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Thursday, 17 November 2022

543. उड़न छू- अनिल मोहन

आपका दिमाग भी हो जायेगा....
उड़न छू- अनिल मोहन

  पाठक मित्रों से सूचना मिली थी की अहमदाबाद में एक दो जगह लोकप्रिय उपन्यास मिलते हैं। काम से आबू रोड (राजस्थान) गया हुआ था। रविवार (13.11.2022) को समय निकाल कर अहमदाबाद भी जा पहुंचा। वहाँ गुजरी बाजार (साबरमती नदी के पास) और बैंक आॅफ बड़ौदा के सामने कुछ उपन्यास मिलते हैं। वहाँ से कुछ उपन्यास खरीदे, जिनमें से अनिल मोहन जी का उपन्यास 'उड़न छू' भी शामिल है।
   लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में एक समय तीन लेखक ही सक्रिय थे, या बाजार में जिनके उपन्यास बिकते थे। वेदप्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन‌ पाठक और अनिल मोहन । तीनों का लेखन पूर्णतः अलग-अलग तरह का था, तीनों के पाठक भी अलग-अलग नजर आने लगे।
आबू रोड़ से रायसिंहनगर,  यात्रा का साथी उपन्यास
  अनिल मोहन जी ने अपने कई पात्र खड़े किये हैं जिनमें से एक है अर्जुन भारद्वाज, जो एक प्राइवेट डिटेक्टिव है। (हालांकि इस उपन्यास में‌ अर्जुन का कोई परिचय नहीं दिया गया)
प्रस्तुत उपन्यास 'उड़न छू' अर्जुन भारद्वाज सीरीज का उपन्यास है। जिसमें उसके साथ इंग्लैंड का प्रसिद्ध जासूस बॉण्ड भी है- जेम्स बॉण्ड।- वो लम्बा, ऊँचा कद, नीली आँखें, लाल सुर्ख चेहरा, होंठ सिगरेट पीने की वजह से हल्के बैंगनी। (पृष्ठ-07)
  अब चर्चा कथानक पर-

Thursday, 18 March 2021

424. किंबो- अनिल मोहन

एक खतरनाक जीव की कहानी
किंबो- अनिल मोहन

दृश्य- 01
कंगूरा आइलैण्ड
'फच्चाक...।' अगले ही पल आदिवासी शिकारी की नाभी में बड़ा सा सुराख हुआ और चीख गूंजती चली गई-"आह..."
'कड़ाक...'- तभी नाभी के रास्ते गुजरता किंबो नामक जीव पीछे पीठ की हड्डी तोड़ता बाहर जा उछला।


 दृश्य-02
'कड़ाक।' पहले आदिवासी के पृष्ठ भाग की खोपड़ी टूटी। उसमें चार इंच चौड़ी हड्डी टूटकर नीचे गिरी और उसके बाद किंबो बाहर की तरफ हवा में लहराता चला गया।
दृश्य-03
"किंबो मानव शरीर में कहीं से भी घुस सकता है। फिर भी जिस शरीर को इसने  अपना घर बनाना होता है यह उस शरीर में मुँह से प्रवेश करता है या नीचे गुप्तांग से। (पृष्ठ-17)



उक्त दहशत भरे दृश्य हैं रवि पॉकेट बुक्स से प्रकाशित लोकप्रिय साहित्य के सितारे अनिल मोहन जी द्वारा लिखित उपन्यास 'किंबो-एक अजूबा' नामक के। 

किंबो- अनिल मोहन
   लोकप्रिय साहित्य में यूं तो एक से बढकर एक उपन्यास लिखे गये हैं। पर किसी जानवर को आधार बना लिखा गया यह प्रथम उपन्यास है,मेरी दृष्टि में तो। हिंदी हाॅरर उपन्यास साहित्य में ऐसे प्रयोग अन्यत्र नहीं है। 

Wednesday, 9 October 2019

231. रफ्तार- अनिल मोहन

साढे चार अरब के हीरों की डकैती।
रफ्तार- अनिल मोहन

आप‌ने कभी दौलत की रफ्तार देखी है? नहीं न! तो आइए, इस उपन्यास में देखते हैं दौलत की रफ्तार। दौलत जब रफ्तार पकड़ती है तो सब कुछ बर्बाद करती चली जाती है।

अनिल मोहन जी द्वारा लिखित और सूरज पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित उपन्यास 'रफ्तार' पढने को मिला।
आज से 18 वर्ष पहले का लिखा गया यह उपन्यास आज भी वैसा ही तरोताजा महसूस होता है। कहीं से भी यह अहसास नहीं होता की यह उपन्यास इतना पुराना भी है।

