चल उड़ जा रे पंछी...
पिंजरा- कुमार कश्यप
एक युवा लड़की जो एक पिंजरे में कैद थी । सिर्फ कैद ही नहीं उस पर अमानवीय अत्याचार भी होते थे और अत्याचारी था उसका परिवार । भाई की हरकतें सुन कर तो मानवता भी शरमा जाये।
एक दिन एक अजनबी ने पिंजरे में बंद पक्षी को हिम्मत दी और कहा - चल उड़ जा रे पंछी...
आज हम यहां चर्चा कर रहे हैं कुमार कश्यप जी के एक सामाजिक उपन्यास 'पिंजरा' की ।
बादलों से घिरी अंधेरी शाम । ठंड और उस पर गरजते हुये बादल । जैसे कोढ़ में खाज । रात होने से पहले ही घटा-टोप अंधकार छा गया था, पूरे आसार थे कि पानी अब बरसा तब बरसा । सड़कों पर एकदम सन्नाटा था। ठिठुरती ठण्ड की वर्षा से कौन नहीं डरता । बार-बार बिजली चमक उठती थी उसकी कार तेज गति से ढलान से उतर कर सामने दिखाई देते नगर में प्रवेश करने को उतावली होती जा रही थी । कार की खिड़कियों के शीशे चढ़े हुये थे तथा कार की पिछली सीट पर एक गम्भीर व्यक्तित्व की गोर्ण स्त्री बैठी थी। उम्र यही चालीस की रही होगी। आंखों पर सुनहरी फ्रेम का चश्मा, जिनसे झांकती हुई पत्थर सी कठोर आंखें । गम्भीर और चुप।

