उपन्यास में प्रस्तुत किया है।
       'भूतनाथ की संसार यात्रा' में भूतनाथ और जासूस राजेश की जोड़ी को प्रस्तुत किया गया है।
अब चर्चा करते हैं प्रस्तुत उपन्यास की।
राजेश को भूतनाथ का निमंत्रण मिला तो राजेश भी उनके साथ जाने को तैयार हो गया।
जाना ही होगा।
जीवन का यह संयोग भी देखना होगा।
भूतनाथ के साथ संसार यात्रा। (पृष्ठ-07)

Sunday, 5 July 2020

347. पेशावर एक्सप्रेस- ओमप्रकाश शर्मा

एक थ्रिलर प्रेम कथा- अफगानिस्तान से पाकिस्तान
पेशावर एक्सप्रेस- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा

जगत सीरीज       जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी का कोई उपन्यास लंबे समय पश्चात पढा। डायमण्ड पॉकेट बुक्स से प्रकाशित उपन्यास 'पेशावर एक्सप्रेस' जगत सीरिज का एक 'थ्रिलर प्रेम कथानक' है।
       उपन्यास का कथानक प्रेम पर आधारित होने के साथ-साथ इसमें रोमांच का अदभुत मिश्रण भी है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के तात्कालिक हालात का अच्छा चित्रण भी उपस्थित है। 

       कहानी है एक अफगान नौजवान की जो प्रेम के चलते पाकिस्तान में कैद हो जाता है। पाकिस्तान में 'मार्शल ला'( आपातकाल) है, अत्याचार है, भ्रष्टाचार है, बिना अपराध गोली मार दी जाती है। पाकिस्तान अफगानिस्तान को अपना दुश्मन मानता है और दुश्मन देश का एक लड़का उनकी कैद में है। वह प्रेम का पुजारी दुश्मन देश में जासूस साबित कर जेल में डाल दिया जाता है और जगत को इसी प्रेम कैदी को आजाद करवाना है और पाकिस्तान से बाहर निकालना है लेकिन प्रेम कैदी पाकिस्तान से बाहर निकलने को तैयार नहीं।

Thursday, 31 October 2019

243. खतरे की घण्टी- ओमप्रकाश शर्मा

सावधान...बज रही है खतरे की घण्टी
खतरे की घण्टी- ओमप्रकाश शर्मा, जासूसी उपन्यास

242. किले की रानी- ओमप्रकाश शर्मा

वह खुशबू से गुलाम बनाती थी।
किले की रानी- ओमप्रकाश शर्मा

राजस्थान में, किंतु राजस्थान के प्रतीक रेगिस्तान से दूर सुंदर सुरम्य भूतपूर्व रियासत कांटिया के बारे में आपने अवश्य सुना होगा। उसी की तब की राजधानी और अब का रौनकदार शहर रूपपुर...। (पृष्ठ-06)
      तो यह कहानी है रूपपुर की। रूपपुर के किले की और किले की रानी की। रूपपुर रियासत के दो वारिस बचे हैं। बड़ा भाई सूरज सिंह और छोटा भाई चन्द्र सिंह।
दोनों राजकुमारों की माताएं अलग-अलग थी।....... इसके बावजूद दोनों भाईयों में खूब स्नेह था। (पृष्ठ-06)
सूरज सिंह की पत्नी का नाम है माधवी।
एक थी माधवी। सूरज सिंह की पत्नी। किले की रानी।
www.sahityadesh.blogspot.in
किले की रानी- ओमप्रकाश शर्मा
बहुत ही सुंदर। चेहरे पर सौम्य भाव। आँखें मादक। परंतु कुल मिलाकर एक सभ्य और सुशील महिला का सा चित्र।
- यह इतनी शांत और इतनी सौम्य, इतनी सहज है कि कल्पना भी नहीं की जा सकती कि यह जादूगरनी हो सकती है।
जादूगरनी?
"हां...जादूगरनी ही तो। या जो शब्द आप इसके लिए प्रयोग करना चाहें। जिसकी मधुर सुवास से पुरूष इसके संसर्ग में आता है और धीरे मर जाता है।"
(पृष्ठ-17)
      यह कहानी मुख्यतः इन तीन पात्रों पर आधारित है लेकिन कुछ गौण पात्र जो की महत्वपूर्ण भूमिका में भी हैं उपन्यास के विकास में सहायक हैं।
      सभी एक दूसरे पर संदेश करते नजर आते हैं। चन्द्र सिंह का तो कहना है की माधवी से एक अजीब सी खुशबू आती है और वह गुलाम बना लेती है। जैसे माधवी ने मुझे वशीकृत कर रखा हो। मैं उसके सम्मोहन से केवल प्रातः दो घण्टे के लिए तब मुक्ति पाता हूँ जबकि वह स्नान आदि के लिए जाती है। (पृष्ठ-25)
     महल के अंदर कुछ षड्यंत्र रचे जाते हैं। कारण है धन। चन्द्र सिंह चमनगढ के खुफिया विभाग के चीफ गोपाली को इस रहस्य से पर्दा हटाने के लिए याद करता है। दूसरी तरफ एक मिशन के तहत जगन और बंदूक सिंह भी यहाँ पहुँच जाते हैं।
     उपन्यास मुख्यतः गोपाली सीरिज का ही है, फिर भी जगन और बंदूक सिंह सहायक के रूप में आते हैं यहाँ तक तो ठीक है लेकिन उपन्यास के अंत में जगत का अनावश्यक प्रवेश उपन्यास के पृष्ठ बढाने के अतिरिक्त कहीं तर्कसंगत नजर नहीं आता।
जगन और बंदूक सिंह प्रेमिकाएं मीनू और रीनू भी उपन्यास में बेमतलब की हैं और उनके साथ लंबे-लबे दृश्य भी बेमतलब के हैं।
उपन्यास की कहानी अच्छी है लेकिन अनावश्यक विस्तार और पात्र कहानी को खत्म करते नजर आते हैं।

