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Monday, 7 February 2022

506. रोड़ ट्रिप - देवेन्द्र पाण्डेय

तीन दोस्त, तीन यात्राएं और तीन कहानियां
रोड़ ट्रिप- देवेन्द्र पाण्डेय

तीन अनजाने जो मित्र बने।
पहली मुलाकात और पहली ही मुलाकात में रोड ट्रिप की योजना।
तीन यात्राएं, तीन पड़ाव, तीन कहानियां, लेकिन मंजिल एक।
  जिंदगी की परेशानियों और उलझनों से जूझ रहे तीन अनजाने दुनिया जहान को भूला कर एक अनोखे सफर पर निकल पड़े, एक ऐसे अनुभव के लिए जिसने उन्हें बदल कर रख दिया।
     यात्रा जो मुम्बई के मैदानों से आरम्भ होकर उत्तराखण्ड की बर्फिली चोटियों तक पहुँच जाती है, जहाँ उनका सामना नियति से होता है। नियति जो जीवन मरन से मरे जाकर उनके अस्तित्व को ही बदल कर रख देती है।
रास्तों में मंजिल खोजने की कहानी।

Saturday, 2 January 2021

411. अनोखा सफर- राधानाथ स्वामी

एक अमरिकी युवक आध्यात्मिक भारत यात्रा
अनोखा सफर- राधानाथ स्वामी, आध्यात्मिक यात्रा वृतांत


भारत भूमि अध्यात्म की भूमि है। ऋषि-मुनियों की भूमि है। यहाँ की भूमि में कुछ तो विशेष आकर्षक है जो अभारतीय भी यहाँ खींचे चले आते हैं। और उनके आने का उद्देश्य कोई सामान्य यात्रा नहीं है, वे तो आध्यात्मिक शांति के लिए यहाँ आते हैं। इस पवित्र धरा को समझने आते हैं।
ऐसा ही अमेरिकी युवक भारत आता है और फिर यहाँ का होकर रह जाता है। 
    राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में हमारे आदरणी मैम रेखा चौधरी जी को आध्यात्मिक पुस्तकों में विशेष रूचि है। उनके सानिध्य में कुछ आध्यात्मिक किताबें मैंने भी पढी हैं। इस पुस्तक से पूर्व मैंने श्री एम की आध्यात्मिक रचना 'हिमालयवासी गुरु के साये में' पढी थी और संभव यह अध्ययन आगे भी यथावत जारी रहेगा।
   
अनोखा सफर- राधानाथ स्वामी
अनोखा सफर- राधानाथ स्वामी
यह यात्रा है एक बीस वर्षीय अमेरिकी युवक रिचर्ड की। उसे यात्रा का शौक था। एक बार किसी यात्रा में,नदी के किनारे उसे एक आवाज सुनाई देती है-भारत जाओ-भारत जाओ
  इस पुकार पर वह युवक अपना घर-ऐशोआराम त्याग कर 'हिचहाइक'(रास्ते में जो भी साधन मिला उसी से लिफ्ट लेकर यात्रा करना) द्वारा तुर्की, अफगानिस्तान जैसे खतरनाक और आतंकवाद क्षेत्र से पैदल भारत की ओर गमन करता है। खैबर दर्रे से होता हुआ जब वह भारत में प्रवेश चाहता है तो उसे प्रवेश नहीं मिलता। 

Wednesday, 22 July 2020

352. हिमालयवासी गुरु के साये में- श्री एम

साधारण मनुष्य से असाधारण होने तक की आध्यात्मिक यात्रा
हिमालयवासी गुरु के साये में- श्री एम
    एक नवयुवक की भारत के दक्षिणी तट से हिमालय की रहस्यमयी ऊँचाईयों तक की रोमांचक यात्रा जहाँ से उसे अपने महान गुरु मिलते हैं- ज्ञानी, शक्तिवान् और स्नेहमय।