      उपन्यास देवराज चौहान सीरिज का है तो स्वाभाविक ही है की यह डकैती पर आधारित होगा। यह उपन्यास भी एक डकैती पर ही आधारित है। यह कोई छोटी डकैती नहीं है, यहाँ तो मामला साढे चार अरब रूपयों का है।
उपन्यास के आवरण पृष्ठ से एक झलक देखें।
बुरे वक्त की मार साढे चार अरब के हीरों को ले जाता जगमोहन, यू ही इत्तफाक से, खामखाह ही पुलिस वालों के फेर में जा फंसा और खड़ा हो गया झंझट, क्योंकि ...क्योंकि साढे चार अरब के हीरे गायब हो गये। कौन ले गया? हर कोई इस बात से परेशान था उपर से एक और नई मुसीबत खड़ी हो ग ई कि जो भी डकैती में शामिल था, कोई बारी बारी से उनके कत्ल करने लगा और उसकी वजह जिसी के समझ में नहीं आ रही थी।

Tuesday, 3 July 2018

126. नफरत की दीवार-अनिल मोहन

नफरत में‌ लिपटी एक मासूम‌‌ जिंदगी।
नफरत की दीवार- अनिल‌ मोहन, थ्रिलर उपन्यास, पठनीय, मध्यम।
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एक ऐसे इंसान की कहानी, जो हर नये दिन के साथ नफरत की मजबूत दीवारों की गिरफ्त में फंसता चला गया।

      अजय को बचपन से ही घर से नफरत मिली और यह नफ़रत दिन प्रति दिन‌ बढती ही गयी

उपन्यास का आरम्भ होता है जब अजय अपनी पत्नी सुनीता के साथ घर में प्रवेश करता है। सुनीता का घर में  प्रथम दिवस, गृह प्रवेश और उसका व्यवहार पाठको को आश्चर्यचकित करता है।
- मैं‌ सिर्फ इज्जतदार लोगों की ही इज्जत करती हूँ, ऐरे-गैरे से तो मुझे बात करना ही पसंद नहीं। (पृष्ठ-11)
- मैं तुम दोनो से भी बड़ी चुडैल हूँ, इस बात को हरदम अपने दिमाग में रखना।(पृष्ठ-11)
      अब पाठक के आश्चर्य का यह कारण है की वह ऐसा क्यों करती है लेकिन अगले पृष्ठ पर यह रहस्य खुल जाता है। जब अजय के भाई विमल- सुरेश और उनकी‌ पत्नियां सुधा और अनिता आपस में चर्चा करते हैं।

   अजय अगर छब्बीस साल की उम्र होने तक शादी कर लेता है तो उसे रामदयाल जी की संपत्ति में से हिस्सा मिलेगा अन्यथा नहीं।
जब अजय अपनी शादी की बार चलाता है तो अजय के भाई सुरेश और विमल अजय को उसकी मंगेतर कल्पना सहित खत्म करने का प्लान बनाते हैं और सफल भी हो जाते हैं।
लेकिन एक दिन अजय घर आ पहुंचता लेकिन कल्पना के साथ नहीं, अपनी पत्नी सुनीता।
- अजय जीवित कैसे बच गया?
- क्या हुआ कल्पना का?
- सुनीता कौन है?
- अजय से उसके परिवार वाले नफरत क्यों करते हैं?
- संपत्ति और वसीयत और शादी का आपस में क्या संबंध है?
- अजय के भाई उसके दुश्मन क्यों है?

इन सभी प्रश्नों के उत्तर तो अनिल मोहन जी का उपन्यास 'नफरत की दीवार' पढकर ही मिलेगा।

                    उपन्यास का प्रथम चरण है जब अजय सुनीता के साथ शादी करके घर पहुंचता है, तब एक आश्चर्य होता है की अजय को मारने की किसने कोशिश की, अजय कैसा बचा और उसकी प्रेयसी कल्पना कहां है, और अचानक सुनीता से शादी करके घर कैसे पहुंच गया?
द्वितीय चरण वह है जिसमें अजय के बचपन का वर्णन है यह चरण बहुत ही भावुक है।
तृतीय चरण वह है जिसमें अजय अपने दुश्मनों से बदला लेता है।
             

उपन्यास में‌ गलती-

उपन्यास के अंत में रंजन का कत्ल हो जाता है लेकिन कोई स्पष्ट ही नहीं हो पाता की कत्ल किसने किया।
तभी रंजन की चीख गूंजी और वह जुदा होकर दूर जा गिरा। .....रंजन के पेट में मूठ तक चाकू धंसा था।(पृष्ठ-202)

- उपन्यास में 'मंगेतर' शब्द को जगह-जगह पर 'मंगेदर' लिखा गया है।

- राधिका एक जगह अजय को वसीयत की सत्यता बताती है। यह दृश्य उपन्यास में किसी भी दृष्टि से‌ मेल नहीं खाता।
राधिका को क्या जरुरत थी इस सत्य को बताने की?