उपन्यास में एक जगह बंदूक सिंह का हल्का सा परिचय दिया गया है। प्रान्तीय खुफिया विभाग का जासूस बंदूक सिंह सुपुत्र खंजर सिंह। (पृष्ठ-76)

राजतंत्र खत्म हो गया पर राजघराने अब भी कायम थे। यह उपन्यास ऐसे ही राजघराने की कहानी है। जहां दौलत के लिए षड्यंत्र रचे जाते हैं और परिवार के सदस्यों को मौत के घाट उतार दिया जाता है।
      धन और परिवार पर आधारित यह उपन्यास मध्य स्तर का कहा जा सकता है। कहीं-कहीं उपन्यास में बेवजह के संवाद और लंबे दृश्य उपन्यास को उबाऊ बनाते हैं। उपन्यास में कुछ पात्र भी बेवजह के हैं।
कहानी के तौर पर उपन्यास को एक बार पढा जा सकता है।
उपन्यास- किले की रानी
लेखक- ओमप्रकाश शर्मा
प्रकाशक- जनप्रिय लेखक कार्यालय, मेरठ
संपादक, प्रकाशक- महेन्द्र कुमार शर्मा

मूल्य- -5 ₹ (तात्कालिक)

उपन्यास का एक पृष्ठ

241. सुहाग की साँझ- ओमप्रकाश शर्मा

प्यार और नफरत की मार्मिक रचना। 
सुहाग की सांझ- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा।
   
       
www.svnlibrary.blogspot.in

मैंने ओमप्रकाश शर्मा जी के अधिकांश जासूसी उपन्यास पढे हैं। लेकिन अब निरंतर दो सामाजिक उपन्यास पढकर उनको और भी गहराई जा जाना है, हालांकि यह जानना अभी भी अधूरा ही है। लेकिन इतना अवश्य पता चला है की सामाजिक उपन्यासों के क्षेत्र में ऐसी मार्मिक रचनाएं कम ही देखने को मिलती हैं।
       'सांझ का सूरज' प्यार और प्यार में उपजी नफरत की एक ऐसी कहानी है जो आदि से अंत तक सम्मोहित सी करती चली जाती है।
       कहानी में कहीं समय का वर्णन तो नहीं मिलता फिर भी कहीं कहीं हल्का सा आभास है की कहानी सन् 1950-70 के मध्य की है।

भुटान की सीमा से लगे तेजपुर से लेकर असम की उत्तरी सीमा कमेंग तक सड़क बनाने का काम कहा जाता है की ग्यारह वर्षों से चल रहा है। (पृष्ठ- प्रथम)
       ये कहानी यहीं की है, सड़क विभाग के कार्मिक सहायक इंजिनियर सुरेश की है। आयु तीस वर्ष, रंग गोरा...आयु के अनुसार कुछ दुबला सा दिखाई देने वाला। कर्मठ और मितभाषी। (पृष्ठ-तृतीय)
      एक है बेला। जिसके जीवन में दुख के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। सामाजिक बंधन और प्रेम के बीच में वह भटक सी जाती है। वह स्वयं को एक असफलत नारी मानती है। - असफल स्त्री का प्रतीक किसी को देखना हो तो मुझे देखे। प्रेमी, पति और पिता के प्रति मैं वफादार रहना चाहती थी और किसी के प्रति भी नहीं रह पायी। (पृष्ठ---)
       दोनों के साथ अगर कुछ समान है तो वह है उनका दुर्भाग्य। जो दोनों को आखिर एक जगह एकत्र कर देता है। - दुर्भाग्य से बचने के लिए चाहे कितना तेज दौड़े परंतु वह सदा चार कदम आगे दौड़ता है। (पृष्ठ---)
        उपन्यास में कुछ और भी पात्र हैं और उनकी संक्षिप्त कहानियाँ वर्णित है‌। हर आदमी का अपना-अपना दुख है। कोई उस दुख से भागना चाहता है तो कोई उसके साथ जीवन बिताना चाहता है। लछिया जहां दुख से भागना चाहती है वहीं चर्च के फादर उस दुख के साथ जीना चाहते हैं।
        वहीं जीवनराम एक ऐसा पात्र है जो किसी के सुख दुख में स्वयं को समाहित कर लेता है।