       आध्यात्मिक जीवन चरित पढने का यह मेरा प्रथम अवसर है। किसी के व्यक्तिगत जीवन‌ को पढना हमें तभी रूचिकर प्रतीत होता है, जब हम उस व्यक्ति के विषय में कुछ जानकारी रखते हैं या उस व्यक्ति से हमारा संबंध हो। इस दृष्टि से देखे तो उक्त जीवन चरित किसी भी दृष्टि से मेरे साथ संबंध नहीं रखता। मैंने तो 'श्री एम' का प्रथम बार नाम इस किताब से ही जाना है। 
       यह पुस्तक केरल के एक युवक की आध्यात्मिक 'रंक से राजा' होने की कहानी है कि कैसे वह अपने पूर्ण समर्पण, सच्ची लगन और एकनिष्ठा के आधार पर एक ओजस्वी योगी 'श्री एम' के रूप में विकसित हुआ। सरल भाषा में श्री एम अपनी मनमोहक हिमालयी यात्राओं और उनसे वापसी के वृतांत, औपनिषदिक दर्शन के गहरे ज्ञान और व्यक्तिगत अनुभवजन्य गहन आध्यात्मिक अन्तर्दृष्टि को मधुरता से पाठकों के साथ बांटते हैं- उन्हें एक अनूठी और विचारोत्तेजक यात्रा का अवसर प्रदान करते हैं। (फ्लैप कवर से) 

Friday, 22 May 2020

320. नास्तिकों‌ के देश में- प्रवीण कुमार झा

हाॅलैण्ड की दिलचस्प यात्रा
नास्तिकों के देश में, नीदरलैण्ड- प्रवीण कुमार झा

      प्रवीण कुमार झा पेशे से चिकित्सक हैं। लेकिन इसके साथ-साथ वे यायावर भी हैं। समय समय पर घूमते रहते हैं। हालांकि उनका घूमना कुछ उद्देश्यवश होता है लेकिन इस उद्देश्य के साथ-साथ वे अपनी मनमौजी प्रवृत्ति के चलते कुछ रोचक घटनाओं को भी देख जाते हैं और पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर देते हैं।- दरअसल मैं इस यात्रा में एक शोध की वजह से आया था। मैं गिरमिटिया इतिहास के कुछ अंश तलाश रहा था, जो यहीं कहीं बिखरे पड़े थे।
लेखक प्रवीण झा शहरों और देशों के विचित्र पहलूओं में रुचि रखते हैं। आईसलैंड के भूतों के बाद यह अगला सफर नीदरलैंड के नास्तिकों की तफ़्तीश में है। इस सफर में वह नास्तिकों, गंजेड़ियों और नशेड़ियों से गुजरते वेश्याओं और डच संस्कृति की विचित्रता पर आधी नींद में लिखते नजर आते हैं। किताब का ढाँचा उनकी चिर-परिचित खिलंदड़ शैली में है, और विवरण में सूक्ष्म भाव पिरोए गए हैं। यह एक यात्रा-संस्मरण न होकर एक मन में चल रहा भाष्य है। भिन्न संस्कृतियों के साम्य और द्वंद्व का चित्रण है। इसी कड़ी में उनका सफर एक खोई भारतीयता का सतही शोध भी करता नजर आता है।

Sunday, 10 May 2020

313. कण कण केदार- देवेन्द्र पाण्डेय

केदारनाथ पैदल यात्रा का वर्णन
कण कण केदार- देवेन्द्र पाण्डेय

ऋषिकेश से चोपता तक का लगभग 200 कि.मी. का अंतर मानो कटने का नाम ही नही ले रहा था, मैंने अनुमान लगाया था कि 50 किमी प्रतिघन्टा भी यदि कैब चली तो भी अधिकतम 5 घण्टो में हम चोपता में रहेंगे, लेकिन सारा गणित तब बिगड़ गया जब गाड़ी 30 किमी प्रतिघन्टा के हिसाब से चलने लगी। ऊपर से चार धाम योजना सड़क निर्माण के कारण जगह जगह कटिंग चल रही थी, जिस कारण हमें उकीमठ पहुंचने तक ही अच्छी खासी रात हो गयी, रास्ते मे जब थकान अधिक हो गयी तब एक छोटे से होटल में रुक कर गरमागरम चाय और मैगी का नाश्ता किया, मैंने इतनी स्वादिष्ट मैगी आज तक नही खायी थी, मन प्रफुल्लित हो गया, इस समय तक हवा में ठंडक भी काफी हो चुकी थी। (किताब के अंश)
मनुष्य में आदिकाल घूमने की प्रवृत्ति पायी जाती है। वह कभी भी एक जगह पर स्थिर होकर नहीं बैठ सकता, अगर एक जगह उसे बैठा रह जाना पड़े तो उसका जीवन नीरस हो जाता है। इसी नीरसता को दूर करने के लिए वह अक्सर  यात्राओं पर निकल जाता है। 