संवाद-
    उपन्यास संवाद के स्तर पर कोई विशेष नहीं है फिर भी कई जगह कुछ संवाद पठनीय हैं।

- सच्चे प्यार की चाहत न तो कभी कम हो सकती है और न ही समाप्त हो सकती है। (पृष्ठ-192)

निष्कर्ष-
   ‌    ‌  उपन्यास का आरम्भ बहुत रोचक और संस्पेंश से भरा है और मध्यांतर भाग अजय के बचपन से संबंधित बहुत ही भावुक है।
                   उपन्यास के आरम्भ में पाठक जहां पल-पल चौंकता है वहीं मध्यांतर में उसकी आँखों से आँसू बह जाते हैं‌ लेकिन उपन्यास का समापन बदला प्रधान हिंसक फिल्म की तरह है जिसमें कोई ज्यादा आनंद नहीं आता। बस लेखक ने उपन्यास का समापन करना था जैसे-तैसे कर दिया।
      उपन्यास एक बार पढी जा सकती है। अच्छी है।

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उपन्यास- नफरत की दीवार
लेखक - अनिल मोहन
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- 236
मूल्य-60₹

125. डकैती मास्टर- अनिल मोहन

इण्डिया बैं‌क की डकैती की कहानी।
डकैती मास्टर- अनिल मोहन, थ्रिलर उपन्यास, रोचक, पठनीय।
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     जवाहर सिंह कालिया वह शख्स था जिसने देवराज चौहान से डकैती की एक डील की थी ।
"माल रोड़ पर इण्डिया बैंक की ब्रांच है।"- जवाहर सिंह कालिया ने गंभीर स्वर में कहा - " उसमें लाॅकर की सुविधा भी उपलब्ध है। 402 नंबर लाॅकर में पड़ा सारा सामान तिनका-तिनका, बेशक वह रुपया हो या सोना-हीरे हों या फिर कागजात हों, मुझे चाहिए। यह काम है।"(पृष्ठ-07)
     देवराज चौहान और जगमोहन ने वह डील स्वीकार की। और जगमोहन के साथ एक प्लान बनाया।
"तुम....!" देवराज चौहान मुस्काया-"सिर्फ 402 नंबर लाॅकर के बारे में ही नहीं सोच रहे बल्कि वहां मौजूद सब लाॅकरों के बारे में सोच रहे हो। जाहिर है, जब 402 नंबर लाॅकर खाली करने के लिए बैंक में डकैती डालोगे तो बाकी लाॅकरों पर भी हाथ मारोगे।"(पृष्ठ-13)
               देवराज चौहान ने डकैती की। लेकिन यह एक संयोग था की डकैती के दौरान एक शख्स वहां आ पहुंचा।

124. खून की प्यासी- अनिल मोहन

घर में तीन सदस्य एक गायब....और शेष दोनों पर शक।
खून की प्यासी- अनिल मोहन, थ्रिलर उपन्यास।
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"प्रणाम भाभी।" एयरपोर्ट से बाहर आते ही राजेश ने प्रसन्नता भरी मुद्रा में चालीस वर्षीय विमला देवी के पांवों को छूकर कहा-"सब ठीक हैं ना?"
        "सब ठीक है देवर जी।"- विमला देवी ने उसके सिर पर आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ रखकर हँसते हुए कहा-" अमेरिका से काॅर्स ठीक तरह पूरा करके आये हो ना?"
"बिलकुल भाभी। बिजनेस मैनेजमेंट में टाॅप किया है। अब भैया के साथ सारे बिजनेस को संभालूंगा, ताकि उनके कंधों का बोझ कुछ कम हि सके।"- राजेश ने कहा।(पृष्ठ-07)
             वीरेन्द्र प्रताप सिन्हा का छोटा भाई राजेश जब अमेरिका से अपना काॅर्स पूरा करके घर लोटा तो उस तीन सदस्य घर में खुशी का माहौल था। लेकिन एक छोटी सी फोन काॅल ने सारी खुशियों को ग्रहण लगा दिया।
" जी हां, कौन हैं आप?" वीरेन्द्र प्रताप ने शांत लहजे में कहा।
"आपका शुभचिंतक.........आपका छोटा भाई राकेश आपके खिलाफ बहुत गहरी साजिश रच रहा है। ताकि वह करोङों‌ की दौलत का अकेला मालिक बन सके...और...।" (पृष्ठ-10,11). 
   