'सुहाग की साँझ' उपन्यास एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो अपने सामाजिक जिम्मेदारी और प्रेम के बीच में अटक गयी है। उसका दिल कहीं है और शरीर कहीं है। प्रेम और त्याग के मध्य उसका असमंजस उपन्यास में चित्रित है। उपन्यास का अंत करुणापूर्ण है।
लोकप्रिय उपन्यास साहित्य की अनमोल धरोहर है यह उपन्यास।
रोचक, पठनीय और संग्रहणीय।

उपन्यास- सुहाग की साँझ
लेखक-  ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय लेखक
प्रकाशक- जनप्रिय पब्लिकेशन
पृष्ठ- -      95

240. साँझ हुई घर आए- ओमप्रकाश शर्मा

प्यार और त्याग की मार्मिक कहानी।
सांझ हुई घर आए- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा।

ओमप्रकाश शर्मा जी को जनप्रिय लेखक क्यों कहा जाता है? यह सहज सा प्रश्न पाठकों के मन में उठता होगा। जनप्रिय वह होता है जिसे जनता प्यार करती है। अब ओमप्रकाश शर्मा जी के नाम के साथ 'जनप्रिय लेखक' शब्द कैसे लगा यह अलग विषय हो सकता है, लेकिन इनका उपन्यास 'सांझ हुई घर आए' पढकर यह महसूस हुआ की ओमप्रकाश शर्मा जी वास्तव में जनप्रिय लेखक शब्द के हकदार हैं।
        'सांझ हुई घर आए' लोकप्रिय उपन्यास साहित्य का एकमात्र ऐसा उपन्यास है जो किसी राज्य स्तर या सरकारी स्तर पर पुरस्कृत हुआ हो। प्रस्तुत उपन्यास उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत है।
       प्रेम और त्याग को आधार बना कर लिखा गया उपन्यास पाठक के मन को अंदर तक झंकृत कर देता है। जहां प्रेम है वहाँ नाराजगी भी है। अपनापन भी है तो गुस्सा भी है। इन बातों को आधार बनाकर लिखा गया यह उपन्यास एक अमूल्य रचना बनकर उभरा है।
       अशोक एक सीधा-सादा लड़का है जो अपनी बहन बेला के साथ रहता है। अशोक की सहपाठी हेमा इन दोनों की मित्र है।
      अशोक जहां शांत स्वभाव का है वहीं हेमा हर बात पर तंज कसने वाली लड़की है। इस बात पर अक्सर दोनों में अनबन रहती है, लेकिन इन दोनों के बीच अशोक की बहन बेला भी है जो दोनों को पुनः मिला देती है।
      अशोक अंतर्मुखी है। हेमा के कहे कुछ शब्द उसकी जिंदगी को विरान कर देते हैं। अशोक गुस्से और नफरत में कुछ ऐसे कृत्य कर बैठता है जो उसके जीवन के न खत्म होने वाले जख्म बन जाते हैं। अब उसे इंतजार है तो मौत का। मैं एक बदकिस्मत इन्सान हूँ। बस, खामोश मौत का इंतजार कर रहा हूँ। (पृष्ठ-79)
      जिंदगी हेमा की भी आसान नहीं है। कुछ गलतफहमियां और परिस्थितियाँ उसे एक नये मोड़ पर ले जाती हैं लेकिन जो उसके जीवन में घटित हो गया वह भूल नहीं पाती। "दुनिया में सबसे दुखदाई बात यह है कि जो हो गया वह भूलाया नहीं जा सकता।"(पृष्ठ-107)
         अशोक, हेमा, बेला, विश्वनाथ और संतोष आदि के जीवन के इर्दगिर्द घूमती यह रचना सहृदय पाठक की भावनाओं छूने में सक्षम है।
       कम शब्दों में और उपन्यास के पात्र संतोष के शब्दों में उपन्यास का सार देख लीजिएगा- दुखी... जीवन में धन, व्यापार सभी कुछ विष के समान लगता है और फिर केवल बरबादी रह जाती है। (पृष्ठ-129)

        प्रेम, त्याग और आपसी मनमुटाव पर आधारित यह उपन्यास आँखें नम कर देने वाला एक मार्मिक उपन्यास है। 
सामाजिक उपन्यास प्रेमियों के लिए यह एक बहुत अच्छी रचना है। एक बार पढकर कुछ अलग आनंद लीजिएगा।
         'साँझ हुई घर आए' जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी का एक यादगार उपन्यास है। उपन्यास प्रेमियों के लिए अनमोल रचना। 
पठनीय और संग्रहणीय।

उपन्यास- सांझ हुई घर आए
लेखक-    ओमप्रकाश शर्मा
प्रकाशक- जनप्रिय पब्लिकेशन
पृष्ठ- -      176



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239. तूफान फिर आया-भाग-02 ओमप्रकाश शर्मा