Sunday, 1 September 2019

222. भूतों के देश में - प्रवीण झा

भूतों के देख में आईसलैण्ड- प्रवीण कुमार झा, यात्रा वृतांत

विश्व के नक्शे पर एक छोटा सा देश है आइसलैंड।
इसी आइसलैण्ड की यात्रा का वर्णन है उक्त छोटी सी किताब। यह किताब kindle पर online प्रकाशित हुयी है। इसकी भूमिका में भी कुछ भी वर्णित नहीं है या यू कहें की भूमिका, लेखकिय कुछ भी नहीं लिखा गया। विभिन्न स्त्रोतों और किताब पढने के बाद इस पर कुछ मेरे विचार प्रस्तुत हैं।
आइसलैण्ड के लोग भूतों पर ज्यादा विश्वास करते हैं। लेखक को भी भूतों में दिलचस्पी है। जब से सुना, आईसलैंड में प्रेत बसते हैं, इच्छा थी कि इन विदेशी प्रेतों से भी एक बार रू-ब-रू हो लूँ।  (किताब से)
    एक दिन लेखक भी भूतों के देश आइसलैण्ड जा पहुंचा। वहाँ लोगों से भूतों के विषय पर चर्चा की। कुछ ऐसे स्थान भी देखे जहाँ भूतों का निवास माना जाता है।

      यह साठ पृष्ठ की एक छोटी सी रचना है। लेखक ने आइसलैंड के लोगों के भूत- प्रेत आदि के प्रति विश्वास का वर्णन किताब में किया है। उसके साथ-साथ वहाँ के बर्फीले तूफान का वर्णन भी है। प्रस्तुत पुस्तक में कहीं कहीं तो भूतों का वर्णन न होकर बर्फ का चित्रण ही है।
    कुछ जगह आश्चर्यजनक तथ्य या घटनाएं भी वर्णित है लेकिन उनके पीछे का कहीं कोई कारण स्पष्ट वर्णित नहीं है।
किताब छोटी सी है पढना चाहो तो पढ सकते हैं। मध्यम स्तर की है। कोई निष्कर्ष पर नहीं पहुंचाती, बस घटनाओं का वर्णन है।
इस किताब का शीर्षक मुझे रोचक लगा इसलिए पढ ली।
किताब में से कुछ रोचक पंक्तियाँ
- आईसलैंड के दस प्रतिशत लोग कोई न कोई किताब लिख चुके हैं। यह मुझे पंजाब की याद दिलाता हैं, जहाँ कहते हैं कि हर दसवें घर से एक ‘म्यूज़िक सी.डी.’ निकली है।
- यहाँ क्राइम-फिक्शन का इतना शौक है कि आईसलैंड की प्रधानमंत्री भी पहले ‘क्राईम-फिक्शन’ ही लिखती थीं।
- अनुमान है कि आईसलैंड में हर हफ्ते लगभग 500 बार भूकंप आते हैं।
- प्राईवेट अस्पताल हैं ही नहीं। छह सरकारी अस्पताल और कुछ सरकारी क्लिनिक हैं।

      यह एक छोटी सी रचना है। आप चाहे तो इसे
भूतों में दिलचस्पी के नाते पढ सकते हैं, या फिर आइसलैण्ड के बारे में थोड़ा बहुत जानना चाहते हैं तो पढ सकते हैं। हालांकि किताब लघु आकार की है इसलिए ज्यादा उम्मीद न रखे की इससे बहुत कुछ जानने को मिलेगा। बस इतना है की छोटा आकार है और रोचक है। कम समय में पढ सकते हैं। कुछ घटनाओं का अधूरा सा वर्णन भी आपको परेशान कर सकता है।
आइसलैण्ड नक्शे में














किताब - भूतों के देश में आइसलैण्ड
लेखक- प्रवीण कुमार झा
पृष्ठ- 60
प्रथम संस्करण- मार्च 2018