            वीरेन्द्र प्रताप सिन्हा की पत्नी विमला देवी का अपहरण हो गया और इल्जाम‌ लगा  वीरेन्द्र सिन्हा के छोटे भाई राजेश पर।  दुसरी तरफ राजेश ने इल्जाम‌ लगया मैनेजर पंकज वर्मा पर।
राजेश के सबूत और गवाह झूठ साबित हुए और दूसरी तरफ पंकज वर्मा गायब था।
      
       तो फिर सत्य क्या था?
-विमला देवी को गायब किसने किया?
- पंकज वर्मा ने या राजेश ने?

              वीरेन्द्र सिन्हा ने भी अपनी पत्नी को ढूंढने की बहुत कोशिश की पर कोई सबूत हाथ न लगा।
  06 माह बाद जब इस केस को‌ पुन: खोला गया तो फिर एक के बाद एक ऐसे रहस्य सामने आनर लगे की सभी दंग रह गये।
       कहानी एक ऐसे मोङ पर जा पहुंची जहाँ तक कोई सोच भी नहीं सकता था। अपराधी वर्ग का बिछाया हुआ एक ऐसा जाल था जिसमें एक- एक कर सभी उलझते चले गये। स्वयं पुलिस विभाग भी हैरान रह गया।
        
         उपन्यास की कहानी मध्यांतर तक बहुत ही रहस्यात्मक ढंग से आगे बढती है और पाठक आश्चर्यचकित सा रह जाता है। जब एक-एक कर रहस्य से पर्दे उठते हैं तो बहुत अच्छा लगता है। लेकिन उपन्यास मध्यांतर के पश्चात अपनी गति खोती नजर आती है।
  पहले उपन्यास में जहाँ रहस्य था वहीं बाद में उपन्यास बदला प्रधान फिल्म की तरह हो जाती है। अपराधी वर्ग से बदला लिया जाता है।
          अब एक-एक अपराधी मारे जाते हैं। आखिर इनको मार कौन रहा है। किसी को कुछ भी पता नहीं चलता लेकिन जब अंत में कातिल सामने आता है तो एक झटका सा लगता है की यार किस को कातिल ठहरा दिया।

             उपन्यास अच्छा था, उपन्यास का आरम्भ बहुत अच्छा था, मध्यांतर तक उपन्यास शानदार था लेकिन‌ बाद में अपराधियों से बदला ले‌ने के लिए उपन्यास अपने मूल तथ्य से भटक जाता है।

खून की प्यासी- उपन्यास का शीर्षक भी एक ऐसे व्यक्ति पर आधारित है जैसे जादूगर द्वारा पिटारे में से कबूतर निकाल गया हो।

कमियां- मुझे उपन्यास के अंत यह नहीं पता चला की वीरेन्द्र सिन्हा को अपने भाई राजेश के प्रति सजग करने वाला वह शुभचिंतक कौन था?
  और उसने वीरेन्द्र सिन्हा को फोन क्यों किया?

निष्कर्ष-               उपन्यास का आरम्भ और कहानी बहुत जबरदस्त है। उपन्यास में एक के बाद एक रहस्य पाठक को जबरदस्त झटका देने वाले हैं। कहानी बहुत घुमावदार है। पाठक को जब लगता है यह अपराधी होगा तो तब अगले पृष्ठ पर धारणा बदल जाती है। ऐसा कई बार होता है लेकिन यह रहस्य-रोमांच उपन्यास के मध्य भाग से पूर्व तक तो ठीक है लेकिन उपन्यास के मध्य भाग पश्चात उपन्यास अपने साफ इंसाफ नहीं कर पाता और कहानी का अंत/अपराधी जिस व्यक्ति को दिखाया गया है वह भी कोई उचित न लगा।
  उपन्यास एक बार पढा जा सकता है।
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उपन्यास- खूनी की प्यासी
लेखक- अनिल मोहन
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स मेरठ
पृष्ठ- 222
मूल्य- 60₹

      

Monday, 25 June 2018

123. विधि का विधान- अनिल मोहन

चलती वैन से लूट की कथा।
विधि का विधान- अनिल मोहन, उपन्यास, रोचक, औसत।
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मध्य प्रदेश में पुरातत्व विश्लेषण विभाग को खुदाई के दरम्यान, तरबूज के साईज के दो हीरे मिले हैं। वह बेहद कीमती, अमूल्य, बेशकीमती हीरे हैं। विशेषज्ञों का कहना है की ऐसे कीमती, हीरे शायद दुनियां‌ में कहीं भी नहीं हैं। अब उनकी कीमत का तुम‌ लगा ही सकते हो। (पृष्ठ-31)
                    जब देवराज चौहान को इन हीरों‌ की खबर लगी तो उसने अपने मित्र जगमोहन के साथ मिलकर इन हीरों‌ को लूटने का सोचा।
                देवराज चौहान‌ ने कुछ लोगों को साथ लिया और हीरे लूट को लूटने का प्लान बनाया।
          अनिल मोहन जी का एक विशेष पात्र देवराज चौहान और उसका साथी जगमोहन डकैती के लिए प्रसिद्ध हैं।  उपन्यास 'विधि का विधान' में भी वे एक ऐसी डकैती का प्लान बनाते है, जबकि उनके पास कोई अच्छा प्लान भी नहीं है।