महमूद ग़ज़नवी का सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण
तूफान फिर आया-  ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय लेखक
जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी द्वारा लिखा गया एक बहुत ही अच्छा उपन्यास पढने को मिला। उपन्यास का की कथा ऐतिहासिक है, जिसे शर्मा जी ने अपनी कल्पना के रंग भर के उसे जीवंत रूप दे दिया है। लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में यह उपन्यास मील का पत्थर है। महमूद गजनवी का भारत पर आक्रमण और फिर सोमनाथ मंदिर की लूट यह इतिहास लिखित है।
      महमूद ग़ज़नवी अफ़ग़ानिस्तान के गज़नी राज्य का राजा था जिसने धन की चाह में भारत पर 17 बार हमले किए, सन 1024 ईसवी में उसने लगभग 5 हज़ार साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया, उस समय लगभग 25 हजा़र (यह संख्या कम ज्यादा हो सकती है) लोग मंदिर में पूजा करने आए हुए थे।
तूफान फिर आया- ओमप्रकाश शर्मा
जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश जी द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास 'तूफान फिर आया' गजनवी के सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण से संबंधित है। यह उपन्यास 'गजनी का सुल्तान' का द्वितीय भाग है।
      सौराष्ट्र में राजाओं को पता चला की इस बार म्लेच्छ गजनवी पवित्र सोमनाथ की अपार सम्पदा लूटने आ रहा है। - अबकी बार तूफान आया है सौराष्ट्र में। म्लेच्छ ने लक्ष्य बनाया है देवाधिदेव सोमनाथ को।"(पृष्ठ-145) तो उन्होंने गजनवी के विरुद्ध मोर्चा तैयार किया।
        यह एक सत्य है की राजपूत मरने से नहीं डरता। उनके लिए युद्ध एक खेल की तरह है। लेकिन गजनवी जैसे लुटेरे के लिए युद्ध कूटनीति का काम है, बहादुरी का नहीं। भारतीय राजाओं के लिए यह युद्ध धर्मयुद्ध था, सोमनाथ को बचाना उनका कर्तव्य था। लेकिन महामंत्री जानते थे की युद्ध केवल युद्ध होता है और यही बात उन्होंने राजा और रानी को समझायी।
"महामंत्री, महाराज यहाँ धर्मयुद्ध करने आए हैं।"
"मैं आपकी भावनाओं का आदर करता हूँ महारानी....परंतु युद्ध केवल युद्ध होता है धर्मयुद्ध नहीं।"
(पृष्ठ-191)
       क्योंकि गजनवी एक लूटेरा है। वह एक हिंसक पशु है और पशु धर्मयुद्ध नहीं जानते। मंत्री मेहता ने कहा - "हम भारतीयों को इतना सभ्य नहीं बनना चाहिए था। जितना कि हम सब बन गए हैं। राजाओं की यही भूल रही कि उन्होंने प्रजा को यह नहीं बताया कि पशु से निपटने के लिए पशु बन जाना चाहिए....।" (पृष्ठ-146,47)
       उपन्यास में एक पात्र है अनहिलवाड़ का दुर्गपाल नामदेव। एक युद्धा है जो सुलतान को टक्कर देता है। नामदेव के कथन राजपूतों का प्रतिनिधित्व करते नजर आते हैं। "भूलते हो सुलतान! पत्थर मोम नहीं हुआ करते। पत्थर झुकते भी नहीं हैं। पत्थर सिर्फ टूटते हैं। पत्थर सिर्फ टूटना जानते हैं।" (पृष्ठ-180))
         उपन्यास का प्रमुख पात्र है गुप्तचर कमल। यह एक काल्पनिक पात्र है लेकिन यह यथार्थ के बहुत नजदीक है। जहां राजा युद्ध को धर्मयुद्ध कह कर लड़ते वहीं कमल का मानना है की युद्ध में कूटनीति आवश्यक है। वह युद्ध अंत नहीं चाहता वह तो गजनवी का अंत चाहता है ताकी भविष्य में गजनवी का तूफान फिर न आये।
"कौन अंत कर सकता है?"
"जब तक जियूंगा मैं यह प्रयत्न जारी रखूँगा।"
(पृष्ठ-186)
यही कमल अंत तक गजनवी को जिस तरह से मात देता नजर आता है वह उसकी बहादरी और बुद्धि का कमाल है। कमल का चातुर्य प्रशंसा के योग्य है। वह चाहे साधू कमलानंद के रूप, किले के पहरेदार के रूप में या छद्म युद्ध में। कमल एक गुप्तचर है और उसका व्यवहार उसी के अनुरूप है, वही उसकी ताकत है।
         सत्य घटना पर वह भी ऐतिहासिक घटना पर उपन्यास लिखना बहुत मुश्किल कार्य है। क्योंकि उपन्यास का समापन किस तरीके से किया जाये की घटना सत्य भी रहे और पाठक भी संतुष्ट हो। क्लाइमैक्स किसी भी उपन्यास का महत्वपूर्ण होता है। प्रस्तुत उपन्यास का समापन इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है की पाठक को एक आत्मसंतुष्टि प्राप्त होती है वह भी सत्य के साथ कोई खिलवाड़ न करके।
       उपन्यास काल्पनिक है, ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है, पर तथ्यों को कहीं गलत नहीं दिखाया गया। ऐतिहासिक  विषयों पर लिखा गया इतना रोचक उपन्यास मैंने इस सेे पहले नहीं पढा।  शर्मा जी को इस कार्य के लिए धन्यवाद।

       लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में ऐतिहासिक विषयों पर लिखित उपन्यास नाममात्र के ही हैं। शर्मा जी इस विषय पर लिख कर लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में ऐतिहासिक अध्याय पृष्ठों में जो श्रीवृद्धि की है वह अविस्मरणीय है।
        जहाँ इतिहास मात्र तथ्यों का संग्रह होता है वही उपन्यास इतिहास और कल्पना का वह मिश्रित होता है नीरस कथा में भी सरसता पैदा कर देता है। इस दृष्टि से प्रस्तुत उपन्यास खरा उतरता है। ऐतिहासिक और युद्धों का विवरण होते हुए भी उपन्यास में जो मानवीय दृष्टि दिखाई गयी है वह लेखक की प्रतिमा का परिणाम है।
‌ ‌उपन्यास मात्र पठनीय ही नहीं संग्रहणीय भी है।

उपन्यास- तूफान फिर आया
लेखक-   ओमप्रकाश शर्मा
प्रकाशक- पुष्पी पॉकेट इलाहाबाद


गजनी का सुलतान- ओमप्रकाश शर्मा  प्रथम भाग समीक्षा

238. गजनी का सुल्तान भाग-01- ओमप्रकाश शर्मा

गुप्तचर कमल का कारनामा
गजनी का सुल्तान- ओमप्रकाश शर्मा

भारत भूमि हमेशा ऐश्वर्यशाली रही है, वह चाहे धन-धान्य के रूप में हो या वीरों के रूप में। इस पावन धरा पर धन भी है तो वीर भी जन्म लेते हैं।
      जहां अच्छाई होती है वहां बुराई भी आ जाती है।‌भारतभूमि की अपार सम्पदा पर विदेश शासकों की हमेशा से कुदृष्टि रही है। भारत पर सर्वाधिक आक्रमण पश्चिम से होते। जिनमें गजनी के शासकों द्वारा भारत पर किये गये क्रुर आक्रमण भी हैं।
      ओमप्रकाश शर्मा जी द्वारा लिखित उपन्यास 'गजनी का सुलतान' और इसका द्वितीय भाग 'तूफान फिर आया' भारतीय वीरों की वीरता और महमूद गजनी की क्रूरता का चित्रण करते हैं।
      महमूद गजनवी की क्रूरता का चित्रण करते हुए लेखक ने लिखा है।  यह प्रलयवान आँधी जिस दिशा की ओर रुख करती गांव राख हो जाते, नगरों के वैभव नष्ट हो जाते। जो मनुष्य उस आँधी की भेंट चढ़ते उनकी लाशें गिद्धों का भोजन बनती, जो इस आंधी की लपेट में आ जाते वे दूर काकेशश तक जाकर गुलामों ले बाजार में बिकते, और जो दुर्भाग्यशाली यह दोनों गति न पाकर किसी प्रकार भाग निकलते वो निराश्रित होकर चाकरी करते, भीख माँगते और युवा स्त्रियाँ भूख न सह पाने के कारण वेश्याएं बन जाती। (पृष्ठ-03)

महमूद गजनवी ने भारत पर लगभग 17 बार आक्रमण किया था। वह भारत की अपार संपदा लूट कर ले गया। यह कहानी गजनवी के सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण से कुछ पूर्व की है।
जब महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण और सोमनाथ मंदिर की लूट का विचार बनाया तो कुछ भारतीय राजा उसका साथ देने को तैयार हो गये। ऐसे ही एक राजा का राजदूत गजनी में जाकर महमूद गजनवी से मिला।
     अब लगभग तय हो गया की गजनवी का भारत पर और वह भी सौराष्ट्र पर आक्रमण होगा तो राजपुताना, सिन्ध यहाँ तक की सौराष्ट्र तक के राजा इस विशाल आँधी से चिंतित रहते थे।(पृष्ठ-03)

     वहीं दूसरी तरफ सुरक्षा का भार भीमदेव के जिम्मे था। इस प्रलयकारी आँधी के झोंके राजपूताने और उसके विशाल रेगिस्तान को स्पर्श करके सौराष्ट्र की और न बढें संयोग से इसका दायित्व सौंपा था पाटणपति भीमदेव को। अनहिलवाड़ पाटण की गद्दी पर अब भीमदेव विराजते थे। (पृष्ठ...)
अनहिलवाड का श्रेष्ठ गुप्तचर कमल गजनी सत्य का पता लगाने जाता है। उपन्यास का अधिकांश भाग कमल के गजनी प्रवास पर ही आधारित है।
       लेखक महोदय ने कमल के गजनी आवागमन और प्रवास का जो चित्र उकेरा है वह जीवंत लगता है।
         इस कथा के साथ -साथ गजनी में साहित्यकार फिरदौसी का भी अच्छा वर्णन मिलता है। उपन्यास में फिरदौस और महमूद का जो वर्णन है वह एक सत्य घटना है।
        उपन्यास मुख्यतः कमल पर आधारित है जो अपने बुद्धिबल पर क्रूर सुल्तान के राज्य गजनी में रहकर किस तरह अपने गुप्तचर दायित्व का निर्वाह करता है। एक-एक शब्द और घटना का जिस तरह से उपन्यास में वर्णन किया गया है वह एक काल्पनिक कथा न होकर एक ऐतिहासिक रचना नजर आती है।
       मेरी दृष्टि में जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी की यह एक अनमोल रचना है। जो कल्पना और सत्य के मिश्रित एक यादगार रचना है।