Wednesday, 21 August 2019

218. पृथ्वी के छोर पर- शरदिंदु मुकर्जी

एक वैज्ञानिक की अंटार्कटिका यात्रा
पृथ्वी के छोर पर- डाॅ. शरदिन्दु मुकर्जी

कभी-कभी अलग प्रकार ही नहीं बहुत अलग प्रकार की किताबें पढने को मिल जाती हैं। ऐसी किताबें जो स्मृति पर अमिट छाप छोड़ जाती हैं। जब कुछ ऐसा पढने को मिल जाये जो अपनी उम्मीदों से परे हो, अपनी कल्पना शक्ति से आगे हो और रुचिकर हो तो उसकी चर्चा आवश्यक हो जाती है। ऐसी ही एक रचना 'पृथ्वी के छोर पर' पढने को मिली।
पृथ्वी के छोर पर' भूवैज्ञानिक शरदिंदु मुकर्जी जी के अंटार्कटिका यात्रा का रोमांचक वर्णन है। भारत का वैज्ञानिक दल अंटार्कटिका में शोध हेतु जाता रहता है। वहाँ पर भारत के दो शोध केन्द्र भी हैं दक्षिण गंगोत्री और मैत्री।
अंटार्कटिका के अपने तीन दशकों से भी अधिक समय के सम्पर्क से और वहाँ के विभिन्न अभियानों में भाग लेने के कारण उनके पास इस अद्भुत हिमप्रदेश के अनेक रहस्यमय संस्मरणों का एक विशाल भण्डार मौजूद है. एक सशक्त लेखक, प्रकृति प्रेमी कवि तथा कुशल वैज्ञानिक होने के कारण जिस सहजता से बखूबी उन्होंने अपनी आँखों देखी बातों का विवरण ‘पृथ्वी के छोर पर' में लिखा है, उसने इस पुस्तक को रोमांचकारी रूप प्रदान कर दिया है.

Thursday, 18 October 2018

147. मुअनजोदड़ो- ओम थानवी


       मुअनजोदड़ो नाम सुनते ही आँखों के समक्ष एक तस्वीर उभरती है, एक प्राचीन और सुव्यवस्थित शहर की। इस तस्वीर के साथ एक कसक भी उठती है वह कसक है की यह शहर क्यों, कैसे जमीन में दफन हो गया। कहां गये इस प्राचीन सभ्यता के लोग। लेकिन उत्तर आज तक न मिल सके।
सिंधु घाटी सभ्यता के विषय में स्कूल, काॅलेज से ही पढते आये हैं। जितना इस सभ्यता को जाना उतनी ही इच्छा और प्रबल हो उठी।


अगर आपको सिंधु घाटी सभ्यता को समझना है तो ओम थानवी जी द्वारा लिखी गयी पुस्तक 'मुअनजोदडो' बहुत उपयोगी है। यह पुस्तक न तो इतिहास की है ना साहित्य की। यह तो साहित्य और इतिहास का मिश्रण कर उसे एक कलात्मक रूप प्रदान करती है। इस यात्रा वृतांत के माध्यम से मुअनजोदड़ो का जो कलात्मक शैली में चित्रण यहाँ किया गया है वह एक अनोखी अनुभूति देता है, एक ऐसी अनुभूति जिसमें आपको अहसास होगा की आप स्वयं मुअनजोदङो की गलियों में घूम रहे हो।
मुअनजोदड़ो अर्थात् मुर्दों का टीला। रांघेग राघव ने भी इस विषय पर एक उपन्यास लिखा है 'मुर्दों का टीला'।

यह एक संस्मरणात्मक यात्रा वृतांत है। जनसत्ता अखबार के संपादन ओम थानवी का। इस यात्रा वृतांत या मुअनजोदड़ों वर्णन की विशेषता है की यह वर्णन जीवंत है, और इस जीवन को पाठक भी महसूस करता है।
                   मुझे प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी के दौरान इस वृतांत को पढने का अवसर मिला, हालांकि वह इस पुस्तक का कुछ अंश ही था, लेकिन उसने जो मन पर प्रभाव छोड़ा वह प्रभाव ही इस पुस्तक को पढने को प्रेरित करने के लिए काफी था। अब यह पुस्तक 'राजकीय आदर्श माध्यमिक विद्यालय-माउंट आबू' में‌ मिला तो पढने बैठ गया।
ओम थानवी की भाषा शैली ही इतनी अच्छी है की वह मन पर एक अमिट प्रभाव छोडती है।