Monday, 9 October 2017

67. दहशत का दौर- अनिल‌ मोहन

जुगल किशोर जैसे खतरनाक इंसान का खूनी खेल।
दहशत का दौर, थ्रिलर उपन्यास, एक्शन।

जुगल किशोर  के प्रतिशोध की कहानी।

अनिल मोहन का पात्र है जुगल किशोर।
क्या आप जुगल किशोर को जानते हैं? अरे! वही
जुगल किशोर
गुण्डा
मवाली
जेबकतरा
दस नंबरी- (पृष्ठ- 07)
और भी न जाने क्या-क्या है बदमाश।
   "छोटे- मोटे गुण्डों-बदमाशों की आँखों में धूल झोंक कर उनके माल पर हाथ साफ करना जुगल किशोर का धंधा था। वक्त आने पर इतना खतरनाक हो जाता था कि उसे देखकर सामने वाले के पसीने छूट जाते थे।"- (पृष्ठ-07)
                     बस जेबतराशने के साथ-साथ कभी कभार छोटा-मोटा हाथ भी मार लेता है। बस कमबख्त से यहीं एक गलती हो गयी। शहर के डाॅन राजबहादुर कोठारी के रुपयों पर हाथ साफ कर बैठा। अब रुपये कार में रखे थे, कार में कोई था नहीं, कार के लाॅक भी न था। जुगल किशोर के हाथों में खुजली होने लगी। अब खुजली का तो एक ही इलाज है और वह है कार में रखा रुपयों से भरा।ब्रीफकेस।
  आदमी हरामी है, दस नंबरी है, बस ब्रीफकेस उठा लिया। लेकिन वाह री किस्मत उसी समय ब्रीफकेस के रक्षकों ने जुगल किशोर को देख लिया। पर जुगल किशोर कहां किस के हाथ आने वाला था। पीछे से गोलियाँ भी चली पर, जुगल किशोर अपनी जान बचा गया पर पहचान पीछे छोङ गया।
 राजबहादुर कोठारी शहर का डाॅन, जिसके नाम से लोग कांपते है। उसके माल पर कोई हाथ साफ कर जाये। लानत है...।
बस यहीं से राजबहादुर कोठारी ने जुगल किशोर की मौत का फरमान जारी कर दिया।
अमृतपाल, कोठारी का वहशी दरिंदा है। जुगल किशोर का पता जानने के लिए अमृतपाल ने जुगल किशोर की प्रेयसी करूणा को अमानवीय यातना देकर मार दिया।
बस यहीं से...ठीक यहीं से ...ठन गयी...दोनों में ठन गयी....राजबहादुर कोठारी और जुगल किशोर में भई ठन गयी।
और जिसका परिणाम इतना भयंकर निकला की पूरा शहर कांप उठा। राजबहादुर कोठारी और शहर के दूसरे डाॅन भूपेन्द्र सिंह के ठीकाने तबाह हो गये।
जब जुगल किशोर जैसा युवक अपने प्रतिशोध लेने को उतरा तो तबाही का वह तूफान उठा जिसनें शहर से अंडरवर्ल्ड को खत्म कर दिया।
"वह खोखली धमकियां नहीं दे रहा है। उसने जो कहा है उसे वह कर दिखाने की हिम्मत रखता है। इसका अंदाज आप उसके चंद दिनों के कारनामों से लगा सकते हो। उसने ऐसे कारनामों को अंजाम दिया है कि अंडरवर्ल्ड में सनसनी फैल गयी। उस अकेले ने तबाही मचा दी।"-(पृष्ठ 194)
  कमबख्त अकेला ही दुश्मनों‌ से जा टकराया, आखिर हवा थी उसकी, सीने में दम था। तभी तो सामंत सिंह के ठिकाने पर जाकर उसके साथियों के सामने सामंत सिंह को ललकार दिया। विश्वास नहीं होता तो आप स्वयं पढ लो ये संवाद।
" साले, हरामी!"- जुगल किशोर ने धधकते स्वर में कहा, "जुगल किशोर पर गोली चलाना बच्चों का खेल नहीं है। मुझ पर गोली चलाने के लिए तेरे को अभी तगङी ट्रेनिंग की जरूरत है। क्योंकि आजकल मेरी हवा है। समझे बेटे।"- (पृष्ठ-213)