        प्रस्तुत उपन्यास ओमप्रकाश शर्मा जी द्वारा लिखा गया एक अदभुत उपन्यास है। लोकप्रिय साहित्य के पाठक के लिए एक दुर्लभ मोती की तरह है।
गजनी का सुल्तान- ओमप्रकाश शर्मा
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उपन्यास- गजनी का सुल्तान
लेखक-   ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय लेखक
प्रकाशक- पुष्पी पॉकेट बुक्स, इलाहाबाद



Saturday, 26 October 2019

237. शहजादी गुलबदन- ओमप्रकाश शर्मा

प्रेम और राजनीति पर आधारित एक रोमांचक कहानी
शहजादी गुलबदन- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा

"शेखू बादशाहत चाहता है बीरबल...!"- सम्राट का स्वर बुझा सा था।
" जिद्दी बच्चा कुछ भी चाह सकता है....।"
"पर देना क्या चाहिए?"
"सबक ! सीख!!"
"लेकिन बेटा!" राजमाता के मातृत्व ने रोक लगायी-"खून-खराबा न हो बीरबल। मेरे शेखू को कुछ न हो जाये...।"

विद्यालय से दीपावली का अवकाश (20.10.2019- 03.11.2019) था। मेरे पास जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी के कुछ उपन्यास उपलब्ध थे। सोचा क्यों न शर्मा जी के उपलब्ध सभी उपन्यास पढ लिए जायें। तो एक के बाद उपन्यास पढता चला गया। हालांकि अधिकांश उपन्यास समय की बर्बादी साबित हुए। लेकिन प्रस्तुत उपन्यास ने बर्बाद समय के रोष को भूला दिया। हालांकि ओमप्रकाश शर्मा जी को पढने का यह क्रम जारी रहेगा, तब तक, जब तक मेरे पास उनके उपन्यास हैं।
        प्रस्तुत 'शहजादी गुलबदन' ऐतिहासिकता का आभास देते हुए भी एक काल्पनिक प्रेम कथा पर आधारित रोचक कथानक है।

Thursday, 24 October 2019

236. पत्रकार की हत्या- ओमप्रकाश शर्मा

तलाश एक हत्यारे की।
पत्रकार की हत्या- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा 
जगत, जगन और बंदूक सिंह का कारनामा।
पत्रकार की हत्या नामक उपन्यास जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी द्वारा लिखा गया एक मर्डर मिस्ट्री कथानक है।
एक पत्रकार की हत्या और स्थानीय पुलिस की नाकामी के पश्चात खुफिया विभाग के तीन जासूसों द्वारा मामले की पुन: खोजबीन।
बात तो जनपद के शहर सुमेरपुर की है, परंतु इसकी गूंज प्रांत की विधान सभा तक पहुंच गई।
बात ही कुछ ऐसी थी।
सुमेरपुर जिले तक सीमित दैनिक पत्र था- आज का समाचार।................
........…..सचमुच ही वह आम जनता का अखबार था और किसानों, मजदूरों तथा दलित वर्ग के प्रति समर्पित था। 

Tuesday, 22 October 2019

225. सुल्तान नादिर खाँ- ओमप्रकाश शर्मा

औरतों के व्यापारी।
सुल्तान नादिर खाँ- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा

सुंदरता कभी-कभी अभिशाप बन जाती है।
और यासमीन के लिए तो सुंदरता अभिशाप बन ही गई थी। यह चीनी युवती कुछ वर्ष पहले शंघाई की सुंदरी कहलाती थी।

           जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी का उपन्यास 'सुलतान नादिर खाँ' पढा। प्रथम दृष्टि में यह कोई ऐतिहासिक उपन्यास नजर आता है लेकिन यह न तो ऐतिहासिक उपन्यास है और न ही ऐतिहासिक पात्र है। यह पूर्णतः एक काल्पनिक और मनोरंजन की दृष्टि से लिखा गया रोचक उपन्यास है।


        यह कहानी है यासमीन नामक एक स्त्री की। जो अति सुंदर है और यही सुंदरता उसके लिए अभिशाप बन जाती है। शंघाई की यासमीन कुछ षडयंत्रों से बच कर चीन छोड़कर भारत आती है। यहाँ वह जासूस राजेश और जगत से टकराती है। अजीब थी वह सुंदरी। पहले राजेश की प्रतिद्वंदी थी और फिर राजेश से प्रणय निवेदन कर बैठी।* (पृष्ठ-04)
लेकिन यासमीन का दुर्भाग्य यहा भी उसका पीछा नहीं छोड़ता। रजतपुरी में से कुछ अनजान लोगों ने उसे अपहृत करके अचेत अवस्था में यान पर चढा दिया....(पृष्ठ-04)