               पाकिस्तान में स्थित एक प्राचीन नगर है मुअनजोदड़ो जो वक्त के साथ खत्म हो गया। उस पर न जाने कितनी मिट्टी की परतें बिछ गयी। वक्त के साथ मुअनजोदड़ो अपना अस्तित्व गया बैठा तो अपने समय का एक महानगर गायब हो गया।
                    मिट्टी के नीचे एक शहर दब गया, क्यों और कैसे यह प्रश्न आज भी अनुतरित है। इस शहर पर मिट्टी के टीले स्थापित हो गये। अब शहर न रहा वहाँ मिट्टी के टीले थे। उन्हीं टीलों पर बौद्ध धर्म के मठ स्थापित हो गये। वक्त फिर बदला और वह बौद्ध मठ भी खत्म हो गये। यहाँ एक बौद्ध स्तूप भी था।
                  एक पुरातत्त्वज्ञ यहाँ आये। सन् 1922 जब राखालदास बद्योपाध्याय‌ यहाँ आए, तब वे इसी स्तूप की खोजबीन करना चाहते थे। ....धीरे-धीरे यह खोज विशेषज्ञों को सिंधु घाटी सभ्यता की देहरी पर ले आयी। (पृष्ठ-50)
लेकिन खुदाई ले दौरान उनको एहसास हुआ की इन बौद्ध मठों/ स्तूप के नीचे भी कुछ और है। इस तरह एक स्तूप की खोज से वे विश्व की प्राचीन सभ्यता तक पहुंचे। यहाँ स्थित बौद्ध स्तूप को नागर भारत का सबसे पुराना लेंड स्केप कहा जाता है। (पृष्ठ-51)
               इस खोज से भारत की गणना भी एक प्राचीन सभ्यता वाले देश के रूप में होने लगी। मुअनजोदडो ही था जिसने सबसे पहले भारत के इतिहास को पुरातत्त्व का वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।(पृष्ठ-38)

         मुअनजोदड़ो एक विशाल और विकसित सभ्यता थी। इसकी सभ्यता की संस्कृति की झलक वहाँ से प्राप्त अवशेषों से भी होती है। यहाँ का नगर, गलियाँ, नालियाँ आदि एक तय पैमाने के अनुसार निर्मित है। वर्तमान में हमारे पास चाहे जितनी सुविधा है लेकिन हम कोई व्यवस्थित शहर नहीं बसा सके लेकिन मुअनजोदड़ो की उस समय की व्यवस्था वर्तमान चंडीगढ़ शहर से मिलती है। क्या चंडीगढ़ की प्रेरणा वहीं से आयी है। कोई घर सङक पर नहीं खुलता, उनके प्रवेश द्वार अंदर गलियों में है। (पृष्ठ-61)
                यहाँ बहुत कुछ अदभुत मिला। यहाँ से लगभग सात सौ के करीब कुएं मिले। एक तरफ यह सभ्यता सिंधु नदी के किनारे बसी थी दूसरी तरफ सात सौ के करीब कुएं, यह रहस्य समझ में नहीं आया। विद्वान इरफान हबीब कहते हैं -"सिंधु घाटी सभ्यता संसार में पहली ज्ञात संस्कृति है, जो कुएँ खोद कर भू-जल तक पहुंची। (पृष्ठ-63)
सिर्फ कुएं ही नहीं और भी बहुत कुछ यहाँ से मिला। याजक नरेश, नर्तकी मूर्ति........... यहाँ से प्राप्त एक नर्तकी की मूर्ति के विषय में पुरातत्त्वज्ञ मार्टिन वीलर ने कहा है- "मुझे नहीं लगता कि संसार में इसके जोङ की कोई दूसरी चीज होगी। (पृष्ठ-43)


                   ओम थानवी साहब ने इस संस्मरणात्मक यात्रा वृतांत को जिस भाषा शैली लिखा है वह पाठक को अनुभूति करवा देती है जैसे पाठक स्वयं उसी प्राचीन महानगर नें खड़ा है। उसकी गलियां में घूम रहा है। वहाँ के घरों को, वहाँ की सभ्यता और संस्कृति को महसूस कर रहा है।   मुअनजोदड़ो की खूबी यह है कि इस आदिम शहर की सड़को और गलियों में आप आज भी घूम-फिर  हैं। यहां की सभ्यता और संस्कृति का सामान चाहे अजायबघरों की शोभा बढ़ा रहा हो, शहर जहां था अब भी वहीं है। आप इसकी किसी भी दीवार पर पीठ टिका कर सुस्ता सकते हैं। वह कोई खण्डहर क्यों न हो, किसी घर की देहरी पर पाँव रख कर सहसा सहम जा सकते हैं, जैसे भीतर अब भी काई रहता हो। रसोई की खिड़की पर खड़े होकर उसकी गंध महसूस कर सकते हैं। (पृष्ठ-49,50)