भाषा शैली  और संवाद-
  यह एक थ्रिलर उपन्यास है। जिसमें ज्यादा अच्छे संवादों की कल्पना नहीं की जा सकती।
"इंसान कभी अकेला नहीं होता। उसके साथ अपने इरादे होते हैं। कुछ कर गुजरने का जज्बा होता है।"-(पृष्ठ-54)
      उपन्यास भाषा के स्तर पर प्रचलित उपन्यासों की भाषा शैली बनाये हुए है।
    एक्शन और थ्रिलर पाठकों के लिए यह एक अच्छा उपन्यास हो सकता है। कहानी के स्तर पर कुछ भी नया या याद रखने योग्य नहीं है। जुगक किशोर को हद से ज्यादा बहादुर दिखाया गया है। एक अकेला सब पर भारी।
उपन्यास में जहां पुलिस और मुजरिम के आपसी संबंधों का चित्रण है वहीं कर्तव्य को सर्वोपरि मानने वाले पुलिस वाले भी उपन्यास में उपस्थित हैं।
  उपन्यास का सार यही है कि बुराई का अंत बुरा।
  उपन्यास में छुटपुट गलतियां है लेकिन उपन्यास एक बार पढा जा सकता है।
  यह उपन्यास मुझे माउंट आबू से सूरतगढ (राजस्थान) ट्रेन से आते वक्त पाली मारवाड़ जंक्शन के एक पुस्तक विक्रेता से मिला था।
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उपन्यास-  दहशत का दौर
लेखक-    अनिल मोहन©
प्रकाशक- शिवा पॉकेट बुक्स- गांधी मार्ग, मेरठ।
प्रकाशन वर्ष- ........
पृष्ठ-       239
मूल्य-      20₹
श्रृंखला- जुगल किशोर

66. पहरेदार- अनिल मोहन

एक उपन्यास- दो कहानियाँ, एक पूरी, एक अधूरी।

अनिल मोहन द्वारा लिखित उपन्यास पहरेदार एक ऐसा उपन्यास है जिसमे दो‌ अलग-अलग कहानियाँ है जो की देवराज चौहान के कारण एक बार आपस में मिलती हैं और फिर अलग अलग हो जाती हैं।
दोनों कहानियाँ की विशेषता ये है की मुख्य कहानी जो की एक इंस्पेक्टर सूरज यादव पर केन्द्रित है तो इसी उपन्यास में संपूर्ण हो जाती है वहीं देवराज चौहान की कहानी अधूरी रह जाती है।

    पहरेदार एक ऐसे जाबांज इंस्पेक्टर की कहानी है जो सत्य के लिए गृहमंत्री तक को गोली मारने से पीछ नहीं हटता।
CBI का एक एजेंट सूरज यादव उन ‌लोगों की तलाश में है जो भारत की आंतरिक ‌सुरक्षा से जुङी महत्वपूर्ण फाइलें अन्य देशों तक पहुंचाते हैं।
इसी सिलसिले में सूरज यादव जा टकराता है देश के गृहमंत्री से भी जा कटराता है। सूरज यादव की जिंदगी का यही निर्णय, गृहमंत्री से टकराना उसके जीवन में तूफान खङा कर देता है।
  सूरज यादव गृहमंत्री पर इल्जाम तो लगा देता है पर उसे सही साबित नहीं कर पाता। इस चक्कर में उसकी नौकरी पर भी तलवार लटक जाती है और उसके मित्र इंस्पेक्टर मेहता की जान भी चली जाती है।
दूसरी तरफ गृहमंत्री से छीने गये महत्वपूर्ण कागजात भी सूरज मेहता डकैती मास्टर देवराज चौहान को गलतफहमी में सौंप देता है।
  यही से कहानी एक नया मोङ लेती है और सूरज यादव के इंस्पेक्टर मित्र की जान भी।
  अपने मित्र की मौत का बदला लेने, स्वयं को बेगुनाह साबित करने और असली मुजरिम को सामने लाने के लिए सूरज यादव जा टकराता है कानून के दुश्मनों से।
द्वितीय कहानी है देवराज चौहान द्वारा एक गोल्ड वाॅल्ट लूटने की लेकिन वह कहानी इस उपन्यास में पूर्ण नहीं होती‌।
"एक वजह से गोल्ड वाॅल्ट में आज तक  डकैती करने की किसी की हिम्मत नहीं हुयी। और वह वजह थी बीस फीट की गैलरी। सारी सुरक्षा व्यवस्था तोङकर अगर गोल्ड वाॅल्ट के भीतर पहुंच भी जाया जाए तो बीस फीट की गैलरी रूपी मौत के रास्ते को पार करके वाल्ट के उस दरवाजे तक नहीं पहुंचा जा सकता, जिसके पास करोङों अरबों की दौलत मौजूद है।"-(पृष्ठ-65)