एक था कासिम।
"तो तुम हो कासिम।"
"कोई ऐतराज?"
"औरतों के व्यापारी..... शैतान। सुना है भले घर की औरतें तुम्हारे डर से बाहर नहीं निकलती?"
(पृष्ठ-06)
कासिम स्वयं जे बारे में भी यही कहता है-
पहले में औरतों से घृणा करता था फिर औरतों का व्यापार करने लगा। (पृष्ठ-28)

Monday, 25 June 2018

122. जगत और चंपा डकैत- ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय लेखक

चंपा नामक डकैत की कहानी ?
जगत और चम्पा डकैत- ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय लेखक, जासूसी उपन्यास, अपठनीय।
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     जासूस जगत को एक काम मिला। दिल्ली से एक कार मुंबई गोपाली के पास पहुंचाने का। यह भी एक संयोग था की दिल्ली की एक पत्रकार किरण भी मुंबई जा रही थी।
"अगर आप पसंद करें तो मैं साथ चलूं?"
"नहीं बिलकुल पसंद नहीं करुंगा।"
"क्यों?"
......
"......नंबर एक तो मेरे पांवों में चक्कर है, नंबर दो हर सफर में मेरे साथ कुछ न कुछ गड़बड़ हो जाती है।" (पृष्ठ-15)
      और अनंतः दोनों एक साथ मुंबई को चल दिये।
            और गड़बड़ हुयी, रास्ते में हुयी।  रास्ते में एक शहर था सरूरपुर।
तीसरा पहर था, सामने बोर्ड लगा था- सरूरपुर नगरपालिका आपका स्वागत करती है। कोई साधारण सा शहर। (पृष्ठ-28)
         क्या हुआ उस शहर में। गड़बड़ हो गयी और जगत का सफर यहाँ से एक नयी दिशा को हो गया।
       शहर के इस तरफ सात किलोमीटर पर सरूरपुर किले और महल के खण्डहर हैं, तकरीबन दो सौ साल पुराने। अब वो जगह अजीब ही है, पहले वहाँ हुआ करता था बल्लू काने का चोर दल। इसी नगर में गांव से ब्याही आयी चम्पा। यूं तो उसका घरेलु नाम कल्लो है। अब वहां कल्लो अर्थात् चम्पा का डकैत गिरोह रहता है.........इस बार उसने रिश्ते में अपनी जेठानी का चार बरस का लङका उठवा लिया है, और एक लाख फिरौती की मांग की है। (पृष्ठ-29)
                 सरुरपुर पहुंचे जगत को जब इस घटना का पता चला तो उसने चम्पा डकैत से उस बच्चे को छुड़वा लेने का वायदा किया। यहाँ पर लगा की अवश्य ही चम्पा और जगत की लङाई होगी और उपन्यास कुछ रोचक बनेगा लेकिन जगत ने एक छोटी सी चालाकी से चम्पा को मूर्ख बना कर बच्चे को आजाद करवा लिया और स्वयं चम्पा को भी अपने साथ ग्वालियर ले चला।
             तब लगा की कहानी में कुछ रोचक मोङ आयेगा। मोङ तो अवश्य आता वह न तो रोचक था और न ही कहानी से संबंधित। ग्वालियर के रास्ते में‌ शिवपुरी में जगत को जासूस जगन और बंदूक सिंह मिल गये और  शेष कथा यही पर सिमट गयी।
     ‌‌‌‌शिवपुरी में अजब सिंह नाम का एक बहुत बङा स्मगलर है। जगन और बंदूक सिंह उसी को पकङने के लिए यहाँ उपस्थित हैं। ‌अपने  जासूस महोदय भी मुंबई और चम्पा डकैत को भूल कर अजब सिंह के अजीब से चक्कर में‌ फंस कर उपन्यास की कहानी को ही अजब -गजब बना देते हैं।
   ‌‌‌       अजब सिंह की एक सहयोगी है रसभरी। पहले रसभरी को पकङा जाता है और कोशिश होती है की मानवता के नाते रसभरी को कुछ नुकसान न हो। दूसरी तरफ अजब सिंह को भी मानवता के नाते तब तक गिरफ्तार नहीं करना जब तक उसकी बेटी की शादी न हो जाये।
      जगत भी चम्पा को अपने साथ इसीलिए चिपकाए हुए है की वह डकैत का जीवन छोङ कर एक अच्छे नागरिक का जीवन जीये।
      तीनों जासूस और इनके सहयोगी उपन्यास में‌ जासूस कम‌ और  समाज सेवक ज्यादा नजर आते हैं।
         उपन्यास ना कोई अच्छा अंत भी नहीं है। कहानी के स्तर पर भी उपन्यास अच्छा नहीं  है। पूरा उपन्यास 'कहीं की ईंट, कहीं‌ का रोङा' वाली पंक्ति को सार्थक करता नजर आता है।

  निष्कर्ष-    
प्रस्तुत उपन्यास किसी भी स्तर पर पठनीय नहीं है। कहानी का कहीं को तालमेल नहीं है और न ही कोई समापन। उपन्यास में कहीं कहानी है भी नहीं। यह उपन्यास पढना समय की बर्बादी है।
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उपन्यास- जगत और चम्पा डकैत
लेखक- ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय लेखक
प्रकाशक- रजत प्रकाशन
पृष्ठ -235
मूल्य-20₹