                 इस सभ्यता की खुदाई तो काफी समय तक चलती रही लेकिन‌ इसकी प्राचीनता का आंकलन काफी समय बाद हो सका। मुअनजोदड़ो के खण्डहर 1924 में दुनियां के सामने आए। इनकी खुदाई का श्रेय जाॅन‌ मार्शल को दिया जाता है। (पृष्ठ-44) और उसके बाद तो काफी पुरातत्ववेता यहाँ खुदाई करते रहे। जैसे, डीआर भण्डारकर -1911, दयाराम साहनी- 1917, राखालदास बनर्जी- 1922-23, माधोस्वरुप वत्स, काशीनाथ दीक्षित आदि।

         समय के साथ मुअनजोदड़ो की खुदाई बंद हो गयी। लेकिन कुछ प्रश्न आज भी अधूरे हैं जिनका उत्तर किसी भी विद्वान के पास नहीं। यह अधूरापन कब खत्म होगा यह तो भविष्य ही तय करेगा लेकिन जब भी इन अधूरे प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे तब सिंधु घाटी सभ्यता प्राचीन इतिहास पर ....
1. यह सभ्यता खत्म कैसे हो गयी?
2. इस शहर का वास्तविक नाम क्या था?
3. आखिर कहां और क्यों चले गये एक विकसित सभ्यता के लोग?
4. इस सभ्यता की लिपि आज तक पढी नहीं गयी।

          ओम थानवी का यात्रा वृतांत 'मुअनजोदड़ो' बहुत ही रोचक है। पाठक को यह प्राचीन सभ्यता के शहर मुअनजोदड़ो का भ्रमण करवाने में सक्षम है। अगर सहृदय पाठक है तो ओम थावनी जी भावों को जगाने वाली इस शैली में खो जायेगा।

किताब आवरण चित्र मुअनजोदड़ो से प्राप्त मिट्टी का मुखौटा है।
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पुस्तक- मुअनजोदड़ो (यात्रा वृतांत)
लेखक- ओम थानवी
प्रकाशक- वाणी प्रकाशन
पृष्ठ-118
मूल्य- 200₹
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किताब का लिंक- वाणी प्रकाशन



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अतिरिक्त तथ्य किताब से...
- पाकिस्तान में सबसे ज्यादा हिंदू- कोई पच्चीस लाख- सिंध में रहते हैं। (पृष्ठ-23)
- मुस्लिम राज सबसे पहले सिंध में स्थापित हुआ।(पृष्ठ-23)
सन् 711 में सिंध शासक दाहर पर मोहम्मद बिन कासिम ने हमला किया।

- पुरातत्त्व को इतिहास का रोशनदान कहा जाता है। (पृष्ठ38)
- झूले लाल जी के गीत 'दमा दम मस्त कलंदर' में आया 'सेवण' शब्द सिंध की एक जगह का नाम है।


Thursday, 26 October 2017

73. वह भी कोई देस है महराज - अनिल यादव

पूर्वोत्तर भारत के जीवन की दहशत भरी यात्रा।।
  
   पेशे    से पत्रकार अनिल यादव का प्रस्तुत यात्रा वृतांत बहुत ही रोचक व रोमांच से भरा है।  अपने मित्र के साथ यात्रा पर निकले अनिल यादव को भी शायद पता हो की उनके जीवन में यह यात्रा वृतांत स्वयं उनके साथ-साथ पाठकवर्ग के लिए भी यादगार बन जायेगा।
इस यात्रा वृतांत पर कुछ लिखना बहुत ही कठिन कार्य है क्योंकि जिस यात्रा का अनिल यादव ने दस वर्ष में पूर्ण कर उसे एक पुस्तक का रूप प्रदान किया है उस पुस्तक को चंद शब्दों में व्यक्त करना बहुत मुश्किल का काम है।
     मुझॆ नहीं लगात की में इस पोस्ट में इस पुस्तक के साथ न्याय कर पाऊंगा लेकिन नये पाठकों के लिए इतना ही कह सकता हूँ की एक बार आप इस यात्रा वृतांत का अवश्य पढें ताकी आप इस सत्यता से परिचित हो सकें।
  यात्रा वृतांत शुरु होता है दिल्ली से। अनिल यादव लिखते हैं।
  पुरानी दिल्ली के भयानक गंदगी, बदबू और भीङ से भरे प्लेटफार्म नंबर नौ पर खङी मटमैली ब्रह्मपुत्र मेल को देखकर एक बारगी लगा कि यह ट्रेन एक जमाने से इसी तरह खङी है। अब कभी नहीं चलेगी। (29.11.2000)
   