जासूस की जिंदगी को लेकर बहुत अच्छी बात कही है-
"हम लोग जिस धंधे में हैं, उसमें तभी तक जिंदगी बची रह सकती है जब मन की बात मन में रहे। सीक्रेट एजेंट उस वक्त तलवार की धार पर बैठता है जब उसकी मूवमेंट की खबर दुश्मनों को मिलने लगती है।"- (पृष्ठ-132)

उपन्यास में कमी
- उपन्यास में अगर गलतियों की  बात करें तो बहुत ज्यादा गलतियाँ नजर आती है जो एक अच्छी कहानी को भी खराब कर देती है।
1. उपन्यास को जबरन देवराज चौहान सीरीज बनाने की कोशिश की गयी है।
2. उपन्यास में दो कहानियाँ है। मुख्य सूरज यादव की व दूसरी देवराज चौहान की।
सूरज यादव की कहानी इस उपन्यास में खत्म हो जाती है, वहीं देवराज चौहान की कहानी अधूरी रह जाती है।
3. उपन्यास में खलनायक का किरदार बहुत कम व बहुत कमजोर दिखाया गया है ।
गृहमंत्री से दुश्मनी करने वाला एक सामान्य सा  व्यक्ति बन कर रह गया।
4. सूरज यादव CBI का एक होनहार एजेंट है, पर वह गृहमंत्री वाले केस में निर्णय ऐसे लेता है जैसे कोई अतिउत्साहित नव युवक हो।
5. उपन्यास के अंत में हमशक्ल वाला जो किस्सा दिखाया गया है वह बिलकुल ही उचित नहीं लगता।
एक देश का गृहमंत्री, वह भी नकली हो, किसी का हमशक्ल हो और शासन चला रहो हो,  तो क्या वहाँ का प्रशासन, सरकार असली नकली में भेद ही नहीं कर सकती।

     अनिल मोहन का पहरेदार उपन्यास का द्वितीय भाग सुलग उठा बारूद है, लेकिन दोनों उपन्यासों में मुझे आपस में कोई तारतम्य नजर नहीं आता।
  जहां पहरेदार में सूरज यादव की कहानी खत्म हो जाती वहीं देवराज चौहान की कहानी सुलग उठा बारूद में समाप्त होती है।

समग्र दृष्टि से देखे तो कहानी के स्तर पर प्रस्तुत उपन्यास बहुत रोचक है। रोचकता भी ऐसी की पाठक कहीं भी बोरियत महसूस नहीं करता।
यहाँ तक की देवराज चौहान के आगमन से उपन्यास में रोचकता भी बढ जाती है।
 

एक पठनीय उपन्यास है। अनिल मोहन व  देवराज चौहान के प्रशंसकों के लिए यह एक पठनीय उपन्यास है।

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उपन्यास- पहरेदार
लेखक- अनिल मोहन
प्रकाशक- राजा पॉकेट बुक्स- दिल्ली
पृष्ठ- 238
मूल्य- 20₹

Wednesday, 20 September 2017

62. जेल से फरार- अनिल मोहन

अपहरण की योजना पर आधारित देवराज चौहान सीरीज का एक रोमांचकारी उपन्यास।
अनिल ‌मोहन के चर्चित किरदार देवराज चौहान पर आधारित उपन्यास जेल से फरार एक अपहरण की योजना, क्रियान्विति व उसके परिणाम पर आधारित एक बहुत ही रोचक उपन्यास है।

कहानी:-
देवराज चौहान, जो की एक इश्तिहारी मुजरिम है। वह अपने सहयोगी मित्र जगमोहन के साथ मिलकर शहर के पूर्व कुख्यात डान विक्रम सिंह रंधावा के पुत्र सूरज रंधावा के अपहरण की योजना बनाता है। इस योजना में उसके साथ शहर की‌ कुख्यात लेडी डाॅन चीमा नारंग व एक अन्य अपराधी जुगल‌ किशोर साथ होते हैं।
सूरज रंधावा के अपहरण तक कहानी सामान्य चलती है पर इसके पश्चात कहानी में पल-पल, पृष्ठ दर पृष्ठ इतने रोमांचक मोङ आते हैं की पाठक कहानी के बहाव में बहता चला जाता है।
अपहरण के पश्चात भी सूरज रंधावा देवराज चौहान के हाथ से निकल जाता है और जो व्यक्ति सूरज रंधावा को ‌देवराज से छीन ले जाते हैं उनके साथ भी चोर पे मोर वाली कहावत लागू होती है।
इनके चक्कर में देवराज चौहान जेल‌ पहुंच जाता है।
लेकिन देवराज चौहान को जेल ज्यादा समय तक कैद न रख सकी।
"तुम‌? देवराज चौहान को‌ देखते ही उसका मुँह खुला रह गया।
" तुम...म तो ...जेल ‌में थे!"
"तो‌ क्या हो गया।"- देवराज चौहान हंसा- " जेल में था तो जेल ‌से फरार भी हो सकता हूँ।"
"जेल‌ से‌ फरार...?"- जयचंद भाटिया का मुँह फिर खुला‌ का ‌खुला ‌रह गया।
" हां, मैं जेल‌से फरार होकर सीधा यहाँ ही आया हूँ।"
"सी...धा......यहाँ....क्...यों?"- (पृष्ठ148)

