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Saturday, 5 July 2025

657. अदल बदल - आचार्य चतुरसेन शास्त्री

 स्त्री स्वतंत्रता या उच्छृंखल
अदल-बदल - आचार्य चतुरसेन शास्त्री

भारतीय समाज में नारी को धार्मिक दृष्टि से चाहे उच्च श्रेणी दी गयी हो पर समाज में उसका स्थान बहुत पीछे है। वह गर की चारदीवारी तक सीमित थी, शिक्षा से दूर रही लेकिन बदलते वक्त के साथ औरत को स्वतंत्रता मिली, वह घर की चारदीवारी से बाहर निकली, यहाँ तक तो सब उचित था लेकिन इस से आगे जो घटित हुआ वह अनुचित था।
हम पहले चतुरसेन शास्त्री जी के उपन्यास 'अदल-बदल' का एक पृष्ठ देखें-
डाक्टर कृष्णगोपाल आज बहुत खुश थे। वे उमंग में भरे थे, जल्दी-जल्दी हाथ में डाक्टरी औजारों का बैग लिए घर में घुसे, टेबल पर बैग पटका, कपड़े उतारे और बाथरूम में घुस गए । बाथरूम से सीटी की तानें आने लगीं और सुगन्धित साबुन की महक घर-भर में फैल गई। बाथरूम ही से उन्होंने विमलादेवी पर हुक्म चलाया कि झटपट चाइना सिल्क का सूट निकाल दें।
विमलादेवी ने सूट निकाल दिया, कोट की पाकेट में रूमाल रख दिया और पतलून में गेलिस चढ़ा दी, परन्तु डाक्टर कृष्णगोपाल जब जल्दी-जल्दी सूट पहन, मांग-पट्टी से लैस होकर बाहर जाने को तैयार हो गए तो विमलादेवी ने उनके पास आकर धीरे से कहा, "और खाना ?"

Tuesday, 1 July 2025

656. नीलमणि- आचार्य चतुरसेन शास्त्री

परिवार और आधुनिक में घिरी औरत की कहानी
नीलमणि- आचार्य चतुरसेन शास्त्री

हिंदी कथा साहित्य में आचार्य चतुरेसन शास्त्री जी का नाम उनके उपन्यासों के कारण ज्यादा जाना जाता है । उनके लिखे सामाजिक, ऐतिहासिक और प्रेमपरक उपन्यास पाठकों में प्रिय रहे हैं।
श्री चतुरसेन शास्त्री जी का उपन्यास पढने का यह पहला अवसर है। इनके एक जिल्द में दो उपन्यास मिले थे, एक था 'नीलमणि' और दूसरा था 'अदल- बदल' । दोनों सामाजिक उपन्यास बदलते परिवेश को आधार बनाकर लिखे गये हैं।
पहले उपन्यास 'नीलमणि' का प्रथम पृष्ठ पढे-
मालकिन रसोईघर में बैठी बड़ी तत्परता से पकवान बना रही थीं। महाराजिन सामने बैठी उनकी मदद कर रही थी। रसोई के द्वार के पास मही बैठी दरांत से तरकारी काट रही थी। बहुत-से मीठे और नमकीन पकवान बन चुके थे और उनकी सोंधी सुगन्ध घर में भर रही थी। दिन काफी चढ़ चुका था; हवा में अधिक उष्णता न थी । सूरज की धूप खिल गई थी। परिश्रम और चूल्हे की गर्मी के कारण मालकिन के उज्ज्वल ललाट पर पसीने की बूंदें मोती की लड़ी के समान सोह रही थीं। उन्होंने फुर्ती से हाथ चलाते हुए महरी से कहा - "देख तो री रधिया, यह लड़की अभी सोकर उठी या नहीं। इस लड़की से तो भई नाक में दम है, दिन बांस-भर चढ़ आया और महारानी अभी सो रही हैं। लड़की क्या है, कुम्भकरण की दादी !"

Friday, 23 October 2020

393. शतरूपा- यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र'

औरत का घर कहां है...
शतरूपा- यादेवन्द्र शर्मा 'चन्द्र'

'शतरूपा' हिंदी व राजस्थानी के प्रख्यात लेखक यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' का ऐसा उपन्यास है जो पुरुष मानसिकता की दुर्बलताओं को व्यस्त करता है और नारी के संघर्ष और उत्थान को प्रकट करता है। आज नारी विमर्श के बारे में खूब हो-हल्ले हो रहे हैं। यह ऐसा उपन्यास है जो नये जीवन के आयामों के यथार्थ को प्रकट करता है। भाषा सरल और शिल्प शैली रोचक है। - प्रकाशक
शतरूपा उपन्यास स्त्री के दर्द को उकेरती एक मार्मिक रचना है। घर और समाज में विभिन्न दुष्कर परिस्थितियों में निर्वाह करती स्त्री को कई रूपों में जीना पड़ता है।  और ऐसे ही एक घिनौने घर में जी रही थी शतरूपा। 

     लालची सास और शकी मिजाज पति के साथ शतरूपा का जीवन बहुत ही कठिन था। इस दर्द को वह अपनी सखी बन्नो के पास व्यक्त करती है- जब मनुष्य बिना किसी अपराध के दंड भोगता है तब वह उसे पूर्व जन्म के पापों का फल ही मानता है, बन्नों, मेरा पति मुझे चरित्रहीन समझता है। (पृष्ठ-38)