यह यात्रा वृतांत भारत के उन सात राज्यों का चित्रण करता है जो अपने सौन्दर्य के कारण जितने विख्यात हैं, उतने ही दहशत के लिए कुख्यात है।
   

माजुली दुनिया का सबसे बङा नदी द्वीप है और असम का धार्मिक तंत्रिका केन्द्र है। (पृष्ठ-39)
  ज्यादातर असमिया हिंदू गांव किसी न किसी मठ से संबद्ध हैं और वहाँ के सामाजिक जीवन में नामघर की केन्द्रीय भूमिका है। (पृष्ठ -41)

नागालैण्ड का वर्णन लेखक इन पंक्तियों से करता है " पहली नजर में नागालैंड का पहला कस्बा दीमापुर ...टूटी सङकों...फटेहाल लोगों...ट्रांस्पोर्ट कम्पनी का बङा गोदाम लगता है।"-(पृष्ठ-49)
,- नागालैंड की अर्थव्यवस्था केन्द्र सरदार से मिलने वाले नब्बे प्रतिशत अनुदान से चलती है। (पृष्ठ-54)
- ....आँखें ...नये देश की नयी संस्कृति का साक्षात्कार कर रही थी, जहां वेलेन्टाइन डे पर रेस्टोरेंट ' डाॅग मीट स्पेशल' की तख्ती लटका कर प्रेमी जोङों का स्वागत करते हैं।(पृष्ठ-55)

उग्रवाद कि छाया तले अपराध के छोटे-छोटे नेटवर्क पूरे पूर्वोत्तर में फैले हैं।( पृष्ठ-53)
   नागालैंड को पूर्वोत्तर के उग्रवाद की माँ का दर्जा मिला है।(पृष्ठ-70)
- नागाओं की मानसिकता पर ढेरों अध्ययन हुए हैं जिनका एक ही निष्कर्ष है, संवेदनहीनता और पागलपन। (पृष्ठ- 73)

मेघालय चैप्टर पृष्ठ 74 से आरम्भ ।
....रोडवेज की बस भोर के तीन बजकर अडतालीस मिनट पर शिलांग पहुंची। (पृष्ठ-74)
शिलांग नवधनिकों के बच्चों की शिक्षा का केन्द्र है लेकिन यहाँ बीच में स्कूल छोङ देने वालद आदिवासी बच्चों की तादाद बढी है।(पृष्ठ-75)
मेघालय में बेरोजगारी, शराबखोरी, ड्रग्स और एडस बङी सामाजिक समस्या बन कर उभर रही है।(पृष्ठ-75)

- मेघालय का प्रथम उग्रवादी संगठन भी वसूली के लिए ही बना था।(पृष्ठ-85)

"अनिल यादव की यात्रा कृति 'वह भी कोई देश है महराज' को पढते हुए और उसके जिक्र से मेरा रक्तचाप बदल जाता है।.....पूर्वोत्तर देश का उपेक्षित और अर्धज्ञात हिस्सा है, उसको महज सौन्दर्य के लपेटे से देखना अधूरी बात है। अनिल यादव ने कंटकाकीर्ण मार्गों से गुजरते हुए सूचना और ज्ञान, रोमांच और वृतांत, कहानी और पत्रकारिता शैली में इस अनूठे ट्रैवलाॅग की रचना की है।"- ज्ञानरंजन
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पुस्तक- वह भी कोई देस है महराज
लेखक- अनिल यादव
विधा- यात्रा वृतांत
प्रकाशन- अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद- उत्तर प्रदेश
www.antikaprakashan.com
ISBN 978-93-85013-79-9
संस्करण- 2017
प्रथम संस्करण- 2012
पृष्ठ-
मूल्य-150₹