एक करोङ की फिरौती के लिए देवराज चौहान ने विक्रम रंधावा के पुत्र का अपहरण कर उसे अपना दुश्मन भी  बना लिया और विक्रम रंधावा का पुत्र भी हाथ से निकल गया। फिरौती की जगह जेल की हवा भी खा ली।
लेकिन जब विक्रम सिंह रंधावा जैसे खुंखार पूर्व डाॅन ने देवराज चौहान को ही अपने पुत्र को सही सलामत घर पहुंचाने का काम सौंपा तो अपहरणकर्ता व दुश्मनों में खलबली मच गयी।

- किसने किया देखराज चौहान के साथ धोखा?
- किसने किया धोखेबाज से भी धोखा?
- किसने पहुंचाया देवराज चौहान को जेल?
- कैसे हुआ देवराज चौहान जेल से फरार?
- आखिर क्यों विक्रम रंधावा ने अपहरणकर्ता को ही अपने पुत्र को वापस लाने का काम सौंपा?

उपन्यास में कुछ विशेष व रोचक बातें हैं वो है सब चोर पर मोर हैं।
1. एक तो यह की अपहरण करने वालों से भी कोई अपहर्ता को छीन लेता है और फिर उनसे भी आगे कोई और व्यक्ति सूरज रंधाना को छीन लेता है। एक आदमी का तीन बार अपहरण होता है।
2. दूसरी रोचक बात ये है की यहाँ सब एक दूसरे पर गुप्त नजर रखते हैं, चोरी-चोरी पीछा किया जाता है।
एक दूसरे का पीछा करता है तो तीसरा दूसरे का।
- "यह ठीक है की करण चौधरी ने देवराज चौहान की पार्टी का पीछा बेहद सावधानी से किया था कि किसी को उनके बारे में पता न चला। परंतु जयचंद भाटिया ने उससे भी ज्यादा सावधानी बरती और करण चौधरी का पीछा किया।
  देवराज चौहान- करण चौधरी- जयचंद भाटिया।
- जुगल किशोर का पीछा जगमोहन करता है।
उपन्यास का कौनसा पात्र कब बदल जाये कुछ पता ही नहीं चलता। सब एक दूसरे को धोखा देने को तैयार बैठ हैं और मौका मिलते ही अपना रंग दिखा जाते हैं।
देवराज चौहान, जगमोहन व जुगल किशोर से चीमा नारंग धोखा करती है।
- जुगल किशोर व महेन्द्र सिंह से करण चौधरी धॊखा करता है।
- जयचंद भाटिया, बिल्ला और महेन्द्र सिंह जगमोहन से धोखा करते हैं।
- और एक जुगल किशोर है जो अपने पेशे से गद्दारी नहीं करना चाहता, पर मजबूर है।

भाषा शैली व संवाद-
     उपन्यास की भाषा शैली सामान्य है। लेखक ने कोई नया प्रयास नहीं किया, जो ठीक भी है। सभी पात्र सामान्य प्रचलित हिंदी बोलते हैं।
उपन्यास के संवाद सामान्य प्रचलित संवाद हैं कोई विशेष या याद रखने लायक नहीं।
जिस स्तर के संवाद इस प्रकार के उपन्यासों में होते हैं वही संवाद है।
"धूप ‌से सङती सङक पर पङी..."- (पृष्ठ 06)
धूप से कभी सङक सङती नहीं‌। यह एक भाषागत गलती है।
उपन्यास बहुत ही रोचक व पढने लायक है। पाठक एक बार बहाव में बह गया तो उपन्यास का समापन करके ही रहेगा।
उपन्यास में अपहरण, देवराज को जेल व प्रत्येक व्यक्ति द्वारा डबल क्राॅस करना काफी रोचक है।
नये- नये पात्रों का सामने आना व सभी का खलनायक होना भी काफी रोचक है।
       उपन्यास पढने योग्य है, मिले तो अवश्य पढें।

उपन्यास- जेल से फरार (देवराज चौहान सीरीज)
लेखक- अनिल ‌मोहन
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- 208
मूल्य- 80₹
संस्करण - 2017 (द्वितीय संस्करण)