Sunday, 22 October 2017

72. खूनी वारदात- ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय लेखक

अपने पति की हत्या के आरोप में जेल में बंद एक स्त्री की कहानी।
खूनी वारदात, जासूसी उपन्यास, मध्यम स्तरीय।

जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का ' तीन गायब' के  बाद 'खूनी वारदात' यह द्वितीय उपन्यास है जो मैंने पढा।

  जेल से भारत के राष्ट्रपति के नाम एक पत्र पहुंचा।
  पत्र भेजने वाली का नाम यशोधरा था और उसे पुलिस ने अपने पति प्रेमनाथ की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार किया था।
   पत्र में राष्ट्रपति को पूज्य पिताजी के नाम से संबोधित किया गया।
पत्र में अपना परिचय देते हुए उसने लिखा था- मेरा नाम यशोधरा है और मैं मृत प्रेमनाथ की विधवा हूँ।
    आप विश्वास कीजिए मैं नहीं जानती की मेरे परि का खून किसने किया, क्यों किया और किस समय किया।
मैंने आपको पिताजी कहा है और कोई भी अच्छी बेटी पिता से झूठ नहीं बोला करती। (पृष्ठ -5, कहानी का प्रथम दृश्य)
जब यह पत्र राष्ट्रपति के माध्यम से खुफिया विभाग में पहुंचा तो वहाँ से जगन, जगत, पचिया और बंदूक सिंह को इस मामले की सत्यता पता लगाने के लिए नियुक्त किया गया।
    जब चारों इस मामले की खोजबीन में लगे तो एक यशोधरा की हत्या का प्रयास किया गया और एक बार जगन पर कातिलाना हमला हुआ।
   पर अतंतः चारों अपने अभियान में सफल रहे।
- प्रेमनाथ का खून किसने किया?
- यशोधरा को कातिल किसने ठहराया?
- बंद कमरे में प्रेमनाथ का कत्ल किसने किया?
- यधोधरा पर हमला किसने व क्यों करना चाहा?
- जासूस पार्टी पर हमला किसने किया?
  ऐसे एक नहीं अनेक प्रश्नों के उत्तर तो जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा के उपन्यास खूनी वारदात को पढकर ही मिल सकते हैं।
          उपन्यास में चार जासूस मुख्य हैं और उनके सहायक भी हैं। चारों पात्रों के साथ लेखक इंसाफ नहीं कर पाया और इस चक्कर में कोई भी पात्र अपनी पहचान नहीं छोङ पाया।
    एक पात्र पचिया( जिसका वास्तविक नाम नहीं नहीं दिया गया) है जो थोङा-बहुत उपन्यास में प्रभाव स्थापित कर पाया है।
           प्रस्तुत उपन्यास एक मध्यम स्तर का उपन्यास है जिसे अनावश्यक रूप से विस्तार दिया गया है। और विस्तार भी ऐसा जिसका कोई महत्व ही नहीं है। चारों जासूसों की वार्तालाप को काफी लंबा खींचा गया है इसके अलावा उर्वशी क्लब, चित्रलेखा- मोहिनी से बातचीत भी बार-बार व अनावश्यक रूप से दिखा कर उपन्यास को विस्तार दे दिया गया है।
      उपन्यास में एक बंदूक सिंह के अलावा अन्य कोई भी जासूस ऐसा नहीं लगता की वह कातिल की तलाश कर रहा है। पचिया एक जगह बस इतना पता लगा पाता है की कातिल किस रास्ते से कमरे में घुसा। बाकी समय तो सभी जासूसी दल अपनी व्यर्थ की वार्तालाप में समय बिता देता है।
  और कातिल में उन्हें अनायास ही हाथ लग जाता है। स्वयं पचिया भी यही बात कहता है- " यह मात्र संयोग ही है की कातिल अनायास ही इतनी जल्दी मिल गया।"(पृष्ठ 233)

      शराब और शराबी के विषय में स्मरणीय बात कही है जो मुझे अच्छी लगी, आप भी पढ लीजिएगा-
  " एकदम गलत बात है। शराब पीने से इंसान अपनी चिंता भूल पाता है और अपने दुख भूल पाता है। इंसान शराब पीता है मन के आनंद के लिए और उसे कुछ आनंद मिलता भी है। इसके बाद वह सोचता है कि अगर और पिएगा  तो और आनंद मिलेगा। परंतु वह यह भूल जाता है कि अधिक शराब पीने से या तो वह बेहोश हो जाएगा या उसके मन की कामनाएं और भी भङक उठेंगी।"- (137)
             यह एक मध्यम स्तरीय जासूसी उपन्यास है जिसे टाइमपास के लिए एक बार पढा जा सकता है लेकिन उपन्यास में कोई याद रखने योग्य कोई विशेष बात नहीं है।
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उपन्यास- खूनी वारदात
लेखक- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा
प्रकाशक- शिवा पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- 237
मूल्य- 15₹